ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
भारतीय साहित्य का परिप्रेक्ष्य
01-Sep-2019 06:25 PM 711     

भारतीय साहित्य का दुर्भाग्य रहा कि इसे अन्य भारतीय कलाओं की तरह तरजीह नहीं मिली। इसी का परिणाम है कि भारतीय साहित्य का इतिहास जैसी कोई व्यवस्था सामने नहीं आई। जबकि "भारतीय साहित्य" यह अवधारणा बनी रही और इसकी चर्चा भी होती रही। कुछ विद्वानों के लिए अब भी भारतीय साहित्य अर्थात संस्कृत में हुए कार्य हैं। यह घोषित किया जाता रहा कि "India has one literature that is written in many Languages." अर्थात भारत का एक साहित्य है जो कई भाषाओं में लिखा गया है। लेकिन इस बात को गंभीरता से स्थापित करने की कोशिश शायद नहीं हुई।
इसका कारण यह रहा कि बहुत सारी भाषाओं को समझते हुए उसमें से किसी एक साहित्यिक मूल्य की पड़ताल, कठिन काम था। विश्व में इस तरह का कोई अन्य उदाहरण भी नहीं मिलता, जहां इस तरह की किसी परंपरा पर काम हुआ हो। एक कारण यह भी था कि आजादी के पूर्व सभी क्षेत्रीय भाषाओं का विकास समान रूप से नहीं हुआ और आजादी के बाद क्षेत्रीय अस्मिता की भावना अधिक प्रबल हुई, अपेक्षाकृत राष्ट्रीय या एक उप महाद्वीपीय साहित्य की भाषा के रूप में।
लेकिन क्षेत्रीयता और अंतरराष्ट्रीयता की बीच राष्ट्रीय भावनाओं का विकास भी बहुत जरूरी है। राष्ट्रीय भावनाओं के साथ आगे बढ़ना बहुत जरूरी इसलिए भी है क्योंकि यह कड़ी आज कहीं ना कहीं खो गई है।
प्राचीन, मध्यकालीन और आधुनिक भारत का भारतीय साहित्य कई भाषाओं में लिखा गया है। इस भारतीय साहित्य के पहले अध्येता और लेखक विदेशी विद्वान थे। इनकी दिलचस्पी संस्कृत साहित्य में अधिक रही। आधुनिक भारतीय भाषाओं के साहित्य को इन्होंने उतना महत्व नहीं दिया। भारतीय भाषाओं के साहित्य लेखन के जो भी प्रयास हुए उनमें साहित्यकारों और उनकी कृतियों की जानकारी देने पर बहुतायत में प्रयास हुए, लेकिन इतिहास, सिद्धांत और आलोचना से जोड़कर उन्हें व्याख्यायित करने की परंपरा नहीं रही। विदेशी विद्वानों का यह एहसान तो मानना पड़ेगा कि अनुवाद के माध्यम से उन्होंने कई तरह के क्षेत्रीय साहित्य और भाषा को विद्वानों के बड़े वृत्त के बीच चर्चा का केंद्र बनाया और भारतीय साहित्य और भारतीय भाषाएं जैसी परिकल्पना हमारे सामने रखी।
श्री अरबिंदो और सर आशुतोष मुखर्जी ये दो प्रमुख भारतीय नाम हैं जिन्होंने 1918-20 के आसपास भारतीय साहित्य जैसी संकल्पना प्रस्तुत की। श्री अरबिंदो ने तो कई लेख लिखकर इस संबंध में अपने विचार प्रस्तुत किए। सर आशुतोष मुखर्जी के प्रयासों से सन् 1919 में कोलकाता विश्वविद्यालय में डिपार्टमेंट ऑफ मॉडर्न इंडियन लैंग्वेजेस की स्थापना हुई। यह जरूरी है कि हम क्षेत्रीय भावना के ऊपर उठकर राष्ट्र के रूप में अपने आप को देखें। राष्ट्र के स्तर पर देखें कि हम साहित्यिक स्तर पर क्या योगदान दे सकते हैं। बिना इस तरह के साहित्यिक आदान-प्रदान के न तो क्षेत्र का विकास होगा और न ही राष्ट्र का। भारत की 130 करोड़ जनता जब तक भाषायी आधार पर नहीं जुड़ेगी तब तक राष्ट्रीय तथा भारतीय साहित्य जैसी संकल्पना व्यर्थ हैं।
भारतीय भाषाओं से जुड़े इस तरह के प्रश्नों को लेकर चर्चाएं लंबी हो जाती हैं जबकि आवश्यकता उनके गहन होने की है। इधर ऑल इंडिया रेडियो और साहित्य अकादमी की तरफ से भी जिन प्रयासों की चर्चा मिलती है उनमें भी किसी केंद्रीय लक्ष्य का कोई रूप निखर कर नहीं सामने आता। अलग-अलग विद्वानों के स्वतंत्र रूप से किए गए कार्यों को भारतीय साहित्य के नाम पर एक साथ परोस दिया जाता है। कई कार्य तो ऐसे हैं कि उनमें संदर्भों और स्रोतों का कोई जिक्र नहीं है। ऐसे में उनकी प्रामाणिकता संदिग्ध हो जाती है। भारत में एक साहित्य है जो कई भाषाओं में लिखा गया है - सर्वपल्लीराधा कृष्णन के इस विचार पर आशंका इस तरह भी उठाई जा सकती है कि साहित्य भाषा पर आधारित है और भाषा, क्षेत्र विशेष की परिस्थितियों एवं संस्कृति पर अवलंबित है। और अगर ऐसा है तो उन संस्कृतियों का प्रतिनिधित्व करने वाले इस देश को बहुकेंद्रक रूप में देखना देखने की व्यापक, पूर्ण और समग्र प्रक्रिया होगी।
साहित्य का इतिहास सामाजिक-संस्कृतियों पर अधिक केंद्रित होता है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल इसे जनता की चित्तवृत्ति का संचित प्रतिबिंब कहते थे। मेरी समझ में शुक्ल जी समय विशेष की सामाजिक चेतना की बात कर रहे हैं। लेकिन इस बात से कैसे इनकार किया जा सकता है कि समय विशेष की राजनीतिक परिस्थितियां अपने समय की इस तथा कथित सामाजिक चेतना को प्रभावित नहीं करती होंगी। निश्चित तौर पर करती होंगी। इसलिए इतिहास को समझने का रास्ता इतना सीधा नहीं हो सकता। हमारी जो अपनी परंपरा रही है उसमें कोरी सूचनाओं को नहीं अपितु उसके रूपांतरण को महत्वपूर्ण माना गया है। एक महत्वपूर्ण बात यह भी है कि हम अपनी परंपरा को भलीभांति समझने का प्रयास करें और कतिपय विरोधी मान्यताओं के बीच भी सूक्ष्म संदर्भों को तलाशने का प्रयास किया जाय।
परंपरा को सामान्य रूप में उस आधिकारिक या स्वीकृत व्यवहार के रूप में चित्रित किया जाता है जो कि समय विशेष में किसी समाज विशेष में हो। परंपरा क्या है? यह समझना भी जरूरी है। परंपरा सामान्य रूप से उस आधिकारिक या स्वीकृत व्यवहार के रूप में चित्रित किया जाता है जो कि समय विशेष में किसी समाज विशेष में हो। लेकिन यह स्वीकृति बनती कैसे है? कब बनती है? कितने दिन के लिए बनती है? और बनी हुई स्वीकृति बदलती कैसे है? ये प्रश्न भी जरूरी हैं। अर्थात यह जानने का प्रयास कि परंपरा का उद्गम स्थान क्या होता है? इस संदर्भ में रामाश्रय राय जी का यह कथन महत्वपूर्ण है कि - कोई भी विश्वास या व्यवहार शून्य में अविर्भूत नहीं होता। इसलिए वे किसी इतर तत्व को इसका स्रोत मानते हैं।
जीवन के प्रांजलता, प्रखरता और प्रवाह को निरंतर क्रियाशीलता की आवश्यकता होती है। वैचारिक एवं कार्मिक क्रियाशीलता ही जीवन की प्रांजलता का प्राण तत्व है। जीवन का उत्कर्ष भी इसी निरंतरता में है। इसलिए परंपरा को आमनाय भी कहा जाता है। यह समन्वय की प्रक्रिया है। यहां संपूरक सिद्धांत भी लागू होता है। पूर्वर्ती और उत्तरवर्ती समन्वय की प्रक्रिया में सहप्रयत्न भी जुड़ा हुआ है। परस्पर विपरीत से दिखने वाले वास्तव में परंपरा की प्रक्रिया में दोनों संपूरक हैं। यह एक तरह की प्रक्रियाबद्ध बंधुता (क्तदृथ्र्दृथ्दृढ़न्र्) है।
हमारी अस्मिता, हमारी सामाजिकता, हमारी भाषा से जुड़ी हुई है। किसी भाषा में व्यक्त संकट उस समाज का भी संकट होता है। इसी भाषायी अस्मिता का विस्तार भारत में प्रांतीय अस्मिता के रूप में भी परिलक्षित होता है। भाषावार प्रांतों का गठन इसका उदाहरण है। लेकिन इसका दुखद परिणाम यह हुआ कि प्रांतीयता का यह प्रांतीय भाव राष्ट्रीयता के भाव पर हावी हो गया। साथ ही अपनी मातृभाषा के अतिरिक्त अन्य भाषा को अपनी भाषा पर संकट के रूप में समझा गया। 1961 की जनगणना के अनुसार भारत में कुल 1652 भाषाएं बोली जाती थी। ऐसे में राष्ट्रीयता का भाव, इस प्रांतीयता और भाषायी अस्मिता के आगे बौना हो गया। राजनीतिक स्वार्थों के चलते यह बौनापन और भी बढ़ा। जबकि आपसी आदान-प्रदान से समन्वय की परंपरा बनती है। शुद्धता और पवित्रता का अति आग्रह भाषा को पंगु बना देता है।
यही कारण रहा कि हमारे यहां साहित्यिक आलोचना की समृद्ध परंपरा भी भारतीय साहित्य के संदर्भ में नहीं रही। आज की सच्चाई यह है कि हम गंभीर रूप से या तो क्षेत्रीय हैं या फिर अंतरराष्ट्रीय होना चाहते हैं। यदि मौका मिले तो दोनों भी होने में गुरेज नहीं। लेकिन राष्ट्रीय होना उतना महत्वपूर्ण नहीं मानते। हिंदी की शक्ति समायोजन के गुण में निहित है। हिंदी प्रांतीय भाषा न होकर, एक भाव भाषा है। यह भारतीय जीवन दर्शन को राष्ट्रीय संदर्भों में अभिव्यक्ति प्रदान करने वाली निर्झरणी है। अनेकानेक भाषाओं, बोलियों और सभ्यताओं के इस पुंज को प्रेम, कर्म, करुणा और प्रकाश से भरने वाले अंतः निहित केंद्र के रूप में हिंदी का लक्ष्य एवं पक्ष हमेशा से स्पष्ट रहा।
भारतीयों भाषाओं के बीच समन्वय और संपर्क के सेतु रूप में हिंदी का योगदान अप्रतिम है। व्यवस्था के बीच पनपी सारी व्यथाओं को झेलते हुए घने कोहरे के बीच गुलाबी धूप की तरह हिंदी खिलखिलाती रही। सबको अपना बनाती रही, प्रेम के सौजन्य से ही। भाषायी तकनीकी विकास ने वैश्विक स्तर पर हिंदी को नया आयाम दिया। कृतज्ञतर होती हुई यह भाषा संभावनाओं का नया इतिहास रचने लगी। इंटरनेट, यूनीकोड, सोशल मीडिया, ब्लॉग इत्यादि के माध्यम से "स्क्रीन वाद" के इस युग में हिंदी प्रयोग, प्रतिवाद, प्रखरता और प्रांजलता के रंगों में सराबोर है।

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