ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
राजेश करमहे
राजेश करमहे

विज्ञान (भौतिकी प्रतिष्ठा) स्नातक, काशी हिंदू वि·ाविद्यालय से पुस्तकालय एवं सूचना विज्ञान में स्नातकोत्तर एवं हैदराबाद वि·ाविद्यालय से पी.जी. डिप्लोमा इन लाईब्रोरी ऑॅटोमेशन एंड नेटवर्किंग। आकाशवाणी वार्षिक पुरस्कार में मेरिट सर्टीफिकेट। विभिन्न सेमिनार एवं गोष्ठियों में आलेख प्रस्तुत किये। हिंदी एवं अंग्रेजी में ब्लॉग प्रकाशित। पठन-पाठन, लेखन एवं आध्यात्म में रुचि। संप्रति आकाशवाणी राँची में कार्यरत।


ओ आषाढ़ के काले बादल

प्रिये! आया ग्रीष्म खरतर!
सूर्य भीषण हो गया अब, चन्द्रमा स्पृहणीय सुन्दर,
कर दिए हैं रिक्त सारे वारिसंचय स्नान कर कर,
रम्य सुखकर सांध्यवेला शान्ति देती है मनोहर,
शान्त मन्मथ का

जेठ जरै जग, चलै लुवारा

ग्रीष्म का आगमन हो गया। ग्रीष्म शब्द - ग्रसु अदने (खाना, निगलना) और मक् प्रत्यय से व्युत्पन्न हुआ है। इस ऋतु में काल हमें निवाला बनाना चाहता है। कोई कारण पूछ सकता है, "भला ऐसा क्यों होता है?" इसका

काल

कलयति संख्याति सर्वान् पदार्थान् स कालः। जो जगत् के सब पदार्थों और जीवों को आगे बढ़ने को बाध्य करता है और उनकी संख्या (आयु) करता है, वही काल है।
"कल संख्याने" धातु में "अच" प्रत्यय करने से "काल

अरण्यगान

तुम गाओ, मैं मुरली बजाऊँ
तुम्हारा गीत है सदाबहार
कल जब हम रहें न रहें
मेरी मुरली पर बजेगा तेरा ही गीत

क्या तुम रह पाओगे इस अरण्य में
मेरी तरह संसार के कोलाहल से दूर


आज़ादी की अभिधारणा

भारतीय प्रायद्वीप के लिए अगस्त आज़ादी के उत्सव को मनाने का महीना है। इसी महीने इस भूभाग के दो राष्ट्र - भारत और पाकिस्तान, जो 1947 ई. के पहले ब्रिटिश उपनिवेश का हिस्सा थे, अपने सपूतों के अथक संघर्ष,

वर्षा-मंगल

ऋग्वेद के पाँचवे मंडल के 83वें सूक्त की इस प्रथम ऋचा में उस वैदिक महा¶ाक्ति¶ााली, दानवीर और भीम गर्जना करने वाले पर्जन्य देवता की स्तुति की गई है, जो वृषभ के समान निर्भीक है और पृथ्वीतल क

कस्मै देवाय हविषा विधेम?

भारतीय मानस की अनवरत् जिज्ञासा की कथा की यह कड़ी आधुनिक भारत में वैज्ञानिक विकास लिखने के क्रम में बारम्बार यही प्रशन मानस पटल पर उभर कर आता है, "कस्मै देवाय हविषा विधेम?' अर्थात् किस देवता की उपासन

कस्मै देवाय हविषा विधेम?

गर्भनाल पत्रिका, मई 2016 अंक में प्राचीन भारत में ज्ञान-विज्ञान की चर्चा करते हुए वैदिक युग की वैज्ञानिक जिज्ञासाओं और संभावनाओं को रेखांकित किया गया था। इस चर्चा की शुरुआत राइबोसोम पर अपने अनुसंधा


कस्मै देवाय हविषा विधेम

जब भारतीय वैज्ञानिक विरासत की बात होती है, तो मन में ध्वनित हो उठता है ऋग्वेद के नासदीय सूक्त और हिरण्यगर्भ सूक्त के इन पद्यनुवादों का। ये पद्यानुवाद पं. जवाहरलाल नेहरू रचित पुस्तक "डिस्कवरी ऑफ़ इंड

महाकुम्भ की घड़ी

भारतीय सनातन संस्कृति शा?ात मूल्यों और सिद्धांतों के आधार पर विकसित हुर्इं है। सनातन का अर्थ ही है - शा?ात, निरन्तर और चिरस्थायी और इस प्रकार सनातन धर्म का अर्थ - शा?ात, निरन्तर, चिरस्थायी और दृढ़ त

अंतिम व्यक्ति को वै·िाक करने का स्वप्न

वर्ष दो हजार पंद्रह की दूसरी छमाही का आरम्भ भारत के लिये अत्यंत महत्वपूर्ण रहा। इस समय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने "डिजिटल इंडिया' योजना का उद्घाटन किया, जिसमें द इंटरनेट से शासन में सुधार की

QUICKENQUIRY
Related & Similar Links
Copyright © 2016 - All Rights Reserved - Garbhanal - Version 10.00 Yellow Loop SysNano Infotech Structured Data Test ^