ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
प्रवासी भारतीय दिवस के मायने
01-Jan-2016 12:00 AM 1011     

प्रवासी भारतीय दिवस का आयोजन अब एक परम्परा बन गया है। 9 जनवरी 2003 को तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी ने "सदा खुले हैं द्वार' कविता-पंक्ति सुनाकर विश्व भर में फैले प्रवासी-आप्रवासी भारतीयों को संदेश भेज दिया था कि भारत उनका स्वागत अभिनंदन करना चाहता है। उनके संघर्ष, उनकी उद्यमशीलता, उनकी उपलब्धियों को सम्मानित करना चाहता है। प्रवासी भारतीय दिवस की आयोजना को 9 जनवरी, 1915 में महात्मा गांधी जी के साउथ अफ्रीका से लौटने की तिथि से जोड़कर एक सार्थक संदेश देने की कोशिश की गयी है। पर प्रवासी भारतीयों के संघर्ष का इतिहास उससे भी बहुत पीछे तक जाता है। 1835 से शुरू हुई "गिरमिट प्रथा' का प्रवासी भारतीयों के जीवन में संघर्षपूर्ण इतिहास रहा है जिससे स्वयं महात्मा गांधी भलीभांति परिचित थे। इसके उन्मूलन के लिए उनके प्रयास भी अत्यन्त महत्वपूर्ण रहे हैं तथा जिसके फलस्वरूप सन 1916 में यह अमानवीय प्रथा समाप्त घोषित कर दी गयी। 1921 के बाद इसका पूर्ण अंत हो गया। गिरमिट-प्रथा का अंत हो जाने भर से ही प्रवासी भारतीयों के जीवन में कोई गुणात्मक परिवर्तन आ गया हो, ऐसी बात नहीं थी। वस्तुत: इस अंत के साथ भारतीय कृषकों को धोखे से विदेश भेजने की प्रक्रिया को विराम लगा था। साथ ही साथ गांधी जी के भारतीय स्वातंत्र्य संग्राम की बागडोर संभालने के कारण, प्रवासी भारतीयों के मन में एक नयी आशा का संचार भी हुआ था कि अब भारत आजाद हो जायेगा तथा उसके फलस्वरूप उनकी गुलामी के दिन भी बीत जायेंगे। वस्तुत: सन् 1901 में महात्मा गांधी को साउथ अफ्रीका से भारत आते हुए जलपोत में आयी खराबी के कारण कुछ समय मारीशस द्वीप में रुकना पड़ा था। इस पडाव में वे मारीशस के भारतीय खेतिहर मजदूरों की दारुण स्थिति से परिचित हुए और इसी के साथ ही साथ उन्हें अन्य कई द्वीपों यथा गयाना, ट्रिनीडाड, सूरीनाम एवं फीजी में रह रहे भारतीयों की कठिन यातना भरी जिन्दगी का अनुमान भी हो गया जिसने कालान्तर में इन प्रवासी भारतीयों के संघर्ष को समाप्त करने में निर्णायक भूमिका निभायी थी। सन् 1947 में भारत स्वतंत्र हो गया। इस समाचार से हमारे प्रवासी भारतीय अत्यन्त उत्साहित हुए। उन्हें लगा कि स्वतंत्र भारत में उनके लौटने के अवसर होंगे। वे अपना वनवास समाप्त कर सकेंगे। उनका मान-सम्मान बढ़ सकेगा, पर ऐसा कुछ भी न हो सका। इसका एक बड़ा कारण तो यही था कि भारत, स्वतंत्रता के बाद, विभाजन की विभीषिका के साथ मिली समस्याओं से जूझने में लगा हुआ था। प्रथम प्रधानमंत्री श्री जवाहरलाल नेहरू प्रवासी भारतीयों की समस्याओं से उतने नहीं जुड़े थे जितने कि महात्मा गांधी। वे तो स्वयं प्रवासी जीवन जी चुके थे। इसीलिए प्रसिध्द उपन्यासकार गिरिराज किशोर ने उन्हें अपने उपन्यास में "गिरिमिटिया गांधी' का संबोधन दिया है। पं. नेहरू ने जिस विदेश नीति का निर्माण किया उसमें प्रवासी भारतीयों को उचित महत्व नहीं मिला था, क्योंकि वे मानते थे कि जिन देशों में वे रह रहे हैं, वहाँ जन्म लेने के कारण वे वहीं के निवासी हैं और वही उनकी मातृभूमि है। पर सच तो यह है कि ये प्रवासी भारतीय वहाँ जन्मे अवश्य थे लेकिन भारत से नाभि-नाल की तरह जुड़े भी थे। उन्होंने परदेश में रहते हुए कभी भी भारत को भुलाया नहीं था। उनकी स्मृतियों में, उनकी भाषा में, उनके तीज-त्यौहारों में, उनके धार्मिक संस्कार कर्मों में, उनके खान-पान और पहरावे में अर्थात जीवन-जगत के समस्त व्यवहारों में भारत ही समाया हुआ था, फलत: भारत की ओर उनकी चातक-दृष्टि एकदम स्वाभाविक थी। दूसरी ओर वे अपने-अपने देशों के स्वातंत्र्य संग्रामों में भी भाग ले रहे थे। गुलामी की जंजीरों को तोड़ने में सक्रिय थे। सन् साठ के बाद के दशक में अनेक देश ब्रिाटिश साम्राज्य से स्वतंत्र भी हो गये थे। मारीशस में भारत से बाहर पहली बार भारतीयों की सरकार भी बनी। नेहरू के बाद लाल बहादुर शास्त्री का कार्यकाल अत्यन्त संक्षिप्त रहा। उनके बाद श्रीमती इंदिरा गांधी के कार्यकाल में पहली बार प्रवासी भारतीयों की आवाज एक मंच पर सुनाई दी। और यह अवसर था नागपुर में प्रथम विश्व हिन्दी सम्मेलन के आयोजन का। आज से चालीस साल पहले आयोजित इस सम्मेलन में सैकड़ों की संख्या में प्रवासी भारतीयों ने भाग लिया था और पूरे विश्व ने पहली बार जाना कि भारत से बाहर कितने ही देशों में भारतवंशियों का विशाल समुदाय मौजूद है जो हिन्दी बोलता है, हिन्दी जीता है और अपनी अस्मिता की रक्षा के लिए भारतीय संस्कारों को अपने जीवन में हर पल उतारता चलता है। वस्तुत: प्रवासी भारतीयों की विश्वव्यापी धड़कती सत्ता का प्रथम उद्देश्य इसी सम्मेलन के मंच से हुआ था। कालान्तर में विश्व हिन्दी सम्मेलनों की परम्परा चल पड़ी और अब तक दस सम्मेलन आयोजित हो चुके हैं, लेकिन धीरे-धीरे वे अपनी मूल प्रेरणा शक्ति और उद्देश्य से भटक कर सरकारी आयोजन भर होते जा रहे हैं। इसी पृष्ठभूमि को ध्यान में रखते हुए सन् 1999 में अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग परिषद् के महासचिव और प्रवासी भारतीयों के अभिन्न मित्र श्री बालेश्वर अग्रवाल (अब स्वर्गीय), प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिले और प्रवासी भारतीयों को भारत से जोड़ने के लिए विभिन्न उपक्रम करने का आग्रह किया। इसके परिणाम स्वरूप प्रधानमंत्री ने एक उच्चस्तरीय समिति का गठन किया जिसके अध्यक्ष लक्ष्मीमल सिंघवी जी को बनाया गया। इस समिति ने विभिन्न देशों की यात्राएं की तथा प्रवासी-आप्रवासी भारतीयों से मिलकर उनकी आशा-अपेक्षाओं का आकलन करके एक विस्तृृत रिपोर्ट सन् 2002 में प्रधानमंत्री को सौंप दीं। इस समिति के द्वारा सुझाए गये अनेक सुझावों में से एक सुझाव था "प्रवासी भारतीय दिवस' मनाने का जिसे प्रधानमंत्री ने तत्काल स्वीकार कर लिया तथा अगले ही वर्ष से उसे आयोजित करना आरंभ कर दिया गया। वस्तुत: आजादी के बाद से ही हमने अपने प्रवासी भारतीयों की क्षमताओं और महत्व को अनदेखा किया। भारतवंशियों का यह विशाल समुदाय वर्षों से भारत माता की स्मृतियों को अपनी छाती में संजोये रहा और सदियों से विपरीत परिस्थितियों से संघर्ष करता रहा था। अंग्रेज उपनिवेशवादियों ने उन्हें धोखे से भारत से बाहर भेजा था अत: उनके भारत छोड़ कर जाने के बाद इन सभी प्रवासी भारतीयों में आजाद भारत से यह अपेक्षा स्वाभाविक थी कि अब उन्हें अपने देश की ओर से पर्याप्त सुरक्षा और महत्व मिलेगा। लेकिन यह सम्भव न हुआ। फलत: भारत की अस्मिता को अपने सिर पर मुकुट की तरह धारण करके आत्म-गौरव अनुभव करने वाला यह विशाल समूह निरन्तर उपेक्षा ही पाता रहा। इन सभी देशों में स्थित भारतीय दूतावास और मिशनों में कार्यरत अधिकारी भी मसूरी की अकादमी से जो पाठ पढ़ कर आते थे उनमें भारतीयता का संस्कार होता ही नहीं था। वे एक नये तरह के अंग्रेज थे बल्कि कहना होगा- अंग्रेजों से भी ज्यादा अंग्रेज। फलत: एक दूरी बनी रही और भारत से जो सहज जुड़ाव पनपाया जाना था, वह कभी हुआ नहीं। इन विभिन्न देशों में रहने वाला भारतीय समुदाय उन देशों में लगातार दुहात का शिकार भी होता रहा। नस्ली व्यवहार को झेलते हुए इन्हें उन देशों की मुख्यधारा से अलग-थलग करने के षडयन्त्र लगातार होते थे और हद तो तब हो गयी जब युगांडा में बसे भारतीयों पर ईदी अमीन ने अनेक तरह के अत्याचार करने शुरू कर दिए और उन्हें देश छोडकर निकल जाने पर विवश कर दिया। इसी तरह के प्रयास फीजी, गयाना और सूरीनाम में भी हुए। ऐसी स्थितियों में भारतीय कूटनीति की विफलता विकराल रूप से सामने उजागर होने लगी। यहाँ यह भी ध्यान देने की बात है कि निरंतर उपेक्षित इस भारत वंशी समुदाय से भारत की सरकारें यह भी अपेक्षा करती रहीं थी कि वे अपने डॉलरों को भारत अवश्य भेजें। भारत-प्रेम में बँधे लोगों ने हमेशा यह किया भी क्योंकि उनका भारत से भावनात्मक लगाव था। वस्तुत: चीनी प्रवासियों के बाद भारतीयों का समुदाय ही एक ऐसा समुदाय था जो अपनी बचत का एक बड़ा हिस्सा अपने देश भेजता था। सन् 1990 के बाद परिस्थितियाँ बदलने लगी। उदारीकरण और भूमण्डलीकरण के चलते भारत से बाहर बसे भारतीयों का महत्व और वर्चस्व बढ़ने लगा। उनकी संघर्शषीलता, कड़ी मेहनत, बचत करने की आदत और अपने देश की परम्परा और मूल्यों की रक्षा करने की भावना के कारण उनके रहने के देशों में उनका सम्मान और अनिवार्यता बढ़ने लगी। इन नयी परिस्थितियों ने भारत सरकार को प्रवासी भारतीयों के बारे में सोचने को विवश कर दिया और जिसकी परिणति में "प्रवासी भारतीय दिवस' की आयोजना में हुई तथा इसकी देख-रेख के लिए अलग से प्रवासी भारतीय मंत्रालय की स्थापना भी की गयी। पर यहाँ एक बात गौर करने की है। प्रवासी भारतीय दिवस की आयोजना में वे भारतवंशी लोग प्रमुख स्थान नहीं पाते हैं जिनके पुरखे ब्रिाटिश शासन काल में परदेस भेजे गए थे। बल्कि इस आयोजन की धुरी वे आप्रवासी भारतीय और उनकी संततियाँ हैं जो भारत की आजादी के बाद विदेशों में जाकर बस गयीं। कभी इसे "ब्रोन-ड्रेन' भी कहा गया था। चूंकि ये आप्रवासी भारतीय ज्यादा सम्पन्न हैं, पढ़े-लिखे हैं, राजनैतिक रूप से जागरूक भी हैं, अत: "प्रवासी भारतीय दिवस' के अवसर पर इनकी सहभागिता अधिक पाई जाती है। ऐसे लोगों में अनेक नाम हैं जो पिछले आयोजनों से जुड़े रहे हैं और विश्व में जिनका विशिष्ट नाम हैं। उदाहरण के लिए अनिरुध्द जगुरनाथ, भरतदेव, वासदेव पाण्डेय, कमला विसेसर, स्वराज्य पॉल, लक्ष्मी मित्तल, बौबी जिन्दल, इन्दिरा नुई, बी.एस. नॅयपाल, जैसे अनेक नाम हैं जो अपने-अपने देशों में राष्ट्रप्रमुख, उद्योगपति, लेखक आदि हैं तथा जिन्होंने अपने-अपने क्षेत्र में किए गए विशिष्ट कामों से भारत का नाम गौरवान्वित किया है। "प्रवासी भारतीय दिवस' आयोजन की यह एक अत्यन्त महत्वपूर्ण उपलब्धि है कि इसने देश विदेश में फैले हुए भारतवंशी समुदाय के बीच एक सार्थक सेतु का काम किया है तथा जिसके फलस्वरूप विश्व में भारत एक सुदॄढ आर्थिक और राजनैतिक शक्ति के रूप में मान्यता पाता जा रहा है।

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