ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
पानी की आवाज सुनो
01-Jul-2016 12:00 AM 6166     

अब पानी सब व्यक्तियों, व्यापारियों और व्यवस्थाओं के खिलाफ आंदोलन पर है
कि मेरे रास्ते से हटो। मेरा रास्ता मत रोको। मुझे नदी में बहने दो, कुइया में,
पोखर में, ताल में भरने दो, कुओं में आहिस्ता-आहिस्ता रिसने दो, पर्वत से
मुक्त झरने दो। मुझे बाँधते क्यों हो। क्यों मेरा रास्ते मोड़ते हो।

बूँदों को देखो तो लगता है कि जैसे वे पानी के बीज हों। वर्षा धरती में पानी ही तो बोती है। पहले झले के पानी की एक-एक बूँद को पीकर धरती की गोद हरियाने लगती है। जैसे हरेक बूँद से एक अँकुर फूट रहा हो, जैसे धरती फिर से जी उठी हो। बरसात आते ही वह फूलों, फलों, औषधियों और अन्न को उपजाने के लिये आतुर दिखाई देती है।
कोई धरती से पूछे कि उसे सबसे अधिक किसकी याद आती है तो वह नि¶चय ही कहेगी कि पानी की। वह पानी से ऊपर उठकर ही तो धरती बनी है पर उसने पानी की लाखों बरस पुरानी सम्पदा को अपने सीने में छिपा रखा है। वह पानी को कभी नहीं भूलती। वह तो पानी की यादों में डूबी हुई है। ग्रीष्म ऋतु में झुलसती हुई धरती को देखो तो लगता है कि वह जल के विरह में तप रही है। उससे धीरे-धीरे दूर होता जल और उसकी गर्म साँसें एक दिन बदली बनकर उसी पर छाने लगती हैं और झुलसी हुई धरती के श्रृंगार के लिए मेघ पानी लेकर दौड़े चले आते हैं।
वर्षा के ¶ाुभागमन का स्वागत करने के लिये कविवर भवानी प्रसाद मिश्र हमें एक कविता लिखकर दे गए हैं। "पहिला पानी' आते ही उस कविता की याद आती है- "पहले झले का पानी जैसे अकास-बानी। दुनिया में उसने भर दी लो हर तरफ जवानी। हर एक अधमरे को बदली नचा गई रे, बरसात आ गई रे।' वर्षा आते ही चिड़ियों की चहक खुल जाती है। वे घर के आँगन में दाना चुगने आती हैं। उनके पर उड़ान की नयी ताजगी से भर उठते हैं। सूखे झाड़ों पर नयी पत्तियाँ झिलमिलाने लगती हैं।
नालों, नदियों और झरनों के सूखे गान फिर वापस लौट आते हैं। किसानों को खेत बुलाते हैं। घर की छपरी में आल्हा का गान और ढोलक की थाप गूँजती है। कविवर भवानी प्रसाद मिश्र को लगता है कि बादलों की गर्जना सुनकर जैसे सारे जड़-चेतन ने जुबान पा ली हो और धरती के साथ मिलकर ताल-तलैया, कुइया-पोखर, नदी-नाले, कुएँ-कुण्ड, सरोवर-समुद्र, पेड़-पौधे, प¶ाु-पक्षी और नर-नारी सब जीने का गीत गा रहे हों।
जीने के गीत की सरगम पानी के बिना पूरी नहीं होती। संगीत में जैसे सात सुर होते हैं, एक स्वर सप्तक होता है, वैसे ही पानी के कई स्वर सप्तक हैं, जिनमें पानी के स्वर डूबे रहते हैं। जैसे जलतरंग के सात करोटे हों, जिनमें से संगीतकार एक-एक स्वर बड़े ही सधे हाथों से उठाता है। ऐसे ही पानी के सप्त सरोवर, सप्त नद और सप्त समुद्र हैं, उनमें से एक आचमन जल उठाने पर पूरे पानी का विन्यास झंकृत होता है। सूरज की सतरंगी किरनें भी तो हौले-हौले धरती से जल को ऊपर उठाती रहती हैं। जितना जल उठाती हैं, उतना ही वापस कर देती हैं। वैदिक ऋषिगण ऋचाएं गुनगुनाते हुए कहते हैं कि जब मेघ वर्षा करते हैं तो जल निनाद करते हुए बहता है। वेगवान जल के इस मधुर संगीत को सुन सकने वाले लोग आज भी कामना करते हैं कि सबके जीवन में जल का सुखकर और सांगीतिक प्रवाह बना रहे।
जल जीवन का आधार है और सबसे प्राचीन मार्ग भी वही है, जो हमें न जाने कब से किनारे लगाता आ रहा है। हम ही अपने लिए सूखी गलियाँ खोजते और सड़कें बनाते पानी से दूर आ बसे हैं। पर पानी कहाँ हमारा पीछा छोड़ने वाला है। हम भले ही अपना रास्ता भूल जायें। पानी तो अपना मार्ग जानता है। उसे अच्छी तरह मालूम है कि उसे कहाँ आकर भरना है। भले ही हमने उसके किसी तालाब को पूरकर कॉलोनी बना ली हो, पर वह तो वहीं आकर भरेगा। हमें डुबोएगा क्योंकि हमने पानी की जगह पर अतिक्रमण कर लिया है। पानी हमारे खिलाफ किसी अदालत में नहीं जाता। वह उसके रास्ते में आ गई अदालत को जरूर डुबो देता है। वह हर बरसात में हमारे द्वार पर दस्तक देता है कि मेरे तालाब की जमीन खाली करो। मुझे अपने आसपास बसेरा करने की साफ-सुथरी जगह दो।
अब पानी सब व्यक्तियों, व्यापारियों और व्यवस्थाओं के खिलाफ आंदोलन पर है कि मेरे रास्ते से हटो। मेरा रास्ता मत रोको। मुझे नदी में बहने दो, कुइया में, पोखर में, ताल में भरने दो, कुओं में आहिस्ता-आहिस्ता रिसने दो, पर्वत से मुक्त झरने दो। मुझे बाँधते क्यों हो। क्यों मेरा रास्ते मोड़ते हो। मुझमें अपने पाप धोने वाले तुम कौन होते हो। मेरे रास्ते में गंदी नालियों के मुँह क्यों खोलते हो। अपनी पूजा के बासे फूल मुझमें क्यों बहाते हो। मुझमें डूबो, तैरो, पार हो जाओ, पर मुझे मत सताओ।
आये दिन सड़कों और चौराहों पर मतलबी किस्म के लोग जब धरने देते हैं तो उनकी तरफ कोई देखता तक नहीं। सब जान गये हैं कि इस तरह के लोग सत्याग्रही नहीं होते। वे तो सिर्फ अपने लिए लड़ते हैं। पर पानी से बड़ा सत्याग्रही कौन होगा जो सबके हित के लिये अपनी राह बहता है। अगर वह आज आंदोलित है और हमारे रास्ते रोक रहा है। हमारी बस्तियाँ डुबा रहा है तो हमें कुछ देर ठिठककर पानी की आवाज को सुनना चाहिए। पानी के पक्ष में खड़े होकर जल सत्याग्रह के लिये मार्ग बनाना चाहिए।

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