ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
एक दो : सुधा दीक्षित
01-May-2018 07:34 PM 1106     

एक
जब श्याम मेघ
क्षिति पर झुक कर
चातक की प्यास बुझाये
तब तुम चकोर बिरहन को
नभ में रह कर ना तरसाना
विधु बदली में छुप जाना।

जब रिमझिम वर्षा की फुहार
या कुहुक कोकिला की पुकार
सुनकर दामिनी खिलखिला पड़े
तब उसका मुख लख मुस्काना
विधु बदली में छुप जाना।

हाँ चन्द्र छटा बिखरा कर
अपनी सब चमक मिटा कर
हो जाये तेरी क्षीण कांति
मत फींका मुँह दिखलाना
विधु बदली में छुप जाना।

दो
बिना बताये ही तुम आये
तेज़ हवा के झोंके से
और वैसे ही चले गये तुम
रुके ना मेरे रोके से।

छोड़ गये यादों का मलबा
और विघटन की निशानियाँ
शुरू किधर से करूँ समेटना
बिखरी हुई कहानियाँ।

सोच रही स्तब्ध खड़ी मैं
शब्दहीन सूनेपन में
कैसे बदल गया कोलाहल
घर का ऐसे निर्जन में।

कोई भी ना प्यार करेगा
आयें कितने मौके से
दहशत भर दी सबके दिल में
तुमने अपने धोखे से।

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