ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
प्रणय-ब्रह्माण्ड गर्भ की उतरन
CATEGORY : कविता 01-May-2018 07:02 PM 847
प्रणय-ब्रह्माण्ड गर्भ की उतरन

प्रणय-ब्रह्माण्ड
प्रणय
देह का ब्रह्माण्ड है
साँसों की आँखें
स्पर्श करती हैं
प्रणय का
अंतरंग कोना
जहाँ
निनादित है -
अनहद नाद

देह
प्रेम का शब्द है
विदेह प्रणय की
सुकोमल देह
अनंग पुष्प की
साकार सुगंध।

गर्भ की उतरन
स्त्री
जीवन में उठाती है - इतने दुःख
कि माँ होकर भी
नहीं महसूस कर पाती है -
माँ होने और बनने तक का सुख

स्त्री
होती है - सिर्फ कैनवास
जिस पर
धीरे-धीरे मनुष्य रच रहा है
घिनौनी दुनिया
जैसे - स्त्री भी हो कोई
पृथ्वी का हिस्सा
मनुष्य से इतर

स्त्री
झेलती है - जीवन में
इतने अपमान
कि भूल जाती है - आत्म सम्मान

स्त्री
अपने को धोती रहती है - सदैव
अपने ही आँसुओं से
जैसे - वह हो कोई
एक मैला-कुचैला कपड़ा
किसी स्त्री-देह के गर्भ की उतरन।

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