ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
प्रवासी दिवस के बहाने
CATEGORY : रम्य रचना 01-Jan-2017 01:04 AM 2601
प्रवासी दिवस के बहाने

गये ज़माने में जब जनसंख्या कम थी तो लोग मिलजुल कर रहते थे। रिश्तों की क़दर करते थे। अब जनसंख्या विस्फ़ोट के कारण धरती पर भीड़ बढ़ गयी है। संयुक्त परिवार न्यूक्लियर फॅमिलियों में बंट गये हैं। रिश्ते घट गये हैं। अंदरखाने कहीं डार से बिछुड़े लोगों में अपराध भाव जागा तो त्रुटि-पूर्ति यानि खामियाज़ा - भरपाई अर्थात डैमेज-कंट्रोल के लिये उन्होंने एक तरक़ीब खोज ली। हर रिश्ते के नाम पर एक दिन लिख दिया--- माँ-दिवस, पिता-दिवस, भाई, बहन, बेटा, बेटी आदि दिवसों के साथ मित्रता और महिला दिवस भी शामिल कर लिये। (अभी तक पुरुष दिवस नहीं आया क्योंकि पुरुषों के तो साल, महीने, सप्ताह सभी दिन होते हैं)।
तो साहब लोगों ने सोचा कि क्यों न एक दिन उनके भी नाम कर दिया जाये जो परिवार को छोड़ कर विदेश प्रस्थान कर जाते हैं। लीजिये सरकार बन गया प्रवासी-दिवस। हमारे बंगलौर में भी पूरे ज़ोर-शोर से प्रवासी दिवस मनाया जाने वाला है। और क्यों न हो, भारत में तो वैसे भी प्रवासियों को बड़े आदर-सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है। भैये यहाँ हर आयात की हुयी वस्तु (इम्पोर्टेड चीज़) ऊँचे दामों में आँकी जाती है। इसीलिये निर्यात (हर एक्सपोर्ट) किये हुए बशर को भी काफ़ी भाव दिया जाता है। "कनाडा से आये हैं" सुनते ही पास के लोग बालों में कंघी करने लगते हैं, इत्र लगाने लगते हैं और साहब सबसे महत्वपूर्ण बात तो ये है कि लोग फ़ौरन हिंदी, अवधी, भोजपुरी, बंगाली, पंजाबी, कन्नड़ा, मलयालम आदि छोड़ कर अंग्रेजी बोलने लगते हैं। ऐसा दबका होता है इम्पोर्टेड व्यक्ति का।
ऐसा नहीं है कि ये प्रवासी बशर हमेशा से ही महत्वपूर्ण थे। इन बेचारों ने भी बड़े पापड़ बेले हैं। एक लम्बे अर्से से अनेक लोग अपना घर-बार देश छोड़ कर प्रवासी का जीवन व्यतीत करते आ रहे हैं। दरअसल प्रवासी वे व्यक्ति हैं जो अपने मूल भौगोलिक निवास को छोड़ कर किसी अन्य भौगोलिक क्षेत्र में जा कर बस जाते हैं। क्यों बस जाते हैं, इसके तीन कारण हैं। पहला कारण है - उत्पीड़न! एक ज़माने में अमीर और विकसित देशों के लोग गरीब देशों के व्यक्तियों को लालच देकर या धमका कर अपने देश में ले जाते थे और ग़ुलाम बना लेते थे। ये ग़ुलाम फिर कभी अपने घर वापस नहीं जा पाते थे। इन्हें खाने पीने और कपड़े के अलावा कोई पारिश्रमिक भी नहीं मिलता था। ज़ाहिर है कि उन लोगों के लिये वापसी के सभी रास्ते बन्द हो गये और वे परमानेंट डायस्पोरा बन कर रह गये।
 दूसरी वजह भी एक अच्छे भविष्य की खोज ही रही है। इसमें श्रमिक लोग आते हैं। ये ग़ुलाम तो नहीं हैं किन्तु अकुशल मज़दूर की तरह बाहर के मुल्कों में जाकर काम करते हैं और बदले में वेतन लेते हैं। इनमें से कुछ लोग पैसे जमा करके अपने वतन भी लौट आते हैं।
तीसरी श्रेणी में आते हैं तिजारती लोग यानि व्यापारी। इन्हें अपने धंधे की अच्छी समझ होती है। ये लोग आयात- निर्यात का काम करते हैं (आप कह सकते हैं कि ये इधर का माल उधर और उधर का माल इधर करने में माहिर होते हैं)। बुरा ना मानो भाई - चुटकुला है।
विश्व में सबसे ज़्यादा प्रवासी भारतीय मूल के हैं। कारण जो भी हो, देश त्याग कर जाने वाले लोग प्रवासी कहलाते हैं।
कारण कुछ भी हो, प्रवासी भारतीय वो बशर हैं जो रहते विदेश में हैं और उनका डीएनए जुड़ा हुआ है भारत से। चलें छोड़ें इन परदेसियों को।
अब चर्चा करें अपने देश में टिके रहने वालों के बारे में! आम आदमी तो मौके ढूँढता रहता है देश से बाहर जाने का। उसका क़ुसूर नहीं है। कौन है जो बेहतर ज़िन्दगी नहीं चाहता? सिर्फ सियासत एक ऐसी जगह है जहाँ से कोई कूच नहीं करना चाहता। एक बार अगर किसी ने राजनीति में अपनी जड़ जमा ली, उसके तो वारे न्यारे हो जाते हैं। बचपन में एक गाना हम बड़े भाव विभोर हो कर गाते (सुनते) थे- हम लाये हैं तूफ़ान से कश्ती निकाल के / इस देश को रखना मेरे बच्चों संभाल के।
उस वक़्त के वो सभी बच्चे अब बड़े हो गये हैं (श्री राहुल गाँधी "पप्पू" को छोड़कर)। अब वे (भूतपूर्व बच्चे) देश की परवाह नहीं करते - सिर्फ अपनी फ़िक्र करते हैं। स्वार्थ के लिये वे कश्ती को तूफ़ान के हवाले करने से भी नहीं चूकते। उदाहरण के लिये संसद की हालत ही देख लो। सब हारे हुए लोग जुटे पड़े हैं कि संसद को काम नहीं करने देंगे। यानि जिस काम के पैसे मिलते हैं वो न करेंगे न ही सरकार को करने देंगे। ये लोग जनता का पैसा मुफ्त में खाते हैं - दंगा-फ़साद करते हैं। बकौल ग़ालिब - काबे किस मुंह से जायेंगे ये सब, शर्म इनको मगर नहीं आती।
हमें नरेंदर मोदी से उतना ही लगाव है जितना हमें कभी चाचा नेहरू और प्रियदर्शिनी इंदिरा से था। वैसे, बकौल अमिताभ बच्चन, पूरी की पूरी सियासत एक बड़ा ड़ड्ढद्मद्मद्रदृदृथ् अर्थात गन्दा गटर है और इसके लिये तमाम राजनीतिक दल ज़िम्मेदार हैं। शहज़ादे - राहुल और अखिलेश, गंगू तेली - अरविन्द और मुलायम, मंथरायें - मायावती और ममता भी उत्तरदायी हैं। भाजपा भी कोई दूध की धुली नहीं है। भ्रष्टाचार में सभी की भागीदारी है। सवाल यह है कि किसे चुनें? देवता तो कोई नहीं है। तो भैया क्यों न उसे चुने जो देवता हो या न हो, कम से कम दैत्य तो न हो - यानि इन्द्र!
इंद्र ने देवताओं वाले काम तो नहीं किये (धर्मशास्त्र पढ़िये) मगर वो कभी दानवों में भी शामिल नहीं हुये। तो साहब हमारे आधुनिक इंद्र (अरे वही अपने नरेंदर ताऊ) ने नोट बन्दी कर दी। झटका तो सबको लगा, मगर ज़ोर का झटका उन्हें लगा जिन्होंने बेशुमार धन जोड़ रखा था (जो पड़ा-पड़ा काला हो रहा था)।
 चिल्लाये तो आम आदमी भी लेकिन ज़्यादा ख़ास आदमी चिल्लाये -- "ये.. क्या हुआ, कैसे हुआ, कब हुआ, क्यों हुआ...? मायावती बोलीं "मोदी जी ने अपनों को अमीर कर लिया हमें खबर भी नहीं होने दी"। मतलब "हमें भी एक दो दिन का वक़्त दे देते तो हम भी अपना बन्दोबस्त कर लेत।" ममता रोयीं "अरे मेरा शारदा चिट फंड में कमाया सारा का सारा पैसा गया - ये गलत बात है।" राहुल बाबा, जिन्होंने दस सालों में किसानों के लिये कुछ नहीं किया, खटोला लेकर भागे खेतों की ओर। ये और बात है कि लोग खटोला लेकर भाग गये और "खटोला यहीं बिछेगा" वाला मिशन फेल हो गया। अखिलेश बाबू, जिन्होंने हाल ही में अपना जनम दिन करोड़ों खर्च करके मनाया (सिर्फ आयोजन पर जनता पर नहीं), गरीब आदमी के दुःख का रोना रोने लगे। केजरीवाल जो अभी तक दिल्ली में ता-ता थैय्या कर रहे थे, सहसा बेताला तांडव करने लगे।  
हम तो आम आदमी हैं। थोड़ी मुश्किल ज़रूर हुयी लेकिन सब्र से काम लिया और नैया पार कर ली। इंसानियत का एक नया और अच्छा स्वरूप देखने को मिला। सब्ज़ी वाले, दवा वाले, दूध और किराने वाले सभी उधार दे रहे थे। अधिकतर लोग एक-दूसरे की मदद कर रहे थे। वो सब कुछ हो रहा था जो बाढ़, तूफ़ान या और कोई मुसीबत आने पर होता है। मुश्किल में आदमी और इंसान की पहचान हो जाती है। रही क़तार में लगने की बात, तो साहब, हमने मन्दिरों में इससे भी लंबी क़तारें देखी हैं (जहाँ कोई गारन्टी नहीं कि मन की मुराद पूरी हो ही जायेगी)। हाल ही में सबरीमाला में घण्टों लंबी क़तार और भगदड़ के कारण हुई मौत की खबर सभी ने पढ़ी होगी, फिर बैंकों और एटीएम वाली क़तारों का शिकवा हारे हुये, मौक़ा-परस्त लोग ही कर रहे हैं। कोई नेता जिसने काला धन चुनाव या अपने किसी निजी फायदे के लिये जोड़ रखा था यह नहीं बतायेगा कि - सीमा पर हमले कम हो गये हैं, क्योंकि वो हमले पाकिस्तान के ज़रखरीद गुलाम पैसे लेकर करते थे। कश्मीर में दंगे बन्द हो गये हैं। पैसे लेकर तोड़-फोड़ करने वालों की फंडिंग जो बन्द हो गयी है। सब काले धन का कमाल था। तमिलनाडु में लोकप्रिय नेता (फ़िल्मी हो या सियासती) के मरते ही अमूमन दंगे-फसाद शुरू हो जाते हैं - ये सब करवाये जाते हैं पैसे देकर। कोई व्यक्ति या पार्टी अपना सफ़ेद पैसा नहीं बांटता। सब काला या नकली पैसा इस्तेमाल होता है। जयललिता जैसी पॉपुलर महिला के मरने पर कोई भी अल्लाह को प्यारा ना हुआ, ना ही आगज़नी या तोड़फोड़ की कोई घटना हुई। होती कैसे? नोटों की किल्लत जो थी। हाँ शराब की दुकानों के बाहर क़तार लगी इस डर से कि जयललिता की मौत की वजह से एक हफ्ता शराब - बन्दी रहेगी। लोकर लो बात! बाज़ार में हर चीज़ मयस्सर है। कोई मंहगाई नहीं बढ़ी।
चलते चलते : मोदी राज में वर्ष 2016 औरतों के लिये कुछ ठीक नहीं रहा - जयललिता की जान गयी। - मायावती की माया (पूंजी) गयी। - सुषमा स्वराज की किडनी गयी। - ममता की मानसिकता गयी। -  अनन्दी बेन की सत्ता गयी। - हर पत्नी की बचत गयी।  राम-राम करके साल का अंत हुआ है, खुदा खैर करे। नया साल मुबारक दोस्तों, जय हिन्द!

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