ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
पंजाब की लोक-कविता
CATEGORY : लोक-स्मृति 01-Mar-2017 08:08 PM 523
पंजाब की लोक-कविता

लोकगीत उन्मुक्त मन की भाव लहरिया हैं और सामाजिक परम्पराओं के लयात्मक शब्द चित्र भी। इनमें व्यक्ति मन के मूक वेदना-उल्लास भी है और समाज की रीतियों-कुरीतियों का समर्थन-विद्रोह भी। लोकगीत कुंठामुक्त समाज के सर्जक भी हैं और रुग्ण मन के चिकित्सक भी। पंजाब लोकगीतों की धरती है। यहाँ के लोक गीत, बोलियाँ, टप्पे, भांगड़ा, गिद्दा, माहिया, घोड़ियाँ बन अन्तर्मन की प्रत्येक संवेदना को स्वर देते हैं। सुरिंदर कौर, प्रकाश कौर, आसासिंह मस्ताना, जगमोहन कौर, रेशमा की सुरीली आवाजों ने इन लोकगीतों को संगीत से संवार अमरता दी है। जगजीत सिंह, चित्रा सिंह के टप्पे जान डाल रहे हैं। हंसराज हंस लोकगीतों का जादूगर है।
पर्व गीतों में लोहड़ी प्रमुख है। यह 13 जनवरी को होता है। बच्चे कुछ दिन पहले ही लोहड़ी मांगनी शुरू कर देते हैं। लोहड़ी त्योहार के अनेक लोकगीत प्रचलित हैं। लड़कियां - दे माई पाथी, तेरा पुत चढ़े हाथी, जैसी बोलियाँ बोलकर लोहड़ी मांगती हैं और लड़के मुख्यत: उस दुल्ला भट्टी का यशोगान करते हैं, जिसने अकबर के समय सुंदरी और मुन्दरी नामक दो अनाथ कन्याओं की जंगल में हिन्दू लड़कों के साथ सेर शक्कर डाल कर शादी करवाई थी और फिर अनाथ बचिच्यों को ऐय्याश खरीददार अमीरों से बचाने की यह परम्परा ही चल पड़ी थी।     
सुंदर मुंडरिए ए हो
तेरा कौन बिचारा- हो
दुल्ला भट्टी वाला- हो
दुल्ले धी ब्याही- हो
सेर शक्कर पाई- हो-----
कहते हैं कि पंजाब में मिलने वाले भट्टी उसी दुल्ला भट्टी के वंशज हैं।  बैसाखी भी पंजाब का प्रमुख त्योहार है। यह कनक की फसल तैयार होने पर मनाया जाता है। किसान ढ़ोल बजाकर जी भर कर भांगड़ा डालते और खुशियाँ मनाते हैं-ंक्या रंग अनोखा लाई है, मेहनत भरपूर किसानों की, सारे अरमान निकालो जी।।
पंजाबी खान-पान में लस्सी और मक्खन प्रमुख हैं। तिरंजन में बैठी स्त्रियाँ इसी की बातें करती हैं। सरसों के साग, गंदलां, खीर का जिक्र भी यहाँ- वहाँ मिल जाता है-
तेरी माँ ने चाढया साग वे
असां मंगया ते मिलेया जवाब वे----
तेरी माँ ने चाढ़िया गंदला
असां मंगिया ते पाई गईया दंदला  ----
तेरी माँ ने चाड़ी खीर  वे
असां मंगी ते पाई गई पीढ़ वे----
लट्ठे दी चादर उत्ते सलेटी रंग माहिया
आवो सामने कोलो दी न लंग माहिया।
भारतीय समाज में बेटियाँ स्वयं अपनी शादी की बात नहीं किया करती। ऐसे में एक लोकगीत के माध्यम से बेटी अपने पिता, भाई, चाचा, मामा से उस वर की इच्छा प्रकट करती है, जो सितारों के बीच चाँद की चमक लिए हो, कान्ह-कन्हैया जैसा हो-
बेटी चन्नण दे ओले ओले क्यों खड़ी
नी जाईए चन्नण दे ओले ओले क्यों खड़ी
मैं तां खड़ी सां बाबल जी दे पास
बाबल जी तों आस
बाबल वर लोड़िए----------
ज्यों तारयां विच चंन, चन्ना विच कान्ह, कन्हाईया वर लोड़िए।
एक अद्वितीय सुंदरी इन लोकगीतों में पालथी मारकर बैठी है। यह सिंदूरी सुंदरी बाल संवारती दर्पण में भी झांक ले, तो उसमें भी दरार आ जाए। लड़के तो उसके लिए दीवाने हैं- मैनु हीरे हीरे आक्खे मुंडा नम्बरा दा, मैनु वांग शुदाइया छनके हाय नी मुंडा नम्बरा दा।। यह आसन्न यौवना प्रिय को आमंत्रित करती है-
फुल्ला दी बहार राति आओ न
शाव्वा राति आओ न।
प्रेम की अनन्यता और समर्पण भाव अपने चरम पर है। नायिका प्रेम में सराबोर हो छत पर बैठे कौवे को संबोधित करती है-
कोठे तों उड कांवाँ
सद पटवारी नूं
जिंद माहिए दे नां लांवाँ।  
प्रियतम से कहती है- वे लै दे मैनु मखमल दी पक्खी घुंघरूयाँ वाली।। इस ग्रामीण युवती की कसक है कि उसका यौवन गर्मी से पिंघला जा रहा है और प्रियतम बहाने ही बनाता जा रहा है। काश! वह शहर मे होती तो बिजली के पंखे की बहार उसके जीवन को खुशहाल बना देती। प्रियतम माँ का पिछलग्गू है, लाई-लग है, बिगड़ा हुआ है, देखने में भी सुंदर नहीं, पर उसका प्यार आत्मिक है-
काला शाह काला,
मेरा काला है सरदार, गौरेयां नू दफा करो
मैं आप तिल्ले दी तार, गौरेयां नू दफा करो।
प्रियतम के साथ नोंक-झोंक तो यहाँ-तहाँ बिखरी पड़ी है- चन्न कित्था गुजारी आई रात वे... को गायिका सुरिंदर कौर ने कमाल की आवाज दी है।   
बेटियों के दुख, उनकी उदासी, उनके प्रश्न इन लोकगीतों में बिखरे पड़े हैं। कौन-सा घर उनका अपना है? मन में है कि पिता के उपवन की डालें, गलियों की ईंटें ही शायद उनकी डोली को  रोक लें, पर नहीं, बाबुल को तो उन्हें ससुराल भेजना ही भेजना है।  
सादा चिड़ियाँ दा चंबा वे, बाबल असा उड़ जाणा ----
तेरे बागाँ दे विच विच वे बाबल डोला नहीं लंगदा----
तेरी भीड़ियाँ गलियाँ च वे बाबल डोला नहीं लंगदा।
माओं का बेटों के प्रति अतिरिक्त मोह और बेटियों को मिलने वाली उपेक्षाएं भारतीय समाज का कटु सत्य है। माना जाता है कि बेटा वृद्ध माँ-बाप का संरक्षक होता है। जग्गे के जन्म पर बधाइयाँ मिलती हैं, गुड़ बांटा जाता है। भले ही वह बड़ा होकर डाकू बनता है-
जग्गा जम्या ते मिलन बधाईयां
के वड्डे हो के डाके मारदा-----
जे मैं जानदी जग्गे ने मर जाणा
मैं इक थाई दो जम्मदी, जग्गया।  
बेटियों की और बेटियों के लिए कसक, बेचैनियां, बेबसियां भी यहाँ है-
नी कनका लम्मिया धियाँ क्यों जम्मियाँ नी माए।
कनका निसरियाँ धियाँ क्यों विसरियाँ माए।
इन लोकगीतों में विदाई के मर्मस्पर्शी वर्णन हैं। बेटियों के लिए मायका महल सरीखा है, वहाँ के कबूतर सतरंगे हैं। वहाँ की हवा शीतल है। जबकि भाई बेझिझक डोली आगे सरका देते हैं। भाभियाँ ननद की विदाई पर सुख की साँस लेती हैं। मानों वह मिट्टी का बुत हो। लेकिन माँ बेटी का रिश्ता फर्क है, जैसे ही माँ बेटी गले लगती हैं, पीड़ा का ऐसा भूकंप उठता है कि चौबारे की सभी दीवारें डोलने लगती हैं।
सास का माँ-बाप को हर समय बुरा-भला कहना उससे बर्दाश्त नहीं होता। बोलियों में उसका विद्रोह मुखर हो उठता है -
कुकड़ी ओ लैनी जेड़ी आण्डे देंदी ए,
सौरे नहीं जाना सस्स ताने देदी ए।
कुकड़ी ओ लैनी जेड़ी कुडकुड़ करदी ए,
सौरे नहीं जाना सस्स बुड़बुड़ करदी ए।
सुथना छीट दियाँ मूलतानों आइयाँ ने,
मावाँ आपनियाँ जिन्हा रीझा लाइया ने।
सुथना छीट दियाँ मूलतानों आइयाँ ने,
सस्सा  बगानियाँ जिन्हा गलों  लवाइया ने।
पंजाब के लोकगीत अनेक विश्वास-अंध विश्वास सहेजे हैं। विश्वास है कि कौवे का "कां कांं" प्रिय आगमन का संदेश है। चरखा चला रही युवती का कौवे की आवाज सुन ध्यान भटक जाता है। लगता है मानों मायके से भाई आ ही रहा होगा-
उच्चे बनेरे कां पया बोले, मैं चरखे तंद पावां
वे कांवाँ मेरा वीर जे आवे, तेनु कुट- कुट चूरी पावां
चरखा चन्नण दा, शावा चरखा चन्नण दा
कत्ता प्रीता नाल चरखा चन्नण दा।
वह छत या दरवाजे  पर खड़ी होकर भाई की राह देखती रहती है। मिट्टी का बुत बनाकर उसके गले लगती है, उससे बतियाती है।
पंजाबी वेश-भूषा, हार-ऋंगार के चित्र भी यहाँ हैं। सितारों जड़े नारोवाल के  जूते युवतिओं की पहली पसंद है- जुती मेरी नारान्वाल दी, सितारेयन जड़त जड़ी।।  कानों में बड़ी-बड़ी बालियाँ उन्हें सुहाती हैं- कन्नी बुँदे सोहने।। जालीदार डोरिए के दुपट्टे उन्हें पसंद हैं।  उसके आभूषणों में सब को आकर्षित करने की शक्ति है। पायल की रुनझुन पथिकों को बांध लेती है। जालीदार डोरिए का दुपट्टा उसके रूप को छिपाता नहीं, दिखाता है, चार चाँद लगा देता है।
शादी के गीतों को घोड़ी और सुहाग कहा जाता है। मत्थे ते चमकन बाल, मेरे बनड़े दे शादी गीत, घोड़ी है। इसमें दूल्हे को मेहँदी लगाई जाती है, बहनें गान्ना बांधती हैं। सलेटी रंग की लट्ठे की चादर का भी उल्लेख मिलता है।
लोकगाथा गीतों में हीर-रांझा, सस्सी-पुन्नू, सोहनी महिवाल का नाम प्रमुख है। कभी वारिसशाह ने हीर लिखी थी। विभाजन के समय स्त्री की दुर्दशा देख कर अमृता प्रीतम का लेखनी तड़प उठी। वारिस शाह को ही संबोधित करते उसने कहा-
अज आक्खाँ वारिस शाह नू, किते कब्रा विचचों बोल वे
कदी रोई सी धी पंजाब दी, तूँ लिख- लिख मारे वैन
आज लक्खा धियाँ रोंदियाँ, तेनु वारिस शाह नू कैन।
लोक साहित्य ने स्वतन्त्रता संग्राम के समय "पगड़ी संभाल जट्टा" गीत का सृजन किया तो "रब्ब मोया, देवता भज गए, राज फिरंगी दा" जैसे गीत भी चले।
भारतीय सिनेमा में पंजाबी लोकगीतों की लोकप्रियता से निर्माता-दर्शक सब परिचित हैं। उड़े जब जब जुलफ़े तेरी, कुंवारियों का दिल मचलेे, कि मैं झूठ बोल्या, जिसकी बीबी लंबी उसका भी बड़ा नाम है, कोठे से लगा दो सीढ़ी का क्या काम है, जिसकी बीबी गोरी उसका भी बड़ा नाम है, कमरे मे बिठा दो बिजली का क्या काम हैै- जैसे गीत मूवी के प्राण बन जाते हैं। लोकगीत मात्र मनोरंजन का साधन नहीं अपितु पंजाब की संस्कृति को उजागर करते हैं। प्रदेश की आत्मा का दर्पण हैं। यह पीढ़ी दर पीढ़ी चलने वाली विरासत है। पंजाब के लोकगीत मनुष्य को सत्यम, शिवम, सुंदरम से जोड़ते हैं। इनमें कसक और माधुर्य का समन्वय है। देवेन्द्र सत्यार्थी ने वर्षों यात्रायें करके लाखों लोकगीतों को संकलित करने के असंभव कार्य को संभव बनाया था। उन्होंने संकलन भी किया और अध्ययन भी। लोक गीत संगीत से, लोक वाद्य से जुड़े हैं।

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