ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
पानी बिच मीन पियासी
01-May-2016 12:00 AM 2096     

प्रकृति में हर तरह का स्वतः प्रबंधन है- जल, मल, जनसंख्या, विभिन्न जीवों का संतुलन आदि। लेकिन मनुष्य की विकास की नई अवधारणा के कारण प्रकृति की इस व्यवस्था को कई तरह से प्रभावित किया है- सकारात्मक कम और नकारात्मक अधिक। जब प्रकृति की व्यवस्था में मनुष्य व्यवधान पैदा करता है तो उसे प्रकृति और वस्तुतः अपनी दूरगामी सुरक्षा के लिए प्रकृति के नियमों का ही ध्यान रखना चाहिए लेकिन व्यक्ति अपनी तात्कालिक स्वार्थपरता के कारण इसके विरुद्ध आचरण कर जाता है। यही तात्कालिक स्वार्थ आगे जाकर उसके लिए और अंततः समस्त संसार के लिए दु:खद सिद्ध होता है। यह लिप्सा तब और बढ़ जाती है जब सभी अधिक काम कर सकने अर्थात प्राकृतिक संसाधनों का बड़े पैमाने पर ¶ाोषण कर सकने वाले बड़े-बड़े यंत्र व्यापारियों और ¶ाोषकों के हाथ लग जाते हैं। आज का तात्कालिक और अदूरदर्¶िातापूर्ण तथाकथित विकास इसका स्पष्ट उदाहरण है। इसीलिए गाँधी जी कहा करते थे- यह धरती/प्रकृति मानव की आव¶यकताएँ तो पूरी कर सकती है लेकिन इच्छाएँ और विलासिता जनित अपव्यय नहीं। तभी संत भी कहते हैं- सार्इं इतना दीजिए जामें कुटुम समय/मैं भी भूखा ना रहूं साधु न भूखा जाय। अथवा साधू गाँठ न बाँधई उदार समाता लेय/आगे पीछे हरि खड़े जब माँगे तब देय। ये दोनों संकेत अनाव¶यक इच्छाओं पर नियंत्रण के लिए हैं।
इस सन्दर्भ में सामान्य-सी लगने वाली लेकिन वास्तव में कल बहुत विकट बन जाने वाली समस्या- जल-संकट के बारे में विचार करना चाहते हैं।
वि·ा के सभी दे¶ाों में वहाँ के मूल निवासियों ने उपलब्ध साधनों और अपनी आव¶यकताओं के अनुरूप एक अद्भुत संतुलन बैठा रखा था जो आज हर चीज के व्यापार, सूचना क्रांति और आवागमन के साधनों के कारण प्रभावित होता है। वह उसे अपने साधनों तक सीमित और संतुष्ट रहने से आगे जाकर कहीं से भी, कुछ भी प्राप्त करके अपनी लिप्सा को संतुष्ट करने के लिए उकसाता है। बिन मौसम की महँगी चीजें या जो अपने यहाँ नहीं होतीं वे सब्जियाँ या फल दूर-दूर से मँगवाना, स्वाद कम और अपने वैभव का प्रदर्¶ान करने के लिए अधिक होता है। क्या राजस्थान में गरमी में मूली, गाजर, पालक उगाने में पानी का अपव्यय करना या उसे कहीं से भी महँगा-सस्ता मँगवाकर धन का अपव्यय करना क्या प्रदर्¶ान की कुंठा नहीं है?
राजस्थान के रेगिस्तानी इलाकों में किसी भी राजा के महल में तरण-ताल (स्विमिंग पूल) नहीं है, लेकिन आज किसी भी इलाके में कोई भी पाँच सितारा होटल खोल सकता है जिसमें स्विमिंग पूल भी होगा; यह जाने, सोचे समझे बिना कि उस इलाके में पानी की क्या स्थिति है। जिस इलाके में पानी की अधिकता हो या वर्षा के समय में पानी की अधिकता जहाँ समस्या बन जाती हो वहाँ की बात और है अन्यथा धरती और जीवों की प्यास के पानी से स्विमिंग पूल बनाना पाप तो है ही, दंडनीय अपराध भी माना जाना चाहिए। यह विवेक ¶ाायद राजस्थान के रेगिस्तानी इलाकों के ¶ाासकों में था। अपने अत्याचारों के लिए बदनाम अधिकतर ये ¶ाासक कम से कम जनता की प्यास से खेलने के पाप से तो बचे रहे।
आज लोकतंत्र है। जनता का राज। जनता के द्वारा चुने गए सेवकों द्वारा उसकी सेवा करने वाले समर्पित लोगों का सतयुग। ¶ाायद लोकतंत्र, चुनाव, जनता का राज, जनसेवा जैसे ¶ाब्दों से आपको हँसी आ रही हो। वास्तव में जनता का राज, जनसेवक जैसे ¶ाब्द हँसी का सबसे बड़ा रुाोत हैं, व्यंग्य और विडंबना हैं क्योंकि किसी भी समाज के संसाधनों का सबसे अधिक दुरुपयोग इन्हीं सेवक वर्गों द्वारा किया जाता है और ये ही जलवायु-दिवस, पर्यावरण-दिवस, अर्थ-आवर, जल-चेतना, जल बचाओं जैसे नारे लगाते हैं, आयोजन करते हैं। अम्बानी के, दे¶ा के सबसे बड़े और कीमती आवास का बिजली का बिल कितना आता है? क्या मात्र नोटों से बिजली बन जाती है? ¶ाक्ति¶ााली धनपतियों से उनके अपव्यय का हिसाब कौन लेगा?
राजस्थान के सभी पुराने पक्के घरों में, वि¶ोष रूप से खारे पानी (भूजल) वाले इलाकों में कुंड (पक्के हौद) हैं जिनमें वर्षा का जल संग्रह किया जाता था। जिनके घरों में यह व्यवस्था नहीं होती थी वे जब भी वर्षा होती उसके जल का भरपूर उपयोग करते थे। पुराने और बड़े कपड़े धो लेते थे। जिनको गरमी में घमौरियों ने परे¶ाान कर रखा था वे वर्षा में नहाते थे। सब अपने बड़े बर्तनों में पानी भर कर रख लेते थे। यद्यपि ¶ोखावाटी वि¶ोष रूप से सीकर-झुंझुनू जिले कभी जल संकट से परे¶ाान नहीं रहे। ज़मीन के अन्दर पानी था क्योंकि म¶ाीनों से उसका तीव्र दोहन नहीं होता था, जितना आज हो रहा है। जितने समय में आप ज़मीन के अन्दर से रस्सी-बाल्टी से खींच कर या बैलों से निकालते थे उतने समय में वह पानी ज़मीन से फिर संचरित हो आता था। यदि कभी-कभी पानी टूट जाता था तो लोग थोड़ी देर इंतज़ार कर सकने का धैर्य रखते थे।
एक बाल्टी से नहाना, कपड़े धोना और धोने से बचे पानी से गोबर पाथना या किसी पौधे में डाल देना। रेगिस्तान माने जाने वाले राजस्थान में भी पेड़ मिलते थे, घरों और सार्वजनिक स्थानों में। कोई भी जंगल-दि¶ाा जाते, कुएँ-तालाब से आते-जाते थोड़ा बहुत बचा-खुचा पानी ऐसे ही ज़मीन पर नहीं फेंकता था बल्कि किसी पेड़ में डालता था। हरा पेड़ काटना एक पातक (बड़ा पाप) माना जाता था। पेड़ों की रक्षा के लिए अपनी जान देने वाले साढ़े तीन सौ से अधिक लोग राजस्थान के बि¶नोई ही थे।
ऐसी स्थिति में भी किसी प्यासे को प्यासा नहीं लौटाने वाले संवेदन¶ाील लोग यहाँ सामान्य रूप से पाए जाते थे। ज़मीन से साठ हाथ नीचे से, हाथों से खींचकर, दूर-दूर से ढोकर पानी की प्याऊ लगाने वाले लोग यहाँ पहले कभी कम नहीं थे। जब 1985 में तबादला होकर दिल्ली आया तो मुझे सबसे अधिक दु:खद बात यही लगी कि बस स्टापों पर कोई प्याऊ नहीं बल्कि रेहड़ियों पर 25 पैसे में पानी का एक गिलास बेचा जा रहा है। जिसके पास पैसा नहीं वह प्यासा मर जाए और इसका प्रमाण भी दिल्ली में ही मिला। उन दिनों अमरीका के राष्ट्रपति Ïक्लटन भारत आने वाले थे। मौर्या ¶ोराटन होटल के सामने एक पेट्रोल पम्प है। अपराह्न में थोड़ी सी बारि¶ा भी हो गई थी। बह कर सड़क के ढलान में जाते, कूड़ा मिले पानी को चुल्लू से पीते हुए व्यक्ति को देखा था तो संविधान में घोषित कल्याणकारी राज्य की अवधारणा को मानने वाले, परोपकाराय सतां विभूतयः और वसुधैव कुटुम्बकम का उद्घोष करने वाले दे¶ा की इस परिणति पर लज्जा अनुभव हुई। कहा गया है- यदि आप अतिथि के लिए और कुछ नहीं तो कम से कम जल, आसन और मधुर वचनों से स्वागत तो कर सकते हैं। पता नहीं, किस आस में राजधानी आए इस प्यासे अतिथि का यह कैसा स्वागत था? बचपन में गर्मियों के दिनों में हमारे अध्यापक हमें ¶ााम को रेलवे स्टे¶ान ले जाते थे जहाँ हम रेल यात्रियों को पानी पिलाते थे और अगले दिन के लिए कुँए से खींचकर पानी भरकर रख कर आते थे। आज पता नहीं, स्कूलों कालेजों में राष्ट्रीय सेवा योजना में क्या सिखाया जाता है? स्कूलों में या तो बच्चों को पानी उपलब्ध नहीं होता या फिर वह पीने लायक नहीं होता। बच्चे के लिए बस्ते की तरह पानी की बोतल भी एक आव¶यक वस्तु हो गई है।
अमरीका में आमतौर पर घरों में आने वाला पानी ¶ाुद्ध होता है। वहाँ एक भारतीय परिचित ने बताया कि वह नल का पानी ही पीता है क्योंकि वह अपेक्षाकृत अधिक ¶ाुद्ध हो सकता है क्योंकि उसकी समय-समय पर जाँच तो होती है जबकि किसे पता बोतल में बंद पानी कैसा और कितना पुराना है। अमरीका में कहीं प्याऊ नहीं हैं। जो खरीद सकते हैं वे लोग सामान्यतः घर का और सामान लाते समय पानी की बोतलों के क्रेट भी लाते हैं।
अमरीका में पानी की कमी नहीं है। अमरीका और कनाडा की सीमा पर मीठे पानी की पाँच बड़ी झीलें (ग्रेट लेक्स) हैं जिनमें दुनिया का 25 प्रति¶ात मीठा पानी है। फिर भी पानी बिकता है और उसका अपव्यय भी बहुत होता है। कैलीफोर्निया अमरीका एक समृद्ध राज्य है और आईटी और नई कंपनियों का एक प्रमुख केंद्र भी। पानी का अपव्यय और विक्रय वहाँ भी होता है। यह राज्य अब जल संकट से जूझ रहा है। वहाँ बोतल बंद पानी बेचने वाली एक कम्पनी को कोर्ट द्वारा यह निर्दे¶ा दिया गया कि वह पानी बेचे लेकिन जिनके पास पानी खरीदने के लिए पैसे नहीं हैं उनके लिए एक निः¶ाुल्क जल का साधन भी बनाए। मतलब अपने मन से कहीं संवेदना नहीं है और कानून से व्यक्ति को कानून-पालन का प्रदर्¶ान करने वाला बनाया जा सकता है लेकिन संवेदन¶ाीलता तो संस्कारों से आती है जिनका इस उपभोक्तावादी और व्यक्तिवादी संस्कृति में अभाव होता जा रहा है। और मज़े की बात यह है कि अपनी संस्कृति की महानता का ढिंढोरा पीटने वाले हम लोग भी विकास के अमरीका मॉडल को श्रेष्ठ मानते हैं और उसे ही अपनाने के लिए मरे जा रहे हैं तो फिर जल ही क्या, ¶ाुद्ध हवा तक की कमी होती जा रही है।
चीन ने अमरीकी विकास का मॉडल अपनाया है इसलिए उसकी भी दुर्द¶ाा ¶ाुरू हो गई है। जल की कमी और हवा के प्रदूषण की स्थिति बहुत असंतोषजनक है। चीन में बीजिंग का जल संकट दूर करने के लिए 1200 किलोमीटर दूर हान्जियंग नदी से पानी लाने के लिए 12 साल पहले 59 अरब डॉलर की एक योजना बनाई गई थी जिसकी लगत अब 80 अरब डालर हो गई है। इसे चीन का एक महान निर्माण तो कहा जा सकता है लेकिन क्या यह जल के सदुपयोग और जल संरक्षण की अयोग्यता नहीं माना जा सकता? आज हम भी लातूर में ट्रेन से पानी भेज कर अपनी संवेदन¶ाीलता और कर्मठता का नाटक कर रहे हैं लेकिन क्या यह दुरुपयोग, असुंतलन और मूर्खता और अदूरदर्¶िाता का प्रमाण नहीं है? जन्नत की यह हकीकत बहुत डरावनी है।
इस सृष्टि में सभी जीवों के जीवन के लिए सीमित साधन उपलब्ध हैं लेकिन अपव्यय के लिए कहीं भी गुंजाइ¶ा नहीं है। यदि उपलब्ध जल का सदुपयोग किया जाए, उसका सावधानी से संचय किया जाए तो न तो कहीं जल की कमी पड़ेगी और न ही इस प्रकार की नाटकीय कवायदें करनी पड़ेंगी। आज बंगलुरु जैसे झीलों के ¶ाहर में हालत यह है कि सभी झीलें भूमि-पुत्र खा गए और अब ज़मीन पर पानी बरसता है लेकिन अन्दर नहीं जाता बस, सड़कों पर ठहरा रहता है। इसी को कहते हैं- पानी बिच मीन पियासी। सभी ¶ाहरों में देर-सवेर यही हालत होने वाली है।
हालत लाइलाज होने से पहले भारत ही नहीं इस पूरी दुनिया को समझना होगा लेकिन इसके लिए कानून नहीं बल्कि त्यक्तेन भुंजीथा वाला आदर्¶ा अपनाना होगा। नहीं तो मरता क्या न करता वाली स्थिति आने पर फिर उसे सँभालना किसी के व¶ा में नहीं रहेगा। भारत सरकार ने जल संरक्षण के लिए पुरानी तकनीक अपनाने, जल का अधिक उपयोग करने वाली फसलों और जल का अपव्यय करने वाले धंधों पर पुनर्विचार करने का इरादा ज़ाहिर किया है लेकिन राजनीति के ¶ाब्द आचरण में उतरते कम ही देखे गए हैं फिर भी आ¶ाा तो करनी ही चाहिए-आ¶ाा बलवती राजन....

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