ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
पलाश शिरीष के फूल
CATEGORY : कविता 01-Feb-2017 12:57 AM 1197
पलाश शिरीष के फूल

पलाश

झूम रहे हैं पलाश
हौले-हौले
ओढ़ ओढ़नी
नुपुर बजाते खवाबों के
खिल गये हैं
पलाश

मौसम के आँगन में
अहसास के परिंदों पर
सुर्ख अंगारे से रंग लिए
औषधीय ऊर्जा से
भरपूर अपने रस में डूबे
झूम रहे हैं पलाश

हौले-हौले
रह-रह
सर्र-सर्र
गह-गह करते
ओढ़ ओढ़नी
नुपुर बजाते
गदराई ड़ार पर
लहके से दहके से
पलाश

प्रकृति ने दिए हैं हमको
सचमुच इन्द्रधनुषी
अद्भुत उपहार!

शिरीष के फूल

दीपशिखा से
शिरीष के फूल
जब तुम गदराते हो
सुरभित बासंती
मौसम ले आते हो

बसंत से आषाढ़ तक
रंगों की तुम रूहानी
बंदनवार सजाते हो
तुम्हारे हँसते गाते
नाज़ुक डालीदार
शाख पर छिड़क रंग
पतंग से लहराते हो

ओ फूल शिरीष के
चाँदनी रात में क्यों
पीतांबरी हो जाते हो।

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