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प्रवासी भारतवंशियों की गाथा
01-Jan-2016 12:00 AM 1372     

भारतवंशी विश्व के अनेक देशों में बसे हैं। उनके पूर्वज जीविकोपार्जन के लिए अलग-अलग समय पर अनेक देशों में गए। अनेक तत्कालीन परिस्थितियों से वशीभूत होकर वहीं बस गए। आज वहां के सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक जीवन से उनका जीवन जुड़ा हुआ है। जीवन-मूल्य, परंपराएं, धर्म, रीति-रिवाज, लोकगीत, लोककथाएं उनके प्रवासी पूर्वज अपने साथ लेकर आए। उस संस्कृति को "भारतवंशियों' ने पर्याप्त मात्रा में आज तक सुरक्षित रखा है। जहां तक संस्कृति के बाह्र उपकरणों का संबंध है कहा जा सकता है कि अनेक राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय परिस्थितियों से प्रभावित होकर ये लोग अपने रहन-सहन, अपने पहनावे और कुछ हद तक अपनी भाषा में परिवर्तन कर चुके हैं। फ्रांस और हालैंड के सत्ताधारी उत्तरप्रदेश और बिहार के भारतवंशियों को धान की फसल की पौध बीजड़ की तरह उन्हें ले गए और अपनी कमाई के लिए दूसरे देश में रोप दिए। वे वहां फीजी, मॉरीशस, गयाना, ट्रिनीडाड जैसे भारतवंशी बहुल देशों की धरती पर धान की फसल की तरह उगे-फैले और उनकी सत्ता और संपत्ति की भूख को पूरा किया। विश्व में गुलामी और शर्तबंदी प्रथा के अंतर्गत विश्व के ब्रिाटिश, फ्रांस और डच साम्राज्य से जुड़े द्वीपों, देशों और क्षेत्रों में गन्ना की उगाई को व्हाइट चीनी की कमाई से उन्होंने अपने देशों को स्वर्णलंका में तब्दील किया। इन गोरे पूंजीपतियों के व्हाइट गोल्ड में ही हमारे भारतीयों की देह की खदान से निकला और पिघला हुआ लाल सोना था। हमारे पुरखों का पसीना, सिर्फ पसीना नहीं-परिश्रम के हिमालय से प्रवाहित हुई गंगा-यमुना की जलधारा है। वर्तमान पीढ़ियां हमारे आजा-आजी की श्रम गंगा-धारा की प्रधाराएं हैं। जो आज भी भारतीय संस्कृति मानव-धरती को सींच रही है। विश्व के देशों में भारतीय संस्कृति का वैभव विदेशी भारतीयों के पसीने की कमाई का पुरस्कार है। उनका रक्त उनके देह की खदानों का लाल है जिसे वह सूरज के ताप में पिघलाते हैं और ज्योतिर्पुष्पों की खेती करते हैं और स्वर्ण-फसल उगाते हैं। जो भारतवंशियों की खून और पसीने की कमाई के स्वर्णिम कुसुम हैं। जिनमें उनके परिश्रम की सुगंध है और उस परिश्रम में भारतीय संस्कृति की शक्ति है। ट्रिनीडाड के वेस्टइंडीज विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक समाजशास्त्री लारेंस ने क्ष्दड्डड्ढदद्यड्ढदड्ढड्ड त्थ्र्थ्र्त्ढ़द्धठ्ठद्यत्द्म पुस्तक में शर्तबंदी के मजदूरों की दास्तान का कच्चा चिट्ठा प्रस्तुत किया है। फ्रांस के इतिहासकार द्रु तेते ने खोज करके उनके जीवन की दर्दनाक सच्चाइयों को बखाना है। किंग्सले डेविस (ख़्त्दढ़द्मथ्ड्ढन्र् क़्ठ्ठध्त्द्म) वैज्ञानिक के अनुसार तीस मिलियन भारतवंशी विदेश ले जाए गए। जबकि 1900 में भारत की आबादी तीन सौ मिलियन मानी जाती है। तात्पर्य है दस प्रतिशत भारतीयों को विदेश ले जाया गया। औपनिवेशिक देशों में भाषा एक महत्वपूर्ण विषय रहा है। औपनिवेशिक देशों में शिक्षा प्रणाली हमेशा एक राजनीतिक समस्या रही है, न कि शैक्षिक समस्या। सूरीनाम की पितृभूमि हमेशा हालैंड रही है और ट्रिनीडाड की इंग्लैंड। ये दोनों ही देश चाहते थे कि उनकी ही संस्कृति का प्रचार हो। कुछ देश इसमें सफल हुए और कुछ देश सफल नहीं हो सके। फ्रेंच, अंग्रेजी और स्पेनिश विश्व की भाषाएं बन चुकी थीं। औसतन भारतवंशी जन बहु-भाषाभाषी हैं लेकिन ऐसी स्थिति गयाना और ट्रिनीडाड की नहीं है, वहां सिर्फ अंग्रेजी है। इन देशों की तुलना में सूरीनामियों को अपनी मातृभाषा बचाने की ज्यादा सुविधा थी। क्रियोल लोगों को रुाांगतोंगो भाषा का शिक्षण स्कूल में दिया जाता था। भारतवंशी लोग प्राय: ऐसे शिक्षण से 1873 ई. के बाद दस वर्षों तक इससे वंचित रहे क्योंकि वे गांव, देहात में रहते थे और क्रियोल लोग पारामारिबो में रहते थे। लेकिन धीरे-धीरे जब भारतवंशियों पर शर्तबंदी प्रथा का प्रकोप कम हुआ है और जमीन मिलने पर सूरीनाम में ही रहने का निश्चय किया तब उन्होंने अपनी भाषा की पढ़ाई धीरे-धीरे जारी रखी। ट्रिनीडाड और गयाना की पॉलिसी एक भाषा की रही इसलिए 1840 ई. के बाद अंग्रेजी वहां प्रयोग में आ गई। ब्रिाटिश गवर्नर मैक ग्लीज ने मिनिस्टर ऑफ कोलोनी को एक पत्र लिखा कि- यहां शिक्षा की कोई स्थिति नहीं है इसलिए लोगों को शिक्षित करने के लिए शिक्षा का एक पैटर्न या नमूना होना चाहिए। 1851 ई. में ब्रिाटिश सरकार द्वारा तीस स्कूलों का निर्माण हुआ और सूरीनाम में "कुली स्कूल' खोले गए। आयरलैंड के शिक्षा विशेषज्ञ घ्ठ्ठद्यद्धत्ड़त्त् ख्दृद्मड्ढद्रण् ख़्ड्ढड्ढदठ्ठद (पैट्रिक जोसेफ कैनन) का मानना था कि भारतवंशियों के लिए एक विशेष शिक्षा प्रणाली बनाई जाए। इसके बाद ज़्त्थ्थ्त्ठ्ठथ्र् ङदृडत्दद्मदृद (विलियम रोबिंसन) का मानना था कि भारतवंशियों के बच्चों के लिए अलग प्रकार की शिक्षा प्रणाली हो। सूरीनाम, ट्रिनीडाड और गयाना में लोग अपने धर्म-प्रचार के लिए आए और शर्तबंदी प्रथा के भारतवंशियों के बीच भारतीय भाषा में धर्म का प्रचार करने लगे। अनुबंधी गुलाम बच्चों के विकास के लिए भारतवंशी बहुल देशों में उनकी अपनी मातृभाषा सीखने-पढ़ने के लिए विशेष स्कूलों की व्यवस्था की गई। जिन्हें "कुली स्कूल' के नाम से जाना गया और वे सिर्फ गांव-देहात में खुले हुए थे। सर्वप्रथम कुली स्कूल की स्थापना 1890 में कमोबेअना मारियम बरख प्लांटेशन में हुई। निकेरी के वातरलो और फिशरशोरख अलियांस में स्कूल चलाए गए। लेकिन 1906 ई. में सभी स्कूल बंद हो गए और यह शिक्षा का प्रथम काल था। सन् 1900 से 1920 तक का समय अनुबंधी गुलामों के पढ़ने के लिए कुछ जागृति काल का रहा। 1907 ई. से कुली स्कूलों के स्थान पर कुछ दूसरी तरह की शिक्षा प्रणाली की व्यवस्था की गई और स्नातक हिंदू अध्यापकों की संस्था बनी और हिंदी तथा डच भाषा के शिक्षण की व्यवस्था की गई। लेकिन 1929 ई. तक यह योजना भी ठप्प हो गई। जबकि उच्च शिक्षा के लिए 90 प्रतिशत उच्च जाति के लोग थे। इसी दौरान पौराणिक कथा वगैरह सुनने के लिये लोग पांच दिन का यज्ञ करने लगे। पौराणिक कथा-वाचन के लिये गयाना से लोगों को निकेरी लेकर आए। और एक-दो वर्ष बाद निकेरी से लोग पारामारिबो पहुंचे। 1928 ई. में एक कानून पारित हुआ कि जिन बच्चों का 1928 ई. में और इसके बाद सूरीनाम देश में जन्म हुआ है, राष्ट्रीयता उनका जन्मसिद्ध अधिकार है। लेकिन 1928 ई. से पूर्व आए उनके पिता को यह अधिकार नहीं है। इसके परिणामस्वरूप लोगों में डच भाषा सीखने के प्रति रुचि पैदा हुई। शर्तबंदी के भारतवंशियों की संतानें अनेक कारणों से पारामारिबो में केंद्रित होने लगीं, जबकि उनके माता-पिता बहुत दिनों के बाद शहर के आसपास बसे। प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान सूरीनाम और यूरोप के बीच संबंध कुछ कम थे। ऐसी स्थिति में यूरोप से कोई सामान सूरीनाम नहीं आ पाता था जिससे सूरीनाम के लोगों को अपने ही उत्पादन पर निर्भर रहना पड़ा। इससे सूरीनाम की वस्तुओं का महत्व बढ़ने लगा और उसका दाम भी बढ़ने लगा। इस कारण खेतिहर लोगों को आमदनी होने लगी और उनमें से कुछ धनी हो गये तो उन्हें अपने बच्चों को पढ़ाने के लिए साधन की कमी नहीं रही और बच्चों में भी जागृति आई। 1915 ई. से लेकर 1920 ई. के बीच कुछ मिलों डिप्लोमा और चार व्यक्ति अध्यापन में डिप्लोमा के लिए उत्तीर्ण हुए। 1916 ई. में पहले व्यक्ति ने चिकित्सकीय पढ़ाई में प्रवेश लिया। एक अन्य सूरीनाम बैंक में कार्यरत हुए और दूसरे सरकारी अफसर हुए। उनमें से एक नवोन्मेषकाल तक बहती रही है। जिसे विश्व के भारतवंशियों ने, उनके पुरखों ने किसनई और मजदूरी करते हुए भी साधु-संतों की तरह पूरे विश्व में खटकर भारतीय संस्कृति और चेतना के रूप में प्रसार किया। भारतीय संस्कारों से रचे-बसे भारतीय मजदूर-किसान जब ब्रिाटिश, फ्रेंच और डच सत्ताधारियों के द्वारा मॉरीशस, गयाना, सूरीनाम, ट्रिनीडाड एवं टोबैको और कैरेबियाई देशों में ले जाए गए तो उन्होंने विदेश में भी अपने को जिलाए रखने के संस्कार बचाए रखे। आज भी विश्व के भारतवंशियों को जीने की संजीवनी शक्ति अपनी संस्कृति और सार्वभौम धर्म से ही प्राप्त होती है। गोरे सत्ताधारी वे चाहे अंग्रेज हों, डच हों या फ्रांस के निवासी वे उन्हें देवदूत से लगे। हिंदुस्तानी मजदूर उनके बहलावे और बहकावे में आ गए थे। वे अपनी माँ, बेटी, बहू, पत्नी सहित गठरी दबाए हुए धरती छोड़ने को तत्पर हो गये थे। मातृभूमि के छोड़ने का दु:ख सत्ताधारियों की यातना से कम था। पृथ्वी के जिन देशों, हिस्सों और कोनों में इन्हें मजदूरी के लिए रोपा गया, यह भारतीय संस्कृति की तरह उगे, फूले, फले और फसल की तरह खड़े हुए। जिन देशों में गए वहां अपनी आस्थाओं के मंदिर बनवाए। अपने विश्वास के तोरण खड़े किए। नदी हो या सरोवर, सागर हो या महासागर सबका नाम गंगा रखा या गंगा सागर। गंगा माँ की पवित्र धार मानकर ही डुबकी लगाई। सूर्य को साक्षी मानकर अंजुलि के जल को "गंगाजल' मानकर संकल्प साधते रहे। जिस धरती को अपनी मातृभूमि बनाया उसे "माँ' मानकर अपनी सेवाएं अर्पित कीं। गयाना, ट्रिनीडाड, मॉरीशस, फीजी जैसे देशों में हिंदुस्तानी संतानों ने अपनी सत्ता कायम की। सूरीनाम सहित कई देशों में हिंदुस्तानियों की सरकार तथा सत्ता में महत्वपूर्ण पकड़ रही। भारतवंशी बहुल देशों और द्वीपों की प्रकृति का चरित्र अनोखे रूप से एक समान है। मॉरीशस हो या फ्रेंच गयाना, ब्रिाटिश गयाना हो या सूरीनाम या ट्रिनीडाड, टोबैको या फिर दक्षिण अफ्रीका के क्षेत्र हों या फीजी द्वीप समूह की धरती हो। इन सबमें एक जैसे फल, फूल, फसल और प्रकृति है। वैसे ही हिंदुस्तानी मजदूर-किसानों का चरित्र भी एक जैसा ही है। सूर्योपासना, गंगा-पूजा, शिवरात्रि, नवरात्र, त्रिदेव की भारतीय कल्पना, देवी-देवताओं की पूजा, हवन-यज्ञ, तीज-त्योहार, रस्मो-रिवाज, खानपान और जीवन-शैली में एक जैसी समानता है। विवाह के अवसर पर भर्तवान, लावा भुजाई सहित दो-तीन दिवस तक रस्मो-रिवाज सहित शादी-ब्याह संपन्न होता है। लोककथाओं, लोकगीतों, लोककलाओं, लोकनाट्य और खानपान की प्राणवान शक्ति को भी आज वे वैसे ही धारण किए हुए हैं। लोककथाएं अपने समय और समाज की सच्चाइयों की कोख से जन्म लेती हैं। एक तरह से वे अपने समाज के मानस की सच्ची पहरुआ हैं। लोककथाओं और लोकगीतों ने संपूर्ण विश्व में भारतवंशियों की स्मृतियों की छाती में अपना घर बनाए रखकर, भारतीय संस्कृति संचित कर रखी है। लोक का महत्व शास्त्र से कम नहीं है। एक स्थान पर शास्त्र का महत्व है तो दूसरे स्थान पर लोक का। दोनों संपूरक हैं। लोक के सामने सहज रूप में जो चरम सत्ता प्रदर्शित होती है वही लोकसंस्कृति है। भारतवंशी किसान-मजदूरों ने अपने श्रम, लगन और साहस की साधना से जो अद्भुत शक्ति उपार्जित की है कि पूरे विश्व में भारतवंशियों की एक जमात खड़ी हो गई है जिसके साथ भारतीय संस्कृति भी उनकी पहचान बनकर खड़ी है। विश्व के चाहे यह जिस भी कोने में हों उनकी सांस्कृतिक अस्मिता एक है क्योंकि उनके आधार-रुाोत एक हैं, उनका जीवन जगत एक है। समुद्र तटीय तीसरी दुनिया के अविकसित राष्ट्रों की धरती पर जिस तरह से भारतवंशियों की चार पीढ़ियां अपनी अंजुलि में भारतीय संस्कृति का प्रकाश लिए हुए खड़ी हैं उसी तरह अमेरिका, इंग्लैंड, कनाडा, पुर्तगाल, स्पेन जैसे विकसित राष्ट्रों और पाकिस्तान, नेपाल, बंगलादेश, थाईलैंड, इंडोनेशिया, चीन और जापान तथा रूस आदि देशों में भी भारतवंशियों की पीढ़ियां भारतीय संस्कृति को अपना जीवन बनाए हुए जी रही हैं। यूरोप सहित विश्व के अन्य देशों में भी भारतवंशियों की पीढ़ियां हैं। एक-दूसरे रूप में भी भारतवंशियों की जड़ें दूसरे देशों में जम रही हैं। जिस तरह से मॉरीशस, दक्षिण अफ्रीका के भारतवंशी अब फ्रांस, जर्मनी और इंग्लैंड में भी व्यापार और रिश्तों तथा नौकरियों के कारण पहुंच रहे हैं। ट्रिनीडाड, ब्रिाटिश गयाना के भारतवंशियों की नई पीढ़ी इंग्लैंड में अपना बसेरा बना रही है। सूरीनाम के भारतवंशियों की नई पीढ़ी हॉलैंड (नीदरलैंड) में अपना घर-द्वार बना रही है। इस तरह से पूरे विश्व में भारतवंशियों का वर्चस्व बढ़ता जा रहा है। भारत से बाहर दक्षिण अफ्रीका, फीजी, दक्षिण अमेरिका, कैरेबियाई देश, मॉरीशस और यूरोप-अमेरिका के कुछ भारतवंशी बहुल क्षेत्रों के बीच में भोजपुरी, मैथिली, मगही भाषा ही संपर्क भाषा, सांस्कृतिक भाषा, जीवन की संजीवनी भाषा और संबंधों की भाषा के रूप में विकसित हुई है। इससे भारत के आसपास के पड़ोसी राष्ट्र नेपाल, बर्मा, थाईलैंड, पाकिस्तान, बंगलादेश और श्रीलंका आदि भी अछूते नहीं हैं। हिंदी भाषा की सांस्कृतिक एकता से ही भारतवंशी बहुल देशों का साहित्य प्रकाशित और प्रकट हो सकेगा जिससे "भारतवंशी की सांस्कृतिक एकता' को प्रकट करने में सहायता होगी।

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