ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
पांचों नौबत बाजती
01-May-2016 12:00 AM 3733     

कल्पना कीजिये, कल्पना क्यों - ये दो वास्तविक प्रकरण हैं। मंच पर कुमार गन्धर्व का गायन चल रहा है - उड़ जायेगा... हंस अकेला... भक्ति की रस धार बह रही है, गायक के स्वर सीधे ब्राहृ से जुड़े हैं श्रोता वर्ग मंत्र मुग्ध है, आँखें बंद हैं, कुछ मुंडियां हिल रही हैं, कुछ की अश्रुधार बह रही है, हर कोई रस विभोर है, गूंगे के गुड की भान्ति सभी रसास्वादन कर रहे हैं। जैसे सभी के ध्यान इस असार संसार से परे परब्राहृ में लीन हैं। पंडित जी (कुमार गन्धर्व) तन्मय हैं गायन में, श्रोता तल्लीन है श्रवण में। यही एक बिंदु है उस परब्राहृ से एकात्म होने का।
दूसरा दृ¶य : पंडित पुरुषोत्तम दास जलोटा का मंच। झीनी झीनी बीनी चदरिया... दास कबीरा जतन से ओढ़ी, ज्यों की त्यों धर दीनी चदरिया। यह भी एक अनोखी चादर है। "पांच तत्व और तीन गुणों से बनी हुयी' इस में मेरा कुछ नहीं है...
इस चादर की बुनावट और हमारे इस ¶ारीर रचना में क्या कोई साम्यता है, हाँ है। चादर में एक ताना है, एक बाना है, बीच में है एक तार। ¶ारीर की बुनावट में भी तीन नाड़ियाँ प्रमुख हैं- इंगला, पिंगला और सुषुम्ना। एक सूर्य दूसरा चंद्रमा, एक प्रका¶ा दूसरा अन्धकार, एक सुख दूसरा दुःख, इनको जोड़ने वाली एक नाडी सुषुम्ना, सरस्वती अथवा मेरुदंड। कुछ भी नाम दो। यह ¶ारीर रूपी चादर झीनी-झीनी है। मैंने इसे यत्न से रखा, मैं कहीं किसी ओर लिप्त नहीं हुआ। मैंने सहज और स्वाभाविक रूप से अपना जीवन यापन किया है।
डॉ. हेम भटनागर की पुस्तक को पढ़ने के लिए इन दो प्रकरणों को याद करना आव¶यक था। डॉ. भटनागर ने अपनी पुस्तक "पाँचों नौबत बाजती' की भूमिका "मेरे भीतर का अनहद' में एक प्र¶न उठाया है- कबीर अथवा अन्य किसी भी संत को पढ़ाते समय छात्रों को कौन सा अर्थ बताया जाये। उनकी एक छात्रा ने परीक्षा में कबीर के पद की व्याख्या उन के बताये योगपरक अर्थों में कर दी। परिणाम क्या हुआ। परीक्षक को यह व्याख्या ठीक नहीं लगी। इस सम्बन्ध में लेखिका ने वाराणसी के डॉ. श्री कृष्ण लाल की चर्चा की है। डॉ. लाल ने इस प्रकार की असमंजसता की स्थिति से उबरने के लिए एक रास्ता निकाल रखा था। वे अपनी कक्षा में छात्रों से पूछते थे- चवन्नी वाला अर्थ (चाहिए) या रुपये वाला। अधिकाँ¶ा छात्र ¶ाायद चवन्नी वाला अर्थ ही पसंद करते होंगे जो समझने में भी सरल हो और परीक्षक को भी ठीक लगे।
प्रस्तुत पुस्तक का नाम है "पाँचों नौबत बाजती'। ¶ाीर्षक की व्याख्या पुस्तक के तीसरे भाग के दूसरे अध्याय में दी गयी है। इस अध्याय का ¶ाीर्षक ही पुस्तक का ¶ाीर्षक बनाया है। प्रायः लेखक अपनी पुस्तक का नामकरण पुस्तक के प्रथम अध्याय के अनुसार करते हैं। परन्तु यहाँ यह एक वि¶ोष उद्दे¶य से किया गया है। इस पुस्तक में कबीर की काव्य साधना को संगीत प्रधान बना कर प्रस्तुत किया गया है। इस में कबीर एक संगीतज्ञ के रूप में उभरते हैं। मात्र संगीतज्ञ ही नहीं वरन एक दार्¶ानिक संगीतज्ञ के रूप में प्रकट होते हैं। इस पुस्तक को पढ़ने से लगता है कि अभी तक कबीर को जितना पढ़ा अथवा समझा था वह सब बेमानी था, व्यर्थ था। कबीर को समझने के लिए संगीत का ज्ञान होना श्रेयस्कर होगा।
इस पुस्तक को पढ़ते समय कुछ नए धरातलों से गुज़रना होगा। कभी-कभी लगता है कि कबीर एक संत, संगीतज्ञ, एक दार्¶ानिक अथवा एक समाज सुधारक ही नहीं वरन एक ¶िाक्षा ¶ाास्त्री भी हैं। ¶िाक्षा ¶ाास्त्री के रूप में कबीर आज के बड़े-बड़े ¶िाक्षाविदों, ¶िाक्षा आयोग के अध्यक्षों, कुकुरमुत्तों की तरह उगने वाले नए-नए आकर्षक विज्ञापनों से भाते वि·ाविद्यालयों के कुलपतियों पर भारी पड़ते हैं। हमारे प्रायः सभी उपनिषदों का आधार गुरु-¶िाष्य का वार्तालाप है। मुण्डक उपनिषद में महा¶ााल ¶ाौनक और महर्षि अंगीरा का वार्तालाप विद्या और अविद्या पर केन्द्रित है। डॉ. भटनागर की पुस्तक का प्रथम भाग "¶िाक्षा' उसी धरातल से उठता है। इस भाग में छह अध्याय हैं और इन में मुख्य बल सतगुरु, सत¶िाष्य, ¶िाक्षा, और पाठ्यक्रमों पर दिया गया है। लेखिका ने गुरु की आव¶यकता और महत्ता, सतगुरु की वि¶ोषताएं, ¶िाक्षा के विषय, ¶िाक्षा सामग्री का चयन, आधुनिक ¶िाक्षा प्रणाली, ¶िाक्षा जगत का सम्पूर्ण ढांचा, और आज की तोता रटंत विद्या आदि विषयों को कबीर के माध्यम से प्रतिपादित किया है।
सतगुरु की महिमा अनंत
अनंत किया उपचार
लोचन अनंत उघाडिया
अनंत दिखावन हार
गुरु के प्रति असीम कृतज्ञता का भाव व हम युगों युगों से कहते रहे है।
गुरुब्र्राहृा गुरुर्विष्णु, गुरुर्देवो महे·ार। लेकिन इसकी आव¶यकता आज के युग में अधिक है। आज के युग में ¶िाष्य ही नहीं, ¶िाक्षक भी दिग्भ्रमित है। इसीलिए कबीर ने गुरु के लिए सतगुरु और ¶िाष्य के लिए सत¶िाष्य ¶ाब्द का प्रयोग किया है। सत¶िाष्य का अर्थ है ¶िाक्षा के लिए सुपात्र ¶िाष्य। कुपात्र नहीं। इस में विद्या का योगदान अधिक।
"विद्या ददाति विनयम - विनयाद याति पात्रताम।
पात्रत्वाद धनमाप्नोती - धनाद धर्मस्तत सुखं।।
लेखिका ने आज के अखबारों, विज्ञापनों, सीरयलों, फै¶ान ¶ाो, स्त्री देह का प्रदर्¶ान, आदि की चर्चा करते समय कबीर की फटकार को सामयिक सन्दर्भ दिया है।
एक कनक अरु कामनी विष फल की एउ पाई
देखै ही थै विष चढ़े, खाएं सू मारी जाई (पृष्ठ 30)
¶िाक्षा, ¶िाक्षार्थी और ¶िाक्षक के सन्दर्भ में कुछ विचारणीय प्र¶न। कुछ दिन पहले हम सब ने परीक्षा में नक़ल करने के कुछ चित्र टीवी के समाचारों में देखे थे। स्कूल/कालेज की ऊँची-ऊँची दीवारें फांदते हुए छात्र किस तरह अपनी जान हथेली पर लेकर परीक्षा देते हुए छात्रो को नक़ल की सामग्री दे रहे थे। एक अखबार की दो सुर्खियाँ इस प्रकार हैं।
"परीक्षा में नक़ल नहीं करने देने पर छात्रों ने लगाई इंजीनियरिंग कालेज में आग।'
"ट्यू¶ान पढ़ने गए छात्र की दोस्तों ने की हत्या।'
क्या ये मात्र सुर्खियाँ हैं? क्या आज के सन्दर्भ में ये सामान्य घटनायें हैं? इन से कहीं कोई हलचल क्यों नहीं होती? क्या यह सामाजिक रुग्णता के लक्षण नहीं है? क्या ये ही हमारे प्रगति¶ाील समाज के प्रतीक हैं? लगता है हमारी संवेदन¶ाीलता अब समाप्त हो चुकी है। कुछ दिन पहले दे¶ा में सहिष्णुता और सहन¶ाीलता ¶ाब्दों को लेकर काफी लम्बी बहस चली। आजकल "आज़ादी' को परिभाषित करने का अभियान चल रहा है। हर व्यक्ति, बच्चा, युवा, युवती अपने ढंग से इसे परिभाषित कर रहा है। ¶िाक्षक और ¶िाक्षार्थी के संबंधों में भी अब बदलाव आ रहा है। इन में एक झीना पर्दा था जो अब हटता जा रहा है। छात्र-छात्राओं में यौन उन्मुक्तता अथवा खुलापन प्रगति¶ाील होने का प्रमाण पत्र हो गया है।
सो¶ाल मीडिया- मोबाइल, सेल्फी, एसएम्एस, फेस बुक आदि से होते हुए हम अब व्हाट्सएप को लांघते हुए तेज़ गति से आगे बढ़ रहे हैं। यह नए युग की आव¶यकता भी है लेकिन इनके कुछ नकारात्मक प्रभावों के प्रति सजग रहना भी उतना ही आव¶यक है। कुछ समय पहले दे¶ा के कुछ उच्च पदस्थ व्यक्तियों के विदे¶ा भ्रमण के दौरान उनके रंगरेलियों के वीडियो सामान्य तौर पर देखे गए। ये उन व्यक्तियों की छवि तो धूमिल करते ही हैं दे¶ा के नाम को भी बदनाम करते हैं। हास्य के नाम पर फूहड़ चुटकुले आदि छोटे बच्चों के कार्यक्रम में खुले तौर पर परोसे जाते  हैं। कष्ट तब होता है जब इन में अभिभावक भी उदारता पूर्वक सम्मिलित होते हैं और बच्चों का उत्साहवर्धन करते हैं।
अधिक दिन नहीं हुए जब दे¶ा के एक राज्य में क्षेत्रीयता और जाति आरक्षण की मांग को लेकर तोड़ फोड़, लड़ाई झगडे, सार्वजानिक सम्पत्ति का नुक्सान आदि हुआ। ऐसा लगता था जैसे हम अपने अधिकार के लिए अपनी नहीं वरन किसी विदे¶ाी सत्ता से लड़ रहे हों। हम ¶िाक्षण व्यवस्था की चर्चा कर रहे थे। कबीर के अनुसार इस सामाजिक रुग्णता का कारण बाहर नहीं वरन अन्दर ही है। इस के लिए गुरु-¶िाष्य दोनों ही उत्तरदायी है माता पिता तो हैं ही।
गुरु कुम्हार ¶िाव कुम्भ है गढ़ी गढ़ी काढ़े खोट।                       
अंतर हाथ सहार दे बाहर बाहे चोट।।
हमारी आज की त्रासदी यह है कि हमारे किसी के भी पास समय नहीं है। हर व्यक्ति तनाव ग्रस्त है। इस तनाव का कारण है- भावी भय। एक ऐसा भय जिस हम जानते भी नहीं और जिस की सम्भावना सदा बनी रहती है। कबीर कहते हैं कि यदि व्यक्ति भय मुक्त हो जाये तो तनाव भी स्वयमेव समाप्त हो जायेगा। दूसरे अध्याय में कबीर पति पत्नी के माध्यम से ब्राहृ मिलन की दिव्यानुभूति के संकेत देते हैं। यह जीवन दृष्टि का दूसरा पक्ष है। यहीं पर कुण्डलिनी जगाने की प्रक्रिया, नाद अनहद, पांचों नौबत, छत्तीसों राग-रागनियों की चर्चा की गयी है। इस अनहद नाद के सामने संसार के सब नाद व्यर्थ हैं।
पुस्तक के तीसरे भाग का नाम है- साधना। इस में चार अध्याय हैं। इस में आज के रुग्ण, हिंसाग्रस्त, असत्य और अरूप समाज में अलख जगाने की बात कही गयी है। रे अवधूत तू युगों युगों से योगी है। मन तन चित्त और आत्मा को जोड़कर जीवन का आनन्द लेे।
"एकतारे की गूँज' यह है पुस्तक के चौथे भाग का नाम। एकतारा एक साधारण सा वाद्य यन्त्र है। प्रायः सभी साधु संत भक्त इसे अपने साथ रखते हैं। यह प्रतीक है सादगी और सरलता का। इस भाग में छह अध्याय हैं और ये सब पुस्तक के ¶ाीर्षक के अनुसार कबीर काव्य के संगीत पक्ष को समर्पित हैं। इस में कबीर की सांगीतिक पृष्ठभूमि, इस में प्रयुक्त राग रागिनियाँ, लोक गायन ¶ौलियाँ, सांगीतिक पारिभाषिक ¶ाब्दावली का वि¶लेषण किया गया है।
पुस्तक में सौन्दर्य संवर्धन के लिए रेखाचित्रों का प्रयोग किया गया है। ये रेखा चित्र साधारण रेखा चित्र नहीं हैं वरन कथ्य के अनुरूप हैं। इसका कारण है लेखिका डॉ. हेम भटनागर एक भाषाकार होने के साथ-साथ एक संवेदन¶ाील संगीतकार और चित्रकार भी हैं। सबसे अधिक प्र¶ांसनीय यह है कि लेखिका ने पुस्तक अपनी छात्राओं को समर्पित की है। एक सतगुरु से यही अपेक्षित था। मुद्रण, संयोजन और प्रका¶ान की दृष्टि से पुस्तक नि¶चय ही सर्वोत्तम मानी जाएगी। पुस्तक पढ़ते समय मेरे कानों में कुमार गन्धर्व और पुरुषोत्तम दास जलोटा की स्वर लहरी गूंजती रही।

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