ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
प्रवासी भारतीय दिवस एक सामयिक चेतना
CATEGORY : मन की बात 01-Jan-2017 11:57 PM 1854
प्रवासी भारतीय दिवस एक सामयिक चेतना

भारतीय मूल के लोग बड़ी संख्या में कई दशकों से विदेशों में बसे हुए हैं और उन्होंने प्रत्येक क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। जिसमें व्यवसाय, शिक्षा, नौकरी, वैज्ञानिक एवं तकनीकी सन्दर्भ शामिल हैं। विकसित पश्चिमी देशों में उनकी अपनी एक पहचान है जो विश्व मंच पर चर्चित है। भाषा, संस्कृति और सामाजिक परिवेश के दृष्टिकोण से वे विदेशी मुख्यधारा के अंग हैं और उसके साथ ही भारतीय विरासत के राजदूत भी। भारतीय भाषा, पर्व-त्यौहार, सांस्कृतिक परम्परा, खान-पान, वेशभूषा, इत्यादि का वर्चस्व आज भी उनकी जीवनशैली के अभिन्न स्तम्भ हैं; जो उन्हें भावनात्मक रूप से विस्तृत भारतीय समाज से जोड़ते हैं। इस कड़ी को अभीष्ट संरक्षण देना और मजबूती प्रदान करना, खासकर इस वैश्वीकरण के युग में, अत्यावश्यक है और स्वाभाविक भी। इस तरह प्रवासी भारतीय दिवस इसका एक मुखर प्रतीक है।
प्रवासी भारतीय दिवस प्रति वर्ष नौ जनवरी को मनाया जाता है, जिसका मुख्य उदेश्य है वैसे प्रवासी भारतीयों (ग़्दृद-ङड्ढद्मत्ड्डड्ढदद्य क्ष्दड्डत्ठ्ठदद्म) को सम्मानित करना जिन्होंने भारत की उन्नति में उल्लेखनीय योगदान किया है। "प्रवासी भारतीय सम्मान" वह सर्वोच्च सम्मान है जो भारत के राष्ट्रपति द्वारा किसी भी प्रवासी भारतीय को प्रदान किया जाता है। वर्ष 2003 से यह दिवस मनाया जा रहा है और इसकी महत्ता बढ़ती जा रही है, जिसका प्रमाण है विभिन्न देशों की भागीदारी और उनकी राजनीतिक हस्तियों की उपस्थिति। यह कहना प्रासंगिक होगा कि 9 जनवरी 1915 को महात्मा गाँधी दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटे थे जहाँ उन्होंने "अश्वेत समुदाय" की सामाजिक और आर्थिक उन्नति के लिए अभूतपूर्व संघर्ष किया था। इस प्रकार यह दिवस महात्मा गाँधी के महान व्यक्तित्व का स्मरण भी दिलाता है। उन्नति एक बहुआयामी क्षेत्र है। इसमें आर्थिक, शैक्षिक, सामाजिक, नैतिक एवं मानवीय पक्ष भी शामिल हैं। और कोई भी उन्नति किसी भौगोलिक सीमा में कैद नहीं रह सकती है। इसलिए यह दिवस वस्तुतः वैश्विक समुदाय की आकांक्षाओं को मूर्तरूप देने का एक माध्यम बनता जा रहा है जिसकी कल्पना का श्रेय भारत को मिला है। यह सोचनीय है कि गाँधी का योगदान न तो आर्थिक था और न तकनीकी - उन्होंने भारत को एक नई चेतना, नई प्रेरणा, नया संकल्प दिया था जिसने भारत की आजादी और सर्वांगीण विकास का मार्ग प्रशस्त किया। इसलिए सचेत रहने की जरूरत है कि केवल भौतिकवादी योगदान को ही उन्नति का माध्यम नहीं समझा जाए।
वर्ष 2015 में सम्मान पाने वालों के नाम और उनकी उपलब्धि को देखने से ऐसा स्पष्ट है कि यह सम्मान विभिन्न क्षेत्रों में विशिष्टता प्राप्त करने वाले भारतवंशियों को दिया गया है, जो सराहनीय है। सम्मान पाने व्यक्ति अमेरिका, यूरोप, अफ्रीका, ऑस्ट्रेलिया, न्यूज़ीलैण्ड, मेक्सिको, इत्यादि देशों में कार्यरत हैं और उन्होंने अपनी योग्यता और लगन से वृहद समाज की सेवा की है। इनमें वैज्ञानिकों, उद्योगपतियों, राजनीतिज्ञों और समाजसेवियों के नाम शामिल हैं; जो इस सम्मान की विविधता के सूचक हैं। मेलबोर्न में रहते हुए मेरे लिए यह हर्ष का विषय है कि ऐसे विशिष्ट लोगों में सिडनी (ऑस्ट्रेलिया) की सुश्री माला मेहता का नाम भी शामिल हैं जिन्होंने हिन्दी भाषा के प्रचार-प्रसार के लिए "बाल भारतीय विद्यालय" की स्थापना की है और इस उदेश्य की ओर समर्पित हैं। विदेशों में भारतीय संस्कृति की धारा अनवरत रूप से बहती रहे इसके लिए हिन्दी भाषा का औपचारिक अध्ययन स्कूलों में आवश्यक है। संगीत, कला, एवं योग भी भारतीय संस्कृति को उजागर करते हैं; इसलिए इन क्षेत्रों के ख्याति प्राप्त व्यक्तियों को भी मान्यता मिलनी चाहिए। वर्ष 2015 में योग को संयुक्त राष्ट्र संघ की औपचारिक मान्यता मिली तथा 21 जून को अन्तर्राष्ट्रीय योग दिवस घोषित किया गया। हाल में ही संयुक्त राष्ट्र संघ ने योग को अपनी विरासत की सूची में शामिल किया है। संक्षेप में कहें तो जीने का तरीका बदल रहा है, जो समय के प्रवाह की तरह गतिशील है। इसलिए अनुसंधान, नव-निर्माण, विकास, उन्नति, भी भौगोलिक सीमा से प्रायः बाहर निकल चुके हैं। ऐसी स्थिति में प्रवासी भारतीय भी भारत के अभिन्न अंग हैं और इसका लाभ दोनों पक्षों को मिलना चाहिए। शायद यह कहना सार्थक होगा कि प्रवासी भारतीय दिवस ने वैश्वीकरण और वसुधैव कुटुम्बकम की प्रेरणा को मजबूती प्रदान किया है।
आप्रवास (त्थ्र्थ्र्त्ढ़द्धठ्ठद्यत्दृद) के सन्दर्भ में ऑस्ट्रेलिया की ऐतिहासिक और समकालीन स्थिति के विषय में दो शब्द कहना उपयुक्त होगा। वर्तमान ऑस्ट्रेलिया वस्तुतः आप्रवासियों (त्थ्र्थ्र्त्ढ़द्धठ्ठदद्यद्म) का एक युवा देश है। यूरोपियन लोगों का आगमन यहाँ 1788 में शुरू हुआ, जब कि इसकी प्राचीन "एबोरिजिनल" (ॠडदृद्धत्ढ़त्दठ्ठथ्) संस्कृति करीब चालीस-पचास हजार वर्षों से लगातार जीवित रही है। बहुत दिनों तक यहाँ "श्वेत ऑस्ट्रेलिया" (ध्र्ण्त्द्यड्ढ ॠद्वद्मद्यद्धठ्ठथ्त्ठ्ठ) की सरकारी नीति थी और एशिया से आने वालों पर अनेकों प्रतिबन्ध थे। वर्ष 1966 में इस नीति की समाप्ति हुई जिसके फलस्वरूप ब्रिटिश, यूरोपियन, और गैर-यूरोपियन के बीच का भेदभाव ख़त्म हुआ। पिछले दो-तीन दशकों में भारतीय आप्रवासियों की संख्या में काफी वृद्धि हुई है। अनुमानतः 2016 में ऑस्ट्रेलिया की जनसंख्या 24 मिलियन है, जिसमें करीब 2.1 प्रतिशत (0.5 मिलियन) भारतवंशी (क्ष्दड्डत्ठ्ठद क़्त्ठ्ठद्मद्रदृद्धठ्ठ) हैं। भारत में जन्में ऑस्ट्रेलियाई की संख्या पिछले दस वर्षों में लगभग तिगुनी हो गयी है और यह वृद्धि जारी है। अब कम उम्र के भारतीय यहाँ आ रहे हैं। 2005 में उनकी औसत आयु 37 वर्ष थी किन्तु 2015 में 33.4 वर्ष। ऑस्ट्रेलिया के लिए यह संतोषजनक है। भारतीय आप्रवासी सबसे अधिक शिक्षित हैं, उनमें स्नातक तथा उच्च डिग्री धारकों का अनुपात करीब 54 प्रतिशत है जो राष्ट्रीय औसत से प्रायः तीन गुना है। आर्थिक आधार पर भी भारतीय समुदाय बेहतर स्थिति में है।
प्रवासी भारतीय दिवस विचार विनिमय का भी एक वैश्विक मंच है। ऑस्ट्रेलिया में ऐसे अनेक भारतवंशी हैं जिन्हें "मेम्बर ऑफ़ द ऑर्डर ऑफ़ ऑस्ट्रेलिया (ॠग्)" तथा "मेडल ऑफ़ द ऑर्डर ऑफ़ ऑस्ट्रेलिया (ग्र्ॠग्)" नामक सम्मानों से विभूषित किया गया है। ऐसे सम्मान विभिन्न क्षेत्रों में महत्वपूर्ण योददान करने वाले ख्याति प्राप्त व्यक्तियों को "गवर्नर जनरल ऑफ़ ऑस्ट्रेलिया" द्वारा दिए जाते हैं। आवश्यकता है कि ऐसे व्यक्तियों की सूची भारत सरकार के पास हो और उनकी विशिष्टता का उपयोग जनकल्याण के लिए किया जाय। यह कार्य स्थानीय स्तर पर भारतीय कांसुलेट द्वारा प्रारम्भ किया जा सकता है। यदि कांसुलेट प्रवासी भारतीय दिवस या इसके समरूप कोई दूसरा समारोह मनाकर ऐसे व्यक्तियों को एक सम्मानजनक प्रशंसा पत्र दें तो यह अत्यन्त सराहनीय होगा। कांसुलेट द्वारा आयोजित राष्ट्रीय समारोहों में ऐसे लोगों को आमन्त्रित करना भी प्रशंसनीय होगा - ऐसे लोगों की संख्या उँगलियों पर गिनी जा सकती है।
कभी-कभी मैं सोचता हूँ कि यदि प्रवासी भारतीय दिवस 1970 और 1980 के दशक में मनाया जाता तो किन लोगों को यह सम्मान मिलता! उन दिनों विदेशों में कार्यरत भारतीय मूल के ख्यातिप्राप्त वैज्ञानिक, उद्योगपति, व्यवसायी या समाजसेवी की संख्या प्रायः नगण्य थी और भारत की उन्नति में उनका योगदान भी न्यूनतम रहा होगा। उन दिनों भारत की आर्थिक स्थिति मजबूत नहीं थी, व्यापार सीमित था, विदेशी मुद्रा की भारी कमी थी, विदेश जाने वालों को एअरपोर्ट पर दस डॉलर मिला करता था, उच्च शिक्षा के लिए ब्रिटेन या अमेरिका जाने वालों को "ब्रेन ड्रेन" (योग्यता पलायन) की शंका से देखा जाता था। उन दिनों विदेशी मुद्रा भेजने वालों में अफ्रीका और खाड़ी के देशों में फैले श्रमिकों का बड़ा योगदान था, जिनकी मेहनत की कमाई ने भारत की आर्थिक उन्नति में वर्षों तक अहम् भूमिका निभाई। ऐसे श्रमिक ही उस समय प्रवासी भारतीय सम्मान के काबिल होते - उनके योगदान को नहीं भुलाया जाना चाहिए। आज भी लाखों भारतीय श्रमिक विश्व में फैले हुए हैं और वे भारतीयता के प्रतीक हैं; उनके प्रतिनिधि भी प्रवासी भारतीय सम्मान के हकदार हैं।
अन्त में कहना चाहूँगा कि यह एशियाई शताब्दी (ॠद्मत्ठ्ठद क्ड्ढदद्यद्वद्धन्र्) का युग है, जिसमें भारत और चीन की मुख्य भूमिका होगी। चीन एक आर्थिक और तकनीकी महाशक्ति के रूप में उभर चुका है, भारत भी उसी रास्ते पर अग्रसर है। प्रवासी भारतीय दिवस समारोह में यदि चीन के कुछ जाने-माने वैज्ञानिक, विचारक या कलाकार शामिल हो सकें तो यह शुभ समाचार होगा। ऐसे व्यक्ति सम्पूर्ण विश्व को प्रभावित करते हैं, उनके प्रति सम्मान प्रकट करना शोभनीय है। इसी श्रृंखला में एशिया के अन्य देशों पर भी नजर होनी चाहिए।

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