ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
एक दो - जितेन्द्र वेद
02-Jul-2019 11:30 AM 1185     

एक

क्यों छीना जा रहा है प्यार और प्यास भी
छीनने को आतुर वे जीवन की आस भी

पंजों में फँसा लिया है, उन्होंने जहाँ को
कब्जा कर रोटी पर, छीन ली है साँस भी

आदिवासी भी धकियाये जा रहे जंगल से
छिन गए हैं उनसे पेड़ और तुच्छ घास भी

नदियाँ सुखाकर वे नहीं हुए संतोषी अब
बेचेंगे वे जानवर और इंसान का माँस भी

परबत भी होंगे जल्द उनके ही कब्जे में
लूट से कोई न बच पायेगा उनके पास भी

मुसलसल है लूट का कारनामा इन दिनों
कोई भी न पता लगा पाएगा या आभास भी।


दो

मत देखो ख्वाब आगे दरवाजा है बंद
मौजूदा दौर में मौत ने खोले दर चंद

गोरखपुर मुजफ्फरपुर में ही नहीं केवल
मौत लिख रही है रोज-ब-रोज नव छंद

वे डराते राष्ट्रवाद की शब्दावली प्रयोग कर
बच्चों को खाने को नहीं मिलते कंद

बच्चियों के शिकार पर होती नहीं उफ तक
बलात्कारियों के लिए करते वे बंद ही बंद

ओ मेरे आका, ओ इस दुनिया के रखवाले
क्यों कर दी तूने सब लोगों की मति मंद

तिश्नगी के इस दौर में पानी के लिए भागते सब
वे अलगू-जुम्मन को लड़ाने में हैं रजामंद।

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