ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
अफसर बनकर निकलना मसूरीसे
01-Aug-2019 03:15 AM 1026     

मसूरीके प्रशिक्षणका घोषित उद्देश्य तो यही है कि सरकरी सेवामें उच्चपदसे ही अपनी नौकरीका आरंभ करनेवाले अधिकारियोंको उनके आनेवाले वर्षोंके उत्तरदायित्व लिये तैयार करना। उन्हें बताना कि ग्रामीण स्तरसे लेकर अत्युच्च केंद्रस्तरतक सारे काम कैसे चलते हैं, नीतियाँ कैसे बनती हैं, आदेश कैसे निकाले जाते हैं, उनका अनुपालन कैसे करवाया जाता है, उनसे मिलनेवाला लाभ कैसे मापा जाता है इत्यादि। कुल मिलाकर पहले दिनसे ही अफसरकी भाँति सोचना, समझना और बरतना। यहाँके फाउंडेशन कोर्सके लिये आनेवाले अधिकारी प्रशासनके साथ-साथ विदेश सेवा, पुलिस, वन विभाग, रेल्वे, पोस्ट, कस्टम, इनकम टॅक्स, ऑडिट अँड अकाउंट्स, जिओलॉजिकल सर्वे आदि एक दूसरेसे नितान्त विभिन्न सेवाओंके लिये चुने गये होते हैं। उन सबके लिये पहले चार महिनोंकी एक जैसी प्रशिक्षण व्यवस्था होती है। क्लासेसमें विभिन्न विषयोंके साथ विशेष व्यक्ति भी लेक्चरके लिये आते हैं।
हमारी बॅचके लिये आये विशेष वक्ताओंमें एक थे उस दौरके बहुचर्चित शिक्षाविद् श्री जे.पी. नाईक जिन्होंने मुझे सर्वाधिक प्रभावित किया। शिक्षा नीतिपर और शिक्षाके विषयपर बिलकुल ही ढर्रेसे हटकर थीं उनकी बातें। मेरी अपनी सोच कुछ-कुछ उनके जैसी थी लेकिन उनके व्याख्यानमें स्पष्टता थी और उनके अपने प्रयोगोंमें देखे गये उदाहरणोंसे उनकी सत्यता भी समझमें आती थी। उनका मुख्य प्रतिपादन यह था कि शिक्षा व विकासकी नीतियाँ बनानेके लिये यदि हम अमरीकन शिक्षाप्रणालीका ही अनुसरण करेंगे तो सदाके लिये उनके अनुगामी ही बने रहेंगे। इसे हम एक सीधे रास्तेवाली दौड़के रूपमें सोचेंगे तो उनके वेगको और उनके विकासको हम कभी नहीं छू सकेंगे क्योंकि उनकी विकासदर भी सदा हमसे तेज ही रहेगी। हम इस बातको समझें कि विकास एक चक्राकार गतिमें चलता है, जो आज विकास दिखता है वही अति हो जानेपर विनाश बनता है और उसकी गति व दिशा दोनोंको उलटाना पडता है। इसीलिये हमारा लक्ष्य होना चाहिये कि उस चक्राकार गतिके पडावोंको समझें, उनकी रॅटरेसवाली गतिकी गलतियोंको पकडें, उनपर सोचें, उनसेे बचें। एक प्रकारसे वृत्तकी परिधीवाला रास्ता छोड बीच रास्तेसे उन पडावोंपर पहलेही पहुँच जायें, तब हम उनकी बराबरीमें आ पहुँचेंगे। क्या ये आवश्यक है कि हम हर नवजात बच्चेके लिये एक लकीर खींच दें कि तुम्हें पहले स्कूली पढाई पूरी करनी है, फिर स्नातककी, फिर स्नातकोत्तर, फिर पीएचडी वगैरा, तब कहीं तुम जीने लायक कहलाओगे। श्री नाईकके लेक्चरके बाद शिक्षा संबंधी मेरे विचारोंको एक ठोस धरातल मिला और वे पक्के होते गये। लेकिन मेरा दुर्भाग्य रहा कि मेरे नौकरीके लिये पुणे आनेके दिनोंसे उनका स्वास्थ्य खराब हो गया था और मैं एक छोटीसी मुलाकातके सिवा उनसे कोई चर्चा नहीं कर सकी।
मसूरीमें पढाईसे अन्य विषय भी थे। सरकारी शिष्टाचार कैसे निभाय़ा जाता है, फॉर्मल ड्रेस क्या होता है, नियत मुद्दोंपर फॉर्मल भाषण कैसे किया जाता है, अदि विषयोंका विविध देशोंके बीच निभाये जानेवाले राजशिष्टाचारके दौरान विशेष महत्व है। इनके अलावा कई उत्सवोंमें भाग लेनेहेतु सभीको उत्साहित किया जाता था- यह कहकर कि आगे आपलोगोंको ऐसे आयोजन करवाने पडेंगे। रामलीला, जन्माष्टमी, होली, दिवाली इत्यादी धूमधाम से मनाये जाते थे। लोककला, नृत्य, गायन, नाटक आदिकी तैयारियोंके लिये अलग कमरे बने हुए थे।
जन्माष्टमीपर हम कुछ प्रशिक्षणार्थियोंने अशी पाखरे येती शीर्षक प्रसिद्ध मराठी नाटकके हिंदी रूपान्तरका मंचन करने का विचार किया-- हिंदीमें भी यह नाटक प्रसिद्ध हो चुका है-- पंछी ऐसे आते हैं। इसमें मुझे हिरोइनका रोल करना था जो एक झल्लीसी लडकी थी। अपनी कल्पनाओंमें विचरनेवाली और दुनियादारीकी परवाह न करनेवाली एक लडकी। एक भटकता हुआ युवक आता है और उसकी विचारप्रणालीको बदल जाता है। लडकी उन स्मृतियोंको संभालते हुए अपने नये जीवनसाथीके साथ एक संतोषी जीवन व्यतीत करती है। उस घुमक्कडकी स्मृतियाँ उसके लिये नासूर नहीं वरन जीवनकी प्रेरणा बन जाती हैं।
हमारे एक साथी प्रशिक्षणार्थी शिवेंद्र सिन्हाने इस नाटकका चयन किया था। उसका निर्देशन और नाटककी सूझबूझ गजबकी थी। कई विषयोंपर उसके मौलिक विचार हुआ करते थे। भारतीय इतिहास और धर्मग्रंथोंपर वह मानों एक एनसाइक्लोपीडीया ही था। हीरोकी भूमिकामें बोहीदार नामक ओडिया प्रशिक्षणार्थी था। उसे हिंदी पढनेमें दिक्कत थी लेकिन नाटक करनेकी लगन पक्की थी। तो उसने पूरा हिंदी नाटक ओडिया लिपीमें लिखकर फिर अपने डायलॉग याद किये।
यह कितनी सरल युक्ति थी। मेरे विचारमें आया कि इसीके माध्यमसे हम विभिन्न भारतीय भाषाओंकी एकात्मताको और अधिक गहरा कर सकते हैं। अब तो कई बार मैं अपने हिंदी लेख किसी तेलुगु या किसी बंगाली साथीको भेजती हूँ तब उनकी लिपीमें लिप्यंतरण करके भेजती हूँ। इससे उन्हें मेरा लेख जल्दी समझमें आ जाता है। एक-एक पन्नेकी छोटी कथाको हिंदीमें टंकित कर उसका असमिया लिप्यंतरण कर असमियाँ बच्चोंके स्कूलोंमें मैंने भेजी हैं ताकि उन्हें एक नई कथा भी मिल जाये और उसे सुनकर उनकी हिंदी भी सुधर जाये। 1990 के आसपास सी-डॅकके बनाये अतिसरल सॉफ्टवेयर लीपऑफिसमें यह सुविधा थी। पर इसका महत्व समझे बिना सीडॅकने इस सॉफ्टवेयरको 2008 के आसपास सदाके लिये बंद करवा दिया और देशभरमें रोमन स्पेलिंगके माध्यमसे भारतीय लिपियाँ लिखनेकी विधिको प्रमोट करने लगे हैं। मैं इसे न केवल अपनी लिपियोंपर बल्कि भाषाओं व संस्कृतिपर भी खतरा मानती हूँ। एक सौभाग्यकी बात ये रही कि लीपऑफिसके लिये रचा गया कीबोर्ड जो भारतीय वर्णमालाके अनुक्रमसे चलता है, वही युनीकोडके द्वारा भारतीय लिपियोंका स्टॅण्डर्ड घोषित हो चुका है। अतः इस विधीसे आजके अपटूडेट संगणकोंपर लिखनेसे वह लेखन इंटरनेेेेट कम्पॅटिबल बना रहता है और विश्वके किसी भी संगणकपर वह जंक नहीं होता है। अपने कार्यकालमें और अब निवृत्ति पश्चात् भी संगणकपर भारतीय भाषाओंमें लिखनेकी इस विधीका प्रचार मैं यहाँ-वहाँ करती रहती हूँ।
मसूरी प्रशिक्षणका एक भाग था आर्मी अटॅचमेंट जो किसी सीमासे सटे आर्मी कॅम्पमें करना पडता है। उच्च प्रशासनिक अधिकारीही रक्षामंत्रालयसे संबंधित काम भी देखते हैं और प्राकृतिक विपदाकी स्थितिमें आर्मीसे समन्वय बनानेका उत्तरदायित्व भी होता है। विदेश नीति, बजेट आबंटन, आदि कई क्षेत्रके काम हैं जिन्हें सुचारु ढंगसे पूरा करनेके लिये आर्मीव्यवस्था और खासकर सीमापर आर्मीव्यवस्थाको समझना आवश्यक है। मेरे ग्रुपकी 12 दिनोंकी ट्रेनिंग राजौरी-पूंछ बॉर्डरपर थी।
दूसरा प्रशिक्षण होता है ट्रेकिंग ताकि देशकी सीमाका थोडाबहुत अनुभव हो सके। इसके लिये हमारे ग्रुपने देहरादूनकी माउंटेनियरिंग इन्स्टिट्यूटमें दस दिनका रॉक क्लाइÏम्बग ट्रेनिंग और दस दिनका गंगोत्री ट्रेक चुना था। एक तीसरा ट्रेनिंग था भारतदर्शन जिसके लिये हमारा ग्रुप आंध्र, कर्नाटक और ओडिसा घूम आया। एक अन्य ग्रुप ट्रेनिंग था पब्लिक सेक्टर अटॅचमेंट जो मैंने हटिया, राँची स्थित एचईसी के साथ किया। हर ग्रुपमें अलग अलग अधिकारियोंसे मेल-जोल बढा।
इन सभी प्रवासोंमें जब भी हम देशके ठेठ ग्रामीण इलाकोंके संपर्कमें आये तो मैंने पाया कि मेरे बचपनके ग्रामीण परिवेशके कारण उन लोगोंके साथ मैं जितनी सहजतासे घुलमिल लेती थी उतना कई अन्य अधिकारी नहीं कर पाते थे। रेलयात्राके पहले ही दिन जब मैंने अपनी चिउडा-गुडकी पोटली खोली तो ग्रामीण इलाकोंसे आये 2-3 अधिकारियोंने छीनकर उसका स्वाद लेना आरंभ किया जबकि कई उच्चभ्रू (भौंहें ऊँची कर तिरस्कार जतानेवाले) अधिकारी खिडकीसे बाहर देखने लगे। गंगोत्री यात्राके मध्य एकबार रास्तेपर दूकान डाले एक हलवाईसे मैंने अपने लिये आधा किलो ताजी जलेबी बनानेका ऑर्डर दिया तो कइयोंने इसे हेल्थ-हजार्ड बताया और जब जलेबी बन गई तो सारे बीस अधिकारी उसपर ऐसे टूटे कि मेरे हिस्से कुछ नहीं आया। कइयोंको मैंने हाथोंको बिना खराब किये चूसकर आम खाना सिखाया है, कुएँसे पानी खींचना सिखाया है, चूल्हेकी लकडीमें आलू भूँजकर खाना भी सिखाया है। सेंट-स्टीफेन, दून-स्कूल, आदि जगहोंपर पढकर आये और अपनी संस्कृतिको न समझनेवाले ऐसे अधिकारियोंपर तब मुझे हँसी आती थी और वे भी मेरे गँवारपनपर बहुत हँसते होंगे। एक प्रकारका अदृश्य कल्चरल डिवाइड मसूरीमें हुआ करता था जो इन यात्राओंके दौरान कभी-कभी समाप्त होता दीख जाता था।
यहाँ कुछ रुककर मैं यूपीएससी की चयन प्रक्रियाके विषयमें कुछ कहना चाहूँगी। पिछले पचास वर्षोमें इस प्रक्रियामें कई परिवर्तन हुए। इसका मूलसूत्र है क्विक स्टार्ट, अर्थात् चुने हुए नौजवान अफसरोंको प्रांरभसे ही एक बडे पदपर बिठाकर उन्हें ऑन ड्यूटी सक्षम करते जाना जिससे देश-प्रशासनके बडे-बडे काम वे छोटी आयुसे ही आरंभ कर सकें। नॅशनल डिफेन्स अकादमी, बँक ऑफिसर्स सिलेक्शन आदि कुछ अन्य संस्थाओंकी प्रक्रिया भी इसी सूत्रसे होती है। पढाईमें तीव्र बुद्धि रखनेवाले ही इस माध्यमसे आगे आ सकते हैं, लेकिन क्या उतनेभरसे उन्हें देशकी जनताकी समझ आती है? सत्य, ईमानदारी, लोकसेवा, आदि गुण उनमें उतरते हैं?
उन्नीस सौ सत्तरके दशकमें जब मैंने यह परीक्षा दी तब देशभरमें करीब डेढ लाख परीक्षार्थी थे। वह संख्या अब बढकर आठ लाखसे ऊपर हो गई है, तो यूपीएससी को भी पहला एलिमिनेशन राऊँड चलाना पड रहा है। पहले परीक्षाका माध्यम केवल अंग्रेजी था। लेकिन नब्बेके दशकमें भारतीय भाषाओंमे परीक्षा देना मान्य हो गया । पहले आईपीएस के लिये महिलाएँ नहीं जा सकती थीं लेकिन 1972 में वह निर्बन्ध हटनेसे श्रीमति किरण बेदी देशकी पहली महिला आईपीएस बनी। यही निर्बन्ध आगे सेनाके लिये भी हटा और अब तो नेव्हीकी लेडिज बटालियन, एयरफोर्समें फायटर पायलटिंग, छब्बीस जनवरीकी परेडमें महिला अधिकारी द्वारा सैन्य संचलन आदि सभी जगहोंमें महिलाओंपर लगे निर्बन्ध हट गये हैं। दिव्यांगोंके लिये भी चयन प्रक्रिया खुल गई है।
लेकिन इतना होकर भी चुनाव प्रक्रियामें अंगरेजियतका वर्चस्व नहीं घटा है। हिंदी व देशी भाषाके विद्यार्थियोंको भी अपनी-अपनी मातृभाषा में पेपर लिखकर प्रशासनमें चुनकर आनेका अवसर दें, इस माँगकी आधी-अधूरी पूर्ति होनेमें 45 वर्ष लग गये। चुनकर आनेवाले प्रतिभागियोंको अपनी तैयारीके लिये आज भी वही पुस्तकें पढनी होती हैं और वे ही प्रश्न पूछे जाते हैं जो पश्चिमको श्रेष्ठ और भारतकी संस्कृतीको अंधविश्वासी बताती हैं। पुस्तकें वे ही सही हैं जो पश्चिमी लेखकोंने लिखी हैं, न कि भारतीयोंने। पढाई भी उन विषयोंकी करनी होती है जिनमें विदेशी शोधकर्ताओंने अफ्रीका इत्यादि स्थानोंपर काम किये हैं, न कि वे जो भारतसंबंधी हैं। उदाहरणस्वरूप 2013 की परीक्षामें वृक्षोंके विषयमें प्रश्न था -
कॅन्सर रोगके उपचारहेतु उपयोगी वृक्ष कौनसे हैं --
ऑप्शन -- विलो, यू-वृक्ष, डॉग-फिश, वाईन, मेंढक
क्या कभी किसी भारतीयने इन वृक्षोंका नाम या उपयोगिता सुनी है? भारतके भावी प्रशासकोंको इन वृक्षोंका ज्ञान तो होना चाहिये, लेकिन कभी नीम, पीपल, बरगद, आम, कटहल जैसे वृक्षोंकी जानकारी नहीं पूछी जाती, मानो भारतीय होनेके कारण उन वृक्षोंका अस्तित्व भी महत्वहीन हो गया हो। इसी मानसिकताके कारण देशपर तब संकट आया जब अमरीकामें किसी अमरीकीने हल्दीके गुण और उपयोगका पेटंट फाइल किया। आखिर उसका निराकरण करनेके लिये श्री माशेलकर जैसे वैज्ञानिकको सामने आना पडा। इस घटनाका वर्णन करते हुए उन्होंने लिखा है कि पेटंट-क्लेमका मुकाबला करनेके लिये उनका वह ज्ञान काम नहीं आया जो अपनी डॉक्टरेटतककी पढाईमें पाया था वरन वो काम आया जो उनने अपनी माँसे अनौपचारिक रूपसे सीखा था।
तो प्रश्न उठता है कि देशभरका प्रशासन चलानेके और देशकी विकासनीतियाँ बनानेके हेतु ये जो प्रति वर्ष हजार, डेढ़ हजार अफसर चुने जाते हैं उनसे हम कैसा प्रशासन चाहते हैं? क्या उन्हें गांवोंकी जानकारी होती है, या अपनी संस्कृतिकी, अपनी परपराओंकी? और क्या वे उन्हें तोडनेमें लगेंगे या उनको देशके सामथ्र्यके रूपमें प्रयोग कर पायेंगे? ऐसे कई मुद्दे हैं जिनके लिये यूपीएससी को ही एक योग्य दिशानिर्देशके साथ-साथ अविरत चिन्तनकी आवश्यकता है। मसूरी ट्रेनिंगके कालमें यदि डायरेक्टर उन विचारोंके हों तो इसका थोडा-बहुत ध्यान रखा जाता है कि इन युवाओंको कमसे कम उस एक वर्षमें इन बातोंकी जानकारी मिल सके। इस कारण हमारे डायरेक्टरका चलाया श्रमदान कार्यक्रम मुझे भा गया था। लेकिन ऐसा कोई नीतिगत चिन्तन मसूरीमें प्रायः नहीं हो पाता है।
समयकी गति ऐसी है कि पलक झपकते ही कई महीने, कई वर्ष निकल जाते हैं। मसूरीमें भी जुलाईसे ट्रेनिंग आंरभ हुई और दिवाली बीतते-बीतते फांउडेशन कोर्स पूरा करके आईएएस के सिवा अन्य सभी सर्विसेसके प्रशिक्षणार्थी अपनी-अपनी सर्विसके प्रशिक्षण केंद्रोंमें रवाना हो गये। पुलिस सेवावाले गये हैदराबाद। विदेश सेवावाले दिल्ली, इनकम टॅक्सवाले नागपूर, वनविभागवाले देहरादून इत्यादि।
हम जब आर्मी अटॅचमेंटकी ट्रेनिंगसे जनवरीमें वापस आये तो मसूरी अकादमीका सवा हजार प्रशिक्षणार्थियोंसे गूँजने वाला कॅम्पस अपनी मौन गंभीरतासे हम डेढ सौ आईएएस अफसरोंको जता रहा था कि अब प्रशासनकी बारीकियोंको समझनेके लिये तैयार हो जाओ। इसी दौरान हमारे काडर अलॉटमेंट भी आ गये जो एक नई खलबलीका विषय बन गया।
आईएएस अर्थात् भारतीय प्रशासन सेवाके अधिकारियोंका, साथ ही आईपीएस तथा आईएफएस इंडियन फॉरेस्ट सर्विसका भी काडर अलॉटमेंट होता है, यानी उनकी सेवा एक-एक प्रान्तसे जुडी होती है, जिसकी विशेषताओंका उन्हें पता होता है। यह काडर अलॉटमेंट किस प्रकार किया जाये, इसका भी सूत्र है कि देशके बुद्धिमान और प्रतिभाशाली युवाओंको देशभरमें बिखेर दो ताकि देशका हर कोना दूसरेके साथ एक अदृश्य डोरसे बंधा रहे। अतः इन तीनों सेवाओंमें इनसाइडर और आऊटसाइडरका भेदाभेद किया जाता है। किसी भी एक राज्यहेतु लिये चुने गये अधिकारियोंमें कमसे कम आधे तो बाहरी प्रांतोंसे आने चाहिये। यह और ऐसे कई अन्य सूत्र लगाकर काडर अलॉटमेंट किया जाता है। मेरे विचारमें देशकी अखण्डता और एकजुट बनाये रखनेमें इस पद्धतिका बहुत बडा योगदान है। काडर अलॉटमेंटके आदेश आते ही खलबली मच गई। कोई केरलसे नागालॅण्ड जा रहा था तो कोई बंगालसे गुजरात। महाराष्ट्रके लिये चुने गये अधिकारियोंमें तीन मराठी भाषी थे बाकि तमिलनाडु, हरियाणा, बंगाल, दिल्ली वगैरा प्रातोंसे। श्री चारी ही हमारे काडर इंचार्ज थे जिन्होंने हमें महाराष्ट्रका भूगोल, ग्रामीण प्रशासन, सांस्कृतिक विरासत इत्यादी पढाना आरंभ किया। सबको मराठी भी पढाई जाती थी।
फिर एक दिन महाराष्ट्र काडरके सभी अफसरोंके पास मुख्य सचिव श्री साठे द्वारा लिखा व्यक्तिगत पत्र आया -- स्वागत है, इत्यादि। अब अमुक तारीखको मसूरीसे बोरिया बिस्तर बाँधो और अगले खास महाराष्ट्र ट्रेनिंगके लिये मुंबईकी स्टेट अकादमी अर्थात अॅडमिनिस्ट्रेेेटिव्ह स्टाफ कॉलेजमें अमुक तारीखको उपस्थित हो जाओ।
मई 1974 में विवाहोपरान्त मैं तुरंत ही अपने पति प्रकाशके साथ कोलकाता चली गई थी और वहाँसे मसूरी। पिछले नौ महिनोंमें प्रकाश दो बार मसूरी आये थे, एक बार मैं कोलकाता जा पाई थी और दिवाली हमने एक साथ मनाई थी मैके अर्थात दरभंगामें। लेकिन ससुरालके सदस्योंसे मिलना नहीं हुआ था अतः ससुरालका परिचय अत्यल्प ही था। मुंबई ट्रेनिंगके बहाने अब बीस-बाइस दिन उनके साथ रहना था यह भी एक लाभकी बात थी। मुझे महाराष्ट्र काडर मिला इसकी सबसे अधिक खुशी उन्हें थी। ट्रेनिंगके उतने दिनोंमें मेरे ससुर, सास, बडी ननद और छोटे देवरने बारी बारीसे मुझे मुंबईके अनगिनत रिश्तेदारोंसे मिलवाया और कहा -- लो, संभालो, आगेसे ये रिश्ते निभानेकी जिम्मेदारी तुम्हारी है। प्रकाशकी फिलिप्स कंपनीने संकेत दिया था कि आपको हम कोलकाता ब्रांचसे ट्रान्सफर दे सकते हैं - मुंबई या पुणे, चुनना आपको है। तो हम सभीने आपसी सलाहसे तय किया कि पुणेको अपना घर बनायेंगे।
मुंबई ट्रेनिंगका एक महिना भी तेजीसे बीत गया और साठेजीके हस्ताक्षरवाला अपना नया आदेश हाथमें लिये मैं सोचने लगी कि महाराष्ट्रके मानचित्रमें ये औरंगाबाद कहाँ पड़ता है।

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