ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
राजेश बादल
राजेश बादल
1 मार्च 1959 को छतरपुर, मध्यप्रदेश में जन्म। बचपन आदिवासी गाँवों में बीता। सागर विश्वविद्यालय से बी.एस-सी. एवं भारतीय इतिहास में प्रथम श्रेणी में एम.ए. की उपाधि। जनसत्ता, नईदुनिया एवं नवभारत टाईम्स के अलावा वायस ऑफ़ इंडिया, इंडिया न्यूज, बैग फिल्म्स और आजतक चैनल से जुड़े रहे। अनेक साहित्यिक और सांस्कृतिक विभूतियों पर फ़िल्में बनाई। सौ से ज़्यादा वृतचित्र, दस हज़ार से ज़्यादा टीवी रिपोट्र्स, पाँच हज़ार से ज़्यादा आलेख, बीस से ज़्यादा विश्वविद्यालयों में अतिथि व्याख्यान दिये। अमेरिका के अनेक शहरों में व्याख्यान और हिंदी के लिए समर्पित। एक दर्जन से अधिक बार पुरस्कृत। सम्प्रति - राज्य सभा टेलीविजन में एक्जीक्यूटिव डायरेक्टर।

राजनीति के घाट पर संतन की भीड़
ये कैसा समय आ गया है कि राजनीति के घाट पर संत इकट्ठे हो रहे हैं। नाना प्रकार के संत। कोई लेपटॉप बाबा है तो कोई कम्प्युटर बाबा। कोई घड़ी वाला बाबा है तो कोई गृहस्थ बाबा। सबको भरम है कि उनके पीछे लोग दीवाने हैं। वे जो कहेंगे, लोग वही करने लगेंगे।
पत्रकारिता में इतिहास बोध और राजेन्द्र माथुर
अतीत की बुनियाद पर हमेशा भविष्य की इमारत खड़ी होती है। जब तक इतिहास की ईंटें मज़बूत रहती हैं, हर सभ्यता फलती-फूलती और जवान होती है। लेकिन जैसे ही ईंटें खिसकने लगतीं हैं, इमारत कमज़ोर होती जाती है। शिल्पियों ने अगर सही ईंट का चुनाव न किया तो घुन लगता
चले गए अनुपम भाई
उन दिनों कॉलेज में था। आपातकाल में सेंसरशिप का विरोध करते हुए पत्रकारिता की शुरुआत हो गई थी। शायद उन्नीस सौ पचहत्तर या छियत्तर के आसपास अनुपम भाई से मुलाक़ात हुई थी और तब से लेकर उनके आख़िरी सफ़र पर जाने तक एक बड़े भाई जैसा स्नेह उनसे मिलता रहा। गंभीर
शब्दों की सत्ता अनमोल
उन्नीस सौ अट्ठाईस। चांद का फाँसी अंक बाज़ार में आया। दो सौ साल की गोरी हुक़ूमत के ज़ुल्मों का दस्तावेज़। रामप्रसाद बिस्मिल, सरदार भगतसिंह और माखनलाल चतुर्वेदी जैसे देशभक्तों ने उसमें लेख और कविताएँ लिखीं थीं। आचार्य चतुरसेन इसके संपादक थे। दस हज़ार प्र
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