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राहुल उपाध्याय
राहुल उपाध्याय
शिवगढ़, मध्यप्रदेश में जन्म। तीन दशक से अमेरिका के विभिन्न शहरों में रहते हुए सिएटल में माईक्रोसॉफ्ट में कार्यरत। कविताएँ लिखते हैं और प्रवासी भारतीयों के द्वंद्व और दुविधाओं को उजागर करते हैं। हिंदी ब्लॉग भी लिखते हैं। कबीर साहित्य तथा अभिनय में रुचि। दो अंग्रेजी नाटको में अभिनय किया।

हिंदी की तकनीक छलाँग बाकी है
मैं अमेरिका में पिछले 33 वर्षों से हूँ। 15 सितम्बर 1986 के दिन जब मैं पहली बार हवाई जहाज़ में बैठा था, तब सब जगह अंग्रेज़ी का वर्चस्व था। हिन्दी/ देवनागरी का नाम-ओ-निशान नहीं था। विदेशी परिवेश में हिन्दी कहीं थी तो सिर्फ बी.बी.सी. की हिन्दी सेवा में। आ
सौभाग्य से मैं उनसे मिल सका
अपने एक नाटक "नागमंडला" के बारे में बात करने वे वाशिंगटन विश्वविद्यालय आए थे। कार्यक्रम की समाप्ति पर मैं उनके पास पहुँचा। अधिकांश लोग तब तक जा चुके थे। मैंने उनसे अपने साथ तस्वीर लेने का अनुरोध किया। वे सहर्ष तैयार हो गए। मैं उ
मैं ऑरगेनिक नहीं हूँ
मैं ऑरगेनिक नहीं हूँमुझे फ़र्टिलाईज़र और पेस्टिसाईड देकरबड़ा किया गया हैरात-रात जागकरफिज़िक्स की प्रॉब्लम्सऔर गणित के समीकरणहल किए हैं मैंनेअंग्रेज़ी के कई कठिन शब्दयाद किए हैं मैंने देखो तो सही
हिन्दी सम्पर्क की भाषा है और रहेगी
भारत से जुड़ा कोई भी व्यक्ति ऐसा नहीं है जो हिंदी से अनभिज्ञ हो। और मैं सिर्फ़ उन शब्दों की बात नहीं कर रहा जो विश्व प्रसिद्ध हैं, जैसे मसाला, पण्डित या गुरू। मैं बात कर रहा हूँ, "दिल माँगे मोर" और "जय हो" जैसे जुमलों की। यदि हिंदी भाषा के विक

सपने न हों तो क्या कीजे
मेरा सौभाग्य कहिए कि दुर्भाग्य कि हिन्दी फ़िल्मों का मेरे जीवन पर विशेष प्रभाव रहा है। भारतीय संस्कृति क्या है, मेरा इसमें क्या किरदार है, यह मुझे हिन्दी फ़िल्मों ने ही सिखाया है। राखी, होली, दीवाली आदि त्योहारों की पहचान और महत्ता हिन्दी फ़िल्मों की
शून्य दाता शून्य?
पतझड़ के पत्तेजो जमीं पे गिरे हैंचमकते दमकतेसुनहरे हैंपत्ते जो पेड़ परअब भी लगे हैंवो मेरे दोस्त,सुन, हरे हैं मौसम से सीखोइसमें राज़ बड़ा हैजो जड़ से जुड़ा हैवो अब भी खड़ा
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