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प्रार्थना की भाषा का रंग
01-Feb-2018 09:28 AM 2013     

नीचे वह प्रार्थना दी गई है जिसे 1964 से सभी केंद्रीय विद्यालयों में गाया जा रहा है। इसे लेकर विनायक शाह नामक वकील ने याचिका दायर की है कि हिंदी और संस्कृत की इस प्रार्थना के माध्यम से एक ख़ास धर्म का प्रचार किया जा रहा है। मूल रूप से यह एक आर्य समाजी भजन है। जिसमें "भक्ति" के स्थान पर कुछ सोच-समझकर ही "विद्या" किया गया था।
दया कर दान विद्या का हमें परमात्मा देना
दया करना हमारी आत्मा में शुद्धता देना
हमारे ध्यान में आओ प्रभु आँखों में बस जाओ
अँधेरे दिल में आकर के प्रभु ज्योति जगा देना
बहा दो प्रेम की गंगा दिलों में प्रेम का सागर
हमें आपस में मिल-जुल कर प्रभु रहना सिखा देना
हमारा धर्म हो सेवा हमारा कर्म हो सेवा
सदा ईमान हो सेवा व सेवक जन बना देना
वतन के वास्ते जीना वतन के वास्ते मरना
वतन पर जाँ फिदा करना प्रभु हमको सिखा देना
दया कर दान विद्या का हमें परमात्मा देना।
केंद्रीय विद्यालय, भारत की केंद्र सरकार की सर्व समावेशी राष्ट्रीय शिक्षा नीति के अनुसार प्रारंभ किए गए विद्यालय हैं। पूरे देश में स्थानांतरित होने वाले केंद्र सरकार के कर्मचारी, विशेष रूप से रक्षा सेवा में नियुक्त लोग, देश के किसी भी भाग में तैनात कर दिए जा सकते हैं। शिक्षा राज्य का मामला है। इसलिए विभिन्न राज्यों के पाठ्यक्रम और शिक्षा के माध्यम अलग-अलग हो सकते हैं। ऐसी स्थिति में ऐसे कर्मचारियों के उनके साथ रहने वाले बच्चों की शिक्षा प्रभावित होती थी। इसलिए ऐसे विद्यालयों की स्थापना की गई जिनका पाठ्यक्रम, पुस्तकें, ड्रेस आदि सब एक हों। ऐसे विद्यालय सबसे पहले सेना की छावनियों, फिर केंद्र सरकार के उपक्रमों में, उच्च अध्ययन केन्द्रों में शुरू किए गए। इनके लिए पाठ्यक्रम एनसीईआरटी ने बनाया और परीक्षा एजेंसी बना केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड, दिल्ली।
इन विद्यालयों ने शिक्षा के क्षेत्र में कई कीर्तिमान स्थापित किए और अत्यंत संतुलित व्यक्तित्त्व और राष्ट्रीय सोच वाले युवा देश को दिए। मैं केंद्रीय विद्यालय से सेवानिवृत्त अध्यापक हूँ। मैंने इन विद्यालयों में कभी संकीर्ण क्षेत्रीयता और भाषाई विभेद नहीं देखा।
दुनिया में धर्म और राजनीति की दुरभिसंधि प्राचीनकाल से रही है जो बहुत से अनावश्यक युद्धों और अत्याचारों का कारण बनी। आज भी राजनीतिक स्वार्थ सिद्धि के लिए इतिहास, संस्कृति, क्षेत्रीयता, धर्म की आड़ में जनता को बाँटने और लड़ाने का काम किया जा रहा है।
धर्म यदि किसी दर्शन के तहत मनुष्य के आचरण और नैतिकता के विकास में योग देता है तो वह मानव धर्म है। उसे कोई विशेष नाम देने से कोई फर्क नहीं पड़ता। लेकिन यदि अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिए इसकी आड़ में लोगों में विभेद फैलाया जाए तो वह बहुत खतरनाक हो जाता है। महात्मा गाँधी कहते थे कि सभी अपने-अपने धर्म के अनुसार अच्छे व्यक्ति बनें। मुसलमान अच्छा मुसलमान बने, हिन्दू अच्छा हिन्दू बने। सभी धर्म मनुष्य को एक अच्छा मनुष्य बनाने के लिए ही हैं। लेकिन जब धर्म के बाहरी चिह्न लोगों में विभेद फैलाने के काम आने लग जाएँ तो वे त्याज्य हो जाते हैं।
धर्म एक दर्शन ही है जो मनुष्य-मनुष्य में भेद नहीं करता, बल्कि वह मनुष्य क्या, जीवमात्र में छुपी एकता को तलाशता है और हमें सबके प्रति संवेदनशील और मैत्रीपूर्ण बनता है। अनुशासित और नैतिक बनाता है। यदि सभी धर्मों का मूल विचार समझें तो पता चलेगा कि वह एक ही है। सभी धर्म कहते हैं कि ईश्वर एक हैं, सर्वव्यापी, सर्वशक्तिमान है, पक्षपात रहित है, सभी उसी के रूप हैं, उसी की सृष्टि हैं।
ऐसे विचारों में क्या कहीं भेदभाव है? लेकिन वे लोग जो ईश्वर को अलग-अलग बताते हैं, उसे कोई खास भाषा, कर्मकांड, ड्रेस या स्थान से जोड़ते हैं वे चालाक हैं। दुनिया में बहुत से दर्शन हैं लेकिन वे किसी व्यक्ति या समाज के विरुद्ध नहीं हैं। वे तो जीव का इस सृष्टि से संबंध समझने के प्रयास हैं। यह संबंध यही है कि इस सृष्टि से सभी संसाधनों पर सभी जीवों का अधिकार है, सबको जीवन का अधिकार है, सबको अपना-अपना स्पेस (आकाश) चाहिए।
विभिन्न धर्मों की कुर्सियों पर बैठे और धर्म के नाम पर सत्ताधारियों से बंदरबांट करने वाले न तो दार्शनिक हैं, और न ही धर्म के दर्शन को अपने अनुयायियों को समझने देना चाहते हैं। भाषाओं की भिन्नता के कारण हम दर्शनों या धर्मों को भिन्न समझने लग जाते हैं। यदि सभी धर्मों के मूल दर्शन का उसके अनुयायियों और सामान्य जन के लिए सरल भाषा में अनुवाद कर दिया जाए तो पता चलेगा कि सभी धर्म और दर्शन एक हैं, इस संसार की बेहतरी के लिए हैं और उनमें कोई झगड़ा नहीं है।
अमरीका के प्रारंभिक प्रवासी धर्म के सताए और धार्मिक स्वतंत्रता के आकांक्षी लोग थे। इसलिए उन्होंने यथासंभव दर्शनविहीन, अधिनायकवादी धर्म से बचने की कोशिश की। इस सन्दर्भ में मैं अमरीका के एक स्कूल का संस्मरण उद्धृत करना चाहता हूँ। बात सन् 2000 की है। तब 9-11 वाला कांड नहीं हुआ था। तब दुनिया धर्म के आधार पर इतनी विभाजित नहीं थी।
अध्यापक होने के कारण मेरी अमरीका के स्कूलों को देखने की इच्छा थी। मैं ओहायो राज्य के सोलन कस्बे के एक स्कूल में गया। उन दिनों स्कूलों में गर्मियों की छुट्टियाँ थीं। कुछ अध्यापक और प्राचार्य स्कूल में मिले जिनमें कुछ स्कूल के अगले सत्र की तैयारी में व्यस्त थे और कुछ ग्रीष्मावकाश में विद्यार्थियों को विभिन्न पाठ्येतर गतिविधियों जैसे तैराकी, पेंटिंग, नृत्य आदि में सहयोग कर रहे थे।
मैंने उस विद्यालय के प्राचार्य से मिलने का समय लिया। उन्होंने मुझे पर्याप्त समय दिया, मेरी जिज्ञासाओं को सुना, उत्तर दिए। जिसके अनुसार मैंने जाना कि स्कूल में किसी प्रकार की कोई विशेष ड्रेस का विधान नहीं है। विद्यालय में किसी धर्म की कोई प्रार्थना नहीं होती। किसी प्रकार के धार्मिक चिह्न का प्रदर्शन नहीं होता। स्कूल में किसी प्रकार की धार्मिक गतिविधि नहीं होती।
9-11 की घटना के बाद तो अमरीका धर्म, विशेष रूप से इस्लाम को लेकर संवेदनशील नहीं बल्कि भयभीत हो गया है। विगत दिनों एक समाचार पढ़ने को मिला कि टेक्सास के पियरलैंड में छह साल के एक बच्चे के कक्षा में "अल्लाह" बोलने पर अध्यापक ने पुलिस बुला ली। इंगलैंड के एक स्कूल में हिजाब न हटाने पर एक बच्ची को खाना नहीं दिया गया। कई सिक्खों पर उन्हें मुसलमान समझकर हमला किया गया। यह अति का एक सिरा है।
इसी अति का एक सिरा यह भी है कि केंद्रीय विद्यालयों की प्रार्थना का अर्थ समझे बिना मात्र संस्कृत और हिंदी भाषा से होने के कारण उसे धार्मिक मान लिया गया है। भाषा कोई धर्म नहीं होती। लेकिन ऐसे समय में जब गाय हिन्दू और बकरी मुसलमान है, भगवा या केसरिया रंग हिन्दू और हरा रंग मुसलमान है, मिस्वाक मुसलमान और तुलसी हिन्दू है तो फिर इस प्रार्थना पर सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर करने की अहमन्यता कोई आश्चर्यजनक नहीं है।
अमरीका में मैंने स्कूल के प्रधानाचार्य से पूछा- आप अपने यहाँ प्रार्थना क्यों नहीं करवाते?
उनका मानना था कि कोई भी प्रार्थना किसी न किसी धर्म से संबंधित तो होगी ही।
स्वतंत्रता से पहले हम रामनरेश त्रिपाठी लिखित - "हे प्रभो आनंददाता, ज्ञान हमको दीजिए" गाया करते थे। इसके बाद रवीन्द्रनाथ ठाकुर के एक बांग्ला गीत का हिंदी अनुवाद गाया करते थे जो इस प्रकार था- "भगवन यही है विनती मानव मुझे बना दो। / टालें अनेक विपदा यह माँगता नहीं मैं / दृढ शक्ति भर दो मुझमें सहना मुझे सिखा दो।" आदि-आदि।
हालाँकि मैं उस समय केंद्रीय विद्यालय में ही था लेकिन मुझे उस समय केन्द्रीय विद्यालय वाली प्रार्थना याद नहीं आई। मैंने उन्हें ये दो प्रार्थनाएँ अर्थ सहित सुनाईं और बताया कि प्रार्थना किसी धर्म विशेष की न होकर, सबके कल्याण की कामना के रूप में भी हो सकती हैं। क्या इसमें आप कोई धर्म विशेष ढूँढ़ सकते हैं? वे मुझसे सहमत तो थे लेकिन स्कूल के नियमों में कुछ परिवर्तन करना उनके वश में नहीं था।
केंद्रीय विद्यालय की प्रार्थना में जो संस्कृत मन्त्र हैं उन्हें व्हाईट हाउस, अमरीकी सीनेट और संयुक्त राष्ट्र संघ में भी गाया गया लेकिन उन्हें इनमें कहीं कोई धार्मिक कट्टरता या प्रचार नज़र नहीं आया। इनमें तो ज्ञान, सबके साथ, सहयोग, उन्नति की कामना की गई है। सबके कल्याण की कामना यदि धर्म का प्रचार है तो इस प्रचार को होना चाहिए। इसी धर्म की तो धार्मिक आडम्बरों और कर्मकांडों से परेशान इस दुनिया को आवश्यकता है।
यदि किसी अन्य भाषा में कोई और इसके तरह की सकारात्मक प्रार्थना है तो उसे भी गाने में कोई बुराई नहीं है, लेकिन मात्र संस्कृत या हिंदी से इसे किसी धर्म विशेष से जोड़ देना या तो अज्ञान है या फिर चालाकीष दोनों ही बातें उचित नहीं हैं। आजकल चर्चा में आने के लिए जहाँ कई नेता लोग बचकाने वक्तव्य दे रहे हैं वहाँ यदि केंद्रीय विद्यालय का कोई पूर्व छात्र ऐसा बचपना करता है तो वह स्वीकार्य नहीं। हाँ, क्षम्य ज़रूर है।
धर्म की आड़ में अंधविश्वास, कट्टरता और विद्वेष फैलाना अनुचित और दंडनीय होना चाहिए। ज्ञान और विद्या के केन्द्रों को राजनीति और स्वार्थ का अड्डा नहीं बनने दिया जाना चाहिए। वे स्वस्थ संवाद और उदार चिंतन के केंद्र बनें, इसी में मानवता का विकास और भला है।
प्रार्थना के कोई रंग, भाषा, पार्टी नहीं होते। उसका तो मुखर होना भी आवश्यक नहीं है। यह बात और है कि मन की भाषा से दूर जाते हुए मनुष्य को अपनी प्रार्थना के लिए मुखर भाषा, लाउडस्पीकर, प्रतीकों और तामझाम की ज़रूरत पड़ती है। वैसे क्या किसी उच्चरित भाषा के बिना जीवों का आपस में संवाद नहीं होता?
प्रार्थना तो विगलित मन की मौन प्रणति है।

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