ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
कागज़ के टुकड़े
01-Nov-2018 10:31 AM 131     

आज अंजना सफाई करने के मूड में थी। इतने कागज़ जाने कैसे इकट्ठे हो जाते हैं। इनमें से ढेरों तो ऐसे थे, जिन्हें वर्षों से, कभी देखने की, कोई आवश्यकता ही नहीं पड़ी। यहाँ तक कि वह यह भी भूल गई थी कि यह सब उसने संभाल के रखे हैं। ज़्यादातर तो किसी अवसर विशेष की सोच और तैयारी से ही सम्बन्ध रखते थे। उनको रखने का अब कोई प्रयोजन नहीं था। किसी बीते अवसर के विवरण ही उनमें थे। उनको पढ़कर उसने एक ओर रख दिए कि इन्हें अब फाड़कर फेंकने की बारी थी।
एक अलग बड़े से लिफ़ाफे में, उसकी कभी लिखी डायरी के छोटे-छोटे अंश थे। उनको पढ़कर वह मन ही मन मुस्कराने लगी कि किस प्रकार की बातों को, वह बड़ी उलझनें मानकर कितनी परेशान हो जाती थी। उस समय तो वह उलझनें जैसे उसके जीवन का अभिशाप बनकर उसके दिल-दिमाग को व्यस्त रखतीं थी।
एक और नीले रंग के लिफ़ाफे में उसकी कुछ छोटी-छोटी हस्तलिखित कवितायें थीं और साथ में थी एक और लिखाई में कुछ कवितायें। ऐसी कोई, बहुत उत्तम स्तर की कवितायें तो इन्हें नहीं कहा जा सकता था। कवितायें नीले रंग के कागज़ पर थीं और हस्तलिखित थीं। लिखाई बड़े-बड़े अक्षरों में थी। किसी का नाम उन पर नहीं लिखा था। उन्हें दोबारा देख कर, अंजना अतीत में पहुँच गई थी। अंजना को सच ही इसका ध्यान नहीं था कि यह सब अभी भी उसके कागज़ों सहेजकर रखी थीं। जाने कितने वर्षों से यह सहेजे रखी हैं?
अतीत में झाँकने से तो उसे मानना ही होगा, यह कुछ कागज़ के टुकड़े, अंजना के उस समय के जीवन का एक भाग थे। यह सब कैसे हुआ था, इस पर उसे अब भी आश्चर्य होता है।
किसी और को उन्हें दिखाने की तो कोई बात ही नहीं थी, न वर्षों पहले और न अब।
हाँ, कोई तीस वर्ष पहले इन कागज़ के टुकड़ों ने उसके जीवन में एक अनजानी-सी हलचल को जन्म दिया था। एक रहस्य जैसे मन के भीतर पनपता रहता।
जहाँ तक अंजना को स्मरण है, इस सबसे वह अप्रसन्न नहीं थी। कोई आपको ऐसा अहसास दे कि उसे आपका साथ प्रिय है और आपको लगे कि कहीं एक मानसिक धरातल पर आप कुछ सीख सकते हैं, तो इसमें अप्रिय लगने वाली तो कोई बात नहीं थी।
उसे ऐसे सम्बन्ध को बढ़ावा देने की तो न तो कोई आवश्यकता थी और न ही उसके भरे-पूरे जीवन में इसका कोई भी नैतिक स्थान था। पर यह सब इतने नामालूम से ढंग से हुआ था कि अब भी अंजना को सोच कर आश्चर्य होता है।
इन कागज़ के टुकड़ों में उन दिनों की बड़ी गहरी याद छुपी थी। पर जो इन पर लिखा था, उसे पढ़कर किसी को कुछ समझ आने वाला नहीं था। भिन्न विषयों पर हस्तलिखित कुछ कविताओं का भला क्या अर्थ हो सकता है? ज़्यादा से ज़्यादा, किसी का अनुमान, यही तो होगा, किसी और की -- संभवतः मित्र की कवितायें उसके कागजों में सम्मिलित हैं।
अंजना ने और कितने पुराने कागज़-पत्र रद्दी की टोकरी में फ़ेंक दिए थे तो फिर इनको रखने की क्या तुक थी? एक मोह उसे इन कागजों से जोड़े था। शायद उस मोह की अवधि भी अब समाप्त हो चुकी थी!
किशोरावस्था से ही, अंजना कागजों पर वह कुछ न कुछ लिखकर, किन्हीं ख़ास अवसरों को याद करने के लिए, संभालकर रख लेती। बरसों बाद, जब कभी दोबारा उन्हें फिर पढ़ती तो उसके मन में पुरानी बातें एकदम से तरोताज़ा हो जाती। लिखने का सहारा वह उस समय भी लेती जब किसी कारण उसका मन परेशान अथवा दुःखी होता। अपने विचार लिखकर व्यक्त करके मानो उसका मन हल्का हो जाता।
युवावस्था में उसका, कागज़ के पन्नों पर अपने उद्दगार लिखने का काम चलता रहा। इस तथ्य को तो अंजना ने बहुत देर के बाद, किसी पुस्तक में पढ़कर जाना कि यदि मन को शान्त करना हो तो उन्हें लिखित रूप देने से घबराहट और टेंशन, काफ़ी हद तक दूर अथवा कम हो जाती है। अंजना मन ही मन, यह पढ़कर प्रसन्न हुई थी। यह उसका पुराना आजमाया हुआ नुस्खा था।
शुरू में अपने लिखे कागजों को छुपाकर रखती, सबसे अपने मनस्थिति बाँटने की बात नहीं थी, छुपाने की बात थी। औरों के साथ तो वह अपने भेद, जैसे शेयर नहीं करना चाहती थी। किशोरावस्था से लिखे उसके पास ढेरों कागज़ के टुकड़े इकट्ठे हो गये थे। कभी-कभी इनमें से कुछ को वह फाड़ फेंकती और कुछ को सहेजकर रख लेती कि जब वह कहानी-कवितायें लिखेगी तो यह लिखे कागज़ संभवतः कुछ काम आएँ। उसका यह भय कि कोई दूसरा उन्हें पढ़कर उनका कोई गलत अर्थ न निकाल ले, ठीक नहीं निकला। कई बार उसे अपना कुछ लिखा, स्वयं ही समझ न आता। उसके लिखे पर किसी को कोई क्या सन्देह करने की आवश्यकता थी? उसका व्यवहार तो पहले जैसा ही रहा कुछ अच्छा लगता तो उसकी कुछ पंक्तियों भी लिख कर रख लेती।
विवाह के पहले भी और विवाह के पश्चात भी उसका लिखना चलता रहा। उसके साथ वह कुछ कवितायें भी लिखने लगी थी और कुछ आधी-अधूरी कहानियां भी उन कागज़ के टुकड़ों में शामिल हो गईं। पतिदेव को कभी कोई पंक्तियाँ पढ़ कर सुनायीं तो वह कहने लगे कि इन्हें छपवाती क्यों नहीं? उसे उन पर प्यार आ जाता। कितने सीधें हैं यह? ऐसी उलजलूल बातों को कौन छापता है? पर मन ही मन खुश भी हुई थी। कभी ऐसा हो भी तो सकता है?
मन में एक विचार तो था कि भविष्य में शायद कभी, कोई उसके लिखे में कोई अर्थ निकाल पाए, नहीं तो कुछ आनन्द ले पाए। हाँ वह इतना अवश्य सोचती कि जीवन में एक समय आयेगा, जब उसके इतना समय होगा कि वह अपने लेखक बनने के स्वप्न को मूर्त रूप दे पाएगी। बस अंजना का आंशिक रूप में पढ़ना-लिखना चलता रहा। लोग कभी पूछते कि वह खाली समय में क्या करना पसंद करती है। तब उसका यह उत्तर- कुछ लिखती पढ़ती रहती हूँ, काम आ जाता।
अंजना का विचार था कि संभवतः ऐसा करना सामान्य बात ही होगी क्योंकि पुस्तकें पढ़ना तो बहुत ही साधारण बात थी। उसे तो आश्चर्य होता यदि कभी कोई कहता कि उनके पास पुस्तकों के लिए समय नहीं रहता। यह तो सर्वविदित है कि अपने शौक के लिए, सब समय निकाल ही लेते हैं। आगे आने वाले समय में अंजना का शौक बहुत काम आया, क्योंकि उसे सदैव लगता कि उसके पास कुछ करने को है। और वह खोज-खोज कर अपनी पढ़ने की भूख को शान्त करने में लगी रहती। उसने अनुभव से यह भी सीख लिया था कि हर प्रकार की "कंपनी" में पुस्तकों की बात नहीं चलानी चाहिए। उसका ऐसा करना अपनी बड़ाई करना भी माना जा सकता है, अशोभनीय माना जा सकता है।
इसका एक परिणाम यह भी हुआ कि बाहरी जीवन के साथ-साथ उसके मन के भीतर भी कुछ चलता रहता। जिससे मन मस्तिष्क भरा-भरा सा रहता। न चाहते हुए भी यदि उसने कोई खूब आनन्ददायी चीज़ पढ़ी होती तो वह घर या बाहर वालों से, उसका वर्णन करने के लोभ का संवरण न कर पाती।
इसी सिलसिले में काम पर उसने डेविड, से जो उसका सहयोगी था --अपनी किसी हाल में पढ़ी पुस्तक का जिक्र किया था। उसके काम से सम्बंधित ही थी वह पुस्तक। डेविड ने उसे उसी विषय के बारे एक और पुस्तक सुझाई थी और बताया भी कि वह आफिस की लायब्रेरी में भी उपलब्ध थी। अंजना ने वह किताब मिलते ही पढ़ डाली और उसको कहा कि पुस्तक अच्छी थी पर फिर भी उसके कई प्रश्नों का उत्तर नहीं दे पाई। इस पर उसके साथ, विचारों का आदान-प्रदान काफ़ी देर तक चलता रहा। कई प्रकार की पुस्तकों के नाम लिए गये। मानो अंजना को अपने प्रिय विषय पर बोलने की खुली छूट मिल गई। साथ ही उसके नए काम के अंतर्गत अपनी स्थिति समझने अथवा सुधारने की नई राह खुल गई।
अपने काम से सम्बंधित और अन्य प्रिय विषय पर पढ़ी पुस्तकों का भी जिक्र अक्सर होता और अंजना को नये विषयों को पुस्तकों द्वारा जानने समझने के नित नए अवसर मिलने लगे। जीवन और अपने कार्य को समझने का एक अमूल्य अवसर उसे मिल गया। वह मन ही मन प्रसन्न भी होती कि उसका शौक उसके काम में सहायक हो रहा है।
और साथ ही डेविड के रूप में बैठे बिठाये उसे एक शिक्षक मिल गया था, जो उसके प्रश्नों से उकताता नहीं था। स्वयं भी उसके विचारों को जानना चाहता और अंजना की पृष्ठभूमि के बारे में उत्सुकता दर्शाता था। उसके बताने अथवा समझाने का ढंग बराबरी का था। अंजना को कभी भी ऐसा महसूस नहीं होता कि उसकी किसी विषय पर अज्ञानता का मज़ाक बनाया जा रहा है। इसके विपरीत उसे लगता कि डेविड उसकी प्रतिभा से प्रभावित होने की बात करता, सीधे साधे शब्दों में नहीं, अपने व्यवहार से उसकी बड़ाई करने का अवसर न खोता। अंजना सोचती यह सब तो ईश्वर कृपा है, नहीं तो नई जगह और काम पर पाँव जमाने में उसे जाने कितना समय लग जाता।
अंजना अपने घर परिवार में अत्यधिक व्यस्त रहती थी। वह फुलटाइम काम करती थी। उसका जीवन भरा-पूरा था। पुरुषों के साथ काम करने का अवसर उसे पहले भी मिल चुका था। और भले ही विवाह पूर्व उसका वास्ता घर से बाहर, पुरुषों से बहुत कम ही हुआ था, परन्तु उसके मध्यवर्गीय परिवार में कोई ऐसे प्रतिबन्ध नहीं थे। अपनी सीमाओं के अंतर्गत उसकी पृष्ठभूमि को किसी हद तक आधुनिक कहा जा सकता था।
और डेविड के साथ वह खुल कर हंस-बोल लेती थी। उसके साथ बातें करते हुए वह पूरी मान्यता से उसके विचारों का कभी खंडन भी करती। वह इस काम को वर्षों से करता आ रहा है, उसे अंजना से कहीं ज़्यादा ज्ञान होगा, यह तथ्य वह कभी-कभी भूल सी जाती। सच बात तो यह भी थी कि उसे अंजना के व्यवहार से कोई आपत्ति थी, इसका कोई आभास उसे न मिलता। एक-दूसरे के घर आने-जाने की बात तो नहीं थी क्योंकि मूल्यतः उनका सम्बन्ध आफिशियल ही था पर एक मित्र जैसा खुला। डेविड उम्र में कुछ बड़ा था, ऐसा देखने से लगता था। जहाँ तक उसे पता था विवाहित था क्योंकि कभी-कभी वह अपनी बेटी की बात करता था जो युनिवर्सिटी जाने वाली थी पर पढ़ने पर ज़्यादा ध्यान नहीं दे रही थी।
डेविड ने एक बार कविताओं की बात करते हुए कहा था कि वह भी लिखने का शौक रखता है और बरसों पहले उसकी कुछ कविताओं को किसी प्रतियोगिता में पुरस्कार भी मिला था। वह अब भी नियमित रूप से कुछ लिखने का प्रयत्न करता है। अंजना ने कहा था कि वह उसकी लिखी कुछ कविताओं को पढ़ना चाहेगी, यदि उसे इसमें कोई आपत्ति न हो। साथ ही उसके मुँह से यह भी निकल गया कि वह स्वयं भी कुछ लिखती है। हाँ मुझे कुछ ऐसा आभास हो गया था- डेविड का उत्तर था।
उस दिन घर आ कर, उसने अपने लिखे कुछ कागजों को फिर उलट-पुलट किया और सोचा कि बहुत दिनों से उसने कुछ नया नहीं लिखा था। अगर उसका मन शान्त रहता तो पढ़ती तो रहती पर लिखने की बारी कम ही आती। अपनी पहली लिखी चीज़ों को पढ़ते उसे फिर ध्यान आया कि कितनी बार उसका लिखा पृष्ठ एक प्रार्थना में बदल जाता। ऐसा लिखते-पढ़ते उसे सच ही शांति का आभास होता। उसने फिर एक दो पृष्ठ अपनी मन:स्थिति के बारे में लिख दिए और जैसा कि वह अन्त में करती थी, ईश्वर से मार्गदर्शन की कामना की और निश्चय किया कि और ज़्यादा लिखकर अपने लेखक बनने के सपने को फिर जगाने की कोशिश करेगी।
अंजना ने सोचा कि डेविड से इसके बारे में कुछ सहायता मांगना तो अच्छा नहीं होगा। यह तो उसके अपने हाथ में है। उसके पास कुछ लिखने लायक है भी अथवा नहीं। उसके पास उसे कागज़ पर उतारने के लिए शब्द हैं अथवा नहीं। डेविड का लिखा पढ़ने के लिए वह और भी उत्सुक हो उठी। उसने सोचा अगली बार एक बार फिर कह कर देखेगी। यह तो डेविड पर था कि वह अपना लिखा उसे दिखाना चाहता है या नहीं।
एक दो सप्ताह पश्चात डेविड ने उसे एक पत्रिका दी जिसमें उसकी दो, कवितायें छपी थीं। कविताओं का विषय प्रकृति की सुंदरता थी और एक किसी एतिहासिक विषय पर थी जो उसे पूरी समझ भी नहीं आई थी। उसने उनकी प्रशंसा तो औपचारिक रूप से की और सोचा कि वह कुछ और बोल कर अपनी अज्ञानता का परिचय न ही दे तो अच्छा होगा। पर बात यहीं पर समाप्त नहीं हुई।
जब डेविड ने भी --अंजना का कुछ लिखा देखने की इच्छा को व्यक्त किया तो वह काफ़ी देर तक टालती रही क्योंकि वास्तव में उसे अपना लिखा कुछ भी दिखाने में ढेरों संकोच था। उसका लिखा इतना निजी था, कि किसी बाहर वाले को अपनी निजी जीवन में प्रवेश जैसा था। अंजना काफ़ी असमंजस में घिरी थी, ऐसे ही उसने अपना मुँह खोल दिया। अब इस परेशानी से दूर भागना चाहती थी। डेविड ने इसके पश्चात फिर कभी इस बारे में कोई चर्चा नहीं की।
एक बार फिर डेविड ने, उसे पढ़ने के लिए कुछ दिया तो साथ ही कहा कि इसमें उसकी कुछ और कवितायें भी हैं। पढ़ने के बाद वह उसकी प्रतिक्रिया जानना चाहेगा। अंजना ने स्वयं को ऐसी स्थिति में पाया कि वह उसका धन्यवाद देने के सिवाय कुछ न कह पायी। वह कवितायें भी प्रकृति के बारे में ही थीं। एक कुछ निजी समस्या पर आधारित थी जो उसे पूरी तरह से समझ नहीं आई थी। वह सोचने लगी कि सिवाय इसके कहने के कि वह अच्छी हैं, वह भला और क्या कह सकती है? उसकी अधकचरी समझ में, उसे इससे अधिक कुछ भी कहना, उसकी हिमाकत होगी।
पर कुछ प्रतिक्रिया की रिचर्ड को अपेक्षा है तो उसे इसके बारे में कुछ सोचना विचारना पड़ेगा। आसान बात तो यह पूछना थी कि कवितायें वह क्या सोच कर लिखता है। लिखने की प्रेरणा उसे कैसे होती है? डेविड का उत्तर था कि जब वह स्वयं लिखती है तो इस प्रक्रिया से नावाकिफ़ तो वह नहीं है। साथ ही में यह भी कि लेखक अपने जीवन के अनुरूप कुछ लिखते हैं। कई तो बस अपना शौक पूरा करने के लिए। हाँ, जिनकी रोटी-रोज़ी इस पर निर्भर करती है, वह तो नियमित रूप से लिखते हैं, चाहे लिखने की प्रेरणा कहीं से भी लानी पड़े। अंजना को याद है कि इस बात पर वह दोनों खुल कर हँसे थे। कुछ लोग जो उनसे कुछ दूर बैठे थे उन्होंने कहा था, इतना अच्छा कोई मज़ाक है तो क्या बाकी लोगों से नहीं शेयर करोगे? वह दोनों, एकदम से चुप से हो गये थे और डेविड ने कहा था- यह हमारी आपसी बात है। आप को बताने में ज़रा समय लगेगा। फिर कभी सही।
अंजना ने कुछ समय के पश्चात अपनी लिखी, एक दो पुरानी, एक दो नई कवितायें रिचर्ड को पढ़ने को दीं और कहा कि अगर वह इनमें कोई सुधार बता सकता हो, उसे अवश्य कहे, क्योंकि वह जानती है, वह इस कला की अनाड़ी पात्र है। रिचर्ड ने उसकी बात को गंभीरता से लेते हुए, पढ़ने के पश्चात कुछ टिप्पणियाँ लिख कर दी थीं और कहा कि है तो वह स्वयं भी अनाड़ी ही। अंजना भी उसके लिखे पर सुझाव देगी तो उसे कोई आपत्ति न होगी।
कहते हैं न कि यदि आपको कोई ऐसा मिल जाये जिसके विचार आपसे मिलते हों और जिससे मिलकर आपको लगे कि जो कुछ आप करना चाहते हैं, उसमें कोई आपका सहायक हो सकता है तो आप को अच्छा तो लगेगा ही। आप जैसे उसे चाहे-अनचाहे प्रभावित करने के लिए सक्रिय हो जाओगे।
यह सब करते अंजना को कोई गलत बात करने का अहसास तो बिल्कुल नहीं हुआ। पर समस्या तो इन बातों के लिए समय निकलने की थी। अपने काम में ऐसी बातों के लिए समय निकालना तो संभव नहीं था। इसलिए इस विषय पर बात करते कई बार महीनों बीत जाते। हां कभी पास से गुज़रते वह डेविड उसे एक आध वाक्य कह देता, एक किताब रखी है, मुझे पढ़ कर लगा था, शायद तुम्हें भी पसंद आये। अगली बार याद रहा तो लेकर आऊंगा।
इस तरह, उन दोनों में एक सम्बन्ध-सा स्थापित हो गया था। डेविड को कैसा लगता था, यह तो उसे ज्ञात नहीं था पर जैसे अंजना के मन ही मन में कुछ चलता रहता। हां, उसके साथ, वास्ता काम के दौरान भी कभी-कभार ही होता। पर अगर कोई उससे पूछता कि डेविड के साथ उसका क्या सम्बन्ध है तो वह बेझिझक अपने दोनों के साहित्यिक साझेदारी के बारे कुछ कह सकती थी। परन्तु अपने काम के अंतर्गत ऐसा कुछ कहना सब लोगों के समझ आने वाली बात नहीं थी। इसलिए इस बारे में कुछ कहना छोटा मुँह बड़ी बात भी तो माना जा सकता था। और अंजना लोगों की हास्यपात्र तो कतई नहीं बनना चाहती थी। पर इस सब से उसकी रचनात्मकता को एक बढ़ावा-सा मिला था। अंजना इस बात को लेकर प्रसन्न कैसे न होती? अब वह वह अपने अधलिखे कागजों को दोबारा देखने लगी कि अगर उसकी कभी हिम्मत होगी तो डेविड को अपना कुछ और लिखा भी दिखा सकती है।
कभी सारे दिन के प्रशिक्षण सत्र में, कुछ समय उनकी कोई नई रचनात्मक कृतियों के बारे में कोई प्रश्न करने का अवकाश मिल जाता। अंजना ने अभी तक अपनी कोई नई लिखी कविता नहीं दी थी, जब कि रिचर्ड, हर बार कुछ न कुछ उसे पढ़ने को दे देता। कोई लम्बी-चौड़ी समीक्षा का तो कोई सवाल ही नहीं था, परन्तु अंजना को लगा कि वह भी एक दो अपनी लिखी कवितायें उसे पढ़ने को दे देगी। नहीं तो शायद उसे लगेगा कि बिना किसी बात के अपनी रचनात्मकता की बातें करती रहती है।
अगली बार उसने उसे अपनी तीन-चार कवितायें पढ़ने को दीं। एक उसके छोटे बच्चे को किसी और के पास छोड़ने के विषय में थी, एक प्रकृति के बारे में और दूसरी भी किसी सामाजिक पहलू पर थी। रिचर्ड ने कुछ लिखित टिप्पणियां दीं। इससे अंजना को इतना तो पता चल गया कि इस विषय में उसे अंजना से कहीं अधिक समझ थी।
इस तरह उनमें एक सहज सा रिश्ता बन गया था, जो डेविड को पता नहीं कैसा लगता था पर अंजना को इतना अच्छा लगता था कि वह अपने आपको बड़ा भाग्यशाली समझने लगी। काम तो वह कर ही रही थी पर इस लिखने-पढ़ने को लेकर उसका मन भरा-भरा सा रहता। यह सब बातें किसी और को बताने का तो कोई सवाल ही नहीं था।
पर कहते हैं न अगर कोई बात आप दूसरों को बता न सकें तो संभवतः वह बात तुम्हारे स्वयं के लिए भी श्रेयष्कर न हो! अंजना कोई बच्ची तो थी नहीं। उसने मन ही मन सतर्क होने की ठान ली थी।
डेविड के साथ कन्नी काटने की बात तो कठिन थी, काम के अंतर्गत कभी सामना तो हो ही जाता और जिसे आप मित्र-सा स्थान दे चुके हों, तो रूखापन एकदम तो दिखाना असभ्य माना जायेगा।
एक बार फिर डेविड ने उसे अपनी एक पत्रिका में छपी कुछ कवितायें पढ़ने को दीं जो उसकी नई कवितायें थीं। उनका विषय प्रकृति के अतिरिक्त एक अनजानी स्त्री के बारे में था। अंजना जो प्रश्न पहले पूछती थी अथवा कोई प्रतिक्रिया देती थी, उसने वह भी न दी। बस इतना ही कहा कि अच्छी हैं इसीलिए तो इन्हें छपने का अवसर मिला था।
इसके पश्चात तो जो भी कवितायें, डेविड ने पढ़ने को दीं, अधिकतर मानव जीवन के विभिन्न पहलुओं पर थीं। जाने अंजना को क्यों ऐसा लगने लगा कि हो सकता कुछ का सम्बन्ध उसके साथ हो। यह कहना तो असत्य होगा कि इस बात की संभावना, उसे अप्रियकर लगी हो। पर उसके मन का भय से जैसे दोगुना हो गया। आखिर लोग जो भी लिखते हैं वह अपने चारों ओर के समाज के बारे में ही तो लिखते हैं और लिखने के विषय क्या बिल्कुल बाहर से उपजते हैं?
कोई भी स्त्री-पुरुष इतने अबोध नहीं होते कि, यदि कोई उन्हें चाहता हो उन्हें इसका कदाचित भी भान न हो। विशेषकर स्त्रियों को इस बात को समझने के लिए तीसरी आँख की आवश्यकता नहीं पड़ती। अंजना को भी अब सन्देह ही नहीं, विश्वास भी होने लगा था कि डेविड के मन उसके लिए भावनाएं हैं। मन में ही रहें तो उसे उस बात से क्या एतराज़ हो सकता था?
पर क्या उसके के भी मन में ऐसी भावनाएं डेविड के लिए थीं?
अंजना अपने हृदय पर हाथ रखकर कह सकती थी कि वह डेविड को बस एक सहायक मित्र भर समझती थी। पर किसी के मन में उसके लिए भावना है यह सोच उसे परेशान करने के बजाय, उसके मन को कहीं उद्वेलित भी करती थी, क्योंकि ऐसा तो था नहीं कि आमना-सामना होने के अवसर रोज़ ही होते थे।
मिलने पर डेविड उसे, अपनी लिखी कोई न कोई चीज़ तीन-चार सप्ताह के पश्चात दे देता। उनके विषय पहले जैसे ही होते। जो कवितायें उसके पास उसके कागजों में थी, वह उसकी हाथ की लिखी कवितायें थीं।
अंजना के लिए इस समस्या का समाधान, ईश्वरीय कृपा से हो गया। डेविड का कार्य-क्षेत्र बिल्कुल बदल गया। वह एक-दूसरे शहर में नियुक्त होकर चला गया। उसका जाना अंजना को कैसे लगा होगा, उसे ठीक तरह से तो स्मरण नहीं, पर अब वह अनुमान लगा सकती है कि उसे एक मित्र से बिछुड़ने का दुःख तो हुआ ही होगा। पर साथ एक निश्चिन्तिता की भावना भी होगी। यह सब तीन दशक से पुरानी बातें हैं। अंजना को पता नहीं कि डेविड कहाँ रहता है? क्या करता है? अभी जीवित भी है या नहीं?
इन कागज़ के टुकड़ों को इतने वर्ष संभाले रखा, जाने क्या सोच कर? इन्हें पहले भी किसी को दिखा न पाई थी। अब तो कोई इन्हें क्यों देखना चाहेगा? अंजना के मन में एक प्रबल भावना जागृत हुई थी। यदि पता होता कि डेविड कहाँ है, तो वह एक बार उसे जरूर मिलना चाहेगी। उसका धन्यवाद देने के लिए --भला कहाँ मिलते हैं ऐसे मित्र?

QUICKENQUIRY
Related & Similar Links
Copyright © 2016 - All Rights Reserved - Garbhanal - Version 12.00 Yellow Loop SysNano Infotech Structured Data Test ^