ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
प्रो. सुरेश ऋतुपर्ण
प्रो. सुरेश ऋतुपर्ण
26 अक्तूबर,1948, मथुरा में जन्म। हिन्दी साहित्य में एम.ए., एम.लिट. एवं पी-एच.डी.। हिन्दू कॉलेज में अध्यापन। ट्रिनीडाड एवं टुबैगो में राजनयिक रहे। मॉरीशस के महात्मा गांधी संस्थान में अतिथि आचार्य के रूप में कार्य। तोक्यो यूनिवर्सिटी ऑफ फॉरेन स्टडीज में प्रोफेसर रहे। त्रिनिदाद एवं जापान में आयोजित वि·ा हिंदी सम्मेलन से जुड़े रहे। दो दर्जन से अधिक पुस्तकें प्रकाशित। त्रैमासिक पत्रिका "हिन्दी जगत' के संपादक। ट्रिनीडाड हिन्दी भूषण सम्मान, विदेश हिन्दी प्रसार सम्मान, फादर कॉमिल बुल्के सम्मान, सरस्वती साहित्य सम्मान से पुरस्कृत। दुनियाभर के अनेक देशों की यात्राएँ कीं। सम्प्रति - निदेशक, के.के.बिरला फाउण्डेशन।

छत का टपका और चोर

बहुत समय पहले की बात है। जापान के कुमामोतो प्रदेश में एक बूढ़ा और बुढ़िया अपने छोटे-से पुराने घर में रहते थे। यह घर बहुत पुराना हो गया था और बरसात के दिनों में तो घर में रहना भी मुश्किल हो जाता था। इ

जीवित रहेगा प्रमथ्यु

कभी-कभी इतिहास में ऐसे क्षण आते हैं और अक्सर आते हैं, जब जीवन के किसी मोड़ पर देखी, सुनी या पढ़ी रचना साक्षात् मूर्त हो जाती है। सामयिक और प्रासंगिक हो जाती है। उसके प्रतीक नूतन अर्थ के आलोक में भास्

प्रवासी भारतीय दिवस के मायने

प्रवासी भारतीय दिवस का आयोजन अब एक परम्परा बन गया है। 9 जनवरी 2003 को तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी ने "सदा खुले हैं द्वार' कविता-पंक्ति सुनाकर विश्व भर में फैले प्रवासी-आप्रवासी

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