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ऑस्ट्रेलिया में बरखा
01-Jul-2016 12:00 AM 2830     

लोग मुझसे मौसम के बारे में कुछ भी पूछने से कतराते हैं क्योंकि वे जानते हैं कि मैं मौसम- विभाग में काम करता हूँ उन्हें आँकड़े सुना-सुना कर हलकान कर दूंगा। आँकड़े सुनाना किसी हथियार-प्रयोग में शामिल नहीं है। पत्थर से ले कर पिस्तौल या बम तक कुछ भी इस्तेमाल न हुआ हो तो पुलिस या अदालत कुछ बिगाड़ नहीं सकती। परन्तु गर्भनाल के संपादक जी को धन्यवाद है कि उन्होंने जानते हुये भी ओखली में सिर डालने की हिम्मत दिखाई है।
यदि मैं भारत में होता तो बरखा रानी पर बात करनी खूब जमती। बच्चों के कागज की नाव चलाने से लेकर किसानों की खुशी पर लिखने को बहुत कुछ था। और तो और वहाँ बारिश में मौसम भी कितना रोमांटिक हो जाता है! लिखने के लिये तो इतना भी काफी है। बॉलिवुड  के दिग्दर्शक भी कितने बुद्धिमान हैं जो इसी बहाने अभिनेत्रियों के अर्धनग्न दृ¶य दिखलाने का बहाना ढूंढ लेते हैं। पर यहाँ की तो बात मत पूछो। जरा-सी धूप होने पर तो लोगों की बांछें खिल जाती हैं। गोल-गोल मुँह खोल कर "लवली मोर्निंग', "लवली मोर्निंग' कहते हुये नहीं थकते मानो किसी ने उनके मुँह में लड्डू डाल दिया हो। फिर जरा सी हल्की-फुलकी बारिश होने पर मुँह बिचका लेते हैं और कहते  हैं "बेड वेदर'। इन नादानों को कौन समझाये "बेड वेदर' नाम की तो कोई चीज़ नहीं होती अलग-अलग प्रकार के "गुड वेदर' ही तो होते हैं।  भूल से ऐसा कभी आपने उनको कह दिया तो वे आपको दार्शनिक समझ कर अरस्तू और प्लेटो की पंक्ति में खड़ा कर देंगे। भैया, ऐसा किया तो पूरा-पूरा का भारत दार्शनिक की पंक्ति में खड़ा हो जायगा। हम कभी "रेन रेन गो अवे' नहीं कहते। "मेघ बाबा आ जा, दूध रोटी खाजा' से आज भी बचपन की यादें ताजा हो उठती है।
सचमुच भारत में कवियों की भी खूब जमती है। जब मैं भारत में था तो लिखता था- "भीगा सावन प्यार में/ जल में भीगा बदन/ सजनी साजन से करे/ कैसे प्रणय-निवेदन?' विरहिणियों के लिये लिखा था "पिया बिना बरसात में/ काटी रतियाँ जाग/  वेणी फूलों से लदी/डसती जैसे नाग' पर यहाँ तो मामला बड़ा सीधा-सपाट है। कोई एक चला गया तो दूसरा पकड़ लिया। "विरहिणी' का टेग माथे पर चिपकाने की जरूरत क्या है? इसका परिणाम यह होता है कि बेचारे कवि भी कविता लिखना भूल कर किसी "मौसम-विभाग' में काम शुरू कर देते हैं।
फिर मौसम-विभाग में भी चलता क्या है? कहते हैं अमुक केमिकल्स हवा में मत छोड़ो; सागर में मत फैंको। वे नहीं जानते कि हवा तो हवा है और सागर का दिल भी कितना बड़ा होता है! कहते हैं कचरा इधर-उधर मत फैंको! नासपीटे  कचरा फैंकने के आनन्द पर नजर लगाये बैठे हैं।  कचरे से तो हम भारतीयों को फूलों जैसा प्यार है तो हम बिखराते फिरते हैं। लेकिन वैज्ञानिक बड़े जिद्दी होते हैं जाने किस मिट्टी से बने हैं। मॉडल बना बना कर और सुपर कंप्यूटर से आँकड़े निकाल निकाल कर साबित करते हैं कि अब भी पृथ्वी के वातावरण को बचाया न गया तो कहीं तो समुद्र तल ऊपर उठेगा तो बाढ़ आयेगी और अनेक द्वीप डूब जायेंगे या फिर कहीं वर्षा के अभाव  में बारिश का नाम नहीं दिखेगा। तो इस बढ़ती हुई लापरवाही की फिलोसफी को मैं इन शब्दों में देखता हूँ- "बाँध का छेद बुदबुदाते देख/ न जाने क्यों/ मेरे पग/ सुप्त ततिं्रयों/ और ऊँघते दरवाजों को/ भड़भड़ाने के लिये/ भागने के बदले/ विप्लव के आह्वान मे डूब कर/ प्रलय की कल्पना करने लगे/ कि अब/ मनु कौन है और कामायनी कौन?/ सृष्टि क्या है और वृष्टि क्या?' ऐसी स्थिति को देख-देख कर मैं काँप उठता हूँ। हमारे ऋषि-मुनि प्रकृति पर विजय पाने की अपेक्षा प्रकृति में एकाकार होने की बात शायद इसलिये कहते थे। और मैं दिल से  भारतीय हूँ।  यहाँ बिदेस में देर रात तक रात्रि, बादल, वर्षा और आकाश में एकाकार होने के सपने देखा करता हूँ और लिखता हूँ- "गहरी नींद लगी सोया तो/ मैं स्वयं ही रात हुआ/ प्यास पी गया बादल बन कर/ मैं स्वयं बरसात हुआ।'
मेलबोर्न की बारिश के बारे में बहुत कुछ लिखना चाहता हूँ क्योंकि यहाँ मौसम एक प्रेयसी जैसा है जो पल भर में रूठ जाती है तो पल भर में निहाल कर देती है। कभी गर्म मिजाज कभी ठंड़ा। याने कि एक ही दिन में चारों मौसम- सर्दी, गर्मी, बरसात और सुहाना मौसम।  कभी अत्यधिक खुशी के कारण अश्रु बरसाती हल्की बौछार तो कभी धाड़ें मार-मार कर रोने वाली बारिश। तिस पर तुर्रा यह कि बारिश का कोई एक मौसम नहीं होता।  
मजे की बात है कि भारत में बारिश पहले बहुत तरसाती है फिर जम कर भी बरसती है तो प्रचंड रूप धर लेती है। यह देख कर मैंने लिखा था- "छागये लो बादल आकाश में/ प्यास धरती  को नल आकाश में/ खींचली साड़ी तारों से भरी/ द्रौपदी रोई छल आकाश में।' इस वर्षा के बाद मेढ़क टर्राते हैं किन्तु यहाँ पर मेढक देखने या उसकी टर्राहट सुनने को तरस गया हूँ। और फिर बारिश ही क्यों भारत में चुनाव आने पर भी मेढकों के जुलूस भाषण और नारेबाजी की टर्राहट जो सुनाई देती है यहाँ तो नदारद देखी। शुरू-शुरू में वि·ाास नहीं होता था कि बारिश हों और यह नन्हा प्राणी देखने न मिले। चुनाव का समय और शांत-शांत माहौल! भाषणबाजी खुद ब खुद कानों में पड़नी चाहिये इसमें टीवी खोलने की जरूरत क्यों हो? मेरा ऐसा मानना है कि जब कर्णकटु स्पीच, नीति-विहिन बकवास और कोरे नारे सुनाई पड़ें तब मौन ही उचित है। कहा है "वक्तारो दुर्दुरा यत्र तत्र मौनं हि शोभते।' पर यहाँ तो मैंने चुनाव के दौर में पोस्टर-विहिन, लाउडस्पीकर-विहिन ¶मशान जैसी शांति देखी तो मैं क्या करूँ यह किसी भी शास्त्र में कुछ लिखा नहीं है।
यहाँ पर सुदूर वनों और राष्ट्रीय उद्यानों में केंपिंग का बड़ा महत्व है। ऐसे इलाकों में जब भी वर्षा होती है तो इसके बाद जमीन से निकलते अजीब-अजीब कीड़े देख कर हैरत होती है। अचानक ख्याल आता है कि जमीन के ऊपर भले सिकन्दर, नेपोलियन या हिटलर का राज्य हो, भले राजतन्त्र, धर्म आधारित तन्त्र या प्रजातन्त्र हो पर भीतर तो इन कीड़ों का ही राज्य है। क्या भारत और क्या ऑस्ट्रेलिया! भूमिगत पलने वाले ये कीड़े भले ही वातावरण संतुलन में अच्छी भूमिका अदा करते हैं पर फिर भी अन्डरग्राउंड पलने वाले कीड़े जिन्हें लोग मफिया और डॉन के नाम से जानते हैं, समय-समय पर अपना सिर उठाते हैं तो तबाही के अलावा कुछ भी हाथ नहीं लगता।
मौसम विभाग में काम करता हूँ तो यह भी जानता हूँ कि कभी-कभी दुनिया की कुछ जगहों पर अजीब-अजीब किस्म की बरसात होने की रिपोर्ट मिलती है याने कि मछलियों की या मेढक की बरसात, कीड़े-मकोड़ों की बरसात, कभी तो सर्प जैसे जंतुओं की बरसात आदि। वैज्ञानिक कहते हैं यदि यह सच है तो ऐसा केवल तूफान-आँधी के कारण हो सकता है।  क्योंकि ये तूफान इन जंतुओं को उड़ा कर कई मील दूर वर्षा की तरह फैंकने की क्षमता रखते हैं। पर मेरी रुचि ऐसी बारिश में कम हो गई जब से मैंने मगरमच्छों की बारिश देखी हैं। जी हाँ आपने ठीक पढ़ा - मगरमच्छों की बारिश। ये मगरमच्छ हेलिकोप्टर में बैठ कर आते हैं गरीब मजदूरों के बहते झोपड़ों और तड़पते इंसान के आँसुओं का जायजा लेने के लिये। ये जीव आ·ाासन देते हैं पर मगरमच्छ होने के कारण इनके आँसू भी मगरमच्छी नहीं होंगे तो और क्या होंगे? समझ लो ऊपर स्वर्ग में देवता इंद्र है तो ये यहाँ के ये भगवान हैं, अपने पूरे ठाठ बाट में।
जिस तरह वेदों में वर्षा के देवता इंद्र हैं, चीन में "वर्षा-स्त्री' को वर्षा की देवी माना जाता है। वह सुबह में बादल का आकार ग्रहण करती है और शाम को बरसती है। पर एक बात मुझे अजीब लगती है कि यह देवी हमेशा अपने हाथ क्यों चाटती है! इसका क्या अर्थ है? कारण जो भी हो, मुझे तो इस देवी में भारतीय किसान के दर्शन हो जाते हैं। वे किसान जो सबका पेट भरते हैं, वे भी भूखे रहने को मजबूर होते हैं, लोन न चुका पाने के कारण आत्महत्या करने को मजबूर होते हैं। इधर अन्नदाता दाने-दाने को मोहताज हैं उधर बारिश की देवी अपने हाथ चाटने को मजबूर है।         
यहाँ हम बारिश होने पर प्रसन्न होने के बदले मुँह बिगाड़ते हैं। क्या करें, हम ऑस्ट्रेलियावासी हैं ही उल्टे इंसान। याने दक्षिणी गोलार्ध में सिर उल्टा और पैर  जमीन को छूते हुये, शीर्षासन करते हुये।  मकड़ी की तरह पैर जमीन से चिपका कर चलते हैं। जब भारत में मजे की बारिश होती है तो मेलबोर्न ठंड में काँपता है। उधर भारत जब पसीने से तरबतर होता है तब हम ऑस्ट्रेलियावासी लिहाफ ओढ़ते हैं, हीटर चलाते हैं। सिलिकन वेली के खिलते सुमन और भारत के अनजान कस्बे की कोयल कंप्यूटर के वेबकेम पर सुर में सुर मिलाती हैं- "बसन्त आया'। तब मेरी खिड़की से बाहर सूखे पत्ते आवारा पशुओं की भांति एक-दूसरे पर गिरते हुये भटकते हैं तब जी चाहता है अपना सिर सड़क पर ठोंक-ठोंक कर उल्टा चलूं। पैरों से सोच-सोच कर दिवाली में खेलूं फाग और होली में पटाखें छोडूं। फिर भय भी लगता है कहीं वास्तव में मेरा दिमाग उल्टा तो नहीं हो गया?

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