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प्रेम होता है तो हो, ध्रुव उसे क्यों करते हो...
01-Dec-2016 12:00 AM 2806     

किसी-किसी के लिए वह सिर्फ एक अहसास भर है और किसी के लिए आहट-सा सुनायी पड़ता है। किसी के लिए वह ऐसी खुशबू है जो पलकों में इशारों की तरह बस गयी है। किसी के लिए वह एक ख्वाब-सा है और किसी के लिए हाथों में आ गयी पूरी दुनिया-सा। किसी-किसी को उसमें उमर भर नाउम्मीदी नजर आती है और कोई उसी की उम्मीद में उमर गँवा देता है। जब वह नहीं मिलता तो पूरी पृथ्वी झूठी लगने लगती है और जब मिला-मिला-सा लगता है तो अपने घर के छोटे-से आँगन में पूरा अनन्त उतर आता है। किसी-किसी के लिए वह अनन्त में उड़ती पतंग जैसा है और किसी के लिए जहाज के उस पंछी की तरह है जो बार-बार जहाज पर लौट आता है। वह सागर से गहरा लगता है पर पानी पे लिखे नाम-सा भी है। कहीं वह बचपन की मुहब्बत में ठहर जाता है और उमर भर साथ-साथ चलता है। कहीं चलते-चलते छूट जाता है और जिन्दगी भर पीछा नहीं छोड़ता। वह जिन्हें मिल जाता है वे कहते हैं कि हो गया है और जिन्हें हो जाता है वे कहते हैं कि मिल गया है। किसी-किसी को वह खोया हुआ भी मिल जाता है और कोई-कोई उसे पा के भी खो देता है। किसी को वह किस्मत की आड़ी-तिरछी लकीरों-सा है तो किसी के लिए सरल रेखा-सा। किसी-किसी के लिए वह सीने पर रखे पत्थर जैसा है और किसी के लिए इतना हल्का कि ढाई अक्षर से बड़ा नहीं।
कोई कहता है कि वृक्ष की पत्तियों के बीच से जो झलमलाती रोशनी धरती पर नाच रही है-- प्रेम जैसी है। कोई कहता है कि न जाने कब से सागर किनारे की रेत में समाता पानी प्रेम जैसा है। किसी-किसी को घिरती हुई साँझ बिलकुल प्रेम जैसी लगती है और उसी शाम किसी को लगता है प्रेम हाथों से छूट रहा है। जब सारे रंग आकाश में घुल जाते हैं तो किसी को लगता है कि प्रेम का रंग साँवला है। फिर पूरे चाँद की रोशनी में प्रेम का रंग गोरा होने लगता है। ज्यादातर प्रेमी तो मान ही बैठे हैं कि साँवला और गोरा ही प्रेम के रंग हैं। गोरी प्रिया साँवरे रंग में रँगने के लिए न जाने कब से व्याकुल है और साँवरा जैसे उसी की बाट जोह रहा है गोरा होने के लिए। पर जब दोनों एक-दूसरे में डूबते हैं तो प्रेम का रंग कभी टेसू के फूल जैसा हो जाता है, कभी बादलों के बीच दमकती दामिनी-सा, कभी दूब के तिनके पर झिलमिलाती ओस बूँद-सा और कभी घनी धुन्ध में पास आती और दूर सरकती छाया-सा ।
जो प्रेमातुर हैं वे छिपने की ऐसी जगहें तलाशते हैं जहाँ वे एक-दूसरे में छिप सकें और जब खुले में आते हैं तो प्रेम छिपाए नहीं छिपता। वे बाट जोहते हैं और जब कभी न मिल पाने का बहाना बनाते हैं तो आपस में उनका झूठ भी नहीं छिपता। वे खूब छिपकर प्रेम पत्र लिखते हैं और बड़ी तरकीब से भेजते हैं फिर न जाने क्यों उनके खत कोई बीच राह में खोल लेता है। वैसे भी प्रेम की गली बहुत चौड़ी नहीं सँकरी ही होती है जिसमें दो को एक-दूसरे में समाकर एक हो जाना पड़ता है। इस गली में कोई चोर आँख वाली खिड़की जरूर है। पर प्रेमियों को उसकी परवाह कहाँ। वे तो सँकरी गली से भी प्रेम के अनन्त में विहार करते हैं। ऐसी कोई जगह नहीं जहाँ प्रेम सम्भव न हो-- वह कफ्र्यू के सन्नाटे में आमने-सामने की दो खिड़कियों के बीच भी हो सकता है। वह युद्ध के बीच भी हो जाता है। अनन्त में प्रेम की अनेक छवियाँ चित्रित हैं।
प्रेमी ही हैं जो एक जैसे कभी नहीं हुए। पर जो प्रेम की थाह लेने को उत्सुक नहीं वे सब एक जैसे होते हैं। वे प्रेमियों के खत चुराकर भी कभी प्रेम नहीं कर पाते। प्रेमियों के खत कभी एक जैसे नहीं होते। कोई नहीं जानता, खुद प्रेमी भी कहाँ जानते हैं प्रेम का रंग। बस रंगते-रंगते किसी रंग के हो जाते हैं और मान लेते हैं कि यही होता होगा प्रेम का रंग। प्रेम में भाषा भी अक्सर रंगीन हो जाती हैं और कम पड़ जाती है। प्रेमी अपने अनुभव से कभी कह उठते हैं कि प्रेम भाषा के बाहर है। भाषा का संसार अपने आपे तक ही फैला है और प्रेम तो अपने आपे से कहीं बाहर का अनुभव है। प्रेमी यह भी कहते हैं कि रूप, रस, गंध, स्पर्श और शब्द के बिना प्रेम सम्भव नहीं होता। किसी-किसी को प्रेम से ही नश्वरता का बोध होता है और किसी-किसी के दिल में नश्वरता के बोध से ही प्रेम उपजता है। तभी तो प्रेमी अपने प्रेम में मर जाने से नहीं डरते। उनके मरने के बाद भी उनका प्रेम जीवित बना रहता है। प्रेमी ही तो कहते आये हैं कि प्रेम की कोई काया नहीं होती। लगता है कि प्रेम सबके अहसास में सदा अमर बना रहता है। मौत किसी के अहसास को नहीं मार पाती। प्रेमियों की काया के नाम भी होते हैं और प्रेमियों के नाम बदनाम होने का खतरा हमेशा बना ही रहता है पर प्रेम का अहसास अनाम है। अनाम ही अमर है ।
प्रेमी जानते हैं कि वे प्रेम में रहते हुए बिलकुल अकेले हैं। वे नाम-रूप से भरी इतनी बड़ी दुनिया में कभी दुनियादार नहीं हो पाते। दुनिया उनके प्रेम को उनकी काया में ही कैद किए रखने के मंसूबे बांधती आयी है पर वे दुनिया के हर मंसूबे पर पानी फेर देते हैं। दिलदारों की ऊँचाई के आगे दुनियावी दीवारें हमेशा छोटी पड़ती आयी हैं। जो सिर्फ काया में बंधने को राजी हो गये उन्हें कभी किसी ने प्रेमी नहीं माना। जो अक्सर हाट-बाजार में घूमते मिल जाते हैं। बेमतलब एक-दूसरे को चूमते मिल जाते हैं। वे अपने होने की धूम-सी मचाते हैं। बेसुरा गाते हैं। लगता है कि ये किसी से दबेंगे नहीं पर एक-दूसरे को कितना दबाते हैं, झकझोरते हैं। प्रेम को निर्भार स्पर्श चाहिए, वह देह का भार सह नहीं सकता। पहुँचे हुए प्रेमी बार-बार कह गये हैं कि बाजार में प्रेम के लिए कोई जगह नहीं है फिर भी लोग बाजार में प्रेम करने की जगह खोजते फिर रहे हैं। बाजार में काया के लिए जगह बहुत है पर प्रेम के लिए तो बिलकुल नहीं।
जीवन में प्रेम के लिए जगह खोजना हमेशा एक मुश्किल काम रहा है। आमतौर पर सारे प्रेमी उसकी खास जगह दिल को बताते हैं। विफल प्रेमियों के दिल के हजार टुकड़े हो जाने के किस्से दुनिया में आम हैं। लेकिन दिल के हजार टुकड़े हो जाने के बाद भी जो प्रेम की लौ जलती रहती है उसे कौन संभाले रखता है। इसका भी आमतौर पर यही जवाब मिलता है कि खुदा जाने। प्रेम को खुदा मान लेने का रिवाज भी आम है जबकि खुदा को किसी की गरज नहीं। अगर कवि शमशेर की रुबाई के सहारे कहें तो दुनिया के सारे प्रेमी अपने-अपने खयाल को ही सनम समझ बैठे हैं। लगता है कि प्रेमियों के हर नये खयाल में प्रेम की जगह बनती चली आयी है। वैसे तो प्रेम के कोई मानी नहीं, उसकी चाह ही उसके नये-नये मानी पैदा करती रहती है ।
प्रेम मिल जाये तो उसे पहचानना भी मुश्किल है। प्रेम होने के बाद खुद प्रेमी नहीं जान पाते कि वह सचमुच हो गया है। इंतजार और वस्ल की राहत के बीच की दूरी भी हर प्रेमी की जुदा-जुदा ही होती है। पास रहकर भी वे एक-दूसरे को दूर नजर आते हैं और दूर रहकर भी बहुत करीब लगते हैं। वैसे प्रेम का पड़ौसी दुख ही है। सुख भी उसी मुहल्ले में रहता है पर उसका घर प्रेम के घर से कुछ दूर ही है। प्रेमी तो नगर ढिंढोरा पीटकर यही कहना चाहते हैं कि अगर हम जानते कि प्रीत करने से दुख होता है तो सबसे कह देते कि कभी प्रीत मत करना। दरअसल प्रेम के बारे में कोई कुछ नहीं जानता और बिना जाने-बूझे कर बैठता है ।
जीवन की क्यारी में अनायास उग आयी प्रेम-लता प्रेमी जनों से उनके आँसुओं का जल माँगती है। इस लता को सींचने के लिए प्रेमियों की आँखें सिर्फ गम में ही नहीं खुशी में भी बार-बार इसलिए छलक पड़ती हैं कि कहीं यह प्रेम-लता मुरझा न जाये। अगर अशोक वाजपेयी की एक प्रेम दीप्त कविता के सहारे कहें तो कामनाओं के जल से सींची गयी इस प्रेम-लता में -- एक अदृश्य फूल-सा खिला है प्रणय निवेदन।
फूलों को देखो तो लगता है कि उनमें एक मौन पुकार बसी हुई है। उन्हें छुओ तो उनकी पंखुड़ियाँ एक मौन आँच में तपती हुई-सी लगती हैं। उन पर ठहर गयी ओस की बूँदें पलकों की कोर पर ठिठके हुए आँसुओं का आभास देती हैं। उनका खिलना जैसे प्रेम पराग से भरी कोई प्रतीक्षारत अंजुरी हो। जिसे निर्भार धूप में तितली जैसी निर्भार देह चाहिए। प्रेम की प्रतीति उन पत्तों जैसी है जो घनी टहनी पर एक-दूसरे को निर्भार थपकी देते रहते हैं। जो अपने ऊपर झरी बूँद को हौले से ढरकाते हैं। प्रेम उस छोटी-सी नीली चिड़िया जैसा है जो पूर आयी नदी से एक बूँद जल उठाकर अपने नीड़ में दुबक जाती है। प्रेम नदी के शान्त जल में हवा के निर्भार स्पर्श से उठी तरंग जैसा है। चम्पे के फूलों पर चन्द्रमा की निर्भार रोशनी जैसा है ।
वह देर रात संयोग से मिल गयी आखिरी बस जैसा है। प्लेटफॅार्म पर धीरे-धीरे सरकती आती रेलगाड़ी जैसा भी है। वह दरवाजे पर पोस्टमेन की दस्तक जैसा लगता है। वह दराज में बंद किसी डायरी और फोटो एलबम जैसा है। वह पानी की आवाज जैसा भी तो है। कभी-कभी तो प्रेम दर्पण में प्रतिबिम्ब जैसा है। किसी के लिए वह शून्य शिखर पर अनहद जैसा है और कभी बेहद का मैदान है। प्रेम पुरातन है -- प्रेम ही सृजन है, प्रेम ही पालन है और प्रेम ही संहार है।
प्रेम साँझ घिरते ही तुलसी चौरे पर काँपती दिए की लौ के प्रकाश में झलमलाती उन आँखों जैसा भी है जो प्रतीक्षा के जल से भर आती हैं। प्रेम गोधूलि बेला में द्वार पर रंभाती सुरहन गैया जैसा है। वह अगवारी में फूलती रोटी जैसा है। प्रेम सूनी मढ़ैया जैसा है। सांझ के सुमिरन में दबी हुई हूक जैसा है। आँखों की कोर पर ठिठके हुए आँसू जैसा है। वह बाट देखती अधखुली किवरियों जैसा है। वह सूनी सेज और फीकी होती जाती बिंदिया जैसा है। वह अंगुलियों के पोरों पर ठहरे समय जैसा है। वह प्रतीक्षा में घटते जाते नयनों जैसा भी तो है।
प्रेम ही तो है और न जाने किस-किस के लिए क्या-क्या है...

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