btn_subscribeCC_LG.gif btn_buynowCC_LG.gif

पॉकेट में क्या रखा है!
01-Dec-2017 06:44 PM 2491     

जबसे सुना हूँ कि पॉकेट में क्या रखा है, सब कुछ तो ब्रीफ़केस में है भाई! तबसे मेरा ध्यान बरबस पॉकेट पर ही जाता रहता है; क्योंकि "ब्रीफ़केस" तो हम लोगों के वश की बात है नहीं। जब भी कपड़ा बदलता हूँ या पहनता हूँ, पॉकेट देखना नहीं भूलता, उसमें कुछ न कुछ चीजें रखता ही हूँ। चाहे रूमाल हो, चाहे मोबाइल हो, चाहे पर्स हो, चाहे वॉलेट हो, चाहे खुले हों, चाहे रेचकी हों, चाहे कुछ ज़रूरी कागज़-पत्र ही हों, कुछ न कुछ तो रहता ही है। जब घर जाता हूँ तो पॉकेट को देखना तो भूलता ही नहीं, उसमें रखी चीजोंं को गिनता भी हूँ ताकि बाथरूम जाने पर उसमें से कुछ निकल न जाए और निकल कैसे जाता है यह आप सब जानते ही हैं, इसे बताने व समझाने की जरूरत नहीं है। यह तो घर का प्रतिदिन का दैनिक कर्म जो होता है।
पॉकेट का महत्व देखिए। एक तो भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू थे जो अपने पॉकेट में गुलाब का फूल लगाते थे। इतिहास में भी बहुत से ऐसे महापुरुष हुए हैं जो पॉकेट में अपने-अपने हिसाब से कुछ न कुछ रखते थे या लगाते थे। हिटलर को ही देखिए, स्वास्तिक का चिह्न लगाते थे। पुराने जमाने के लोगों के पॉकेटों में कहीं कौड़ियाँ होती थीं तो कहीं मोहरें होती थीं और आज तो भाई बात मत करिए-- पॉकेट में कुछ नहीं होता! युवाओं के पॉकेटों पर नज़र दौड़ाएँ तो उनकी जेबें तो खाली ही होती हैं। एक कलम भी नहीं रखते वे। उनका तो सब कुछ लैपटाप या मोबाइल में होता है।
यह दूसरी बात है कि वे जब बैंक या रेलवे कार्यालय जाते हैं तो लिखने के लिए किसी दूसरे से कलम मांगते हैं। हमारे एक साथी जिनका नाम गुलाब से ही है, युवाओं पर बिफर पड़ते हैंं ंससुरा! ये आज के युवक। एक कलम तक नहीं रखते, अखबार तक नहीं पढ़ते...। उन्हें क्या पता कि आज के युवक अंदर ही अंदर कितना कुछ और क्या-क्या पढ़ लेते हैं। भाई! सवाल तो पॉकेट का है और जब से यह कहा गया है कि हर पॉकेट में पंद्रह-पंद्रह लाख रुपये आएंगे तब से पॉकेट का महत्व तो बढ़ना ही था और यही कारण है कि जनता हर बार अपना पॉकेट टटोलती नज़र आती है! पॉकेट को जेब या थैली भी कहा जाता है। कुछ तो अपनी थैलियाँ देखते रहते हैं कि पता नहीं कब उससे कुछ घट न जाए! जनता तो जनता, हमारे नेता भी पॉकेटों को संभाल कर रखते हैं। कुछ तो अपना हाथ ही नहीं निकालते कुर्ते के पॉकेट से या हो सकता है कि वह हर बार यह सोच कर डालते रहते हैं कि हो सकता है कि अब तक उसमें डाला गया कुछ आ गया होगा!
भाई! पॉकेट की महिमा अपरंपार है। पॉकेट के साथ पैकेट जो जुड़ा है। पैकेट कहते ही कितनों के मुखारविंद खिल उठते हैं। पॉकेट में क्या रखा है! भाई, पॉकेट में बहुत कुछ रखा है। कोई व्यक्ति अगर अपने फुलपैंट के दोनों पॉकेट बाहर करके खड़ा हो जाता है और उसका फोटो खींचवाता है तो उसे इस भय की आशंका हमेशा रहती है कि उसे कहीं दिवाला तो नहीं घोषित किया जा रहा है! अर्थात उसके पॉकेट उल्टे हैं, बाहर किए हुए हैं यानी उसके पास पैसे नहीं हैं। पॉकेट खाली होने पर पॉकेट सुर्खियां पाता है, भर्ती होने पर भी वह सुर्खियां पाता है। यही तो है पॉकेट की महिमा! लेकिन एक बात तो तय है कि अपना पॉकेट खाली कभी नहीं रखिए। घर से बाहर निकलते हुए तो कभी भी नहीं। कभी आप बस भाड़े के लिए अटक सकते हैं तो कभी आप मेट्रो किराये के लिए, खासकर उस घड़ी जब आपके मेट्रो स्मार्ट कार्ड में बैलेंस नहीं होता हो और कभी पॉकेट में एटीएम डेबिट कार्ड न हो या फिर एटीएम मशीन खराब हो या फिर खाते में शेष ही न हो या फिर कार्ड की तिथि ही वैध न हो या उसकी वैधता समाप्त हो रही हो। कभी ऐसा भी हो सकता कि आप कार्ड से मेट्रो स्टेशन में प्रवेश तो पा जाते हैं लेकिन बाहर निकलते ही रोक दिए जाते हैं; क्योंकि कार्ड में शेष नहीं रह गया होता है और उस स्थिति में जब पॉकेट में कुछ भी न हो तो स्थिति विचित्र हो जाती है! कई बार तो लोग ऑटो रिक्शा के भाड़े की कुरबानी करते हैं और घर तक क्या, घर के द्वार तक कभी प्रेम करते, कभी घिघियाते तो कभी रोब दिखाते ले जाते हैं तथा घर जाकर पत्नी से भाड़ा मांगकर चुकाते हैं और यह कहकर अपनी इज्ज़त बचाते हैं कि पॉकेट में खुले नहीं थे...मोदी जी ने दो-दो हज़ार का निकाल दिया है...अभी-अभी एटीएम से ससुरा यही निकला था...!
पॉकेट भी कई प्रकार के होते हैं। कुछ पॉकेट अपने देसीपन में सपाट होते हैं तो कुछ अपने नएपन में उभरे, कुछ पॉकेट आयताकार होते हैं तो कुछ गोल, कुछ पॉकेट कागज़ के जहाज़ की तरह मुंह बनाए पोशाक के बगल में होते हैं तो कुछ विभिन्न शैलियों में आकर्षित करते उर-प्रदेश में, कुछ पॉकेट छोटे होते हैं तो कुछ बड़े, कुछ पॉकेट आड़े-तिरछे नुकीले चमकदार होते हैं तो कुछ बटन लगे का बहम पालते सादे, कुछ पॉकेट अंदर की तरफ होते हैं ऊपर वाले पॉकेट से दबे व सताए हुए, कुछ तो चुपके पॉकेट की श्रेणी में आते हैं जो बिलकुल छिपे होते हैं।
और तो और इसके रहने के स्थान भी कई होते हैं। कहीं यह कुर्ता में स्थान बनाता है तो कहीं यह पायजामे में; कहीं यह कमीज़ में तो कहीं यह पैंट या फुलपैंट में; कहीं यह कोर्ट में तो कहीं यह पतलून में; कहीं यह गंजी (बनियान) में तो कहीं यह अंडरवियर में; कहीं यह ब्लाउज में तो कहीं यह अंगवस्त्रों में। जेबों के निवास-स्थानों की भरमार है साहब। कइयों के कुर्ते की जेब ऐसी होती है कि वह पायजामा की जेब तक आसानी से चली जाती है और ऊपर की जेब खाली की खाली ही रहती है।
पॉकेट में क्या रखा है! भाई, फिर कहता हूँ कि पॉकेट में बहुत कुछ रखा है। पॉकेट है तो पैकेट है, पैकेट है तो दौलत है, दौलत है तो शोहरत है, शोहरत है तो रुतबा है, रुतबा है तो नाम है, नाम है तो पॉकेट है। फिर भी इतना तो कहना ही पड़ेगा कि जी हाँ, पॉकेट में हाथ डाले आप साक्षात्कार न दें, कंप्यूटर-प्रस्तुति न दें, शिष्टाचार-मिलन न करें; क्योंकि इसे अशिष्टता की निशानी समझा जाता है लेकिन राजनीति में यह चलता है; क्योंकि राजनीति में तो बहुत कुछ चलता है। इसका महत्व तो तब और भी बढ़ जाता है जब समाचार-चैनल भी इसे समाचारों में बार-बार चलाते रहते हैं; और ऐसे ही चलने तथा चलाने में आप पूछेंगे कि पॉकेट में क्या रखा है तो जवाब होगा हाथ ही रखा है भाई, "थाह" नहीं, हा, हा, हा।

QUICKENQUIRY
Related & Similar Links
Copyright © 2016 - All Rights Reserved - Garbhanal - Version 19.09.26 Yellow Loop SysNano Infotech Structured Data Test ^