ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
राजभाषा की असली तस्वीर
01-Sep-2017 10:32 AM 2774     

राजभाषा की असली तस्वीर राष्ट्रभाषा के भ्रम में छिपी है। जाहिर है यहाँ भारत में राजभाषा हिंदी की बात हो रही है जहां राष्ट्रभाषा अपने परंपरागत रूप में हिंदी के स्वरूप में सदियों से विद्यमान है। राष्ट्रभाषा देश की सामाजिक व सांस्कृतिक वाणी है तो राजभाषा सांस्थानिक आंकड़ों की बानगी है। हम यदि यह कहें कि राष्ट्रभाषा देश की या राष्ट्र की असली तस्वीर है और राजभाषा नकली तस्वीर तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। दरअसल तस्वीर तो तस्वीर ही होती है लेकिन असली और नकली का फ़र्क तो होता ही है और यह फ़र्क यहाँ स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होता है।
भारतीय संदर्भ में राष्ट्रभाषा की पृष्ठभूमि में जाएँ तो हमारे सामने ऐतिहासिकता से तीन घटनाएँ प्रमुख रूप से सामने आती हैं। पहली घटना है "भक्ति-आन्दोलन"। भक्ति-आन्दोलन भक्त कवियों तथा संतों का पूरे देश के संदर्भ में आम सम्प्रेषण के रूप में राष्ट्रभाषा हिंदी के माध्यम से अपनी वाणी का प्रसार था जिसने अपने ज्ञान की भाषा संस्कृत, जिसमें वे पारंगत थे, को छोड़कर आमजन की भाषा हिंदी को अपनाकर पूरे देश को एक सूत्र में बांधने का प्रयास किया था। चाहे दक्षिण के रामानुजाचार्य हों, वल्लभाचार्य हों या बंगाल का गौड़ीय संप्रदाय हो, सबने अपनी वाणी मुखरित की थी हिंदी में।
राजभाषा की असली तस्वीर के क्रम में राजभाषा की प्रासंगिकता पर भी बात करनी अपेक्षित है। राजभाषा की प्रासंगिकता क्या है, क्यों है? राजभाषा की प्रासंगिकता भारतीय संदर्भ में है, क्योंकि अभी भारत की कोई संवैधानिक राष्ट्रभाषा (राष्ट्रीय भाषा) नहीं है, फिर भारत एक संघ राज्य है। यह विभिन्न राज्यों का ऐसा संघ है जिसकी अपनी-अपनी राज्य भाषाएँ हैं और केंद्र को समस्त राज्यों से संपर्क साधने के लिए एक भाषा की जरूरत पड़ती है या पड़नी चाहिए। ज़ाहिर है यह भाषा हिंदी ही हो सकती है जो बहुसंख्यक लोगों की भाषा है। यह लोक की भी भाषा है और तंत्र की भी भाषा है। इस प्रसंग में एक विदेशी भाषा अँग्रेजी इसका स्थान कतई नहीं ले सकती।
हमारे देश में राजभाषा की वैधानिकता भी है। 26 जनवरी 1950 को लागू भारतीय संविधान में अनुच्छेद 343 से लेकर 351 तक इसके विभिन्न पहलुओं पर विशद् चर्चा की गई है और इसी संवैधानिक विधान के चलते सरकारी कार्यालयों, उपक्रमों या इसकी सहायक संस्थाओं में राजभाषा के प्रगामी प्रयोग पर बल दिया जाता है और इसके विभिन्न मदों के कार्यान्वयन पर समीक्षा की जाती है तथा यथासमय निरीक्षण भी किया जाता है। लेकिन सवाल उठता है कि राजभाषा की तस्वीर आज भी धुंधली क्यों है? आज़ादी के सत्तर वर्ष बाद भी राजभाषाई प्रावधानों, राजभाषा अधिनियम 1963, राजभाषा नियम 1976, राजभाषा संकल्प 1968 आदि के भी कितने वर्ष बीत गए हैं। इसके साथ ही प्रति वर्ष केंद्रीय गृह मंत्रालय (राजभाषा विभाग) के वार्षिक कार्यक्रम, अपने-अपने मंत्रालय के अपने-अपने निर्णय व अनुदेश, भारतीय रिज़र्व बैंक के अनुदेश, भारतीय बैंक संघ के अनुदेश, राजभाषा कार्यान्वयन समिति (राकास) की विभिन्न स्तरों की बैठकों के निर्णय, सरकारी/ उपक्रम/ बैंक-नराकास (नगर राजभाषा कार्यान्वयन समिति) के निर्णय, व्यक्तिशः आदेश जारी करने का नियम, कंप्यूटर संबन्धित आंतरिक स्थायी कार्यदल के निर्णय, मंत्रालय की राजभाषा सलाहकार समिति के निर्णय, केंद्रीय हिंदी समिति आदि के निर्णय, राष्ट्रपति के आदेश (1952, 1955 तथा 1960) तथा फिर इनके आदेशों के विभिन्न खंड (अद्यतन नौवाँ खंड) और इन सब के ऊपर संसदीय राजभाषा समिति का नियमित निरीक्षण तथा उनकी पैनी निरीक्षणीय-दृष्टि आदि के होते हुए भी राजभाषा की तस्वीर साफ क्यों नहीं हो पा रही है? इस पर गहन विचार करने की जरूरत है।
भारत सरकार के सरकारी कार्यालयों, उपक्रमों, बैंकों के कार्यालयों में राजभाषा के प्रगामी प्रयोग पर प्रेरणा, प्रोत्साहन तथा सद्भावना की प्रेरक नीति इसके लागू होने के समय तब भी थी और आज भी है। इसके माध्यम से इसकी प्रगति बढ़ाई जा रही है। सन् 1987 में वित्तीय वर्ष 1991-92 में "ग" क्षेत्र में हिंदी पत्राचार का लक्ष्य 30 प्रतिशत था और आज वित्तीय वर्ष 2017-18 में वह लक्ष्य 55 प्रतिशत है। यह ध्यातव्य है कि पूरे भारत को भाषाई संदर्भ में राजभाषा-कार्यान्वयन के क्रम में तीन क्षेत्रों "क" (हिंदी भाषा-भाषी क्षेत्र), "ख" (हिंदी से मिलता-जुलता भाषा-भाषी क्षेत्र अर्थात् गुजरात, महाराष्ट्र तथा पंजाब राज्य और चंडीगढ़ संघ राज्य क्षेत्र) और "ग" (हिंदीत्तर भाषा-भाषी क्षेत्र) में बांटा गया है। सवाल यह है कि राजभाषा अपनी कच्छप गति से कब-तक चलती रहेगी? क्या इसमें प्रगति होगी या नहीं होगी? राजभाषा तब और अब में तुलना करें तो अब तक इतनी ही प्रगति हुई है कि राजभाषा अधिकारियों की प्रारम्भिक भर्ती की जमात के समय कार्यालयों में सब जगह अंग्रेजी बोली जाती थी और अब उन्हीं राजभाषा अधिकारियों की सेवा-निवृत्ति तक आते-आते की जमात के समय तक कार्यालयों में हिंदी बोली जाने लगी है, समझी जाने लगी है लेकिन लिखित में टेबुलों पर आज भी अंग्रेजी के नोट व रिपोर्टें ही देखने को मिलती हैं। तस्वीर जो बदलनी चाहिए थी वह आज भी नहीं बदली है। यहाँ तक कि हिंदी भाषा-भाषी स्टाफ-सदस्य भी हिंदी में अपनी प्रस्तुति नहीं देते हैं। इसका एक कारण तो यह उभर कर आता है कि हिंदी में काम करने पर कार्यालय के अन्य लोग उन्हें यह समझने लगते हैं कि उन्हें अंग्रेजी नहीं आती है और वे अपनी इस भावना को "कि उन्हें अंग्रेजी आती है" दिखाने के लिए हिंदी के बजाय अंग्रेजी में अपना कार्यालयी काम करते रहते हैं। इस पर न तो कार्यालयी दांडिक दबाव है और न तो सरकारी। फलतः यह काम अपनी गति और "ढाक के तीन पात" के हिसाब से चलता रहता है। किसी ने कुछ काम हिंदी में कर भी दिया तो उनकी यह मंशा रहती है कि हमने हिंदी अधिकारी का भला कर दिया! उनमें यह भावना क्यों नहीं आती कि यह कार्यालय का काम है, अपना काम है, राष्ट्रीय भावना से ओत-प्रोत का काम है, संवैधानिक काम है, भारतीय नागरिक का काम है, राजभाषा का काम है आदि-आदि।
राजभाषा की तस्वीर पर बीसवीं शताब्दी के आठवें व नौवें दशक की बात करें तो हिंदी कार्यान्वयन के क्रम में हिंदी हाथ से लिखी जाती थी या फिर मैनुअल टाइपराइटर का सहारा लिया जाता था। राजभाषा तब टाइपराइटर पर थी, रेमिंगटन पर थी, इलेक्ट्रॉनिक टाइपराइटर पर थी, कंप्यूटर पर "अक्षर" पर थी, "आकृति" पर थी और आज वह यूनिवर्सल हिंदी "यूनिकोड" पर है, तब भी वह प्रयोग में धड़ल्ले से क्यों नहीं आ रही? बात यहीं तक रुकती नहीं। सभी कार्यालयों में स्टाफ-सदस्यों के हिंदी कार्य-साधक ज्ञान को धार देने के लिए हिंदी कार्यशालाओं का नियमित रूप से आयोजन किया जा रहा है और स्टाफ-सदस्यों के सतत अभ्यास पर भी ज़ोर दिया जा रहा है। यह भी कहा जा रहा है कि हिंदी कार्यशालाओं के सत्रों में 80 प्रतिशत अभ्यास पर बल दिया जाए। इसके बाद भी राजभाषा की असली तस्वीर बदल क्यों नहीं रही है? क्या इसके पीछे हमारे मानस-स्थल में राजभाषा का भ्रम नहीं बैठा है? यही नहीं और इतना तक ही नहीं, हम राष्ट्रभाषा का भ्रम भी पाले बैठे हैं, उसे अमलीजामा नहीं पहना रहे हैं, हमारी मानसिकता नहीं बदल रही है, हम राष्ट्रीय गौरव से ओत-प्रोत नहीं हो रहे हैं, हम अपने देश की मातृभाषा और राष्ट्र की राष्ट्रभाषा से जुड़ नहीं पा रहे हैं, यहाँ तक कि हम अपनी-अपनी मातृभाषा से भी जुड़ नहीं रहे हैं और यही कारण है कि कई भाषाएँ काल के गाल में समाती चली जा रही हैं। सवाल यह है कि भारतीय संदर्भ में अपनी हिंदी राजभाषा के क्रम में हममें राष्ट्रीय चेतना का विकास कब होगा?
राष्ट्रभाषा के भ्रम में हम राजभाषा को ढोते आ रहे हैं। इसकी बैसाखी पर राष्ट्रभाषा की नैया पार लगाते आ रहे हैं लेकिन यह कब तक चलता रहेगा? आज के संदर्भ में भारतीयता तथा राष्ट्रीयता के क्रम में यह ज्वलंत प्रश्न है। आज राजभाषा का विकास सिर्फ़ आंकड़ों तथा रिपोर्टों पर केंद्रित है। कालांतर में भारत सरकार के लक्ष्य बढ़ते गए, कार्यालय के आंकड़े भी बढ़ते गए। एक समय ऐसा आया कि केंद्रीय गृह मंत्रालय को प्रतिवर्ष जारी होने वाले अपने "वार्षिक कार्यक्रम" के लक्ष्यों को भी स्थिर करना पड़ा, अर्थात् कई वर्षों से हिंदी पत्राचार का लक्ष्य "क़" क्षेत्र में 100 प्रतिशत, "ख" क्षेत्र में 90 प्रतिशत तथा "ग" क्षेत्र में 55 प्रतिशत ही है। प्रधान कार्यालय से लेकर शाखा कार्यालय तक आंकड़ों का छद्म खेल चल रहा है। जो जितने वरिष्ठ हैं वे उतनी ही वरिष्ठता से आँकड़ों का नाप-तौल कर रहे हैं या यों कहें कि राजभाषा-कार्यान्वयन में आँकड़ों का प्रबंधन कर रहे हैं, आंकड़े सही नहीं भरे जा रहे हैं, भले ही काम हिंदी में हो भी रहे हों। इसके पीछे हमारा दोष है, नीति-निर्णायकों का दोष है। राजभाषा के फॉर्म, प्रश्नावली, निरीक्षण-फॉर्म आदि दोषी हैं। आयकर का फॉर्म सहज, संक्षिप्त व सरल हो सकता है तो राजभाषा के फॉर्म, निरीक्षण प्रश्नावली, निरीक्षण-फॉर्म सरल, सहज, व्यावहारिक व छोटे क्यों नहीं हो सकते? ये सब फॉर्म ऐसे हों जो आसानी से, व्यावहारिक रूप से भरे जा सकें व उसके अनुरूप इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों पर उसके साक्ष्यों को दिखाए जा सकें।
आज कागज के पुलिंदों की आवश्यकता नहीं है। कार्यालयों में हमारा कारोबार, हमारी लेखा-प्रणाली, हमारी लेन-देन आदि में पर्यावरण बचाने की मुहिम छिड़ी है। पेड़ बचाने, कागज बचाने, खर्च-कटौती, स्पेस बचाने, फ़ाइल-अंबार हटाने, लुक सुधारने, लाभ कमाने आदि-आदि पर बल दिया जा रहा है और आज जब कार्यालयों में सब कुछ पेपरलेस होता जा रहा है तो फिर राजभाषाई निरीक्षणों में कागजी-साक्ष्यों के अंबार की क्या जरूरत है? इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य ही पर्याप्त होने चाहिए। कार्यालय का काम या तो टिप्पणियों से होता है या टिप्पण से, या तो पत्राचार से होता है या ई-मेल (संदेशाचार) से, या तो एसएमएस से होता है या ऑनलाइन भरने से। फॉर्म-निर्माण प्राधिकारियों को या निरीक्षण-प्राधिकारियों को आज इन उपर्युक्त बिंदुओं पर भारत के तीनों क्षेत्रों- "क", "ख" तथा "ग" के लिए कुछ ऐसा बनाना चाहिए जो सबके लिए सरल हो ताकि वे फॉर्म की बोझिलता से बच सकें और इस क्रम में व्यावहारिक रूप से, आसानी से आंकड़े भरे जा सकें व उन्हें कंप्यूटर पर आसानी से दिखाए जा सकें।
आज़ादी के इतने वर्षों के बाद भी हमारा संघ अन्य राज्यों के साथ राजभाषाई तालमेल नहीं बिठा पाया है। केंद्रीय राजभाषा सभी राज्यों में दिखती नहीं है। कुछ राज्यों में उनकी अपनी भाषा होती है और फिर अंग्रेजी होती है। यह रूप हमें उनकी सरकारी सूचनाओं में मिलता दिखता रहता है। राज्यों के प्रतीक चिह्नों में भी राजभाषा नदारत दिखती है, जबकि राज्य प्रतीक चिह्नों में राजभाषा हिंदी का समावेश रहना ही चाहिए। इस मामले में "ग" क्षेत्र में स्थित होते हुए भी ओड़िशा सरकार आगे है जहां "ओड़िशा शासन" लिखा है। इसी प्रकार सभी हिंदीतर राज्यों को भी पहल करनी चाहिए।
अभी 20 जुलाई 2017 का ही एक उदाहरण दृष्टव्य है। बेंगलुरु के मेट्रो स्टेशनों पर कन्नड़ भाषा के समर्थकों ने राजभाषा हिंदी के खिलाफ प्रदर्शन किया और लोगों ने बेंगलुरु के पेरिया, राजाजी नगर, यथवंतपुर, जयनागरा, मायासुरु रोड तथा चिकपेटे स्टेशनों पर हिंदी में लिखे सभी बोर्डों या तख्तियों पर के हरेक शब्द को काले रंग से पेंट कर दिया। आज़ादी के इतने वर्षों के बाद भी यह स्थिति शर्मनाक है। यदि यह राजभाषा की असली तस्वीर है तो हमें बहुत कुछ सोचना होगा, हमें राष्ट्रधर्मी होना होगा, हमें राष्ट्रीय चेतना युक्त होना होगा, हमें भारतीय होना होगा। हमें अपने राज्य की राजभाषा को भी सुदृढ़ करना होगा। साथ ही, भारत की राजभाषा को भी मज़बूती प्रदान करनी होगी।
राजभाषा की असली तस्वीर में सब कुछ नकारात्मक नहीं है। बहुत कुछ ऐसा है जिससे कि कार्यालयों में सकारात्मक बदलाव भी आए हैं। आज बैठकों में हिंदी बोली-सुनी जाती है। अभी हाल ही का (जुलाई 2017 का) एक उदाहरण है कि जिसमें पटना उच्च न्यायालय के अधिवक्ता इंद्रदेव प्रसाद द्वारा डाली गई एक याचिका के क्रम में उच्चतम न्यायालय को हिंदी में सुनवाई करनी पड़ी। उनके प्रयास से पटना उच्च न्यायालय में ऐसी कई सुनवाइयाँ हो चुकी हैं। यह अकस्मात नही प्रत्युत् सन् 1877 में बिहार में स्कूल-इंस्पेक्टर रहे भूदेव मुखर्जी ने बिहार में पाठ्य-पुस्तकों में हिंदी का प्रचलन तथा बिहार की अदालतों में हिंदी-देवनागरी का प्रवेश कराया था। उन्होंने अपनी पुस्तक "आचार-प्रबंध" में हिंदी को देश की सर्वाधिक प्रचलित भाषा मानते हुए उसे संपर्क भाषा के योग्य घोषित किया था। यह भूदेव मुखर्जी की बहुत बड़ी उपलब्धि थी।
अभी हाल ही में उच्चतम न्यायालय में प्रधानमंत्री जी ने तथा उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की उपस्थिति में ऑनलाइन सुनवाई की भी पहल की गई है। आज आवश्यकता इस बात की भी है कि यहाँ की ऑनलाइन आवेदनों में ही नहीं प्रत्युत् सभी कार्यालयों में, कार्यालय के अंदर कर्मचारियों द्वारा भी ऑनलाइन भरने में हिंदी की सुविधा हो और वह ग्राह्य भी हो। एक उदाहरण लें। राजभाषा-कार्यान्वयन के प्रारम्भिक दौर में कम से कम हिंदी अधिकारी तो अपनी गोपनीय रिपोर्ट हिंदी में मैनुअली भरते थे और आज स्थिति यह है कि ऑनलाइन में उन्हें वही रिपोर्ट अंग्रेजी में भरनी पड़ती है, भरनी पड़ रही है, यानी हम उल्टे चल रहे हैं। कई लोग हिंदी-यूनिकोड के माध्यम से भरते हैं या भरने का प्रयास भी करते हैं तो उनके ऊपर के अधिकारियों के पास जाने वाली ऑनलाइन सामग्री कई बार "जंक" के रूप में दिखती है। कई बार यही स्थिति ई-मेल के विषय में भी होती है। ऑनलाइन भरने तथा ऐप में अभी भी राजभाषा की तस्वीर धूमिल है, आवश्यकता है इस पर भरपूर काम करने की, इसकी अनिवार्यता तथा स्वीकार्यता कायम करने की।

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