ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
रमेश बक्षी उसे लेखक होने ने मारा (इस लेख में रमेश बक्षी के लेखन का लेखा-जोखा नहीं है, बल्कि यह एक व्यक्तिगत दस्तावेज़ है।)
01-Jun-2018 01:20 AM 2506     

28-29 मार्च, "92 को केंद्रीय हिन्दी निदेशालय द्वारा "साहित्यिक पत्रकारिता : अस्तित्व का संकट" विषय पर आयोजित गोष्ठियों में एकदम सूख कर काँटा हुए रमेश बक्षी को देखते ही लगा था कि उनके कदम महाप्रयाण पथ पर बढ़ चुके हैं और उनका शरीर धीरे-धीरे घट कर शून्य में विलीन होने जा रहा है। उस कृशकाय व्यक्ति के मुंह से साहित्य से इतर भी कुछ शब्द निःसृत हुए थे, "मणिका, मेरा बेटा बहुत प्यारा है, बहुत प्यारी बातें करता है। अभी छह साल का है।"
रमेश बक्षी के साथ कुछ इस तरह के किस्से-कहानियाँ जुड़े रहे कि उनके मुंह से घर-गृहस्थी, परिवार, बच्चा, ये बातें बड़ी असहज, अस्वाभाविक प्रतीत हुईं। कुछ अटपटा सा लगा कि रमेश अपने बेटे के प्रति मोह दर्शा रहे थे, वही रमेश जो रिश्तों के मामले में मोहमाया से रहित होने की छवि बनाए हुए थे। रमेश की आयु व उनके ढलते हुए शरीर के साथ छह साल के पुत्र की संगति नहीं बैठी। उनका यह बेटा किस पत्नी से होगा? कई वर्ष पूर्व शानी की बेटी के विवाह समारोह में रमेश ने अलका नाम की जिस लड़की को अपनी पत्नी कह कर परिचय कराया था, क्या यह बेटा उसी से है या उसके बाद रमेश किसी और लड़की के साथ रह रहे थे, मुझे इसकी कोई जानकारी नहीं थी लेकिन रमेश बक्षी के व्यक्तित्व के इस पक्ष की जानकारी थी कि वे अकेले नहीं रह सकते, उनके साथ कोई न कोई कन्या अवश्य रह रही होगी।
रमेश बक्षी अपने नेशनल बुक ट्रस्ट के दिनों में अपने से आधी उम्र की एक लड़की के साथ रह रहे थे। धीर, गंभीर, समझदार दिखते रमेश बक्षी के साथ एक निहायत चुलबुली सी बच्ची सी दिखती लड़की को देख कर लगा था कि ये दोनों ज़्यादा दूर तक साथ नहीं चल पाएंगे। उसका बचकाना व्यवहार, यहाँ वहाँ छेड़छाड़, कौन जाने, उसे रमेश बक्षी ने ही कहा हो कि यह "आधुनिक होना" होता है, और वह, अपने माता-पिता के घर से छूटी हुई वह, प्रयोगों की ज़िन्दगी जीती हुई वह "आधुनिक होना" सीख रही हो। कसूर उसका नहीं था, वह तो बच्ची थी, नया-नया लिखना शुरू किया था, लेखन के ग्लैमर की चकाचौंध तले उसकी आँखें मुंदी हुई थीं, शायद भरोसा रहा होगा कि एक प्रतिष्ठित लेखक के बाज़ुओं में बड़ी शक्ति होती है, जो उसे थामे रहेंगे। यह श्लोक संभवतः उसने बाद में सुना होगा कि "हम तो डूबेंगे सनम, तुमको भी ले डूबेंगे।" रमेश बक्षी ने अपना नाटक "देवयानी का कहना है" उसी दौरान लिखा था, जिसकी नायिका में उस लड़की की छवि बाकायदा मौजूद थी।
और एक दिन यह मनचली बच्ची परिपक्व लड़की में बदल गई। रमेश बक्षी के साथ जब तक रहती रही, बच्ची रही, रमेश से अलग होते ही उसे समझ ने आ घेरा और रातों रात वह बच्ची एक शांत, विचारशील, समझदार लड़की में परिवर्तित हो गई। रमेश बक्षी से अलग होने के बाद मुझे रवीन्द्र रंगशाला में एक बुजुर्ग दम्पति के साथ दिखाई दी। फ़िल्म "समर ऑफ़ फ़ौर्टी टू" देखने आई थी। मेरे आगे वाली सीट पर बैठी थी, एकदम मुरझाई हुई, सूख कर हड्डियों का ढांचा हुई, जैसे गम भीतर ही भीतर उसे खा रहा था। उसने ही मुझे पहचाना। मैं उस हालत में उसे पहचान नहीं पाई थी। वैसे तो रमेश बक्षी के साथ मेरी कभी व्यक्तिगत बातचीत नहीं हुई थी, लेकिन कभी-कभी कोई संवाद हो ही जाता था, जैसे इस लड़की से अलग होने के बाद उन्होंने कहा था, "मैं तो हर लड़की के साथ सिंसियर रहता हूँ, अब हर लड़की मुझे ही छोड़ जाए, मणिका, तो मैं क्या करूँ?" (मैंने उनका यह डॉयलाग अपनी कहानी "दिलेर" में फ़िट कर दिया था।) उस दिन रवीन्द्र रंगशाला में मैंने उस मुरझाई हुई लड़की तक रमेश की यह बात पहुंचाई तो वह बोली, "सोचो, जो आदमी हर लड़की के साथ सिंसियर रहता है, वह किसी एक के साथ कितना सिंसियर होगा?" लड़की की बात में दम था। बाद में यह लड़की बीबीसी, लंदन में नौकरी करने चली गई और अब तक रिटायर होकर वहीं बस गई है। लेकिन बात यहाँ रमेश बक्षी की हो रही है।
सुमति अय्यर, हिन्दी लेखिका, के साथ, सुना, रमेश बक्षी की अच्छी अन्डरस्टैंडिंग रही। एक साथ रहने के बाद अलग राहों पर चलना चुन लेने के बाद भी उन दोनों ने अच्छी दोस्ती निभाई। सुमति अय्यर की एक कहानी "मुट्ठी भर पहचान" पढ़ कर लगा था कि रमेश बक्षी जैसे एक पात्र के इर्द-गिर्द बुनी गई है, जिसे पढ़ने के बाद मेरी प्रतिक्रिया यह थी कि अप्रिय होने के बावजूद सचाई यह है कि लड़कियां ऐसे पुरुषों से प्यार करती हैं जो प्यार के कतई काबिल नहीं होते। बहुत खेले-खाए पुरुष लड़कियों को रिझाने की कला में माहिर होते हैं, जबकि सीधे ईमानदार लोग इतने स्मार्ट नहीं होते। ऐसे पुरुष केवल शरीर सुख प्राप्ति एकमात्र लक्ष्य रख कर, बौद्धिकता का आवरण ओढ़ कर, स्वयं को लापरवाह, बिंदास दिखाते हुए, भारतीयता को गाली की तरह प्रस्तुत करते हुए, लड़की-दर-लड़की अपनी अतृप्ति को नापते रहते हैं। ऐसे लोगों के जीने का मकसद केवल अपने लिए जीना है और तरह-तरह के तर्कों से अपने जीने के तरीके का उदात्तीकरण करना है। इस कहानी में ऐसे पुरुष के पाँव लेखिका ने स्त्री पात्र द्वारा स्पर्श करवाए। इस प्रकार औरत को मानसिक गुलामी में जकड़ा हुआ दर्शा कर उसे एक कुपात्र के आगे नीचा गिरा दिया। क्यों? क्या लड़कियां इतनी दृष्टिहीन होती हैं जो ऊपरी चमक-धमक के पीछे भागती हैं और गैर ईमानदार पुरुषों का अहम् पोषित करती हैं? सुमति अय्यर ने विवाह भी किया, अपने ही प्रदेश के पुरुष से, शायद अरेंज्ड मैरिज थी। उन पति-पत्नी में भी अच्छी अंडरस्टैंडिंग थी, पति दक्षिण भारत में कहीं रहता था और सुमति कानपुर में। विवाह के बाद भी सुमति ने रमेश के साथ अपने रिश्ते यानि दोस्ती को निभाया। कानपुर में कई वर्ष पूर्व उनकी हत्या हो गई थी, जिसका कारण रमेश से कतई जुड़ा हुआ नहीं था। कोई कार्यालयीन विवाद था।
कई वर्ष बाद रमेश बक्षी ने विश्व पुस्तक मेले में एक लड़की से परिचय करवाया, "मणिका, यह रानी है।" न जाने कौन थी वह, जो रानी तो क्या, अच्छे स्तरीय परिवार से सम्बंधित भी नहीं लगी थी। लोगों की महानता की हद है, नौकरानी को घर में "बैठा" लेंगे और उसके नाम का पूर्व अद्र्धांश हटा कर उसे नाम दे देंगे, रानी। होगी कोई, जिसके साथ रमेश अब रह रहे होंगे। ओफ़! रमेश बक्षी का यह हाल हो गया? उस लड़की की हालत देख कर मुझे रमेश बक्षी की हालत पर ही तरस आया था। आखिर कितना बजेगा रिकॉर्ड?
फिर रमेश ने बाकायदा पत्नी कह कर अलका का परिचय दिया जो उनकी मृत्यु तक उनकी पत्नी थी तथा रमेश का छह साल का बेटा इसी पत्नी से था। (रमेश की पहली और असली पत्नी जो विधि-विधान से उनकी पत्नी बनी थी तथा उनके पहले पुत्र की माँ थी, उसका ज़िक्र मैं क्या करती क्योंकि मैंने उसे कभी देखा ही नहीं था।) अब तक तो लड़कियां बिना पत्नी कहलाए रमेश बक्षी के साथ रहती आई थीं, अब उन्होंने एक ऐसी लड़की ढूंढ निकाली थी जिसे वे पत्नी का दर्जा दे सकें और खुद एक पति का दर्जा पा सकें। इस दर्जे का हश्र श्मशान घाट में रमेश के शव के इर्द-गिर्द उपजी कड़वाहट और मारामारी में हुआ जिसे देखने के लिए अन्य लेखकों के साथ मैं भी वहाँ उपस्थित थे। बड़ी बुरी मौत मरे वे पर उनका यह अंत स्वयं उनका चुना हुआ था। उन्होंने अकाल मृत्यु को स्वयं आमंत्रित किया था पर जीते जी उन्हें कब यह फ़िक्र होगी कि मरने के बाद उनके शव के साथ क्या सलूक किया जाए। मृत्यु ने उन्हें भयभीत किया होता तो वे जीने के मामले में एहतियात बरतते और शराब को अपने ऊपर इस कदर हावी न होने देते जो एक दिन उनके प्राण ले ले। शायद ऐसों को देखकर ही किसी शायर ने कहा है :
आशिकों की रिन्द पे क्यों न रश्क आए खुद
ज़िन्दगी के भी मज़े और मौत से ग़ाफ़िल नहीं
लेकिन क्या रमेश बक्षी ने सचमुच ज़िन्दगी के मज़े किए? हादसों भरी ज़िन्दगी जीते हुए क्या कभी कोई कचोट उनके मन को नहीं खुरचती रही होगी?
प्रभाष जोशी ने रमेश बक्शी के लिए "औरतबाज़" शब्द का प्रयोग किया था, जो मुझे कतई उपयुक्त नहीं लगता। कई औरतों के साथ सम्बन्ध रख लेने से ही कोई औरतबाज़ नहीं बन जाता, बल्कि देखना यह होता है कि उन औरतों के साथ उसका रवैया क्या है? औरतबाज़ पुरुष औरतों को घर में लाकर नहीं बैठाते। रमेश घरबाज़ थे, जिन्हें औरत से शारीरिक, मानसिक संतुष्टि के अतिरिक्त यह भी अपेक्षा थी कि वह उनके घर को सँवारे, उनके लिए रोटी बनाएँ, उनके साथ रह कर सभी खट्टे-मीठे क्षणों की भागीदार बने, और उनके बच्चे भी पैदा करे। लगता है, रमेश एक घर की तलाश में भटकते रहे, वह "घर" चाहते थे लेकिन उन्हें घर को बनाए रखने की कला नहीं आती थी। उनका लेखक होना उन पर हावी था। उन्हें उनके लेखक होने ने मारा। उनके अवचेतन में तलाश एक घर की चल रही थी, जिसे वे बार-बार बसाने की कोशिश में बार-बार टूटते रहे और अंत में टूटे तो एक बसे-बसाए घर का मालिक होने का भ्रम लेकर और देकर।
(उस समय सुना गया था कि कोई राज्य सरकार और कई अकादमियां रमेश बक्षी के परिवार को सहायता राशि देने पर विचार कर रही हैं, क्योंकि रमेश का छोटा पुत्र अभी बहुत छोटा था। लेकिन जब रमेश ने अपनी पहली पत्नी को छोड़ा था, उस समय उससे उत्पन्न रमेश का पुत्र इतनी ही उम्र का या इससे छोटा रहा होगा। उसकी परवरिश के लिए तो किसी सरकार या अकादमी ने नहीं सोचा था।) पति-पत्नी के रिश्ते की यही अहमियत है कि टूटने की तमाम स्थितियों से गुज़रते रह कर भी यदि किसी कारणवश आप नहीं टूटते हैं तो आपके अधिकार ससम्मान सुरक्षित रहते हैं।

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