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पॉल की तीर्थयात्रा
01-Aug-2016 12:00 AM 3495     

अर्चनाजी पैन्यूली के उपन्यास "पॉल की तीर्थयात्रा" ने वर्जीनिया वुल्फ़ के 1925 में प्रकाशित उपन्यास "मिसिज डेलोवेे" की याद दिला दी जो मनश्चेतन-प्रवाह-पद्धति (Stream of Consciousness) का संभवत: प्रथम उपन्यास था। "पॉल की तीर्थयात्रा" और "मिसिज डेलोवेे" में कई समानताएं हैं। दोनों सीमित-कालीन हैं (पॉल 28 घंटे और मिसिज डेलोवेे एक दिन), दोनों स्मृति-आधारित (Flashback) हैं और दोनों ही चेतन-प्रवाह पद्धति (Stream of Consciousness) पर आधारित हैं।
"पॉल की तीर्थयात्रा" एक स्वस्थ-चित्त प्रेमी की गाथा है। मगर विडम्बना तो देखिये कि उसका ये स्वस्थ-चित्त प्रेम ही उसके विवाहित जीवन में रोड़ा बनता रहता है। दो विवाह किए, दोनों असफल। पत्नियाँ न उसे समझ सकीं और न ही उसके प्रेम को। और उससे अलग होती गईं।
उपन्यास मर्मस्पर्शी है। जिंदगी के उतार-चढ़ावों को संजीदगी के साथ प्रस्तुत करता है। नई सोच ने जहाँ प्रगति के नए आयाम खोल दिए हैं वहीं मानवीय सम्बन्धों को तोड़-मरोड़ कर भी रख दिया है। इसी के चलते पति-पत्नी जैसे अटूट संबंध बिखर रहे हैं। आपसी संवाद छिन्न-भिन्न होता जा रहा है। बच्चे उच्छ्रंखल हो रहे हैं। परिवार टूट रहे हैं। चार दिन की चाँदनी के लोभ में पूरी जिंदगी स्याह की जा रही है। मृगमरीचिका के अंत पर पाते हैं कि हमारे हाथ एकदम खाली हैं। मगर बहुत देर हो चुकी होती है। अति संवेदनशील संदेश देता ये उपन्यास अगर समाज को कोई नई दिशा देता है तो निश्चित ही मानव के लिए ये कल्याणकारी होगा।
"पॉल की तीर्थयात्रा" टूटते परिवारों की त्रासदियों का सजीव चित्रण है और नई पीढ़ियों को संदेश देता है कि अगर कहीं सुख है तो वो विवाह-विच्छेद में तो कतई नहीं है। कई संदर्भ हैं जो इस धारणा को पुख्ता करते हैं। ज़रा बानगी देखें, "मगर हमारे दाम्पत्य जीवन के स्थायित्व का राज़ यह है कि हम जिंदगी भर लड़ सकते हैं। हम उस व्यक्ति से लड़ भी सकते हैं और उसे प्यार भी कर सकते हैं। तुम लोग जिंदगी भर लड़ नहीं सकते। बहुत जल्दी परास्त हो जाते हो।" (पृष्ठ 166) एक और, "जिस दिन पति-पत्नी लड़ना बंद कर देते हैं, उनके बीच सब कुछ खत्म हो जाता है। लड़ाई उनके रिश्तों को गतिमान रखती है।" (पृष्ठ 170) उपन्यास इस संकल्पना को सिर्फ तर्कों से ही नहीं बल्कि दृष्टांत देकर भी सुदृढ़ करता है। ज़रा गौर करें कि सभी तलाक़शुदा जोड़े भटकाव और अवसाद के शिकार हैं तो दूसरी ओर सभी संयुक्त युग्ल आनंद में नहीं तो सुखी अवश्य हैं जिनमें हैं नीना के माता-पिता, पॉल के माता-पिता और उसके सभी भाई।
अर्चनाजी का शब्द-विन्यास भी गजब का है। चंद शब्दों में वे गहरे संदेश छोड़ जाती हैं। ज़रा गौर करें, "लोग भारत और पाकिस्तान के चोरों को बदनाम करते हैं मगर यूरोप के चोर-उचक्के तो बड़े उस्ताद हैं", (पृष्ठ 72) या "उस वक्त मुझे जोहाना की चिल्लाहट शेर की दहाड़ लगती और नीना का चुपचाप मेरे बगल से उठकर उसके पास जाना एक मेमने की मिमियाहट..." (पृष्ठ 74) या "तुम्हें पाने के लिए खुद को खोया था। काश ये शब्द मैं उसे तब कह पाता।" (पृष्ठ 96) या "भले ही जेब से वह फकीर था, मगर कई मायनों में वह मुझसे बहुत अमीर था।" (पृष्ठ 145) या "आज मैं दर्द से हँस पड़ता हूँ। क्या है जिंदगी?" (पृष्ठ 167) और "अच्छे निर्णय लेना अनुभव से आता है और अनुभव बुरे निर्णय लेने से आता है।" (पृष्ठ 100)। अर्चनाजी का विलक्षण शब्द-विन्यास इस कथन में और भी अलौकिक हो जाता है, "ज़िंदगी का पहला व अंतिम पृष्ठ भगवान भर देता है - जन्म और मृत्यु। बीच के पृष्ठ इंसान को खुद ही भरने पड़ते हैं प्यार, विश्वास, संघर्ष से..." (पृष्ठ 149)। लगता है सम्पूर्ण गीता-ज्ञान इन चंद शब्दों में उड़ेल दिया गया हो।
उपन्यास में संदर्भ-हास्य विधि का भरपूर प्रयोग किया गया है। उदाहरण स्वरूप भारतीय-पाकिस्तानी चोरों से यूरोप के चोरों की श्रेष्ठता की तुलना। कुछ और रोचक टिप्पणियाँ हैं : "तुम्हें यह चिंता कि गर्भ क्यों नहीं ठहर रहा और हमारी सारी जवानी इसी फिक्र में गुज़री कहीं गर्भ न ठहर जाये..." (पृष्ठ 89)। या "...बैठकर लेडीज ड्रेसेज बेचूँ। कमर 24, ब्रैस्ट 31, हिप्स 33... शरीर माप तौल करता रहूँ।" (पृष्ठ 109)। या "प्रथम पत्नी सौंद्रा से खफा पॉल जब घर लौटता है तो ये पूछने पर "कहाँ चले गए थे?" वो जवाब देता है, "तुम्हारे लिए कॉफ़ी लेनेे।" (पृष्ठ 118)। या मुकदमे के दौरान नायक पूछता है, "ये पैसे आपके मुवक्किल के अकाउंट में क्या मेरा भूत भर रहा था?" जज समेत सब लोग खिलखिला कर हँस पड़े। (पृष्ठ 121)। या "क्योंकि एशियन व यूरोपियन नारियों की सुंदरता का अपना-अपना पैमाना है, जैसे सेब व संतरे की अलग- अलग खूबियाँ हैं।" (पृष्ठ 23)।
सामाजिक मूल्यों के टकराव और पीढ़ी-मतभेद भी इस उपन्यास में खूब खुलकर बाहर आए हैं। शादी-पूर्व माँ बनना, चलित-दूरभाष (Mobile phone etc) आदि नए उपकरणों के कारण विचार-भिन्नता और करीबी रिश्तों की टूटन, स्त्री की पुरुष से अपेक्षा, पुरुष का स्त्री के प्रति अनाड़ीपन, पति-पत्नी में कड़वाहट और मुक़दमेबाज़ी, प्रथाओं पर कटाक्ष, पाश्चात्य ललित कलाएं, व्यापार, भूगोल, इतिहास, धर्म, पर्यावरण असंतुलन, अस्तित्व-संघर्ष, पाश्चाताप, आत्माओं से साक्षात्कार, क्या नहीं है इस अनूठे उपन्यास में?
लेखिका/लेखक की सोच अलग ही होती है। अर्चनाजी भी अपवाद नहीं हैं। नायिका की मृत्यु और उसके बाद नायक की पूर्व-पत्नि के प्रति निष्ठा और समर्पण इस तीर्थयात्रा का प्रमुख मन्तव्य स्पष्ट दृष्टिगोचर होता है। उसमें वे शानदार सफलता भी प्राप्त करती हैं। सच पूछें तो उपन्यास पढ़ते समय हमें ये आभास होने लगा था कि पॉल की इस तीर्थ-यात्रा में हम न केवल उसके सह-यात्री हैं बल्कि दिवंगत नीना को श्रद्धांजलि देने हम भी जा रहे हैं। इतना सशक्त बन पड़ा है ये उपन्यास!
मगर हमारा मत है कि अगर नायिका के अहं की मृत्यु की जाती, तत्पश्चात पश्चाताप-स्वरूप नायिका नायक को पुन: बुलातीं और तदुपरान्त नायक पदयात्रा करता हुआ अपने "प्यार" के पास पहुंचता तो संभवत: नैसर्गिक न्याय और अधिक हो पाता।
राजपाल संस का बहुत धन्यवाद कि इस उपन्यास को प्रकाशित कर हमें इतना सशक्त उपन्यास उपलब्ध कराया। कुछ छपाई की त्रुटियों को छोड़ दिया जाए तो उपन्यास आरंभ से अंत तक पाठक को बांधे रखता है।

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