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प्रवासी दिवस औचित्य और उद्देश्य
01-Jan-2017 12:00 AM 2667     

भारत के विकास के लिए प्रवासी भारतीय समुदाय के योगदान को चिन्हित करने के लिए प्रतिवर्ष मनाया जाने वाला प्रवासी भारतीय दिवस एक अच्छा प्रयास सिद्ध हो सकता है। महात्मा गांधी के दक्षिण अफ्रीका से भारत वापस आने के दिन (9 जनवरी) को प्रवासी दिवस के रूप में चुनना ही यह दर्शाता है कि योजना उतनी भविष्योन्मुख नहीं जितना उसे होना चाहिये। एक वार्षिक अंतर्राष्ट्रीय आयोजन के लिये ऐसा दिन चुन पाना कठिन है जो संसारभर में बिखरे भारतीय प्रवासियों के लिये समान रूप से सुविधाजनक हो लेकिन गांधीजी के आगमन की तिथि को प्रवासी दिवस मानते समय सामान्य प्रवासियों की, विशेषकर गृहिणी तथा नौकरीपेशा वर्ग की अनदेखी की हुई है। व्यवसायी जन की तुलना में इस वर्ग के लोगों को उस समय भारत आना सुविधाजनक है जब काम से छुट्टी हो, बच्चों के स्कूल बंद हों या कोई छुट्टी वाला सप्ताहांत हो। गर्मी या सर्दी की छुट्टियों का समय अधिकांश प्रवासी महिलाओं व नौकरीपेशा वर्ग के लोगों की उपस्थिति सुनिश्चित करने के लिये आसान होता। दिसम्बर का अंतिम सप्ताह, जब बहुत से कार्यालय क्रिसमस व नए वर्ष की छुट्टी में बंद रहते हैं, इसके लिये आदर्श समय है। वह न भी हो तो गर्मियों की स्कूली छुट्टियों के दौरान अनेक कार्यालय अपने कर्मचारियों की छुट्टी के प्रति लचीले होते हैं।    
यह भी ध्यान दिया जाये कि प्रवासी दिवस का उद्देश्य क्या है। यदि इस समारोह का उद्देश्य केवल प्रवासी धन की आकांक्षा है तो बात अलग है, अन्यथा इसके संचालन में वैविध्य और विभिन्न वर्गों के संतुलन पर ध्यान दिया जाना चाहिये। केवल स्वरोजगार वाले व्यवसाई ही नहीं बल्कि पेशेवर भारतीय, केवल धनाढ्य ही नहीं, बल्कि प्रवासी मज़दूर, केवल ब्रिटेन, रूस और अमेरिका ही नहीं बल्कि नेपाल, भूटान, जापान आदि को प्रतिनिधित्व दिया जाना ज़रूरी है। सन् 2003 के पहले प्रवासी सम्मेलन में खाड़ी देशों के भारतीय श्रमिकों की स्थिति पर व्यक्त हुई चिंता के अनुसार बीमा योजना और कल्याण कोष के गठन, क्रियान्वयन और भारत छोड़ते समय अल्पशिक्षित प्रवासी मज़दूरों के इसकी पूरी जानकारी, प्रपत्र, उस देश में उपलब्ध हेल्पलाइन नम्बर आदि के साथ एक सहायता किट देने की योजना को कार्यान्वित किया जाना चाहिये।
पिछले वर्षों में राजनयिकों द्वारा घरेलू कामगारों के शोषण के कई समाचार प्रकाश में आए हैं। ऐसी घटनाएं न केवल लोकतंत्र की मूल अवधारणा के विरुद्ध हैं, वे देश की छवि को भी बट्टा लगाती हैं। इन घटनाओं के प्रवासी भारतीय पीड़ितों को असहाय छोड़कर भारत सरकार द्वारा अपने राजनयिकों या अधिकारियों के पक्ष में खड़े होना न केवल अमानवीय है बल्कि राष्ट्र के लिये अपमानजनक भी है। राजनयिकों द्वारा ऐसा सामंतशाही व्यवहार प्रवासी भारतीय दिवस की धारणा के विरुद्ध है। राजनयिकों को विदेश भेजते समय मानवाधिकारों की वर्तमान अवधारणा की शिक्षा दी जानी चाहिये और उसके प्रति वचनबद्धता भी ली जानी चाहिये ताकि उनके किसी कृत्य के कारण प्रवासी भारतीयों और भारतमाता का मस्तक नीचा न हो।
अपनी विशेषज्ञता के क्षेत्र में विशेष उपलब्धि प्राप्त करने वाले भारतवंशियों का सम्मान करना अच्छी बात है लेकिन अन्य भारतीय आज की गलाकाट प्रतियोगिता के लिये किस प्रकार तैयार हों, इस पर ध्यान देना भी ज़रूरी है। भारत सरकार को ध्यान देना चाहिये कि चीन आदि देशों की सरकारें अपने नागरिकों को किस प्रकार अंतर्राष्ट्रीय चुनौतियों के लिये तैयारी करती हैं। शिक्षा, खेल एवं अन्य क्षेत्रों, यहाँ तक कि फ़ैशन प्रतियोगिताओं तक के लिये सरकार की चीनी सरकार की पहल और तैयारियां अनुकरणीय हैं।
इस आयोजन का उपयोग भारतवंशियों से सम्बन्धित विषयों और उनकी समस्याओं की चर्चा और हल के लिये प्रमुखता से किया जाना चाहिये। खासकर भारतीय दूतावासों से सम्बंधित कार्यों, यथा पासपोर्ट नवीनीकरण आदि के क्षेत्र में। इस विषय में मेरा अपना अनुभव कोई खास अच्छा नहीं है। जब कभी पासपोर्ट नवीनीकरण का समय आया तो वैबसाइट पर मौजूद अस्पष्ट और विरोधाभासी निर्देशों के भरसक पालन के बावजूद महंगा प्रीपेड पैकेट बार-बार एक न पढ़ी जा सकने वाली साइक्लोस्टाइल्ड सूची में लिखी एक नई कमी के साथ वापस आता रहा, तो अमेरिका में लम्बे समय रहने के बाद भी भारत प्रवास के दिनों के अर्ध-सरकारी दफ़्तरों की नौकरशाही याद आ गई। भारत में भी सरकारी कर्मचारियों को कुशल ग्राहकसेवा में प्रशिक्षित करने की ज़रूरत से इनकार नहीं किया जा सकता, लेकिन विदेश सेवा के कार्यालयों में ऐसे प्रशिक्षण की घनी आवश्यकता है और इस दिशा में त्वरित सुधार वांछित है।
हवाई अड्डों पर कड़ी सुरक्षा के लिये बदनाम अमेरिका में भी कस्टम अधिकारी आपसे विनम्रतापूर्वक मिलते हैं। जबकि भारत के हवाई अड्डे पर बैठे सरकारी कर्मचारी द्वारा आपके अभिवादन का उत्तर तो दूर सिर उठाकर आपकी ओर देख लेना भी आपकी खुशकिस्मती होगी। उन्हें सवाल सुनने की आदत नहीं है और इसके कारण वे 18-20 घंटे की यात्रा करके देश आने वाले व्यक्ति को लाइन में खड़ा करके अधिक तकलीफ़ देने से भी गुरेज़ नहीं करते। बाहर से आने वाले व्यक्ति के लिये ये भारत के पहली पंक्ति के प्रतिनिधि हैं, उन्हें शिष्टाचार और व्यवहार सिखाइये और उनके अधिकारों की सीमाएं भी स्पष्ट कीजिये।
प्रवासी भारतीयों की एक समस्या उनके प्रतिनिधित्व के संविधानप्रदत्त नागरिक अधिकार का हरण भी है। जिसका दोष भारतीय निर्वाचन आयोग की संकीर्ण दृष्टि तथा हमारे दूतावासों की उदासीनता को सम्मिलित रूप से दिया जा सकता है। लगभग दो दशक से अमेरिका में रहते हुए मुझे आज तक संसद के चुनाव से लेकर नगरपालिका के चुनाव तक कभी भी किसी चुनाव की आधिकारिक सूचना भी नहीं मिली, डाक बैलट की प्राप्ति तो एक सपना ही है। क्या किसी सरकारी प्रतिनिधि ने इतने महत्वपूर्ण विषय पर कभी सोचा ही नहीं? यदि दूतावासों के अधिकारी और भारतीय नागरिक कर्मचारी खुद भारतीय चुनावों में मतदान करते हैं तो उनके दिमाग में अन्य प्रवासी भारतीयों के इस अधिकार की बात स्वतः ही आनी चाहिये।
ताज़ा नोटबंदी का उदाहरण सरकारी योजनाओं के लापरवाह निष्पादन और प्रवासी भारतीयों की अनदेखी किये जाने के कारण होने वाली असुविधा और आर्थिक हानि का एक अच्छा उदाहरण है। इंटरनेट पर अमेरिका और कैनेडा के अनेक प्रवासियों को इस बारे में उलझन में ही पाया। भारतीय मुद्रा को वैसे भी अधिक इज़्ज़त से न देखने वाले स्थानीय बैंक 1000-500 रुपये के नोट लेने को तैयार नहीं थे। अच्छा होता कि भारत सरकार और स्थानीय मिशन विदेशी बैंकों के साथ करार करके प्रवासी भारतीयों के पास रखी भारतीय मुद्रा पर छपे पूर्ण मूल्य अदायगी के वचन का आदर करते। अफ़रा-तफ़री फ़ैलाने के बजाय, रिज़र्व बैंक, वित्त मंत्रालय, विदेश मंत्रालय आदि के तत्त्वावधान में भारतीय दूतावास, भारतीय स्टेट बैंक आदि संस्थाएं मिलकर प्रवासी नोट वापसी जैसा कोई सक्षम कार्यक्रम लाया जाना चाहिये था।   
सुनने में आता है कि भारतीय भाषा के साहित्यकारों, शिक्षकों, तथा इस क्षेत्र के स्वयंसेवकों के लिये भी प्रवासी मिशनों के पास योजनाएं हैं। शायद बड़े शहरों में रहने वाले प्रवासियों को इसकी जानकारी भी हो और वे इसका लाभ ले रहे हों। बेहतर यह होगा कि इस क्षेत्र में भी पारदर्शिता लाई जाए और ऐसी योजनाओं की समस्त जानकारी, पूरे नियमों, अपेक्षाओं और पूर्व लाभार्थियों की सूची के साथ इंटरनेट पर उपलब्ध हो। इसके अतिरिक्त, यदि प्रवासी भारतीयों को भारतीय सरकारी संस्थाओं से सूचना के अधिकार के अधीन जानकारी मांगने की प्रक्रिया को कारगर बनाया जा सके तो वह सभी के लिये लाभप्रद होगा।   
विदेशों में पले-बढ़े बच्चों की घरवापसी भारत के लिये बहुत लाभप्रद सिद्ध हो सकती है। इसलिये, प्रवासी भारतीयों के लिये भारत में शिक्षा, स्वयंसेवा तथा रोज़गार की अद्यतन जानकारी उपलब्ध कराई जानी चाहिये। भारत सरकार को अंतर्राष्ट्रीय छात्र-विनिमय जैसे कार्यक्रमों में बढ़-चढ़कर भाग लेना चाहिये और विशेषकर भारतीय उच्चतर केंद्रीय सेवाओं (क्ष्ॠच्/क्ष्घ्च्/क्ष्क़च् आदि) में प्रवेश की प्रक्रिया सुलभ करानी चाहिये ताकि देश को आसानी से ही एक बड़ा और भिन्न प्रकार का प्रतिभा समूह आसानी से मिल सके।
भारतीय भाषाओं, विशेषकर हिंदी को संयुक्त राष्ट्र की भाषा बनाना तथा, अमेरिका आदि देशों के साथ भारतीय मूल के लोगों को दोहरी नागरिकता दिलाने की संधि भी ऐसी पुरानी मांगें हैं जहाँ भारत सरकार द्वारा राजनीतिक इच्छाशक्ति दिखाकर पहल किए जाने की ज़रूरत है।
धन के अलावा बहुत कुछ है जहाँ प्रवासी भारतीय अपने देश की सहायता कर सकते हैं। पश्चिमी देशों की तुलना में भारत में स्वयंसेवा का स्वरूप और ढांचा बहुत अविकसित है। चीन और एशियन टाइगर्स जैसे देश थोक उत्पादन में श्रेष्ठ प्रदर्शन करते रहे हैं। जापान ने अद्वितीय विकास करते हुए भी अपनी सांस्कृतिक विशेषताओं को पूरी तरह बचाकर रखा है। प्रवासी दिवस समारोहों को इस प्रकार उद्देश्योन्मुख बनाया जाना चाहिये कि परदेशी सांस्कृतिक शक्तियों का सामयिक विवेचन करते हुए वहाँ से लाभकारी शिक्षाओं को भारत की बहुमुखी उन्नति के उद्देश्य से अपनाया जा सके।

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