ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
पुस्तक मेला
01-Feb-2018 09:53 AM 2194     

हम पुस्तक मेला देखि लीन
कुछ पर्ची बांटति बुद्धिमान
कुछ धरम धुरन्धर व्यापारी
कल्लू-कबीर सब एक भाव
रचना मा तनिकौ नहीं ताव
अपनी ढपली पर अपनि बीन
हम पुस्तक मेला देखि लीन।
कुछ कुर्ता वाले देखि लीन
कुछ टाई वाले देखि लीन
कुछ जनवादी कुछ फौलादी
कुछ मेहेरबान कुछ गिरगिटान
कुछ दाढीवाले लेखकन का
हम गोल बनाये देखि लीन।
औरतें हुआँ हैरान मिलीं
भौचक्की याक दुकान मिलीं
फिर चमकै वाली साडिन मा
परकटी लेखिका कई मिलीं
आपनि किताब देखरावै का
उइ हरबराय कै गिरी जाँय
उइ आलोचक संपादक के
कान्धे पर मानौ चढी जाँय
कुछ नैन मिले बेचैन मिले
हम सबकी कइती पीठि कीन।
जब भूख लागि जिउ बिलबिलान
खाना तौ बहुतै मँहग रहै
स्वाचा चाहै ते काम चली
लरिकौनू हमका समझायेनि
अब चाह नही है- काफी है
हम हुनुर हुनुर करतै रहिगेन
वुइ दुइ कुझ्झी काफी लाये
मुंहु बरिगा याकै चुस्की मा
जब सौ रुपया का रेट सुनेन
जिउगा अघाय सब देखि लीन।
बडकई दुकानै चमकि रहीं
कुछ पैसावाले ठनकि रहे
कुछ सेल्फीबाज नए लउडे
छोकरिन संग मुस्क्याय रहे
कुछ अपनी धज मा सजे बजे
विद्वान बने गपुवाय रहे
कुछ पुरस्कार की चर्चा मा
कुछ सोक सभा के खर्चा मा
अपनी तरंग मा सबै लीन।
ऊ सवालाख का प्रोफेसर
सेतिहै किसान की बात करै
रिक्सा वालेन ते बहस करै
रेडीवालेन ते मोलभाव
मजदूरन पर भासन झाडै
अपनी किताब की चर्चा मा
सब अपनै खर्चा कै डारै
परकासक की चमचागीरी
संपादक के जूता उठाय
ऊ रहै संझोले कद का मुलु
अब बनिगा है विद्वान बड़ा
बंतू लेखकन की भीड़ बढ़ी
कविता-किसान ई का जानैं
ना सोसित महिला की पुकार
ना दलितन का कोई सुधार
ना हिन्दू है - ना मुसलमान
ई भाट आंय ई बेरिया के
ढोंगी नौटंकीबाज बड़े
अब का करिहौ दद्दू हमार
हमका समझायेनि गयादीन।
चौगिरदा इनका रोब बढ़ा
कुछ कुंअर बहादुर मिले हुआ
कुछ लपकी चपकी कवयित्री
लढिकौने (ट्राली बैग वाले)
वाले व्यंग्यकार
कुछ नक्सा वाले कलाकार
मजदूर मिले परकासक के
मानौ सब फगुई खेलि रहे
सब अपनै आपन पेलि रहे
धन्धेबाजन के धक्के मा
हमहू खुद का पहिचानि लीन
साहित्य कहां पर बिथरि गवा
बसि येहि बिधि सांचौ जानि लीन।

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