ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
जुगलबंदी सम्मलेन में कवि
01-Sep-2018 08:28 PM 312     

जुगाडू कवि दूर समुद्र पार जुगलबंदी भाषा सम्मेलन में पहुँच गए। हर सरकार में हलवा पूरी जीमने का उनका अधिकार है, वे हर सरकार में सत्ता के गलियारे में कूदते-फांदते रहते हैं और कोई न कोई जुगाड़ बिठा ही लेते हैं। जरूरत पड़ने पर विरोधियों का भी विरोध कर लेते हैं।
एक ने पूछा - आप हर सरकार में कैसे घुस जाते हैं?
जवाब मिला - विद्वान सर्वत्र पूज्यते।
वापस उत्तर मिला - चमचा सर्वत्र विजयते।
इस बार कवि जी के साथ कविप्रिया, साली जी, साढू जी, बच्चे भी साथ-साथ हैं। पूरा खानदान पिकनिक मनाने आया हैं। एक ही भवन से कई लोग आ गये हैं। सरकारी जुगलबंदी भाषा सम्मेलन तो बहाना है। सम्मेलन के कार्यक्रमों की ऐसी की तैसी, चलो समुद्र के किनारे, पेड़ों की छाँव तले, ऐसा रोमांटिक मज़ा, वो भी सरकारी खर्चे से। हिंदी भाषा कहीं भागी नहीं जा रही है। आज नहीं तो कल हिंदी का उद्धार हो ही जायेगा। यह महान भाषा इन जुगाडू कवियों के भरोसे नहीं है।
कवि सपरिवार समुद्र में नहा रहा है, अपनी गंदगी धो रहा है। प्रदूषण फैला रहा है। समुद्र भी शरमा रहा है। कविप्रिया फोटो खींच कर फेसबुक, वॉट्सअप पर लगाने में व्यस्त है। चित्रकला का भी आनंद लिया जा रहा है। जो छडे गए हैं, वे मौज-मस्ती की तलाश में हैं। बॉर कहाँ हैं, कैबरे किधर होता है। नाइट लाइफ का मज़ा किधर मिलेगा?
झपक लाल के साहित्य में सांस्कृतिक अनुशीलन के नाम पर झपक लाल को महान साहित्यकार बताने के लिए होड़ मची हुयी है ताकि अगली किताब छापी जा सके। सचमुच मौज हो गयी है। पूरे कार्यक्रम में हिंदी के तकनीक विकास पर कोई बात नहीं, बिना तकनीक के हिंदी कैसे आगे बढ़ेगी? कौन बताये सब व्यस्त, सेशनों में कुर्सियां खाली पड़ी रहीं। लोक कला आहें भरती रहीं।
दुखी कवि ने आगे बताया- मैंने पलटी मारी और इस बार दरबार में घुस गया। मगर वहां तो बड़े-बड़े राजकवि शीश झुकाकर चरण वंदना, चारनीय वंदना कर रहे थे। फ़िल्मी गीतकार भी बाजा बजा रहे थे। मुझे कौन पूछता। कविता का कोई महत्त्व नहीं था। महत्व इस बात का था कि राजा आपसे क्या चाहता है? राजा के चाटुकार आपको सही राह दिखा सकते हैं। यहाँ भी मेरी दाल नहीं गली। मैं फिर पल्टी मारने की सोचने लगा। इस बार मैंने एक ऐसी संस्था पकड़ी जिसके मालिक वयोवृद्ध थे। कभी भी नित्यलीला में लीन हो सकते थे। मैंने सोचा ये ठीक रहेंगे। अगर यहाँ जुगत लग गई तो संस्था पर मेरा कब्ज़ा हो जायेगा। लेकिन भाग्य ने यहाँ भी मेरा साथ नहीं दिया। काफी समय तक तो वे ही जिन्दा रहे और बाद में उनकी प्रेमिका ने संस्था और मुझे दबोच लिया। मैं खूब छटपटाया, मगर कुछ नहीं हुआ।
इससे दंश से उबरने के लिये मैंने फेसबुक पर पेज बनाया, किसी ने नहीं देखा। ट्विटर पर टीटीयाया, किसी ने ध्यान नहीं दिया। वॉट्सअप पर ग्रुप बनाया, पर नहीं चला। मेरी कविता उन पत्रिकाओं ने तक वापस कर दी जिनको मैंने चन्दा दिया था। अब मुझे भरोसा हो गया कि सबके सब मिले हुए हैं। मंच पर मेरी नौटंकी चली, मगर मैं नहीं चला।
मैंने साहित्य में गहरी डुबकी लगाने की सोची मगर डूब जाने का खतरा था। मैं तैरकर इस वैतरणी को पार करना चाहता था। लिहाजा मैंने दूर समुद्र पार जुगलबंदी भाषा सम्मेलन में शामिल होने की राह पकड़ ली। इसमें सफल हो गया, मानो जीवन सुधर गया।
गुजरे दौर में ऐसा ही एक सम्मेलन भारत के हृदय प्रदेश की राजधानी में हुआ था, लेकिन बिना जुगाड़ के एक प्रान्त का प्रतिनिधिमंडल अंदर नहीं घुस सका था। कोलंबस के खोजे देश में हुए ऐसे ही एक सम्मेलन में एक प्रान्त ने तो दो वैद्य भेज दिए थे। इस तरह उन्होंने असली अर्थों में हिंदी के दर्द को हकीमों के जरिये ठीक करने की ठानी थी। इस आयोजन में मेज़बान देश ने अपना कोई प्रतिनिधि मंडल नहीं भेजा और कथित तौर पर भाषण अंग्रेजी में दिया था। प्रायोजक सरकार की ओर से लम्बा-चौड़ा प्रतिनिधि मंडल गया था। हजारों लोग अपने खर्चे पर भी गए। पंजीकरण के सौ डॉलर या पांच हज़ार, फिर भी वे विचारे केवल श्रोता या दर्शक रहे आये। सब जानते हैं ऐसे सम्मेलनों में पत्र-पत्रिकाओं, किताबों की प्रदर्शनी कोई नहीं देखता।
जो सरकारी अफसर थे वे अंग्रेजी के द्वारा ही हावी रहे। विश्व में हिंदी का एक जैसा पाठ्यक्रम तक नहीं बना सके। यह उपलब्धि नहीं तो और क्या है? मुझे अमेरिका में बार-बार यही पूछा जाता रहा कि एक जैसा डिप्लोमा व एक जैसी हिंदी का डिग्री पाठ्यक्रम सरकार कब तक दे देगी? दक्षिण एशियाई भाषा विभागों में सबसे कमज़ोर हालत हिंदी की है। चीनी, जापानी भाषाओं के विभाग बहुत उन्नत हैं।
इसी तरह हिंदी के मास्टर जो विदेश पढ़ाने जाते हैं वे अपनी किताब और अनुवाद से आगे नहीं सोच पाते या अपनी चार लाइन सुना कर वापस आ जाते हैं। मगर हमारे कवि को इसकी क्या चिंता। वो तो सम्मेलन स्थल में इधर-उधर देख, चुपचाप खिसककर नीले समंदर में नहा रहा है। कविप्रिया तौलिया लिए खड़ी है। अहा! क्या अद्भुत दृश्य है। देवता आकाश से पुष्प वर्षा कर रहे हैं।
बाद में कविप्रिया के साथ शॉपिंग करनी है। डिनर में जाना है। मंत्रालय के अफसरों को सलाम करना है। मंत्री के साथ फोटो खिंचाना है। बहुत काम है। अगर जुगाड़ बैठ जाये तो अकादमी पुरस्कार भी झोली में डाल लेना है। बाकी के लोग तो यों ही स्यापा करते रहते हैं। ये तो नोबल पुरस्कार बंद हो गए नहीं तो इस टैक्स हेवन देश से ही नार्वे की टिकट कटा लेता, कवि ने मन ही मन सोचा।
जो खुद का खर्चा करके गए वे भी पर्यटन में व्यस्त हैं और उनका सोच जायज है। इस विधा के एक लेखक ने बताया - यार इस पैसे से दो किताबें छपा लेता, मगर ग्रुप में जाना पड़ा। इधर ग्रुप लीडर ने अपना आना-जाना फ्री कर लिया। जय हिंदी।
सम्मलेन की सार्थकता पर सवाल, सूची पर सवाल, केरल की बाढ़ के समय यह फ़िज़ूलखर्ची, अटलजी के निधन पर यह प्रोग्राम, सवाल ही सवाल। मगर सवाल पूछना खतरनाक है। जुगाडू कवि के नाराज़ होने का खतरा है। मगर इतिहास तो सवाल पूछेगा भाई!

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