ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
पिता और कवि
CATEGORY : विचार 08-Jul-2017 08:13 PM 1134
पिता और कवि

पिता अपनी एक कविता रचते हुए कहते हैं कि – बाँस की पोर ने मुझे पहना है और मेरे भीतर कोई अज्ञात अँगुलियाँ उसे छूती रहती हैं जैसे वे मुझमें कोई स्वर ढूँढ रही हों । उनका यह भाव जानकर लगता है कि पिता तो अनन्त काल से अपने से बाहर आकर कुछ कहना चाहते हैं, शायद कुछ कह भी रहे हैं। न जाने कौन-सा फूल खिलाना चाहते हैं। लगता है कि पिता की देह में फूलों के बीज छिपे हैं जिन्हें वे धरती की कोख में इस तरह छिपा देना चाहते हैं कि वे उसकी नमी और आँच पाकर खिल उठें। फूलों से उनकी कोई चाह नहीं है कि उन्हें माला में गूँथकर अपने गले में डाल लें, उन्हें सीने से लगा लें। बस वे तो उन्हें खिलता हुआ और फिर अपने वृन्त पर झरता हुआ देखना रहते हैं -- खिलते और पत्ता-पत्ता झरते जीवन पर उनकी बादल की-सी छाया भी पड़ती रहती है। पिता बार-बार मुऱझाते जीवन की व्यथा का भार उठाकर उस पर छाये रहते हैं, उसे सींचते रहते हैं।
लगता है कि पिता किसी अनन्त से चलकर मेरे पास आये हैं। वे मुझे जन्म देकर भी मेरे स्वभाव से इतने परे लगते हैं कि मैं उन्हें पूरी तरह पहचान ही नहीं पाता। लगता है वे मेरी देह और मन में तो बसे हैं पर पिता की ओर अँगुली उठाकर उनमें अपने आपको ढूँढना बहुत मुश्किल है। वे साथ रहते हुए भी ढूँढे नहीं मिलते। पर पिता कितनी भी दूर चले जायें, बार-बार उन्हीं के पास लौटने का मन होता है। पिता की तरफ से सोचो तो लगता है वे कभी सफल नहीं होंगे, उनका लगाया हुआ बाग मुरझाये बिना रहता ही नहीं। हमेशा पिता की विफलताओं को ओढ़कर ही जीवन काटना पड़ता है।
पृथ्वी पर पिता के कई रूप रचकर आजमाये गये हैं -- ईश्वर हों चाहे राजा, ज्ञानी हों चाहे भक्त, नेता हों चाहे महाजन और राष्ट्रपिता ही क्यों न हों -- वे कभी सफल नहीं हुए। पिता को दोष देना ही बेकार है, यह दुनिया सफल होने के लिए बनी ही नहीं। इसमें जन्म लेता और विदा लेता हुआ सारा जीवन सदा से साथ रहता आया है और आपस में एक-दूसरे को पालने-पोसने की जन्मजात कला को कभी नहीं भूलता -- वह तो अपने स्वराज्य में ही रह सकता है, उसे पिता के राज्य में रहना आता ही नहीं। अकेले पिता किसी को नहीं पाल सकते, उन पर किसी भी तरह की जिम्मेदारी डालना बेकार है पर दुनियावी आदमी ने पिता पर सबको पालने-पोसने, सजा देने और क्षमा करने की जिम्मेदारी डाल दी है और पिता खुद इससे बेखबर मालूम पड़ते हैं। पिता की इस बेखबरी के कारण उनके नाम पर आदमी के पालन-पोषण और मार्गदर्शन का व्यापार चल निकला है। सदियों पुराना यह व्यापार दुनिया को मिटा-मिटाकर आदमी के मन में कहीं बहुत दूर अकेले रह गये पिता के पास ले चलने की आशा जगाये हुए है क्योंकि आज तक किसी ने पिता को गौर से देखा ही नहीं है और पृथ्वी पर पिता के जो प्रतिरूप गढ़ लिए गये हैं, पिता का स्वरूप जाने बिना उन पर भरोसा किया नहीं जा सकता।
पिता अपने जैसा कुछ नहीं रच पाते, उनके होने से जो भी रच जाता है फिर वही अपने जैसा कुछ रचता रहता है और बार-बार उसी की कामना करता है, उसी को पाता है, उसी से बिछुड़ता है, दुखी होता है तो पिता को पुकारता है और जब उसे लगता है कि पिता नहीं सुनते तब जीवन खुद अपनी कविता रचने को अकुलाता है, कविता में पिता की कल्पना करता है और उनके स्वभाव को पहचानकर उन्हें जीवन में उतार लाने की विधि खोजता है।
ज्यादातर दर्शन तो पिता को संसार से बेदखल किये हुए हैं, कविता ही है जहाँ जीवन के रस में डूबे पिता संसार की सन्तान बनकर उसे साथ लिए चलने को आतुर हो उठते हैं और कवि ही उन्हें कविता में पाल-पोसकर बड़ा करता है। वह कविता में ही अनुभव करता है कि पिता नहीं, सन्तान ही पार उतारती है और पार उतरती है। कविता ही वह जगह है जहाँ पिता छोटे-छोटे अवतार लेकर बहुरूपों में उतरते दिखायी देने लगते हैं। जैसे जीवन में वैसे ही कविता में सबको जगह मिली हुई है, उनको भी जो जीवन को जीने योग्य बनाते हैं और उनको भी जो जीवन को मिटाते रहते हैं। कविता संसार को अपनाकर दोनों के जीवन को रचते हुए, मिटते-मिटते रचते चले जाने को भी रचती है। पिता की मृत्यु नहीं होती, वे सन्तानें जन्म लेती है जिनमें पिता बसे होते हैं।
लगता है कोई जगत पिता जरूर हैं जो अपार संसार की प्रकृति और उसके मन में किसी उत्प्रेरक की तरह समाये हुए हैं और उनकी मौजूदगी के बिना कोई रचना नहीं हो पाती। भले ही वे दिखायी न दें पर इस तरह प्रतीति में आते जरूर हैं कि अगर वे न होते तो यह संसार भी दिखायी न पड़ता। वे कवियों को भी उनके मन और प्रकृति के अनुरूप कविता रचने का निमित्त बना लेते होंगे। जिस तरह पिता जगत-रचना में निमित्तमात्र हैं, उसी तरह अपार काव्य संसार में कवि भी निमित्तमात्र प्रतीत होते हैं । पिता और कवि एक जैसे अनुभव में आते हैं जो संसार को कभी नहीं बदल पाते, वह तो अपने स्वभाव से ही जन्म लेता है पर वह दोनों के हुए बिना प्रतीति में नहीं आता।

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