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प्रतीक्षा है बच्चों के सिनेमा की
01-May-2017 01:36 PM 4036     

नौसाल का एक भाई अपनी सात साल की बहन की चप्पल बाजार में खो देता है, जब वह उसे मरम्मत करवाकर लौट रहा होता है। ढूँढने की अनथक कोशिश कर अंततः उदास, सहमा भाई घर लौटता है। उसे अहसास है कि वह टूट चुकी चप्पल उसकी बहन के लिए कितनी जरूरी थी, क्योंकि उसके पिता की आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं कि वे उसके लिए दूसरी चप्पल खरीद सकें, और कोई चप्पल उसके पास है भी नहीं, और नंगे पाँव वह स्कूल जा नहीं सकती। चप्पल खोने की बात कहकर दोनों बच्चे अपने माँ-बाप की चिंता बढ़ाना नहीं चाहते, वे रास्ता निकालते हैं। सबेरे के स्कूल में पढ़ रही बहन को भाई अपना जूता दे देता है, इस हिदायत के साथ कि वह छुट्टी होते ही घर लौट जाए ताकि उसी जूते को पहनकर वह स्कूल जा सके।
सात साल की उस छोटी लड़की को भी अपनी जवाबदेही का अहसास है, वह छुट्टी होते ही घर के लंबे रास्ते की ओर दौड़ लगाती है बावजूद इसके भाई को रोज स्कूल पहुँचने में देर होती है, वह रोज शिक्षक की डाँट सुनता है, पर उसके पास कोई दूसरा विकल्प भी नहीं है। एक दिन बहन एक बच्ची के पाँव में अपनी चप्पल देख लेती है। वह उसका पीछा कर उसके घर तक पहुँच जाती है और दूसरे दिन अपने भाई को लेकर जाती है, इस आक्रामकता के साथ कि आज उससे चप्पल छीन ही लेना है। दोनों छिपकर उसके बाहर निकलने की प्रतीक्षा करते हैं लेकिन जब वह अपने अंधे पिता के कंधे पर हाथ लिए छोटे से खोंचे में कुछ सामान साथ लेकर फेरी के लिए निकल रही होती है, तो दोनों भाई-बहन किंकर्तव्यविमूढ़ हो जाते हैं। एक दूसरे के चेहरे को देखते दोनों वापस लौट जाते हैं।
ईरान की फिल्म "चिल्ड्रेन ऑफ हेवन" की यह आरंभिक कथा है। परदे पर दिखते स्वाभाविक दृश्य विन्यास और बच्चों के सहज अभिनय का अहसास किए बगैर इन कथा सूत्रों में हालाँकि सिर्फ फिल्म में प्रदर्शित बच्चों की संवेदनशील दुनिया की झलक ही पा सकते हैं। इस निष्कर्ष पर पहुँचने में तो लेकिन जरा भी असुविधा नहीं होती कि बच्चों का स्वाभाविक विकास उन्हें आसपास के प्रति अधिक संवेदनशील, अधिक ईमानदार बनाता है। वास्तव में यह फिल्म उन बच्चों में कहीं न कहीं सारे बड़ों को देखने के लिए बाध्य करती है कि वे भी स्वाभाविक रूप से बुरे नहीं उन्होंने भी अपने जीवन का आरंभ उसी संवेदनशीलता के साथ किया था, फिल्म बगैर कहे भी कहती है, आखिर बड़े होने के बाद इस कदर क्यों बदल जाते हैं हम। उन दोनों भाई बहनों के प्रेम, एक दूसरे के प्रति समर्पण, समय को पहचानने की उनकी संवेदना, अपने परिवार और समाज से सरोकार, वास्तव में वे बच्चे तो बड़े नहीं लगते, लेकिन हम काफी छोटे लगने लगते हैं उनके सामने।
अपने जूते तो छोड़कर वे वापस आ जाते हैं, लेकिन उनकी जरूरतें तो जस की तस हैं। भाई के सामने एक राह आती है जब शहर में दौड़ प्रतियोगिता होने वाली होती है, जिसमें सभी स्कूलों से बच्चों को भाग लेना है। इस दौड़ में चैंपियन को कप मिलना है जबकि रनर अप को जूते। भाई इसमें दूसरे स्थान पर आने के लिए कृत संकल्पित होकर तैयारी में लग जाता है। तैयारी होती भी है, इतनी कि भाई चैंपियन बन जाता है। सारा शहर, सारा स्कूल उनकी वाहवाही में जुटा है, लेकिन उसकी उदासी खत्म नहीं हो रही, उसकी आँखों के सामने बस वही जूते आ जाते हैं। उदास थका जब वह घर लौटता है तो एक और दुःख के पहाड़ का अहसास होता है। उन भाई-बहनों के बीच का वह इकलौता जूता दौड़ में पूरी तरह टूट चुका होता है।
कहानी यहीं खत्म होती है, लेकिन परदे पर एक और दृश्य आता है, जब थककर भाई आँगन में बने छोटे से कुंड में थकान उतारने के लिए पानी में अपने पाँव उतार देता है, और छोटी-छोटी मछलियाँ उसके पैरों के पास जमा हो जाती हैं। दर्शकों का दिल कतई गवारा नहीं करता कि वे उन बच्चों को इस हाल में छोड़कर सिनेमा से बाहर निकलें, लेकिन वे निकलते हैं निश्चय ही इस संवेदना के साथ कि जरूरतमंद बच्चों के दर्द का अहसास वे कर सकें। एक अनजान-सी भाषा, अनजान से मुल्क की वह छोटी-सी फिल्म बहुत कुछ नहीं कहती, बस बालमन के अंदर प्रवेश का अवसर देती है। चप्पल गुम हो जाने के बाद जब बहन भाई के जूते पहनकर स्कूल जाती है तो हर वक्त उसकी निगाहें लोगों के पैरों पर ही टिकी होती हैं। स्कूल में प्रार्थना के समय उसकी निगाहें बस बच्चों के पैरों पर दौड़ती रहती हैं। काश! कहीं दिख जाए उसकी गुमशुदा चप्पल! अद्भुत! उसकी छुट्टी होते ही जिस जवाबदेही के साथ भरे-पूरे बाजार की पूरी रौनक छोड़ छह-सात साल की वह छोटी बच्ची दौड़ती है, किसी के भी रोंगटे खड़े हो सकते हैं।
"चिल्ड्रेन ऑफ हेवन" ईरान की छोटी-सी फिल्म की इस बड़ी-सी कहानी की चर्चा बस यह याद दिलाने की कोशिश है कि क्या भारतीय सिनेमा के लम्बे इतिहास में एक भी ऐसी फिल्म का स्मरण कर सकते हैं, जिसमें बच्चों की मानसिकता को इस तरह पूरे सकारात्मक सोच के साथ फिल्माने की कोशिश कभी किसी के द्वारा की गई हो। उल्लेखनीय यह कि बकायदा राइट्स लेकर भी जब इसी फिल्म को प्रियदर्शन हिंदी में बनाते हैं तो बच्चे का स्नीकर ही रिबाक के स्पोर्टस शू में नहीं बदल जाता, सीधी-सादी संवेदनशील कहानी को आतंकवाद की छौंक से इतना बोझिल बना दिया जाता है कि वह बच्चों के लिए बची रह ही नहीं पाती।
इसके अलावा भी श्याम बेनेगल, गोविंद निहलानी से लेकर गुलजार और यश चोपड़ा, करण जौहर, सुभाष घई तक में तो हिंदी की कोई फिल्म याद नहीं की जा सकती जिसमें बालमन की सकारात्मकता को बच्चों के लिए विश्लेषित करने की कोशिश की गई हो। सत्यजित राय चूँकि खुद बच्चों के लिए लिखते भी रहे, इसलिए उन्होंने अवश्य बच्चों के लिए कुछ बेहतर फिल्में बनाने की कोशिश की लेकिन भारतीय सिनेमा का इससे बड़ा दुर्भाग्य और क्या होगा कि उनकी इस सार्थक कोशिश को भी फिल्म समीक्षक आपातकाल के डर से जोड़कर देखने लगे। वास्तव में आलोचकों के निरपेक्ष नजरिए ने भी बाल फिल्मों के प्रति सोचने के लिए फिल्मकारों को उत्साहित नहीं किया। आश्चर्य नहीं कि यहाँ बाल फिल्म बनाने की प्राथमिकता में भी बाजार पहले रहा, बच्चे पीछे।
हिंदी में बच्चों के नाम पर बनी जो भी फिल्में याद की जा सकती हैं, उनमें एक "तारे जमीन पर" जो मूलतः अभिभावकों के लिए बनी थी, को थोड़ी देर के लिए छोड़ दे तो अधिकांश फिल्में "थोड़ा प्यार थोड़ा मैजिक" से लेकर "हम हैं राही प्यार के" तक सभी में सिर्फ बच्चों की शैतानियाँ मुखर दिखती हैं। गुलजार के "परिचय" और "किताब" में जो शैतानी थोड़ी बाल सुलभ लगती थी, "थोड़ा मैजिक..." तक आते-आते अराजक हो गई। यह भी एक अद्भुत विडंबना है कि "परिचय", "हम हैं राही प्यार के", "राजू चाचा", "थोड़ा प्यार थोड़ा मैजिक" सभी के कथानक कमोबेश एक ही आधार भूमि पर विकसित हैं। वह भी तब जब उनमें से अधिकांश फिल्में आइडिया के लिए हॉलीवुड पर आश्रित रहीं।
विशाल भारद्वाज ने "मकड़ी" बनाकर बाल सिनेमा की सख्त जमीन तोड़ने की कोशिश की। किसी सुखद आश्चर्य से कम नहीं की इसके कुछ एक वर्षों बाद उन्होंने फिर बच्चों के लिए "ब्लू अम्ब्रेला" भी बनाई। निश्चित रूप से व्यावसायिक कुशलता के साथ बच्चों पर केंद्रित फिल्म बनाने की वह एक सराहनीय शुरुआत थी। इसी तरह की एक कोशिश सौमित्र रानाडे ने "जजंतरम ममंतरम" के रूप में की थी। इन फिल्मों को कुछ दर्शक भी मिले और आलोचकों की प्रशंसा भी लेकिन इन फिल्मों को "चिल्ड्रेन ऑफ हेवन" की तुलना में रखकर देखने से इसना खोखलापन स्पष्ट हो जाता है। आखिर इस तरह की वेलमेड फिल्मों से बच्चों को हम दे क्या रहे होते हैं, क्या एक हिंदुस्तानी "हैरी पाटर" या "स्पाइडरमैन"। बच्चों की दुनिया चमत्कार से मुक्त कर हम क्यों नहीं गढ़ सकते। नागेश कुकुनुर ने सुभाष घई के लिए "इकबाल" के रूप में यह कोशिश की थी। परिवार, रिश्ते, समर्पण, संघर्ष की यह कथा बच्चों को सीधे संबोधित नहीं होती, उनके सामने एक स्थिति रखती है और उन्हें सोचने के लिए बाध्य करती है।
कनाडा के एक बाल फिल्म विशेषज्ञ राबर्ट राय बाल फिल्म को परिभाषित करते हुए कहते हैं "वह फिल्म जिसमें बच्चा खुद को एकात्म महसूस करे हमें अपने विचारों को लादने के बजाए बच्चे को स्वतः अपनी राय कायम करने हेतु स्वतंत्र छोड़ देना चाहिए।" यदि "तारे जमीन पर", "राहुल", "मासूम" जैसी पूर्णतया वयस्कों को संबोधित फिल्मों को छोड़ भी दें तो आमतौर पर बाल फिल्मों के नाम पर हमारा वास्ता ऐसी फिल्मों से अधिक पड़ता है जो अपनी सार्थकता साबित करने की कोशिश में अभिभावकों और शिक्षकों के उपदेशात्मक रवैए को प्रतिबिंबित करती हैं। "बाल चित्र समिति" तो अपने अधिकांश कार्यकाल में राजनीतिक आकाओं की अनमनस्कता झेलकर स्वतः अप्रासंगिकता की ओर अग्रसर है। आजादी के बाद से मुख्यधारा के प्रतिष्ठित निर्देशकों ने भी जो फिल्में बनाई उनमें बच्चों को साथ लेकर चलने के बजाए मोटे-मोटे संदेश ठूँसे जाते रहे। यह आदर्शवाद कई फिल्मों में तो इतना भारी पड़ जाता था कि यह समझना मुश्किल हो जाता था बच्चे आखिर इतना सद्ज्ञान लेकर करेंगे क्या? आखिर वे रह भी तो इसी समाज में रहे हैं। रोज की व्यवहारिकता से परे कोरे आदर्श की बातें बच्चों पर कोई छाप छोड़ने में असफल रह जाती और जो फिल्में बच्चों की प्रसन्नता और उनके मनोरंजन के नाम पर बनाई जा रही थीं, वे उससे जान छुड़ाने की कोशिश में लग जाती हैं। सत्येन बोस की बहुप्रशंसित फिल्म "जागृति" जिसे भारतीय बाल फिल्म के इतिहास में मील का पत्थर माना जाता रहा है, वह भी बाल दर्शकों को सिद्धांतों और नैतिकता का उपदेश ही दे पाई। "जागृति" का केंद्रीय तथ्य ही बच्चे पर पांडित्यपूर्ण शैली में आचरण की बाध्यताएँ लागू करने पर जोर देता है, जिसका पालन उसे अवश्यमेव करना चाहिए। यह "अवश्यमेव" बच्चों को इस तरह की फिल्मों से दूर ले जाता रहा।
बाल फिल्मों से कायम होती बच्चों की दूरी उसे वयस्क या बड़ों के सिनेमा की ओर आकर्षित करती है। अपने बालपन की दुनिया से परे बड़ों की रंग-रंगीली दुनिया उनके अबोध मस्तिष्क को ज्यादा आकर्षक भी लगती है। आश्चर्य नहीं कि आज किसी बच्चे की पसंदीदा फिल्मों की सूची में न तो कोई बाल फिल्म होती है, न ही कोई बाल कलाकार और न ही कोई बाल गीत। होता है बस "इश्क वाला लव" जिसका शायद मतलब भी उन्हें नहीं पता, लेकिन इन गीतों को गाते हुए उनके भावों को देखकर कतई आप नहीं मान सकते इन शब्दों के अर्थ से ये मासूम महरूम हैं। बड़ों की मनोरंजन फिल्में हमें कतई निर्दोष लग सकती हैं लेकिन हम भूल जाते है कि ये "निर्दोष" एक परिपक्व मस्तिष्क के लिए है। निष्कलुष बाल मन के लिए इन फिल्मों से अच्छे-बुरे को अलग कर पाना मुश्किल होता है, वे सब कुछ यथावत स्वीकार करते हैं, हिंसा भी, सेक्स भी, प्रेम भी, अपराध भी। और इन सबकी अभिव्यक्ति में इन्हें जरा भी हिचक नहीं होती क्योंकि वे परदे की छाया को सच मानकर चलते हैं।
वे दिन गए जब घरों में बच्चे सिनेमा देखने के लिए डाँट सुना करते थे। सच यही है कि सिनेमा आज हमारी दिनचर्या में अनिवार्य रूप से शामिल है। जिस तरह वयस्कों की इंटरनेट साइट से बच्चों को बचाने की कोशिशें आज हमारी प्राथमिकता में शामिल हो गई है, उसी तरह दिन ब दिन वयस्क और हिंसक होते जा रहे हिंदी सिनेमा के भी खतरों को हमें महसूस करना होगा और महसूस करना होगा हिंदी में "चिल्ड्रेन ऑफ हेवन" की जरूरत। आखिर कहीं न कहीं हम ही तो दोषी हैं कि "स्वामी" जैसी फिल्म दोबारा बनाने की हिम्मत कोई फिल्मकार नहीं जुटा पाते। आज बच्चों के नाम पर- हनुमान, गणेश, घटोत्कच जैसे चरित्रों पर फिर से फिल्में बन रही हैं, फिर से का अर्थ कि भारत में सिनेमा की नींव ही इन्हीं विषयों पर रखी गई थी। दादा साहब फाल्के के बनाए 125 फिल्मों के दायरे से शायद ही कोई पुराण कथा बची हो। कतई आश्चर्य नहीं कि बच्चों के लिए विषय की तलाश होती है तो 100 साल पीछे लौटना पड़ता है। स्वाभाविक है बच्चे इन्हें स्वीकार ही नहीं कर पाते। वास्तव में हमारे जल्दी-जल्दी बड़े होते बच्चे के लिए जरूरी है कि कुछ फिल्में ऐसी बनें जिनमें "वे" भी दिखें, उनकी संवेदना भी उनकी कमजोरियाँ भी।
भारतीय सिनेमा में बच्चों की फिल्मों की बात के अंत में "चिल्लर पार्टी", "स्टेनली का डब्बा", "आइ एम कलाम", "गट्टू" जैसी बच्चों से बच्चों की भाषा में संवाद करती कुछ फिल्में आईं, लेकिन हरेक वर्ष 800 से भी ज्यादा फिल्में बनाने वाले मुल्क में यह संतोष के लिए भी काफी नहीं हो सकती। वास्तव मे बाल सिनेमा के नाम पर कुछ फिल्मों का बनना काफी नहीं है, जरूरी है ऐसी फिल्मों का लगातार बनना जो बच्चों का बड़ों के सिनेमा से मोहभंग कर सकें, जैसा "डोरेमोन" और "सिनचैन" जैसे जापानी कार्टूनों ने किया है। यदि हम भविष्य के लिए चिंतित है तो हमें बच्चों के लिए चिंतित होना होगा और यदि बच्चों के लिए चिंतित है तो हमें बाल सिनेमा के लिए चिंतित होना होगा।

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