ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
राजेश करमहे
राजेश करमहे

विज्ञान (भौतिकी प्रतिष्ठा) स्नातक, काशी हिंदू वि·ाविद्यालय से पुस्तकालय एवं सूचना विज्ञान में स्नातकोत्तर एवं हैदराबाद वि·ाविद्यालय से पी.जी. डिप्लोमा इन लाईब्रोरी ऑॅटोमेशन एंड नेटवर्किंग। आकाशवाणी वार्षिक पुरस्कार में मेरिट सर्टीफिकेट। विभिन्न सेमिनार एवं गोष्ठियों में आलेख प्रस्तुत किये। हिंदी एवं अंग्रेजी में ब्लॉग प्रकाशित। पठन-पाठन, लेखन एवं आध्यात्म में रुचि। संप्रति आकाशवाणी राँची में कार्यरत।


देवनागरी या रोमन हिंदी?
एक बार फिर देवनागरी बनाम रोमन चर्चा में है। इस कंप्यूटर-टैबलेट-मोबाइल के युग में अक्सर यह बात जोर-शोर से उठाई जाती है कि अपनी हिंदी की लिपि देवनागरी की जगह रोमन क्यों नहीं अपनाई जाए। प्रथम दृष्टया यह मुझे सांस्कृतिक हमला नज़र आता है, वह इस तरह कि म
शून्य : विश्व को भारतवर्ष की सौगात
आंग्ल नववर्ष आ पहुँचा। सांस्कृतिक विविधता वाले इस देश में अलग-अलग क्षेत्रों में अपनी-अपनी परम्पराओं, मान्यताओं और सुविधाओं के अनुसार अलग-अलग समय पर अपना-अपना नववर्ष मनाने का रिवाज़ है; तथापि वैश्विक एकरूपता और मकर संक्रांति के आगमन के कारण जनवरी मा
मासानाम् मार्ग-शीर्षः अहम्
हेमन्त ऋतु का आगमन हो चुका। हेमन्त का नामकरण हिम (ड़दृथ्ड्ड) से हुआ है। हिम शब्द की व्युत्पत्ति है - हन्, मारना और मक् प्रत्यय; यहाँ हन् की जगह "हि" ले लेता है। भारत में मध्य नवम्बर से मध्य जनवरी तक हेमन्त का समय है। यह भीषण जाड़े की ऋतु है। इस कारण
अज्ञान-तिमिर से ज्ञान-वर्चस् की ओर
यह पवमान मन्त्र या पवमान अभ्यारोह है, जो वैदिक युग में ज्योतिष्टोम (ज्योतिस् स्तोम या ज्योति यज्ञ) के समय गाया जाता था। वैदिक संस्कृति में पवन और पावक को पवित्र (पूङ्, पवित्र करना) करने वाला माना गया। "पवमान" (पूङ्, पवित्र करना और शानच् प्रत्यय) म

आश्विन का प्रभात और शिउली फूल
आश्विन के शारदीय प्रभात में बज उठे आलोक मंजीरे लुप्त हो चलीं पावस की मेघमालाएँ धरती के बाह्याकाश में प्रकृति के अंतराकाश में जाग उठी ज्योतिर्मयी जगन्माता के आगमन की गाथाएँ बचपन से ही आकाशवाणी केंद्रों से हर वर्ष पित
सावन का महीना : डमरु बाजै चहुँओर
सावन आ गया। सावन अथवा श्रावण माह का नामकरण इस महीने की पूर्णिमा पर चन्द्रमा का श्रवण नक्षत्र के आसपास होना है। श्रवण नक्षत्र में तीन तारे हैं, जिन्हें वैष्णव मत मानने वाले वामन रूपधारी विष्णु का तीन पग बताते हैं। वामन ने पहले पग में आकाश नाप दिया
वर्षा बहार : रस की फुहार
यह मॉनसून का समय है। भारतवर्ष के लिए मॉनसून मात्र हिन्द महासागर में उठने वाली व्यापारिक हवा नहीं है, बल्कि यह एक भव्य, जटिल और रहस्यमय घटना है। यह कविता है - हवा, दवाब, वर्षा और उससे प्रभावित भारतीय जन-गण-मन के जटिल निकाय की। मॉनसून का अरबी मूल है
ओ आषाढ़ के काले बादल
प्रिये! आया ग्रीष्म खरतर!सूर्य भीषण हो गया अब, चन्द्रमा स्पृहणीय सुन्दर,कर दिए हैं रिक्त सारे वारिसंचय स्नान कर कर,रम्य सुखकर सांध्यवेला शान्ति देती है मनोहर,शान्त मन्मथ का हुआ है वेग अपने आप बुझ कर,दीर्घ तप्त निदाघ द

जेठ जरै जग, चलै लुवारा
ग्रीष्म का आगमन हो गया। ग्रीष्म शब्द - ग्रसु अदने (खाना, निगलना) और मक् प्रत्यय से व्युत्पन्न हुआ है। इस ऋतु में काल हमें निवाला बनाना चाहता है। कोई कारण पूछ सकता है, "भला ऐसा क्यों होता है?" इसका उत्तर है कि ग्रीष्म निदाघ काल है। निदाघ - नि (हमेश
काल
कलयति संख्याति सर्वान् पदार्थान् स कालः। जो जगत् के सब पदार्थों और जीवों को आगे बढ़ने को बाध्य करता है और उनकी संख्या (आयु) करता है, वही काल है।"कल संख्याने" धातु में "अच" प्रत्यय करने से "काल" शब्द बनता है। "कल" का दो अर्थ है - 1. गिनना या ग
अरण्यगान
तुम गाओ, मैं मुरली बजाऊँतुम्हारा गीत है सदाबहारकल जब हम रहें न रहेंमेरी मुरली पर बजेगा तेरा ही गीत क्या तुम रह पाओगे इस अरण्य मेंमेरी तरह संसार के कोलाहल से दूरपहाड़ी नदी का पीछा करते-करतेखड़े चट्टानों पर
आज़ादी की अभिधारणा
भारतीय प्रायद्वीप के लिए अगस्त आज़ादी के उत्सव को मनाने का महीना है। इसी महीने इस भूभाग के दो राष्ट्र - भारत और पाकिस्तान, जो 1947 ई. के पहले ब्रिटिश उपनिवेश का हिस्सा थे, अपने सपूतों के अथक संघर्ष, त्याग और बलिदान के बाद आज़ाद मुल्क या स्वतंत्र राष

वर्षा-मंगल
ऋग्वेद के पाँचवे मंडल के 83वें सूक्त की इस प्रथम ऋचा में उस वैदिक महा¶ाक्ति¶ााली, दानवीर और भीम गर्जना करने वाले पर्जन्य देवता की स्तुति की गई है, जो वृषभ के समान निर्भीक है और पृथ्वीतल की औषधियों में बीजारोपण करके नवजीवन के आगमन की सूचन
कस्मै देवाय हविषा विधेम?
भारतीय मानस की अनवरत् जिज्ञासा की कथा की यह कड़ी आधुनिक भारत में वैज्ञानिक विकास लिखने के क्रम में बारम्बार यही प्रशन मानस पटल पर उभर कर आता है, "कस्मै देवाय हविषा विधेम?' अर्थात् किस देवता की उपासना करें हम हवि देकर? क्या हमें वर्तमान वैज्ञानिक वि
कस्मै देवाय हविषा विधेम?
गर्भनाल पत्रिका, मई 2016 अंक में प्राचीन भारत में ज्ञान-विज्ञान की चर्चा करते हुए वैदिक युग की वैज्ञानिक जिज्ञासाओं और संभावनाओं को रेखांकित किया गया था। इस चर्चा की शुरुआत राइबोसोम पर अपने अनुसंधान के लिए दो अन्य वैज्ञानिकों के साथ वर्ष 2009 का न
कस्मै देवाय हविषा विधेम
जब भारतीय वैज्ञानिक विरासत की बात होती है, तो मन में ध्वनित हो उठता है ऋग्वेद के नासदीय सूक्त और हिरण्यगर्भ सूक्त के इन पद्यनुवादों का। ये पद्यानुवाद पं. जवाहरलाल नेहरू रचित पुस्तक "डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया' पर आधारित और ¶याम बेनेगल कृत दूरदर्¶

महाकुम्भ की घड़ी
भारतीय सनातन संस्कृति शा?ात मूल्यों और सिद्धांतों के आधार पर विकसित हुर्इं है। सनातन का अर्थ ही है - शा?ात, निरन्तर और चिरस्थायी और इस प्रकार सनातन धर्म का अर्थ - शा?ात, निरन्तर, चिरस्थायी और दृढ़ तत्त्व (द्रद्धत्दड़त्द्रथ्ड्ढ) हो जाता है। व्युत्पत्
अंतिम व्यक्ति को वै·िाक करने का स्वप्न
वर्ष दो हजार पंद्रह की दूसरी छमाही का आरम्भ भारत के लिये अत्यंत महत्वपूर्ण रहा। इस समय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने "डिजिटल इंडिया' योजना का उद्घाटन किया, जिसमें द इंटरनेट से शासन में सुधार की शक्ति, रोजगार सृजन और नई-नई सम्भावनाओं का सृजन कर
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