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राजभाषा का मुखौटा कब तक?
01-Sep-2017 10:48 AM 3826     

भारतीय संविधान के निर्माण की प्रक्रिया में 14 सितम्बर 1949 को देवनागरी लिपि में लिखी जानेवाली हिन्दी को संघ (केंद्र सरकार) की राजभाषा का दर्जा प्रदान किया गया। संविधान लागू होते ही हिन्दी को राजभाषा का दर्जा अवश्य मिला, किंतु अंग्रेजी की अनिवार्यता को भी सांविधिक मान्यता मिल गई।
अतीत में चाहे संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश आदि भारतीय भाषाएं हों या फारसी, अंग्रेजी आदि विदेशी भाषाएं, राजकाज में उनका प्रयोग तभी संभव हो पाया जब उन्हें शिक्षा व्यवस्था का अंग बनाया गया, किंतु हिन्दी के संबंध में इस ओर न तो संविधान सभा ने ध्यान दिया और न सरकार ने। इस सन्दर्भ में राजभाषा आयोग (1955) ने राजभाषा के प्रश्न को शिक्षा व्यवस्था से जोड़ने की कोशिश की और अपने प्रतिवेदन के अध्याय 6 में शिक्षा व्यवस्था के लिए सुझाव दिए, जिन्हें स्वीकार ही नहीं किया गया।
कुछ महत्वपूर्ण सुझाव थे -
1. देशभर के माध्यमिक विद्यालयों में हिंदी का अध्यापन अनिवार्य होना चाहिए। 2. अंग्रेजी का अध्ययन न समझी जाने वाली भाषा के रूप में एक साथ, एक समान और एक रूप में होना चाहिए, साहित्यिक भाषा के रूप में नहीं। 3. यदि कोई स्वेच्छा से एक विषय के रूप में साहित्यिक अंग्रेजी पढ़ना चाहे तो उसकी व्यवस्था अलग से होनी चाहिए। 4. उच्च शिक्षा का सामान्य माध्यम भारतीय भाषाएं हों, अंग्रेजी नहीं। 5. माध्यम का यह परिवर्तन पूरे देश में एक साथ, एक समान और एक रूप में होना चाहिए। 6. सभी विश्व विद्यालयों में यह व्यवस्था अनिवार्य रूप से होनी चाहिए कि जो विद्यार्थी हिंदी माध्यम से परीक्षा देना चाहें, उनकी परीक्षा हिंदी माध्यम से ही ली जाए। 7. जिन वैज्ञानिक एवं प्राविधिक शिक्षण संस्थाओं में विभिन्न भाषा-क्षेत्रों के विद्यार्थी आते हैं, वहां शिक्षा का माध्यम हिंदी ही हो। 8. माध्यम के इस प्रश्न को विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता से न जोड़ा जाए, बल्कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति लागू की जाए, आदि।
ऐसे उपयोगी सुझावों को स्वीकार न करने का परिणाम यह हुआ कि भाषायी परिवर्तन का प्रश्न अव्यवस्था, आलस्य और अनिश्चय की भेंट चढ़ गया। सरकार द्वारा राजभाषा को लागू करने के सारे प्रयास कागजी बनकर रह गए।
देश में राजभाषा नीति-नियमों को लागू करने का दायित्व सभी मंत्रालयों और साथ ही साथ उन सरकारी संस्थानों का हो गया जिनमें 50 प्रतिशत से अधिक हिस्सा भारत सरकार का है। केन्द्र सरकार के सभी कार्यालय और उपक्रम यह दिखावा तो अवश्य करते हैं कि वे राजभाषा नीति का हर प्रकार से पालन कर रहे हैं किंतु वास्तविकता कुछ और है। पालन उन मंत्रालयों द्वारा भी नहीं हो पाता है, जो स्वयं इसके पालन के अनुदेश देते हैं। संसदीय राजभाषा समिति ने सिफारिश की थी कि हिन्दी भाषी राज्यों में केवल हिन्दी का प्रयोग किया जाए, किंतु इसे स्वीकार नहीं किया गया। स्थिति यह है कि यदि कोई कागज मूल रूप से हिन्दी में तैयार कर भी दिया जाए, तो उसका अंग्रेजी में अनुवाद करना अनिवार्य है। हिन्दी भाषी क्षेत्रों में अंग्रेजी की यह अनिवार्यता मूल रूप से हिन्दी में कार्य करने वाले कर्मचारियों को हतोत्साहित करती है।
राजभाषा अधिनियम से उच्च न्यायालयों के निर्णयों आदि में हिन्दी और भारतीय भाषाओं का वैकल्पिक प्रयोग भी सुनिश्चित हुआ, किंतु तब भी दक्षिण भारत के राज्यों को लगा कि उन पर हिन्दी थोपी जा रही है। एक ओर हिन्दी भाषी राज्यों में अंग्रेजी के विरोध और दूसरी तरफ दक्षिण के राज्यों में हिंदी के विरोध में आदोलन शुरू हो गए। इन आंदोलनों को शांत करने के लिए संसद के दोनों सदनों द्वारा पारित संकल्प 18 जनवरी 1968 को जारी किया गया।
इस संकल्प में तीन महत्वपूर्ण बिंदुओं पर ध्यान केंद्रित किया गया -
1. आठवीं अनुसूची में दर्ज सभी भारतीय भाषाओं के समन्वित विकास हेतु भारत सरकार द्वारा राज्य सरकारों के सहयोग से एक कार्यक्रम तैयार किया जाएगा और उसे कार्यान्वित किया जाएगा, ताकि वे शीघ्र समृद्ध हों और आधुनिक ज्ञान के संचार का प्रभावी माध्यम बनें।
2. एकता की भावना को बढ़ाने तथा देश के विभिन्न भागों के निवासियों के बीच विचार-विनिमय को आसान बनाने के लिए यह आवश्यक है कि राज्य सरकारों के परामर्श से तैयार किए गए त्रिभाषा सूत्र को सभी राज्यों में पूरी तरह लागू किया जाए। हिन्दी क्षेत्रों में हिन्दी तथा अंग्रेजी के अतिरिक्त एक आधुनिक भारतीय भाषा, बने वहाँ तक दक्षिण भारत की कोई भाषा और गैर हिन्दी भाषी क्षेत्रों में प्रादेशिक भाषा एवं अंग्रेजी के साथ-साथ हिन्दी पढ़ाने का प्रबंध किया जाना चाहिए।
3. संघ (केंद्र सरकार) की नौकरियों में देश के सभी भागों के निवासियों को उचित हिस्सा मिलना चाहिए। अगर किसी पद से जुड़े कर्तव्यों का निर्वाह अंग्रेजी के उच्च स्तर के ज्ञान के बिना न हो सकता हो तो अलग बात है, अन्यथा किसी भी नौकरी के लिए अंग्रेजी या हिंदी में से किसी एक का ज्ञान होना पर्याप्त माना चाहिए। सिविल सेवा परीक्षाओं के लिए सभी भारतीय भाषाओं को भी माध्यम बनाया जाना चाहिए।
इस प्रकार देश की शिक्षा व्यवस्था में त्रिभाषा फार्मूला और संघ की सिविल सेवा परीक्षाओं के माध्यम के रूप में भारतीय भाषाओं का प्रवेश हुआ। त्रिभाषा फार्मूले से देश में भाषाई सौहाद्र्र का वातावरण निर्मित हुआ और संघ लोकसेवा आयोग की परीक्षाओं में भारतीय भाषाओं की शुरूआत से देश के ग्रामीण क्षेत्र के ऐसे युवाओं को विशेष लाभ हुआ जो कुशाग्र थे, किंतु अंग्रेजी में पारंगत नहीं थे। किंतु यह त्रिभाषा फार्मूला कुछ वर्षों बाद राज्य सरकारों की इच्छा-अनिच्छा की भेंट चढ़ गया। कई राज्यों में 10वीं कक्षा तक हिन्दी पठन की अनिवार्यता को भी समाप्त कर दिया गया। इधर सिविल सेवा परीक्षाओं में भारतीय भाषाओं का माध्यम तो बना हुआ है, किंतु अंग्रेजी के अनिवार्य ज्ञान के स्तर को उच्च कर दिया गया है, जिससे भारतीय भाषाओं के माध्यम से परीक्षा देकर सफल होने वाले उम्मीदवारों के प्रतिशत में गिरावट आई है।
इस तरह राजभाषा कार्यान्वयन का सम्पूर्ण वातावरण तो देश में तैयार हो गया, किंतु राजभाषा अधिनियम और नियम अधिकारियों और कर्मचारियों की अंग्रेजीपरस्त मानसिकता को बदल नहीं पाए। इन नियमों-अधिनियमों का पालन न करने पर दण्ड का प्रावधान न होने से आज भी अराजकता का वातावरण बना हुआ है। हिन्दी में पर्याप्त प्रशिक्षण देने के बाद भी हिन्दी का प्रयोग औपचारिकता के तौर पर ही होता है। इस कार्य में सबसे बड़ी बाधा वे हिन्दी भाषी कर्मचारी हैं जो हिन्दी में प्रवीण होने के बावजूद हिन्दी में कार्य करने में शर्म का अनुभव करते हैं। कई कर्मचारी हिन्दी में कार्य करना भी चाहते हैं तो उनके वरिष्ठ अधिकारियों के कारण ऐसा नहीं कर पाते हैं। अंग्रेजी में कार्य करने की इनकी क्षमता “पीछे देख, आगे लिख” से अधिक न होते हुए भी और हिन्दी में बेहतर सृजन क्षमता होते हुए भी अंग्रेजी में लिखना बाध्यता बन गई है। ऐसे लोगों का बहुमत होने से इस धारणा का विकास होना स्वाभाविक ही था कि हिंदी में आप बातचीत भले ही कर लें पर कोई चीज अगर लिखनी हो तो वह अंग्रेजी में ही होनी चाहिए। हम किसी भी कार्यालय में अधिकारियों एवं उनके मातहतों को फर्राटेदार हिन्दी में बात करते देख सकते हैं किंतु कागज पर जब उनका पेन चलेगा, तो वह अंग्रेजी में ही होगा।
सरकारी योजनाओं, सूचनाओं को जनता तक पहुँचाने का अब सबसे बढ़िया माध्यम है वेबसाइट, किंतु ज्यादातर विभागों और उपक्रमों की साइट पर पूरी सामग्री हिंदी में नहीं मिल पाती। कई विभाग तो जो थोड़ी-बहुत सामग्री हिंदी में दे रहे हैं, वह भी गूगल का अनुवाद होती है, जो किसी के समझ नहीं आता। सबसे ज्यादा दुःख तो इस बात का है कि केंद्र सरकार के सभी कानून पारित होने से पहले उनका पाठ संसद में हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में रखा जाता है, किंतु समझ नहीं आता कि सभी कानूनों का हिंदी पाठ वेबसाइट (indiacode.nic.in) पर अंग्रेजी के साथ ही उपलब्ध क्यों नहीं हो पाता। उदाहरण के लिए वर्ष 2016 के 32 कानूनों में से केवल 8 का हिंदी पाठ इस साइट पर उपलब्ध है। रियल इस्टेट जैसे जनता से सबसे ज्यादा जुड़े विषय पर बने कानून का हिंदी पाठ अब तक उपलब्ध नहीं है, जबकि अंग्रेजी पाठ 16 मार्च 2016 को ही भारत के राजपत्र में प्रकाशित हो गया था।
इधर स्थानीय से लेकर राष्ट्रीय स्तर के राजभाषा पुरस्कारों की होड़ में राजभाषा कार्यान्वयन की वास्तविकता कहीं खो गई है। जिन कार्यालयों में 10 से 20 प्रतिशत काम भी हिन्दी में नहीं होता, वे पुरस्कार की लालसा में अपना 80 से 90 प्रतिशत तक कार्य हिन्दी में करना दर्शाते हैं। इस प्रवृत्ति से भी हिन्दी के प्रयोग को बहुत धक्का लगा है। जब तक बनावटी आंकड़ों से हिन्दी को फलता-फूलता दिखाया जाएगा तो वास्तविक प्रगति कैसे होगी? जिस अंग्रेजी को कभी "ज्ञान-विज्ञान" की खिड़की बताया गया था, वह अब मुख्य द्वार का स्थान ले चुकी है। इस द्वार से आए अंग्रेजी के अंधड़ ने सारी व्यवस्था को अस्त-व्यस्त कर दिया है पर लोग इसे ही गति और प्रगति का पर्याय मान बैठे हैं।
 पिछले कुछ दशकों में हमारे देश में सेवा क्षेत्र का विकास बहुत तेज गति से हुआ है। यह क्षेत्र सीधे-सीधे जनता से जुड़ा हुआ है। निजी क्षेत्र के बैंकों, बीमा कंपनियों, म्युच्यूल फंड, शेयर मार्केट का विस्तार भी तेजी से हो रहा है किंतु इन क्षेत्रों में कोई राजभाषा नीत-नियम लागू नहीं होते। यह अत्यंत आवश्यक है कि राजभाषा नीति नियमों में संशोधन करके इनके प्रावधान ऐसे निजी क्षेत्रों पर लागू किए जाएं जो आम आदमी से जुड़े हुए हैं। निजी क्षेत्र में भी राजभाषा नीति नियमों को लागू करने की सिफारिश हाल ही में संसदीय राजभाषा समिति ने अपने नौवें प्रतिवेदन में की थी किंतु दुख इस बात का है कि संसदीय राजभाषा समिति की ऐसी अनेक सिफ़ारिशों को स्वीकार नही किया गया जो हिन्दी को स्थापित करने के लिए मील का पत्थर साबित हो सकती थी। उदाहरण के लिए हिन्दी या मातृ भाषा में प्राथमिक शिक्षा, राजभाषा अधिनियम का पालन न करने पर दंड का प्रावधान, केंद्र सरकार की नौकरियों के लिए हिंदी ज्ञान का न्यूनतम स्तर, अधिकारियों और कर्मचारियों की गोपनीय रिपोर्ट में हिंदी में कार्य करने संबंधी टिप्पणी आदि सिफारिशों को खारिज कर दिया गया।
पिछली शताब्दी के 9वें दशक में कम्प्यूटीकरण के नाम पर ऐसे सभी कार्यों से हिंदी का नामो-निशान मिट गया जो राजभाषा अधिनियम-नियम के दम पर हिंदी में हो रहे थे। हिंदी प्रदेशों में भी कार्यालयीन कार्यों एवम लोक सेवाओं से हिंदी गायब होने लगी। लोगों के मन में यह बात बिठा दी गई कि कम्प्यूटर पर तो कार्य केवल अंग्रेजी में ही हो सकता है, जब कि जापान, फ्रांस, कोरिया आदि देश शुरूआत से ही कम्प्यूटर पर अपने सारे कार्य अपनी भाषा में ही कर रहे हैं। तीन दशकों के बाद भी हम कम्प्यूटर पर अंग्रेजी के समकक्ष हिंदी और भारतीय भाषाओं में कार्य करने में सक्षम नहीं हो पाए हैं। यद्यपि कंप्यूटर एवं मोबाइल पर हिन्दी और भारतीय भाषाओं में कार्य करने की अनेक सुविधाएं उपलब्ध हो गई हैं, किन्तु हिन्दी भाषी समाज की उदासीनता इस क्षेत्र में भी कम नही है। यूनिकोड से हिन्दी फॉन्ट की समस्या का निराकरण वैश्विक स्तर पर हो गया है, तथापि हिन्दी में संदेशों के लिए भी रोमन लिपि का ही प्रयोग किया जा रहा है। हिंदी में डैटा आधार विकसित न किए जाने के कारण देश के करोडों लोग अपनी भाषा में जन सेवाओं से वंचित है। जन-धन योजना के अंतर्गत करोडों ऐसे ग्राहकों को रुपे कार्ड अंग्रेजी में दिए गए जो अंग्रेजी का एक अक्षर भी नहीं जानते।
साररूप में यही कहा जा सकता है कि देश में जन-भाषा के रूप में हिन्दी लोकप्रिय बनी हुई है। जन संचार माध्यमों ने इसकी लोकप्रियता को वैश्विक स्तर पर पहुंचा दिया है। राजभाषा के रूप में भी हिन्दी ने प्रशासन और जनता के लिए प्रचुर मात्रा में कार्य सामग्री उपलबध करवाई है। असफलताएं भी देखने को मिली हैं, पर हर असफलता ने सफलता का मार्ग भी प्रशस्त किया है। कमी रही तो सिर्फ एक कि भाषा की राजनीति ने हिन्दी की सार्थकता और इसकी उपलब्धियों को रोके रखा।
राजभाषा के रूप में जितनी भी चुनौतियां हिन्दी के सामने हैं, उससे कहीं अधिक संभावनाएं इसमें निहित हैं। और ऐसा कोई कारण नहीं है कि यदि मानसिकता में बदलाव हो और भाषा के राजभाषायी स्वरूप को एक आमजन की भाषा के रूप में बदल दिया जाए तो इसका मार्ग तेजी से प्रशस्त हो सकेगा।

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