ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
रमेश जोशी
रमेश जोशी
18 अगस्त 1942 को चिड़ावा, राजस्थान में जन्म। राजस्थान वि·ाविद्यालय से एम.ए. और रीजनल कालेज ऑॅफ एज्यूकेशन भोपाल से बी.एड., पोरबंदर से पोर्ट ब्लेयर तक घुमक्कड़ी, प्राथमिक शिक्षण से प्राध्यापकी करते हुए केन्द्रीय विद्यालय जयपुर से सेवानिवृत्त। संप्रति : अमरीका में अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति की त्रैमासिक पत्रिका "वि·ाा' के प्रधान संपादक। मूलत: व्यंग्यकार, गद्य-पद्य की 6 पुस्तकें प्रकाशित। ब्लॉग : jhoothasach.blogspot.com

भविष्य की भाषा और भाषा का भविष्य
जो पराधीन है, जो विवश है, जो निष्प्राण है, जो मूक है या जिसे बोलने का अवसर नहीं है, उसका क्या भविष्य और क्या वर्तमान। "लायी हयात आए, कज़ा ले चली चले", वाली स्थिति है। बकरी का क्या भविष्य और मुर्गे क्या मुस्तकबिल? किसान का क्या भविष्य? उसे तो खेती क
तुम ही ज़रा पहल कर देखो
जीवन में बहुत बार ऐसा होता है कि बात बहुत छोटी होती है लेकिन वह व्यक्ति की अकड़ और अहंकार से बहुत बड़ी हो जाती है। बहुत बार हमारे मन में यह बात आती है कि आगे बढ़कर शुरुआत करें लेकिन हम दूसरे पक्ष द्वारा पहल किए जाने का इंतज़ार करते रह जाते हैं और समय
गर्व ही नहीं, चिंतन का क्षण भी
भारत के एक दृढ़ निश्चयी नायक, स्वतंत्रता सेनानी, प्रथम उप प्रधानमंत्री और लौह-पुरुष के नाम से विख्यात सरदार पटेल की लगभग तीन हजार करोड़ रुपए की लागत से निर्मित, दुनिया की सबसे ऊँची प्रतिमा का उनके 144वें जन्म दिन 31 अक्तूबर को बड़े तामझाम से लोकार्पण
अकबर प्रयाग से बड़ा नहीं हो सकता
प्रयाग का मूल शब्द है याग जो यज् अ घञ् के योग से बना है। यागः का अर्थ होता है उपहार, यज्ञ, वह अनुष्ठान जिसमें आहुति दी जाती है। याग से पहले प्र उपसर्ग लगा देने से प्रयाग बना है। प्रयाग अर्थात एक विशिष्ट प्रकार का यज्ञ।उत्तराखंड को देव भूमि क

सन्देश के प्रसंग और सन्दर्भ
जब तक प्रसंग और सन्दर्भ का हवाला न दिया जाए तब तक किसी बात का सही अर्थ नहीं खुलता। इसीलिए जब किसी गद्यांश या पद्यांश की व्याख्या की जाती है तो पहले उसका प्रसंग-सन्दर्भ बताया जाता था। कोई 45 वर्ष पहले हुई एक सत्य घटना को चुटकले के रूप में इतना प्रच
उत्सव, उत्साह और गौरव के परे हिन्दी का सच
हिन्दी विश्व की सर्वाधिक बोली जाने वाले पहली, दूसरी, तीसरी भाषा है या जैसा भी उत्साही भक्तों को लिखने-बोलने के उस क्षण में उचित लगे। हिन्दी विश्व के कितने देशों में बोली और कितने विश्वविद्यालयों में पढ़ाई जाती है यह भी उत्साही सेवकों की गणना पर निर
मगर देखो, कहाँ पहुँचे
यदि किसी कवि की एक पंक्ति भी लोक में इतना गहरे तक पैठ जाए कि वह अपनी बात कहने के लिए उसका सहारा ले तो समझिए रचनाकार सफल है, उसका जीवन सार्थक हो गया। लेकिन यह सौभाग्य सबको नहीं क्योंकि सब में इतनी क्षमता नहीं होती। किसी लेखक को खुद को कोट नहीं करना
धर्म का मूल भाव
ऊँ सहनाववतु सहनौभुनक्तु सहवीर्यं करवावहै, तेजस्विना वधीतमस्तु मां विद्विषावहै। ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः।अर्थ : हम सभी एक-दूसरे की रक्षा करें। हम साथ-साथ भोजन करें। हम साथ-साथ काम करें। हम साथ-साथ उज्ज्वल और सफल भविष्य के लिए अध्यनन करें। हम

एक अनुवाद ही तो है जीवन
हालाँकि अधिसंख्य जीव मूल प्रवृत्तियों से संचालित जीवन मात्र ही जीते हैं लेकिन चिंतनशील जीव की यात्रा विचारों से शब्दों में होती हुई कर्म तक जाती है। इस प्रकार शब्द विचारों का अनुवाद हैं तो कर्म शब्दों का अनुवाद है। एक सार्थक जीवन मन-वचन-कर्म की एक
ज्ञान और शिक्षा की प्रकृति
विगत दिनों एक छोटा-सा समाचार था- अपंजीकृत मदरसों और वैदिक स्कूलों की पढाई अमान्य। आगे खुलासा था कि यह सलाह सेन्ट्रल एडवाइजरी बोर्ड ऑफ़ एज्यूकेशन की उपसमिति द्वारा सरकार को भेजी गई रिपोर्ट में शामिल है। इसके लिए केंद्र अपंजीकृत मदरसों और वैदिक स्कूल
गंगा-जमनी तहज़ीब के कमजोर पक्ष
यह देश ईसा पूर्व से ही विदेशी आक्रमणों को झेलता रहा है और बार-बार अपने छोटे-बड़े शासकों की मूर्खता, फूट और स्वार्थ के कारण पददलित होता रहा है। कोई पाँच छह हजार वर्ष पहले घुमंतू आर्य आए और यहाँ की नदी घाटियों में बस गए और यहीं के हो गए। ईसा से तीन श
क्यों और कैसी शिक्षा
सृष्टि में जीव और उसके जीवन की एक निष्पक्ष और निरपेक्ष व्यवस्था आदिकाल से है। यह व्यवस्था सृष्टि के संतुलन को बनाए रखती है। उसमें किसी प्रजाति का बढ़ना, नष्ट होना, परिस्थितियों के अनुसार परिवर्तित होकर नया रूप धारण करना आदि सब स्वाभाविक हैं। वे किस

प्रार्थना की भाषा का रंग
नीचे वह प्रार्थना दी गई है जिसे 1964 से सभी केंद्रीय विद्यालयों में गाया जा रहा है। इसे लेकर विनायक शाह नामक वकील ने याचिका दायर की है कि हिंदी और संस्कृत की इस प्रार्थना के माध्यम से एक ख़ास धर्म का प्रचार किया जा रहा है। मूल रूप से यह एक आर्य समा
पुनर्विचार की आवश्यकता आस्था और उत्सव
इस दुनिया में, विशेषरूप से पुराने देशों में आस्था और परंपरा के नाम पर तत्त्वज्ञान को इतने आवरणों और मौखिक व लिखित गर्द-ओ गुबार ने इस कदर ढँक लिया है कि उनके पीछे के सच को, और यदि है तो, थोड़ी बहुत तत्कालीन वैज्ञानिकता को ढूँढ़ पाना असंभव-सा है।
दौड़ की दिशा
यह एक शाश्वत और सही मान्यता है कि गति कम है लेकिन दिशा सही है तो वांच्छित लक्ष्य की प्राप्ति थोड़ा विलंब से ही सही निश्चित है। इसका उदाहरण है वास्को-द-गामा द्वारा अफ्रीका का चक्कर लगाते हुए योरप से भारत पहुँचना। यदि ज्ञान हो और उस पर विश्वास हो तो
बंदूक की संस्कृति
वैसे तो जब संस्कृति के नाम पर "बंदूक-संस्कृति" शब्द तक को स्वीकृति मिल गई तो फिर शेष रह ही क्या गया? ऐसे में प्रदर्शन, आत्मप्रशंसा, झूठ, बड़बोलापन, लम्पटता, धोखा, जुमलेबाजी तो बहुत छोटी बातें हैं। ऐसे में भिक्षा, चोरी, डाका, देह-विक्रय, नकली माल बन

कैसी सेवा - कैसा स्वास्थ्य
जिन लोगों का स्वास्थ्य बीमा नहीं है और जो गरीब भी हैं उनकी बड़ी दुर्गति है। जिनके पास स्वास्थ्य बीमा है उन्हें भी इलाज़ के कुल खर्च का बीस प्रतिशत देना होता है, शेष बीमा कंपनी देती है।विगत शताब्दी के अंतिम दशक के प्रारंभ (199
भाषा की ज़रूरत है क्या?
जिस तरह से अधिकतम मुनाफा कमाने और अपनी, बढ़ी या बाज़ार द्वारा बढ़ाई जा रही, इच्छाओं के कारण आदमी ऐसे भाग रहा है जैसे कि उसके पीछे शिकारी कुत्ते पड़े हुए हैं। गरीब से लेकर समृद्धतम देश के निवासियों को भी सारा दिन जीवनयापन मात्र के लिए खपा देना पड़ता है।
नई दुनिया का पुराना कवि
दो जुलाई 2017 को दिवंगत, 21 फरवरी 1924 को नवलगढ़, राजस्थान में जन्मे और गया बिहार में पले-बढ़े श्री गुलाब खंडेलवाल हिंदी के वरिष्ठतम साहित्यकार थे।जैसे ही उनके निधन का समाचार मिला तो कई यादें ताज़ा हो गईं। बात जुलाई 2000 की है जब मैं अपने सबसे
लोक स्वयंभू होता है
बाग़, बगीचे एक योजनाबद्ध तरीके से, किसी उद्देश्य विशेष के लिए लगाए जाते हैं। उनकी सार-सँभाल और विशेष व्यवस्था करनी होती है। वे किसी कारणवश नष्ट भी हो सकते हैं लेकिन जंगल उगाए या लगाए नहीं जाते। वे स्वाभाविक रूप से बनते और जीवित रहते हैं, जंगलों में

भैंस और चींचड़े
मनुष्य के विकास के कई सोपान हैं। यदि हम इनका एक मोटा-सा वर्गीकरण करें तो ये इस प्रकार हो सकते हैं- अन्य जानवरों के समान भोजन ढूँढ़ने वाला आदिम मनुष्य, भोजन पालने वाला पशुपालक मनुष्य, भोजन उगाने वाला खेतिहर मनुष्य। इनमें खेती से पहले की स्थितियों मे
सरोकारों से दूर होता सिनेमा
भरत मुनि ने नाटक को काव्य अर्थात साहित्य की सभी विधाओं में सर्वश्रेष्ठ माना है क्योंकि इसमें नृत्य, संगीत, अभिनय, संवाद, दृश्य आदि चेतना को प्रभावित करने वाले सभी उपादानों का समावेश होता है। उसी की तर्ज़ पर आज सिनेमा संचार, संवाद और सम्प्रेषण की सभ
मुक्ति के पिंजरे
शिक्षा, चिकित्सा और न्याय ये तीन क्षेत्र ऐसे हैं जिनसे और जहाँ से समाज के स्वरूप, निर्माण और विकास की दिशाएँ तय होती हैं। ये किसी के पद, धन, वंश, नस्ल आदि के आधार पर नहीं बल्कि आवश्यकता और पात्रता के अनुसार काम करते हैं। दवा और इलाज़ मर्ज़ और मरीज़ क
लोक मतलब सामूहिकता और समानता
सन् दो हजार में पहली बार अमरीका जाना हुआ। अमरीकी राज्य ज्योर्जिया की राजधानी अटलांटा की धरती पर पाँव रखते ही एक रोमांच-सा हुआ। 1965 में अमरीका में गोरे अमरीकियों के गुलाम रह चुके अफ़्रीकी मूल की नीग्रो नस्ल के कालों के लिए मानवाधिकारों की माँग करने

देखणा सो भूलणा नहीं
जीव का मूल स्वभाव है जिज्ञासा। यह उसकी मूलभूत जैविक आवश्यकताओं के कारण भी हो सकती है और मानसिक व वैचारिक ज़रूरतों के तहत भी। यह जिज्ञासा ही जीव को घुमाती है, सिखाती है और भटकाती भी है। परिस्थितिवश यह भाव कम-ज्यादा होता रहता है। जब मानव घुमंतू था तब
उत्सव और उल्लास के बीच
मनुष्य एक उत्सव-धर्मी जीव है लेकिन यह उत्सव-धर्मिता उसकी सुरक्षा, समृद्धि और विश्वास पर निर्भर करती है। जिस साल फसल खराब हो जाती है तो किसान के लिए दिवाली का कोई अर्थ नहीं रह जाता। आतंक, अनास्था और अभाव के साए में उत्सव की मानसिकता नहीं बनती। जिसक
अतियों के बीच झूलता अमरीकी समाज
मूल रूप से अमरीकी समाज सनक की सीमा तक पहुंचा हुआ समाज है जिसकी अपनी कुंठाओं से मुक्ति नहीं हुई है। वैसे तो हर समाज की अपनी कुंठाएँ होती हैं और उसे उनसे मुक्त होते हुए अपने अस्त्तित्व पर खतरा लगता है। भले ही भारतीय दर्शन वैदिक काल में बहुत मुक्त और
प्रवास के मंतव्य और मानसिकता
आदिमकाल में मनुष्य का कोई निश्चित स्थान नहीं था और राष्ट्र जैसी अवधारणा तो कतई नहीं थी। भोजन के लिए पशुओं का पीछा करता या पशुपालन युग में अपने पशुओं के लिए चरागाहों और पानी की तलाश में मनुष्य जाने किन-किन जाने-अनजाने स्थानों में भटकता रहा। पशुपालन

भय का व्यवसाय
दवा कंपनियों से मिलकर डॉक्टर तरह-तरह की बीमारियों से डराते रहते हैं। स्वाइन फ्लू का डर भी इसी योजना का एक भाग था। अमरीका में भी स्वाइन फ्लू से ज्यादा लोग साधारण फ्लू से हर वर्ष मरते हैं। भारत में भी एड्स से ज्यादा लोग दस्त से मरते हैं।
आदमी का विकल्प नहीं हो सकता
जीवित होने का प्रमाण-पत्र जमा करवाने लगभग नौ महीने बाद बैंक गया। कारण एक तो पास बुक भरने वाली थी दूसरे कई महीने की प्रविष्टियाँ बाकी थीं। देखा, बैंक में कई परिवर्तन हो गए हैं। नौ महीने कम नहीं होते। इतने अंतराल में एक नए सिस्टम ने जन्म ले लिया था।
स्वच्छंदता के उपफल
आदमी समस्त सृष्टि पर तो नियंत्रण नहीं कर सकता लेकिन अपने समाज, परिवार और अपने संपर्क में आने वाले सभी मनुष्यों, पशु-पक्षियों और यहाँ तक कि प्रकृति के अवयवों और उपादानों से भी अपनी और अपने समाज की व्यवस्था के अनुसार एक विशिष्ट प्रकार के आचरण और व्य
दास कबीर जतन ते ओढ़ी
कबीर ने मानव देह का झीनी चादर का प्रतीक लेकर एक अति स¶ाक्त साँग-रूपक रचा है जिसके अंत में वे अन्यों और स्वयं के बारे में जो धाकड़ घोषणा करते हैं वह गर्वोक्ति नहीं, एक सिर चढ़कर बोलने वाला सच है। वे कहते हैं- सो चादर सुर-नर-मुनि ओढ़ी, ओढ़के मैली क

पानी बिच मीन पियासी
प्रकृति में हर तरह का स्वतः प्रबंधन है- जल, मल, जनसंख्या, विभिन्न जीवों का संतुलन आदि। लेकिन मनुष्य की विकास की नई अवधारणा के कारण प्रकृति की इस व्यवस्था को कई तरह से प्रभावित किया है- सकारात्मक कम और नकारात्मक अधिक। जब प्रकृति की व्यवस्था में मनु
कुम्भ और कुम्भीपाक
समुद्र-मंथन से अमृत निकलता है और विष-वारुणी भी। जब विष्णु वि?ामोहिनी का रूप धारण करके धोखे से दानवों को वारुणी और देवों को अमृत पिलाते हैं तो वे एक ही बर्तन में अन्दर से दो भाग करके अमृत और वारुणी रखते हैं। जीव के इसी कुम्भ में अमृत और वारुणी ही न
नेक्स्ट टू गॉडलीनेस
सफाई के बारे में अंग्रेजी कहावत है- क्लीनली नेस इज नेक्स्ट टू गॉडलीनेस। ई?ार के बाद सफाई ही सबसे महत्त्वपूर्ण है। वैसे तो ई?ार भी सफाई पसंद करता है- मन की सफाई, विचारों की सफाई, कर्मों की सफाई, वाणी की सफाई- एक निश्च्छल मन जो अंततः जीवन को भी सुन्
बंदूक की संस्कृति
अमरीका के राष्ट्रपति ओबामा अमरीका में जब-तब अकारण होने वाले हादसों के सन्दर्भ में बंदूक-संस्कृति को अनुशासित करने के बारे में जब बोल रहे थे तो उनके आँसू छलक पड़े। जिसे प्याज से लाए नकली आँसू भी कहा गया क्योंकि कहीं की भी राजनीति में न नीति है और न

अमेरिका में प्रवासी भारतीय
जेसे मानवेतर जीव भोजन, पानी और सुरक्षा के लिए समस्त सृष्टि में इधर-उधर भ्रमण करते रहते हैं वैसे ही मनुष्य के यत्र-तत्र भरण और प्रवासन का इतिहास भी रहा है। बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए उत्तर-पूर्व भारत के तथा व्यापार के लिए दक्षिण के चेट्टिया
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