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प्रौद्योगिकी और शिक्षा के भारतीय संदर्भ
01-Dec-2017 11:10 AM 3119     

दुनियाभर में प्रौद्योगिकी न केवल जीवन का अभिन्न भाग हो चुका है, बल्कि उसके प्रेरक-चालक के रूप में जानी जाती है। प्रौद्योगिकी द्वारा पिछले पचास साल में जितना परिवर्तन-बदलाव हुआ है, उतना बदलाव पूर्व के सैकड़ों साल के दौरान में नहीं हुआ था। पश्चिम में हम लोग अब प्रौद्योेगिकी के बिना नहीं जी सकते। कल्पना करिये कि मिलेनियम बग के द्वारा कंप्यूटरों का भंग अगर होता तो पश्चिमी जीवन कितना मुश्किल हो जाता, खाने-पीने को कुछ नहीं मिलता, बिजली नहीं होती, यातायात नहीं होता, कुछ भी नहीं होता और स्थिति दुरुस्त होने से पहले कितने लोग मर जाते। पश्चिमी दुनिया का कोई भी व्यक्ति आधुनिक प्रौद्योगिकी द्वारा चालित समाज के बाहर नहीं रह सकता।
हमारी आधुनिक प्रौद्योगिकी का विकास वेग से तो हुआ और सहज ढंग से भी। जीवन की जरूरतों-इच्छाओं से प्रेरित नये आविष्कार हुए, नयी योग्यताओं ने और नये आविष्कार-योग्यताएँ पैदा कीं। यहाँ तक कि सारा समाज प्रौद्योगिकी के द्वारा चलकर अब उसके बिना निर्बल ही है।
भारत में स्थिति कुछ अलग है। यद्यपि वहां भी शहरों में और गांवों तक में भी आधुनिक प्रौद्योगिकी जीवन का अभिन्न अंग बन चुकी है, परंतु अब भी बहुत-सी ऐसी जगह बाकी हैं जहां लोग पुरानी स्वदेशी प्रौद्योगिकी की सहायता से जीवन गुजारते हैं।
इस स्थिति का कारण यह है कि भारत में आधुनिक प्रौद्योगिकी का विकास सहज विकास नहीं था, वह पुरानी स्वदेशी प्रौद्योगिकी से बढ़ नहीं निकली, बल्कि अंग्रेजी शासन करने वालों ने उसे अपने फायदे के लिये आयातित किया। आगे इसका विस्तार समाज के भीतर सहज ढंग से नहीं हुआ। शासन करने वालों के लाभ के अनुसार चयनात्मक ढंग से यह फैला। स्वतंत्रता के बाद सारे देश में विकास बढ़ने लगा, फिर भी आज आधुनिक प्रौद्योगिकी के प्रयोग और भारतीय पर्यावरण की जरूरतों से उपजी पारंपरिक प्रौद्योगिकी में बड़ा अंतर है।
आजकल भारत की प्रौद्योगिकी भूमंडलीय बाजार की निपुण खिलाड़ी बन चुकी है। परंतु इस बाजार के नियम पश्चिम के नियम हैं, जिसके अनुसार जो भी इसमें खेलता हो उसे इन्हीं नियमों के अनुसार खेलना पड़ता है और इन नियमों में विकासमान देशों की विशेष जरूरतों के लिये कोई जगह नहीं है। परिणामस्वरूप भारत की जनता में से कई लोग पश्चिम ढंग के तौर-तरीकों को अपनाने की बदौलत धनी बन जाते हैं, जबकि अधिकतर लोग इस चुनावात्मक और कृत्रिम ढंग से स्फीत हुए विकास से कोई लाभ नहीं उठा सकते। दूसरों के लाभ की कीमत पर हानि उठाते हैं, शोषण झेलते हैं। विकास की दौड़ में जिन आमजनों की उपेक्षा अंग्रेजों द्वारा हुई थी वे अभी भी बहुत पीछे छोड़ दिये जाते हैं। पश्चिमपरस्तवालों को यह विचार कदापि नहीं आता है कि इन अशिक्षित निर्धनी लोगों की सहज प्रौद्योगिकी में अच्छी संभावनाओं का भंडार रहता है।
स्थिति बदलनी है तो लोगों की मनोवृत्तियों-धारणाओं को बदलना होगा। धारणाएँ किधर से निकलती हैं? पश्चिम ढंग का आर्थिक फायदे का सोच आखिर समाज के किस वर्ग के लिये आदर्शतम हो सकता है? एक तो स्वाभाविक बात है कि जिस देश की अधिकतर आबादी गरीबी में जीवन का संघर्ष कर रही हो, वहाँ अमीर देशों की जीवनशैली की नज़ीर क्यों पेश की जाये। सच यही है कि अमीर देश दूसरों का शोषण करते-करते और अमीर हो जाते हैं और गरीब लोग चुसते हुए और गरीब हो जाते हैं। लेकिन यह पूरी कहानी नहीं। जीवन भर हमारे विभिन्न अनुभव हम पर प्रभाव डालते हैं, हमारे विचार-धारणाएँ गढ़ते-बदलते हैं। लेकिन शायद सबसे घने प्रभाव बचपन के समय होते हैं। इसलिए समाज पर शिक्षा के प्रभाव को देखना चाहिए। प्रौद्योगिकी के विकास में शिक्षा के योगदान का असर बिलकुल दूसरी तरह से प्रभाव डालता है। जिस तरह अंग्रेज भारत में आधुनिक प्रौद्योगिकी ले आए थे, उसी तरह वह आधुनिक शिक्षा भी लाये। लेकिन उनकी शिक्षा सिर्फ उन लोगों को मिली जिनका सहयोग शासन करने में आवश्यक था। इन लोगों को अच्छी तरह से सिखाया गया था, भारतीय होने के लिए नहीं, अंग्रेज होने के लिए। शासन करने वालों ने शिक्षा की व्यवस्था स्वभाववश इस विचार से गढ़ी थी कि उनकी अपनी संस्कृति उत्कृष्ट संस्कृति के रूप में सिखायी जाए, उनकी भाषा उत्कृष्ट भाषा के रूप में बोली जाए। इस शिक्षा का नतीजा आज भी भारत में साफ ही साफ दिखाई पड़ता है।
भारत में उच्च वर्ग के बच्चे आज भी सीखते हैं कि कालीदास, खुसरो, कबीर आदि की कृतियाँ पढ़ने की अपेक्षा शेक्सपियर पढ़ना ज्यादा प्रासंगिक और उपयुक्त है। वे अंग्रेजी बोलते हैं, अंग्रेजी में सीखते हैं। इस तरह से उनकी शिक्षा उन्हें उनकी पहचान और संस्कृति से दूर करती जाती है, एक ऐसी दुनिया की ओर जिसमें जो भाषा वे बोलते हैं उसमें बहुतेरी भारतीय धारणाओं और विचारों के लिए शब्द ही नहीं हैं। फिर वे धीरे-धीरे उन खांटी भारतीय विचारों को भी खो बैठते हैं और संकर बनकर अपना जीवन छिछोरे पश्चिमी धन के बदले में मोल लेते हैं।
यह शिक्षा मनोवृत्तियों का मुख्य सूत्र है। कहा जा सकता है कि पश्चिम से आई प्रौद्योगिकी ने देश के विकास के लिए काम किया है, किसी हद तक यह सच भी है, लेकिन यहाँ प्रश्न यह भी उठता है कि इससे कितने लोग लाभान्वित हुए। मौजूदा व्यवस्था में बहुत-से बच्चों को अच्छी और अंग्रेजी शिक्षा मिल रही है, लेकिन यह भी उल्लेख करना होगा कि देश के कितने ऐसे बच्चे हैं जो शिक्षा के मूलभूत अधिकार से वंचित हैं।
यह कहना गलत न होगा कि भारत के संदर्भ में अंग्रेजी के उद्देश्यों-नीतियों के परिणाम-स्वरूप प्रौद्योगिकी और शिक्षा दोनों का बढ़ाव असमान ढंग से चला है, देश का विकास जनता के भिन्न-भिन्न दर्जों में भिन्न-भिन्न ढंग से चला है। आज पढ़े-लिखे अंग्रेजी बोलने वाले विशेषज्ञ प्रौद्योगिकी को बड़े कुशलता से बढ़ाते जाते हैं, लेकिन जनता के अधिकतर लोग अपने बच्चों के लिए शिक्षा चुन सकना तो छोड़िये, किसी भी किस्म की शिक्षा का अवसर नहीं पाते।
जीवन में जो सबसे पहले होती है वह है शिक्षा। जो लोग प्रौद्योगिकी में काम करने आते हैं और इस धारणा में पले हैं कि पश्चिम की सारी चीजें अच्छी होती हैं। भारतीय भाषाओं से अंग्रेजी ऊंची भाषा है, उसमें ही काम करना है, तो फिर प्रौद्योगिकी के अंदर की स्थिति कौन सुधारे? इसलिये भारत को अगर अपने स्वभाव के अनुसार विकास करना और अपनी पहचान को सहारा देना है तो उसे शिक्षा को ही केंद्रीय भूमिका देनी पड़ेगी।
बच्चों को वह सब कुछ जो वह सीखना चाहते हैं, उन्हें अपनी भाषा में ही सिखाना होगा। उनके सामने सांझी सांस्कृतिक विरासत के तौर पर एक तरफ है रीति-रिवाज जो एक तरह से भारत में ही बढ़ी हुई पुरानी सिद्ध प्रौद्योगिकी है, दूसरी तरफ है कला, साहित्य, संगीत इत्यादि। बच्चों को अपनी मातृभाषाएँ पढ़नी होंगी, देश की संपर्क-भाषा या राष्ट्र-भाषा पढ़नी होगी। स्वदेशी ऐतिहासिक, भौगोलिक तथा सामाजिक ज्ञान प्राप्त होने से वे देश और एक-दूसरे का आदर व रक्षा करने के भाव को सीख लेंगे।
सिर्फ ऐसी भारत संबंधित, आत्मविश्वास देने वाली शिक्षा के आधार पर दुनिया की दूसरी जगहों और संस्कृतियों के बारे में सिखाना चाहिए, बजाय पश्चिम की तथाकथित दुआओं के बारे में सिखाएँ, पश्चिमी भाषाएँ सिखाएँ। सिर्फ ऐसी बुनियादी भारतीय शिक्षा की सहायता से पश्चिमी और दूसरी संस्कृतियों की भारत के लिए प्रासंगिकता एवं उपयोगिता तय कर सकेंगे, जिससे अप्रासंगिक और भारतीय समाज या पर्यावरण के लिए संभवतः हानिकर चीजें या मामले पहचान ले सकें। ऐसी शिक्षा राष्ट्रवाद और पूर्वाग्रह से बचकर बच्चों को स्वयं की पहचान विकास कराने से उन्हें ऐसा आत्मविश्वास और आत्मसम्मान दे सके कि वे प्रासंगिक संदर्भ में ही दुनिया की दूसरी संस्कृतियों पर देख सकें। केवल विदेशी विचारों-तरीकों-चीजों का उपयोग करते रहने से उनके अपने समाज का बहुत भला नहीं होने वाला, यह बात बच्चों को गहराई से समझाना चाहिये।
यूरोप में बहुत से छोटे-छोटे ऐसे देश हैं जिनकी आबादी गुजरात की आबादी से भी कम है। फिर भी इन देशों में सारी शिक्षा मातृभाषा में ही चलती है, शिशु-शाला से लेकर विश्व विद्यालय तक और कामकाज भी मातृभाषा में होता है। ये सही मायनों में मातृभाषा में जीते हैं। विश्वविद्यालय में विद्यार्थियों को अंग्रेजी (या कुछ देशों में जर्मन या फ्रांसीसी) की किताबें और लेख पढ़ने की आवश्यकता पड़ती है, क्योंकि खास विषयों की किताबें कम लोगों से बोली हुई भाषाओं में प्रकाशित करना बहुत ज्यादा महँगा होता। लेकिन पाठ, अभ्यास, प्रशिक्षण सब मातृभाषा में ही चलता है।
अपनी मातृभाषा में शिक्षा देने वाली बात भारत के बड़े-बड़े प्रदेशों में मुमकिन क्यों नहीं? इस सवाल का उत्तर देने के लिए दूसरा सवाल पूछना चाहिए। भारत की वर्तमान शैक्षिक स्थिति से कौन लाभ उठा लेता है? एक तरफ है पश्चिमी देशों की बड़ी-बड़ी व्यापारी संस्थाएँ जो भारत में अल्प खर्च पर नफा कर लेते हैं, दूसरी तरफ हैं वे अल्पसंख्यक भारतीय लोग जो पश्चिम की ओर ताक कर और उनसे प्रेरित होकर शिक्षा के अधिकांश संसाधनों का लाभ उठा लेते हैं। लेकिन अगर भारत को दबाने वाले इन साम्राज्यवादियों को रोकना है तो यह बहुत जरूरी है कि कोई भी भारतीय व्यक्ति या संस्था उनका समर्थन न करे। और यह जरूरी है कि सब बच्चों को, शहर-गांव के बच्चों को, कोठी-झोंपड़ी के बच्चों को, लड़कों और लड़कियों को, अपने आपकी मातृभाषा में बराबर शिक्षा मिले जिससे सब बच्चों के जीवन का विकास करने में सहायता हो और सब भारतीय व्यक्तियों को पढ़ने और नौकरी से लगने, पैसे कमाने का बराबर अवसर एवं योग्यता मिले।
इस बराबरी का सबसे महत्वपूर्ण साधन है देश की संपर्क-भाषा, जो सबजनों के बीच बातें होने देती। किंतु उस भाषा में अगर उन्हीं विचारों के लिए शब्द नहीं हैं जो भिन्न-भिन्न भारतवासियों की भिन्न-भिन्न पद्धतियाँ, संस्कृतियाँ व धर्म प्रकट करें तो फिर संपर्क कैसा? संपर्क-भाषा तो भारतीय भाषा ही होनी चाहिए जिससे अपने देश की दूसरी भाषाओं से सहज संपर्क हो। इसलिए हिंदी ही यह काम करने योग्य लगती है। फिर मातृभाषा तथा संपर्क या राष्ट्रभाषा सीखने के बाद ही और इच्छा यदि है तो अंग्रेजी या चीनी या कोई भी और विदेशी भाषा सीख सकते हैं, लेकिन जरूरी नहीं होना चाहिए। क्या भारत को अपनी ही भाषाओं में रहने का अधिकार नहीं है?
यह सिर्फ बुनियादी शिक्षा की बात ही नहीं, देश की सारी शिक्षा की बात है। सारे बच्चे अगर जिस भी स्कूल-विद्यालय-विश्वविद्यालय जाते हैं, वहाँ मातृभाषा या हिंदी में पढ़ाई हो तो देश के सारे बच्चों को बढ़िया शिक्षा का दरवाजा खुलता है। उसके बाद अगर काम भी भारतीय भाषा में चलता है तो मातृभाषा में जीना दूसरे देशों में जितना स्वाभाविक लगता है, उतना ही स्वाभाविक भारत में भी हो जाता।
शिक्षा संभावनाएँ खोल देती है। वह सामाजिक और सांस्कृतिक विकास के रास्ते का आरंभ स्थान होती है। विद्या के साथ-साथ उससे ऐसी शक्ति भी मिलती है, जिससे लोग अपने जीवन के साथ ही दूसरों के जीवन पर भी प्रभाव डाल सकते हैं। परंतु भारत में मौजूद समय में शिक्षा अपनी ऐतिहासिक, आर्थिक और सामाजिक परिस्थितियों के कारण सबको एक ही तरह से नहीं मिलती। कुछ बच्चों को ऊंची श्रेणी की अंग्रेजी शिक्षा मिलती है तो कुछ को ऊँची श्रेणी की भारतीय शिक्षा मिलती है। कुछ को मामूली शिक्षा तो कुछ को कोई शिक्षा नहीं मिलती।
प्रौद्योगिकी अगर खुद चाहती है कि उसकी गति, भाषिक स्थिति, सामाजिक प्रासंगिकता तथा सब कुछ समान विकास के लिए उपयोगी बन जाए, आबादी की समान कुशलता के लिए उपयोगी हो जाए तो उसे शिक्षा के सर्वसुलभ होने के लिए भी काम करना होगा। प्रौद्योगिकीय संस्थाओं-व्यापारों को समाज में जाकर उनकी जड़ें अधिक मजबूत बनानी चाहिए जिनसे वह मजबूती से टिकी रह सकें।
देखें तो इसकी ढेर सारी संभावनाएँ नजर आती हैं। प्रौद्योगिकी के सहयोग से शिक्षा के कार्यक्रम को प्रभावी बनाया जा सकता है, उसे स्कूलों-विद्यालयों के साथ-साथ चलाया जा सकता है। शैक्षिक संस्थाओं को अनेक तरह से समर्थन दिया जा सकता है। स्कूलों और ऊँची शैक्षिक संस्थाओं में भारतीय भाषाओं के प्रयोग का सहारा और शायद आर्थिक प्रोत्साहन भी दिया जा सकता है। भारत के पर्यावरण के संदर्भ में विकास के लिए कार्यों को सहायता, स्कूलों-विद्यालयों को भाषिक तथा विषय-वस्तु संबंधी सलाह देना आदि। शिक्षा में काम करने वाले यदि यह देखते हैं कि प्रौद्योगिकी खुद भारतीय भाषा में भारतीय समाज की ज़रूरतों को पूरा करने में मददगार हो सकत है तो उसे आगे बढ़ने के लिये कितना प्रोत्साहन दिया जा सकता है।
क्या यह सब असंभाव्य बातें लगती हैं? पश्चिम का प्रलोभन-आकर्षण ज्यादा मजबूत लगता है? यों यह बात याद रखनी चाहिए कि पश्चिम की विकसित स्थिति कैसे उपजी थी। वह किसी हद तक दूसरे देशों के शोषण पर आधारित है। विकासमान देश के कुछ लोग जब किसी भी मूल्य पर पश्चिमी देश जैसे बनने का बड़ा प्रयत्न करते हैं तो वे भी शोषण से लाभ उठा लेते हैं, लेकिन किसी और का नहीं, बल्कि वे अपने आपके देश का ही शोषण करते हैं। फिर प्रश्न है कि इस तरह सारे देश की स्थायी विकास-प्रगति कैसे लायी जा सकती है?
इससे बेहतर होगा अगर प्रौद्योगिकी और शिक्षा परस्पर सहायता से ही सही एक ऐसी पीढ़ी बढ़ाए जो आत्मावलंबन-आत्मविश्वास से भारत का विकास-प्रगति सारी जनता के लिए करें। आज की शिक्षा में धन-मन लगाने से कल का भारत दुरुस्त हो जाए। क्या प्रौद्योगिकी के लिए इस लक्ष्य से अच्छा कोई भी और लक्ष्य हो सकता है?

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