ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
परजीवी
01-Oct-2018 08:01 PM 2572     

यूँ तो खबर कोई अनपेक्षित भी नहीं थी। शंका मन मस्तिष्क में हर पल छाई ही रहती थी लेकिन कल रात जब बाबा का फोन आया कि माँ को हृदयघात के पश्चात शरीर के बाएँ भाग में लकवा हो गया है तब मानो पूरा पेरिस ठहर गया था।
अगले हफ्ते की कन्फर्म टिकिट होने पर भी अब यहाँ रुके रहना संभव नहीं था। चूंकि व्योम ने जाने से पहले अपनी सारी मीटिंग्स इसी हफ्ते प्री-पोंड कर ली थी और बच्चों के भी एग्जाम थे तो तय हुआ कि अभी मैं ही चली जाऊं और वह लोग अगले हफ्ते आ जायेंगे। एक टिकिट का इन्तजाम करना इतना मुश्किल भी नहीं था। सुबह 4.30 बजे में पेरिस से लन्दन जाने वाली ब्रिटिश एयरवेज की फ्लाइट में बैठी उसके उड़ने का बेसब्री से इन्तजार कर रही थी। बाबा बेचारे कैसे माँ को अकेले सम्भालेंगे। नेट पर पक्षाघात के बारे में पढ़ा। दवाईयों और फिजियोथेरेपी से आंशिक लाभ हो भी जाये तब भी पूर्ण लाभ किसी चमत्कार से कम नहीं। माँ तो अब पूर्ण रूप से बाबा पर ही आश्रित हो जायेंगी। अनजाने ही चले आये इस विचार ने मेरे चेहरे पर एक मुस्कान ला मुझे स्मृतियों में धकेल दिया।
प्लेन टेक ऑफ कर चुका था। मैंने सीट बेल्ट खोल सर पीछे टिका आँखे मूँद ली। स्मृतियों के सच्चे रंग बंद आँखों से ही देखे जा सकते हैं--
"मधुशा, तेरी माँ कब बड़ी होगी?"
"शरण्या, बच्चों-सी जिद न करो। तुम छोटी हो या मधुशा!"
"मधुशा, तू ही मान जा बेटा। तेरी माँ तो पैरासाइट है। उसकी तरफ ही मुंह कर सो लेने दे।"
"बाबा पैरासाइट माने?"
"पैरासाइट मानेे जो अपना ध्यान खुद न रख पाए... जी न पाए बिना किसी सहारे के।"
जवाब मणि भैया देते। बचपन से ही अथाह ज्ञानी जो थे। पैरासाइट का शाब्दिक अर्थ भले ही यह रहा हो लेकिन इसका माँ से संदर्भ समझने में मेरा बाल मन सफल न हो पाता।
माँ तो हम सबका ध्यान रखती है। हम ही नहीं जी सकते उसके बिना, मैं सोचती लेकिन मन में उठते इन संशयों को पूछने का अवसर कभी नहीं मिल पाता। माँ मोटे-मोटे आंसू अपनी बड़ी-बड़ी आंखों में भरे बाबा के सीने से लिपटी बच्चों-सी सुबक रही होती और मैं इस मोहक पल में खो जाती। तंद्रा तब टूटती जब माँ-बाबा हाथ फैला हमें बुला रहे होते और मणि भैया और मैं भी माँ-बाबा से यूं चिपक जाते जैसे वर्ग की चार भुजायें।
"मेरे तीन बच्चे हैं, और बड़ा बच्चा सबसे छोटा है", बाबा हमेशा कहते।
"सबसे छोटा बच्चा तो आप ही हो। एक चीज संभालकर नहीं रखी जाती आज सुबह फिर अपनी अंगूठी गुमा दी थी", माँ आंसू पोछते हुए उल्हाना देती और शरारत से हंस भी देती।
भाई और मेरे सम्मिलित स्वर गूंजते, "क्या फिर से? फिर मिली कि नहीं?", जवाब में बाबा अपना दाँया हाथ हवा में लहरा अपनी अनामिका में सुशोभित पन्ने की अंगूठी दिखा देते।
"पता नहीं उतारने का क्या शौक है, पहने क्यों नहीं रखते!"
"अच्छा बस-बस, फिर से ना शुरू हो जाओ" कह बाबा उठ भागते।
बाबा ने किस महीने में किस दिन कहां और कैसे-कैसे यह अंगूठी खोई, कैसे वापस मिली है, याद रखने वाली माँ कैसे अपनी दवाइयां लेना प्रतिदिन ही कैसे भूल जाती थी यह भी एक राज ही था। यदि बाबा अपने हाथ से दवाई न खिलायें तो वह खाती ही नहीं थी। बाबा को जब भी कहीं बाहर जाना पड़ता वह फोन पर हमें हिदायत देते और हम पानी का गिलास और दवाई लेकर दिन भर माँ के पीछे-पीछे। माँ के बहाने छोटे बच्चों से भी अधिक बचकाने होते, जैसे "अभी खाना खाया है ... अभी जल्दी में हूं... अभी काम कर रही हूं..."
और जब हम बीमार होते तब वही माँ हमारा मुंह पकड़ जल्दी से चम्मच भर दवाई उड़ेल देती फिर दो चम्मच पानी और मिश्री के दाने और फिर हँस कर कहती - "हो गया बस अब खेलो"।
पूरा घर किसी होटल की लॉबी जैसा व्यवस्थित रखने वाली माँ कभी अपना पैन कार्ड और क्रेडिट कार्ड क्यों नहीं संभाल पाती थी यह माँ की स्त्रीवादी सहेलियों को उद्वेलित कर देता और वह अबला माँ में जोश भरने और उनके सामथ्र्य का भान कराने की पूरी कोशिश करती। लेकिन अगली बार कहीं जाने से पहले माँ फिर बाबा से लड़ रही होती कि इतने पैसे में कैसे होगा और कुछ पैसे दो, जबकि सब जानते थे कि उनके अलग-अलग पर्स में कितने ही हजार रुपये पड़े रहते हैं क्योंकि बचे हुए पैसे न कभी बाबा ने वापिस माँगे, न उन्होंने दिए!
वैक्यूम क्लीनर, वॉशिंग मशीन, गीजर इत्यादि से जूझने वाली माँ लैपटॉप खोलने और मेल करने के लिए भी भाई और मुझे ही पुकारती। भले ही एग्जाम हो, उठना पड़ता। झुंझलाते जरूर।
"माँ, बाबा सही कहते हैं तुम्हें पैरासाइट।"
वह चिढ़ जाती और बोलती, "तुम्हें इतने महंगे स्कूल में पढ़वाना... सब बेकार। एक मेल भेजने के लिए इतनी बातें सुना देते हो!"
"और आप भाई के साइंस-कंप्यूटर सब प्रोजेक्ट्स बना देती हो पर फेसबुक लॉगिन नही कर पाती? भला ऐसे कैसे सम्भव है?"
इसका उत्तर शायद माँ बनकर ही जान पायी मैं। एक माँ अपने बच्चे के लिए बिना वर्ण ज्ञान के भी वेद रच सकती है। बच्चों के विचार से चिंता हुई बच्चे पता नहीं कैसे होंगे घर पर। मेरे विचार भारत और पेरिस, भविष्य और भूत के मध्य पेंडुलम की भांति झूल रहे थे।
लंदन आ चुका था। यहां से इंडिया के लिए फ्लाइट लेनी थी। फोन ऑन करके सबसे पहले व्योम को कॉल मिलाई। चिंता थी कि वह बच्चों के साथ कैसे मैनेज करेगा। और यह "मैनेज"... सिर्फ अभी यह कुछ दिन ही तो नहीं करना था। परजीवी माँ के बिस्तर पकड़ने से बाबा ...मैं... व्योम दोनों बच्चे माहिरा और अर्णव सभी को एक सिम्बायोसिस डेवलप करनी थी ताकि सुचारू रूप से जीवन चलता रहे। मूल प्रश्न यह था कि माँ और बाबा को पेरिस ले जाया जाए या हम लोग भारत शिफ्ट हो जाएँ। माँ-बाबा के गिरते स्वास्थ्य के चलते व्योम और मैंने अपने-अपने हेड ऑफिस में काफी समय से रिक्वेस्ट भेज रखी थी। मुख्य चिंता बच्चों की थी कि वह भारत के स्कूल में और माहौल में कितना ढल पाएंगे।
फ्लाइट का अनाउंसमेंट हो चुका था। यंत्रवत सभी चेकिंग दरवाजों से होते हुए मैं अपनी सीट फोर-ए पर पहुंच गई थी। खिड़की की सीट होने से कुछ पल को मैंने भी बादलों सा-ही हल्का महसूस किया। स्थानीय समय के अनुसार सुबह के छह बजे थे। आसमान में छोटे-छोटे बादल मानो शिशु की भांति प्लेन को देखकर यूं ही आनंदित हो रहे थे जैसे पृथ्वी पर बच्चे ट्रेन को देखकर दौड़े जाते हैं। अनजाने ही मैंने दस हजार मीटर की ऊंचाई से नीचे झाँका। शायद इसी पल लगभग चालीस लाख आठ हजार मीटर की ऊंचाई पर स्थित इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन से भाई भी नीचे झांक रहा हो, मैंने सोचा। भाई का ख्याल जब भी आता तो अब वह माँ की गोद में सिमटा ही नजर आता है।
बचपन में बाबा के साथ मिलकर माँ को पैरासाइट कहने वाला मणि अब जब भी स्पेस से धरती पर कदम रखता तो माँ के आंचल में सिमट जाता हमारे स्कूल ट्रिप पर जाने पर फोन कर करके टीचर्स के प्राण ले लेने वाली माँ कैसे भाई को स्पेस में भेज अच्छी-बुरी कोई भी खबर उस तक नहीं पहुंचने देती है। वह कहती है कि सुखद और दुखद दोनों ही भावनाएं इंसान को कमजोर कर देती हैं। बेहतर है वह निस्पृह भाव से अपना काम करे। भारत में हरे और नारंगी रंग में उलझे नेता अधिकारी कभी समर्पण का यह रंग नहीं देख पाते। अमेरिका और ब्रिटेन जैसे विकसित देश केवल भौतिक प्रगति ही नहीं कर रहे वरन मानवीय संवेदनाओं और भावनाओं की भी ग्राफिंग और एनालिसिस बहुत ही बारीकी से करते हैं। भाई बताता है कि स्पेस स्टेशन में जाने से पहले कैसे मनोवैज्ञानिक और शारीरिक दोनों की ही टफ ट्रेनिंग दी जाती हैं।
भाई की कमी आज सबसे ज्यादा महसूस हो रही थी। वह होता तब शायद माँ को संभालना कुछ आसान हो जाता। मैंने एक नजर बाहर दूर तक डाली और अब मेरा ध्यान आगे किस प्रकार व्यवस्था बिठाई जाए इस पर था। मेरे नौकरी ना करने से काफी समस्या सुलझ सकती थी या फिर एक फुल टाइम नर्स रख घर से ही नेट के माध्यम से पार्ट टाइम काम किया जा सकता है, मैंने सोचा।
मेरे बराबर की सीट पर एक बुजुर्ग दंपति बैठे थे। उन्हें खिड़की पर झांकता पा मैंने उनसे सीट बदल ली । उन दोनों की आंखों में एक-दूसरे के लिए तैरते स्नेह को देख मुझे लगा जैसे माँ-बाबा ही साथ बैठे हों। प्रेम की भाषा और रूप हर देश में एक-सा ही रहता है, मैंने सोचा। मुझे अपनी ओर देखता पा वह दोनों भी मुस्कुरा उठे। मैंने चोरी पकड़े जाने पर झेंपकर नजरें घुमा ली और बैग में से निकाल कर "फाल्ट इन अवर स्टार्स" पढ़ने लगी। पहले भी जाने कितनी बार पढ़ी है, पर जब से माँ बीमार हुई है यह किताब मेरे हाथों में ही है। पता नहीं क्यों हर प्रेम करने वाले युगल में मुझे माँ-बाबा का अक्स दिख जाता है।
प्लेन लैंड कर चुका था। अपने देश की धरती की महक कुछ अलग ही होती है। विदेश से लौटने पर यहां की हवा भी माँ जैसा दुलार करती है। कुछ गहरी सांस भर मैं बाहर प्रतीक्षा करती टैक्सी में बैठ सीधे हॉस्पिटल ही पहुंची घर जाने का कोई आकर्षण था भी नहीं। जानती थी कि बाबा माँ के साथ अस्पताल में ही होंगे।
कहीं दूर से माँ का स्वर गूंजा, "जब मैं आखरी समय अस्पताल में बिस्तर पर पड़ी होऊँगी तब भी तुम चांद पर धान उगाने के ही विचार में खोए होंगे।"
"ऐसा बिल्कुल नहीं। हाथ पकड़कर तुम्हारे साथ बैठा रहूंगा और चांद पर धान उगाने तुम्हे साथ ही ले चलूंगा।"
"फालतू बातें ना करोे", माँ चिल्लाती।
"शुरू किसने की", बाबा कहते।
"अच्छा सुनो, दूसरी शादी नहीं करना", माँ बाबा के गले में लटकते हुए कहती।
"नहीं करूंगा तुम देख लेना।"
"कैसे?", माँ हंसती।
"तुम्हें गलत साबित करने के लिए मरने का रिस्क नहीं ले सकती। मेरे बच्चे बहुत छोटे हैं और तुम बच्चों से भी छोटे।"
"अच्छा। अब अपने इस शिशुआलय से बाहर निकलो और कुछ खिलाओ..", भाई कहता।
"घर का नाम प्रेमआलय की जगह शिशुआलय क्यों नहीं रख लेते आप लोग", वह हंसता।
आज इसी शिशुआलय से निकलकर एक शिशु इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन में बैठा था और एक पेरिस की प्रसिद्ध फैशन कंपनी में मैनेजिंग डायरेक्टर थी और एक एग्रीकल्चर में प्रतिष्ठित मैगसैसे पुरस्कार पा गरिमामयी रिटायर्ड जिंदगी जी रहा है। इन सबको सम्भालने वाली परजीवी माँ इन सब की उपलब्धियों पर मन ही मन गौरवान्वित होती हुई कहती रहती है कि तुम लोगों से कोई एक भी काम सही से नहीं होता। भाई नहीं बता पाता कि कोई भी त्योहार दो दिन पड़ने पर आखिर कौन-सा दिन वास्तविक है। मैं अभी तक हैंडलूम की साड़ियां पेरिस के रैंप पर नहीं पहुँचा पायी और बाबा अक्सर ही बगीचे में पाइप लगा कर भूल जाते हैं। इस बार नए कलेक्शन के लांच पर माँ की ही कोई सिल्क की साड़ी पहनूँगी, मैंने सकल्प लिया।
हॉस्पिटल पहुँचकर रिसेप्शन पर वीआईपी सुइट की डायरेक्शन पूछ अंदर गई तो बाबा माँ का हाथ पकड़े बैठे थे।
"सोयी हैं?", मेरे पूछने पर उन्होंने मेरी तरफ देखा। आंखें गीली थी।
"सब सही हो जाएगा बाबा", मैंने कहा।
"हम लोग शिफ्ट हो जाएंगे यहीं", और अपना हाथ बाबा के हाथों के ऊपर रख दिया।
"सदा के लिए सो गई है", बाबा के शब्द मानो गले में ही फंस रहे हों।
"तुम्हारी माँ के बिना मैं कैसे रह पाऊंगा मणि", बाबा बोले।
"यह आपका कैसा परजीवी था बाबा जिसे एक दिन को भी किसी पर आश्रित होना मंजूर नहीं हुआ", मैंने बाबा के आँसू पोछते हुए कहा।
रास्ते भर सोचे गए मेरे सारे विकल्पों को ठुकरा परजीवी अब पूर्ण तरह स्वतंत्र हो चुका था।

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