ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
एक दो : सुधा दीक्षित
CATEGORY : कविता 01-May-2018 07:34 PM 563
एक दो : सुधा दीक्षित

एक
जब श्याम मेघ
क्षिति पर झुक कर
चातक की प्यास बुझाये
तब तुम चकोर बिरहन को
नभ में रह कर ना तरसाना
विधु बदली में छुप जाना।

जब रिमझिम वर्षा की फुहार
या कुहुक कोकिला की पुकार
सुनकर दामिनी खिलखिला पड़े
तब उसका मुख लख मुस्काना
विधु बदली में छुप जाना।

हाँ चन्द्र छटा बिखरा कर
अपनी सब चमक मिटा कर
हो जाये तेरी क्षीण कांति
मत फींका मुँह दिखलाना
विधु बदली में छुप जाना।

दो
बिना बताये ही तुम आये
तेज़ हवा के झोंके से
और वैसे ही चले गये तुम
रुके ना मेरे रोके से।

छोड़ गये यादों का मलबा
और विघटन की निशानियाँ
शुरू किधर से करूँ समेटना
बिखरी हुई कहानियाँ।

सोच रही स्तब्ध खड़ी मैं
शब्दहीन सूनेपन में
कैसे बदल गया कोलाहल
घर का ऐसे निर्जन में।

कोई भी ना प्यार करेगा
आयें कितने मौके से
दहशत भर दी सबके दिल में
तुमने अपने धोखे से।

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