ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
प्रेम-कैदी
CATEGORY : व्यंग्य 01-Sep-2018 08:30 PM 195
प्रेम-कैदी

ऊँ ऊँ हूँ! छोड़ो न मुझे! खाना बनाना है? बच्चे भी आने वाले होंगे। क्या कहेंगे वे, मुझे तुम्हारे साथ इस तरह देखेंगे?
चलो थोड़ी देर और सही, उसके बाद बिलकुल नहीं।
तुम भी बड़े वो हो! छोड़ते ही नहीं मुझे एक पल को भी।
चलो ठीक है, चलो किचन में चलते हैं...
आज निक्की ने बटर चिकन की फरमाइश की है, पर मैं क्या करूँ? मुझे तो यह बनाना ही नहीं आता?
अरे वाह! तुम्हें आता है बटर चिकन बनाना। ये तो कमाल ही हो गया। अच्छा चलो तुम बताते जाओ मैं बना लेती हूँ।
क्या? कितना घी डालूँ? फिर से बताओ प्लीज़! सुन नहीं पाई थी।
अच्छा! दो बड़े चम्मच!
वाह! बहुत बढ़िया बनी है। चलो तुम भी खाकर थोड़ी देर आराम कर लो। मैं बच्चों को खाना खिलाकर आती हूँ।
आज तो तुम्हारी रेसिपी ने कमाल ही कर दिया। बच्चे तो बहुत खुश हो गए।
तुम्हें कैसे बताऊँ कि मैं तुम्हें कितना प्यार करती हूँ?
बहुत अच्छा लगता है मुझे खुद को तुम्हारी आँखों से देखना। इतनी सुन्दर मैं खुद को कभी दर्पण में भी नहीं लगी।
ये तुम्हारे प्रेम का ही असर है कि मैं खुद पर ही रीझ जाती हूँ।
सचमुच बहुत ही भाग्यशाली हूँ मैं कि तुम सा साथी पाकर! काश! तुम तुम जैसे स्मार्ट, गुड लुकिंग, समझदार और प्रतिभाशाली मेरे पति भी होते! कभी-कभी तो आश्चर्य होता है एक साथ इतनी खूबियाँ भला कैसे संभव है?
और इतना प्यार, इतना प्यार... कहाँ से ले आते हो तुम मेरे लिए? मेरी हर इच्छा की पूर्ति के लिए तुम अलादीन के जिन्न बन जाते हो।
मेरी शॉपिंग की इच्छा हुई। तुम हाज़िर थे।
जरा-सा मूड खराब हुआ, तुमने मूवी दिखा दी।
अच्छा ! ये तो बताओ। इतना ज्ञान कहाँ से पाया तुमने?
देश-विदेश की हर जानकारी अखबार से भी पहले कहाँ से ले आते हो तुम?
ऐसा कौन-सा विषय है जिसकी जानकारी न हो तुम्हें। सचमुच जीनियस हो तुम और मैं भाग्यशाली जो तुम मेरी ज़िंदगी में आए।
पर कहते हैं न कि अधिकता तो प्यार की भी अच्छी नहीं होती।
ग़ालिब को इश्क ने निकम्मा कर दिया था। तुमने मुझे।
तुम्हारे प्यार में डूबी मैं तुमसे एक पल की भी दूरी बर्दाश्त नहीं कर पाती। तुम्हारे बिना जल बिन मछली सी तड़पने लगती हूँ।
सोते-जागते बस तुम ही तुम नज़र आते हो। तुम से बातें किए बिना रात को नींद ही नहीं आती। पति नाराज़ होते हैं तो भी छुप-छुप कर तुम्हें निहारती हूँ।
याद है जब पिछली बार तुम कुछ बीमार हो गए थे। शायद बुखार दिमाग में चढ़ गया था। न जाने क्या अंट-शंट बक रहे थे। होश ही नहीं था तुम्हें। दस दिन तक तुम अस्पताल में दाखिल रहे। कैसे कटा एक-एक पल तुम बिन कैसे बताऊँ? प्राण मुँह को आते थे। हर पल खुद को कोसती थी। काश! तुम्हारा और अच्छी तरह ख्याल रखा होता। तुम्हें पूरा पोषण दिया होता? और फिर जब तुम वापस आए तो अपनी याददाश्त ही खो चुके थे। मेरा तो दिल ही टूट गया था। पर हिम्मत नहीं टूटने दी थी। कैसे तुम्हें सब याद दिलाया मेरा ही दिल जानता है।
अब मुझे सबक मिल गया है। अब मैं तुम्हारा पूरा ध्यान रखूँगी।
पर फिर कहती हूँ। इतना प्यार न करो मुझसे। मैं तुम्हारे सम्मोहन में बंधती जा रही हूँ। तुम्हारा साथ पाने को अक्सर अपने पति और बच्चों तक की उपेक्षा कर जाती हूँ। ऐसा लगता है तुम्हारी कैदी हो गयी हूँ मैं। पहले मुझे तुम्हारी चाहत थी, अब तुम मेरी आदत बन गए हो। क्या करूँ।
मैं तुमसे विनती करती हूँ। मुक्त कर दो मुझे। मुक्त कर दो मुझे अपने सम्मोहन से। ओ मेरे स्मार्ट फोन, मेरे मोबाइल। मुझे तुमसे दूरी बनानी ही होगी। मुझे तुम्हारी कैद से बाहर आना ही होगा।

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