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पांच पत्र मैथिली से अनुवाद जगदीश चन्द्र ठाकुर
01-Jan-2016 12:00 AM 3112     

(1)
दरभंगा, 1-1-19
प्रियतमे!
तुम्हारी लिखी चार पंक्तियाँ मैंने चार सौ बार पढ़ी, फिर भी मन नही भरा। आचार्य की परीक्षा सर पर है, मगर किताब पढ़ने में जरा भी मन नही लगता। हमेशा तुम्हारी ही मोहिनी मूरत आंखों के सामने नाचती रहती है।
मेरी राधा रानी, मन करता है कि तुम्हारा गाँव वृन्दावन हो जाए जिसमें केवल तुम और मैं राधा-कृष्ण जैसे अनंत काल तक विहार करते रहें, परन्तु, मेरे और तुम्हारे बीच में बहुत बड़ा रोड़ा हैं तुम्हारे पिताजी और चाचाजी जो दो महीने के बाद होली में आने को लिख रहे हैं। साठ बरस के बुड्ढ़े को क्या समझ में आएगा कि साठ दिनों की विरह-वेदना कैसी होती है।
प्राणे?ारी, तुम एक काम करो। माघ के अमावस्या को सूर्यग्रहण लगेगा। उसमें अपनी माँ के साथ सिमरियाघाट आ जाओ। मैं वहां पहुंच जाऊँगा और तुझे ढूँढ़ लूँगा। हाँ, एक गुप्त बात लिख रहा हूँ। जब औरतें ग्रहण-स्नान करने चली जाएंगी, तब तुम कोई बहाना बना कर डेरे पर रुक जाना। मेरा एक साथी फोटो खींचना जानता है, तुम उससे फोटो खिंचवाना।
देखो, यह बात किसी को पता न चले, नहीं तो तुम्हारे पिता और चाचाजी कैसे हैं, ये तो तुम जानती ही हो।
ह्मदये?ारी, मैंने तुम्हारी फरमाइश के अनुसार, चन्द्रहार खरीद कर रख ली है, सिमरिया में मिलने पर चुपचाप दे दूंगा। किन्तु, ध्यान रखना कि किसी को पता न चले। मेरे पिताजी को पता लग गया तो खर्चा देना बंद कर देंगे।
हाँ, इस पत्र का जवाब लौटती डाक से देना, इसलिए लिफ़ाफ़ के भीतर लिफ़ाफ़ भेज रहा हूँ। पत्रोत्तर भेजने में एक दिन भी देर मत करना। मेरा एक-एक क्षण पहाड़ जैसा बीत रहा है।
तुम्हारी प्रतीक्षा में आतुर
तुम्हारा ही कृष्ण
हाँ, एक बात और। पत्र डाक से छोड़ने के लिए किसी दूसरे को मत देना, अपने हाथ से छोड़ना। सुबह होने से पहले ही आँचल में छुपाकर लेती जाना और जब कोई न रहे तो लेटर बॉक्स में गिरा देना।

(2)
हथुआ संस्कृत विद्यालय
1-1-29
प्रिये,
कई दिनों के बाद तुम्हारा पत्र पाकर आनंदित हुआ। तुमने लिखा है कि बेटी तुसारी पूजेगी, इसलिए एक अठहत्थी साड़ी जल्द ही भेज दूंगा।
बंगट अब स्कूल जाता है कि नहीं? बदमासी तो नहीं करता है?
तुम लिखती हो कि छोटी को दांत निकल रहा है, सो वैद्यजी से मंगबाकर उसको दस्तवाली दबाई देना।
तुमको भी इस बार घर पर बहुत कमजोर देखा, जीरकादि पाक बनाकर उसका सेवन करो। जाड़े में शरीर नहीं बना तो दिन-प्रतिदिन कमजोर होती चली जाओगी। वहां, दूध उठौना लिया करो। कम-से-कम पाव भर रोज पिया करो।
कुछ दिनों के लिए तुम्हें यहाँ बुला लेता, मगर डेरे में दिक्कत होगी। दूसरी बात यह है कि विद्यालय से कुल साठ रुपये मात्र मिलते हैं। इतने में यहाँ पांच लोगों का गुजारा होना कठिन है और तीसरी बात यह है कि माँ के पास कौन रहेगा?
यही सब सोचकर रह जाता हूँ, नहीं तो तुम्हारे यहाँ रहने से मुझे भी अच्छा होता, दोनों शाम सिद्ध भोजन मिल जाता, बंगट को भी पढ़ने में सुविधा होती, छोटकी बेटी से मन भी बहलता। पर, क्या किया जाए?
बड़ी वाली कुछ और बड़ी हो जाए तो उसको बूढ़ी की सेवा में रखकर कुछ दिनों के लिए तुम यहाँ आ सकती हो। पर, अभी तो घर छोड़ना तुम्हारे लिए संभव नहीं होगा।
मैं होली की छुट्टी में घर आने की कोशिश करूँगा। अगर नहीं आ सका तो मनीआर्डर से रुपया भेज दूंगा।
तुम्हारा
देवकृष्ण
हाँ, एक बात और। चिट्ठी छोड़ने के लिए दूसरे किसी को मत देना। अपने हाथों छोड़ना। सुबह होने से पहले ही आंचल में छुपाकर लेती जाना। जब कोई नहीं रहे, तो लेटर बॉक्स में डाल देना।

(3)
हथुआ संस्कृत विद्यालय
1-1-39
शुभाशीर्वाद।
तुम्हारी चिट्ठी पढ़कर मैं अथाह चिंता में पड़ गया।
इस बार धान नहीं हुआ तो साल भर काम कैसे चलेगा? माँ के श्राद्ध में पांच सौ कर्ज हो गया, उसका ब्याज दिन-दिन बढ़ता ही जा रहा है। दो महीने में बंगट की परीक्षा होगी, उसमे करीब पचास रूपया फीस लगेगा। अगर पास कर गया तो किताब खरीदने में भी पचास रूपये लग ही जाएंगे।
मैं इसी चिंता में पड़ा हूँ। यहाँ एक महीने का अग्रिम वेतन ले रखा हूँ। उसके ऊपर नब्बे रुपया उधार हो गया है। ऐसी स्थिति में बासठ रूपये मालगुजारी के लिए कहाँ से भेजूँ? अगर हो सके तो तम्बाकू बेचकर पीछे का बकाया अदा कर देना। भोलबा जो खेत बटाई किए हुए है, उसमें इस बार रबी कैसा है?
कोठी में एक महीने के लिए भी चावल नहीं है, उस पर लिखती हो कि बेटी ससुराल से दो महीने के लिए आना चाहती है। यह जानकर मैं किंकर्तव्यबिमूढ़ हो गया हूँ। उसे बच्चा भी होने वाला है, दो बच्चे भी हैं। सबों का ख़याल तुम रख पाओगी? अब छोटी बेटी भी 10 वर्ष की हो गई, उसकी भी शादी की चिंता है। रात-भर यही सब सोचता रहता हूँ। फिर भी अपने वश में है क्या?
देखता हूँ भगवान किस तरह पार लगाते हैं।
शुभाभिलाषी   
देवकृष्ण
हाँ, एक बात और। जलावन ख़तम हो गया है तो उतरवरिया हत्तावाला सीसम मंगवा लेना। मैं कुछ दिनों के लिए गाँव आता मगर जब भैंस ही विसुख गयी है, तो आकर क्या करूँगा?
तुम्हारा,
देव कृष्ण

(4)
हथुआ संस्कृत विद्यालय
1-1-49
आशीर्वाद।
मैं दो महीने से बहुत बीमार था, इसीलिए पत्र नहीं दे सका। तुम लिखती हो कि बंगट पत्नी को लेकर कलकत्ता चला गया। आज-कल के बेटे-बहू जैसे नालायक होते हैं सो तो जानती ही हो। हम लोगों ने उनकी खातिर क्या-क्या नहीं किया, किस प्रकार बी.ए. कराया सो मैं ही जानता हूँ। उसका प्रतिफल वह दे रहा है। मैंने तो उसी दिन उससे उम्मीद छोड़ दी जिस दिन से वह मेरे जिन्दा रहते ही मूंछें मुड़वाने लगा। सास की बातों में पड़ कर आशीर्वादी का पैसा हम लोगों को देखने भी नहीं दिया। अगर जानते कि बहू आते ही ऐसा करेगी तो मैं किसी भी हालत में दक्षिण की ओर शादी नहीं स्वीकार करता। 1500 रुपैया लेकर हमने जो पाप किया, उसी का फल भोग रहे हैं। उसमें से अब 15 रुपैया भी नहीं बचा है और बेटा समझता है कि पिताजी रुपैया जमीन में गाड़े हुए हैं। वह अब कुछ नहीं देगा और न बहू तुम्हारे कण्ट्रोल में रहेगी। उसको उचित था कि तुम्हारे साथ रहकर खाना-उना बनाती, सेवा-शुश्रुर्षा में रहती, लेकिन वो तुम्हारी इच्छा के विरुद्ध बंगट के साथ कलकत्ता चली गयी। वहां बंगट को 150 रूपये में अपना खर्च चलाने में कठिनाई होती है, पत्नी को कहाँ  से खिलाएगा? जो हम लोगों ने 30 साल में नहीं किया सो इन लोगों ने तीन महीने में कर दिखाया। खैर, क्या करोगी? अभी गदह-पचीसी है। जब आदमी बनेगा तब खुद समझेगा।  ई?ार सुमति दें। विशेष क्या लिखें? कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति।
देव कृष्ण  
हाँ, एक बात और। अगर खर्चे की तकलीफ हो तो छः कट्ठे डीह जो तुम्हारे नाम से है, वह गिरवी रख कर काम चलाना। तुम्हारा चन्द्रहार जो बंधक पड़ा है सो तो जब ई?ार की कृपा होगी, तब तो छूटेगा ही।

(5)
काशी
1-1-59
स्वस्ति श्री बंगट बाबू को मेरा शुभाशीष।
अत्र कुशलं तत्रास्तु। आगे समाचार यह है कि इस जाड़े में मेरा दम्मा फिर उखड़ गया है। रात-रात भर बैठकर खांसी करता रहता हूँ। अब काशी-वि?ानाथ का कब बुलाबा आता है, क्या पता। संग्रहणी भी ख़तम नहीं हो रहा है। अब हम लोगों की दवा ही क्या? "औषधं जाह्नवी तोयं वैद्यो नारायणो हरिः।' यहाँ सत्यदेव मेरी बहुत सेवा करता है।
तुम्हारी माँ बातरस से परेशान है, यह जानकर दुःख हुआ मगर अब उपाय ही क्या है? वृद्धावस्था का कष्ट तो भोगना ही पड़ेगा। वो चल-फेर लेती है कि नहीं? मैं आकर देखता, मगर आने-जाने में तीस-चालीस रूपये व्यर्थ खर्च हो जायेंगे। दूसरी  बात यह है कि अब मुझे भी यात्रा में  बहुत कष्ट होता है। तुमने लिखा है कि वह भी काशी वास करना चाहती है। मगर, उसको यहाँ बहुत तकलीफ होगी। अपनी परिचर्या करने योग्य तो है ही नहीं, मेरी सेवा क्या करेगी?
दूसरी बात यह है कि जब तुम लोगों जैसे सुयोग्य बेटे-बहू हैं ही तो घर छोड़कर यहाँ आकर क्या करेगी? मन चंगा तो कठौती में गंगा। वहां पोते-पोतियों के बीच रहती है। चि. पोतों को देखने के लिए मेरा भी मन तरसता है मगर क्या कर सकते हैं? जनेऊ तक जिन्दा रहा तो आकर आशीर्वाद दूंगा। तुम्हारा भेजा हुआ 30 रूपया प्राप्त हुआ। इससे च्यवनप्राश खरीदकर खा रहा हूँ। ई?ार तुम्हारा भला करे।
बहू को मेरा शुभाशीर्वाद कह देना। वह गृहलक्ष्मी है। तुम्हारी माँ जो उनसे झगड़ती है सो बिलकुल अनुचित है। मगर, तुम तो उसका स्वभाव जानते ही हो। वो जिन्दगी भर मुझे तकलीफ ही देती रही है। अस्तु "कुमाता जायेत क्वचिदपि कुपुत्रो न भवति', इस उक्ति को तुम चरितार्थ करो, यही मेरी कामना है।
इति देवकृष्णस्य
हाँ, एक बात और। अगर किसी दिन बूढी को कुछ हो जाए तो तुम लोगों के द्वारा सद्गति तो होगी ही। जिस दिन यह सौभाग्य हो उस दिन एक लकड़ी मेरे तरफ से भी चिता पर रख देना।
---- इति देवकृष्णस्य्

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