ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
ओ आषाढ़ के काले बादल
01-Jun-2018 12:59 AM 1721     

प्रिये! आया ग्रीष्म खरतर!
सूर्य भीषण हो गया अब, चन्द्रमा स्पृहणीय सुन्दर,
कर दिए हैं रिक्त सारे वारिसंचय स्नान कर कर,
रम्य सुखकर सांध्यवेला शान्ति देती है मनोहर,
शान्त मन्मथ का हुआ है वेग अपने आप बुझ कर,
दीर्घ तप्त निदाघ देखो, छा गया कैसा अवनि पर,
प्रिये! आया ग्रीष्म खरतर!
ये पंक्तियाँ महाकवि कालिदास कृत "ऋतु-संहार" (ऋतुओं के समाहार) के रांगेय राघव द्वारा किए गए पद्यानुवाद से उद्धृत हैं। ग्रीष्म अपने चरम पर है। भारतवर्ष में मध्य मई से लेकर मध्य जुलाई तक ग्रीष्म ऋतु अर्थात् गर्मी का समय है। भारतीय पंचांग-कैलेंडर के अनुसार ग्रीष्म ऋतु का विस्तार ज्येष्ठ से लेकर आषाढ़ पर्यन्त रहता है। आषाढ़ मास आते-आते उमस भरी गरमी असह्य हो जाती है, अतएव "आषाढ" का व्युत्पत्ति जनित अर्थ है - अ (नहीं) सह (सहना) अण् और टाप् प्रत्यय। आषाढ़ मास की पूर्णिमा तिथि को चन्द्रमा धनु राशि के अंतर्गत बीसवें पूर्वाषाढ़ा अथवा इक्कीसवें उत्तराषाढ़ा नक्षत्रों के करीब रहता है, जो आषाढ़ के नामकरण का आधार है। इस धनु और इंद्रधनुष में कोई अंतर नहीं है। आषाढ़ के अंत तक भारत में पर्जन्यावात (मॉनसून) का आगमन हो चुका होता है और वातावरण के देवता इन्द्र (विद्युत के प्रतीक) का सतरंगी धनुष आकाश में शोभायमान होने लगता है। वैदिक साहित्य में प्रकृति की प्रत्येक क्रियात्मक शक्ति को देवता (दिव् , प्रकाशित होना) कहा गया।
सौर कैलेंडर के अनुसार आषाढ़ में सूर्य का संक्रमण मिथुन राशि में हो जाता है। मिथुन परमपुरुष और प्रकृति के मैथुन अथवा युग्मन का बोधक है। मॉनसून की पहली बारिश (वृष्टि, वृषण का द्योतक) में आकाश (वृषभ) और विदग्ध विरहणी धरती (गो) का मिलन होता है।
मिथुन राशि के अंतर्गत तीन नक्षत्र - मृगशिरा के दो चरणों, आद्र्रा के चार चरणों और पुनर्वसु के तीन चरणों का विस्तार माना जाता है। मृगशिरा अथवा आग्रहायणी हायण (वर्ष) की शुरूआत का प्रतीक है। ध्यातव्य है वर्षा से ही वर्ष शब्द बना है। आद्र्रा वातावरण की आद्र्रता को सूचित करता है और पुनर्वसु में सूर्य के संक्रमण होने पर वसुधा पुनः बसने योग्य अर्थात् हरी-भरी होने लगती है। नवाँकुरों से नवजीवन का सृजन आरम्भ हो जाता है। आद्र्रा की बारिश होने पर भारतीय किसान झूमने लगते हैं। यह ग्रीष्म के अंत और वर्षा के आगमन का सूचक है।
मलिक मुहम्मद जायसी के काव्य "पद्मावत" में रत्नसेन की विवाहिता पत्नी नागमती के विरह वर्णन में आषाढ़ मास का वर्णन इस प्रकार हुआ है -
चढ़ा असाढ़, गगन घन गाजा। साजा विरह दुंद दल बाजा।। धूम साम, धौरे घन धाए। सेत धजा बग पाँति देखाए।। खड्ग बीजु चमकै चहुँ ओरा। बुंद बान बरसहिं घन घोरा।। ओनई घटा आइ चहुँ फेरी। कंत! उबारु मदन हौं घेरी।। दादुर, मोर, कोकिला, पीऊ। घिरै बीजु, घट रहै न जीऊ।। पुष्य नखत सिर ऊपर आवा। हौं बिनु नाह, मंदिर को? अद्रा लाग लागि भुइँ लेई। मोहिं बिनु पिउ को आदर देई।। जिन घर कंता ते सुखी, तिन्ह गारो औ गर्व। कंत पियारा बाहिरै, हम सुख भूला सर्व।।
हिंदी के सुप्रसिद्ध नाटककार मोहन राकेश की एक कृति है - "आषाढ़ का पहला दिन।" यह नाटक महाकवि कालिदास की जीवनी पर आधारित है। कहा जाता कि "मेघदूतम्" में वर्णित अपनी प्रेयसी के विरह में दग्ध रहने वाले शापित यक्ष स्वयं कालिदास ही थे। यही प्रेम-विरह इस नाटक का कथानक है।
इसी विषय पर "महाकवि कालिदास" नाम से एक हिंदी फ़िल्म आयी, जिसके एक गीत का आरम्भिक बोल इस प्रकार है -
ओ आषाढ़ के काले बादल, ओ नभ के काजल! विरही जनों के करुण अश्कजल, रुक जा रे एक पल...
यहाँ बादल को नभ का काजल कहा गया। यह काजल "कद् या कुत् जल" या मटमैला काला जल है। इसीलिए बादल भी कजरारे होते हैं और विरहणी नायिका के कजरारे नैनों में भी अश्रुजल होता है।
वस्तुतः ग्रीष्मकाल विधाता के यज्ञ का समय है। वह इस ऋतु में सूर्य रूपी यज्ञाग्नि में अपने कर्मों की हवि देता है, जिससे संसार का चालन सम्भव होता है। श्रीमद्भगवद्गीता "कर्मयोग" नामक अध्याय में कहा गया है -
अन्नाद्भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसम्भवः। यज्ञाद्भवति पर्जन्यो यज्ञः कर्मसमुद्भवः।।3.14।।
कर्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि ब्रह्माक्षरसमुद्भवम्। तस्मात्सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम्।।3.15।।
एवं प्रवर्तितं चक्रं नानुवर्तयतीह यः। अघायुरिन्द्रियारामो मोघं पार्थ स जीवति।।3.16।।
अर्थात् अन्न के आश्रय पर समस्त प्राणियों का जीवन है और अन्न उत्पादन पर्जन्य अर्थात् मेघों के वर्षण से सम्भव है। मेघ सूर्य रूपी अग्निकुंड में जीवन - जल की हवि देने से अर्थात् यज्ञ करने से उत्पन्न होते हैं और यज्ञ कर्म से उद्भूत होता है।
अब प्रश्न उठता है कि कर्म क्या है। श्रीमद्भगवतगीता में ही कहा गया - भूतभावोद्भवकरः विसर्गः कर्मसंज्ञितः (8.3) अर्थात् जिस विशिष्ट सृजन से पंच महाभूतों अथवा उनसे निर्मित प्राणियों (भूत, जो हुए यानि प्राणी) के गुणों का उद्भव हो, उसे कर्म कहा जाता है। स्पष्ट है कि ग्रीष्मकाल में सूर्य रूपी अग्निकुंड में यज्ञ की आहुति देने से जो पर्जन्य उत्पन्न होता है, उसी के वर्षण से पंच महाभूतों सहित समस्त प्राणियों के नैसर्गिक गुणों में अभिवृद्धि होती है। इसी तरह, समस्त प्राणियों का कर्म अपने-अपने गुणों का उद्भव करते रहना है। यह जीवन "कर्मयोग" ही है। निष्काम कर्म करिए और आनंदित रहिए।
आषाढ़ का वैदिक नाम "शुचि" है। आषाढ़ शुचिता (पवित्रता) और प्रचण्ड धूप का महीना है।
आंग्ल माह "जून" की कथा कुछ कम रोचक नहीं है। जून माह का नाम सम्भवतः रोमन देवी "जूनो" से जुड़ा है। जूनो जुपिटर की पत्नी कही गई। इस हिसाब से वह देवताओं की रानी हुई।
जूनो विवाह की देवी थी। उसे एक सुंदर युवा स्त्री के रूप में दिखाया जाता है, जिसके एक हाथ में राजदण्ड रहता है। यौवन, जवान और जूनो शब्द सहजात कहे जाते हैं। उसकी एक सेविका का नाम आयरिस (इंद्रधनुष) था। वह बहुत तेज चलती थी और सबको जूनो के आने का सन्देश देती थी, किन्तु कोई उसे देख नहीं पाता था, बस उसके चले जाने के बाद उसके वस्त्रों का सतरंगा चिह्न आकाश में दिखता रहता था। अंग्रेजी में आँखों की पुतली को भी आयरिस कहते हैं, क्योंकि इसमें सतरंगी छवि दिखती है।
जूनो के एक सेवक का नाम आर्गस था, उसकी सैकड़ों आँखें थी, अतएव वह शायद ही कभी सोता था। वह जूनो की एक गाय की रखवाली करता था, जिसे जुपिटर चुरा लेना चाहता था। वास्तव में वह गाय एक सुन्दर लड़की ईओ थी। जुपिटर ने अपने दूत मरकरी को उसके पास भेजा। फिर मरकरी ने आर्गस को एक लम्बा और उबाऊ किस्सा सुनाया। इससे वह सो गया और मरकरी ने उसी की तलवार से उसकी हत्या कर दी। अपने सेवक की हत्या से जूनो बहुत दुखी हुई और उसने उसकी सैकड़ों आँखों को अपने वाहन मोर के पंखों पर बिखेर दिया।
ये प्राचीन किस्से महज मानव मन और प्रकृति के बीच तादात्म्य स्थापित करते हैं।
आंग्ल माह अर्थात् जूलियन कैलेंडर और तत्पश्चात् ग्रेगोरियन कैलेंडर की तिथियाँ स्थिर हैं। इसी तरह सूर्य संक्रांति पर आधारित सौर वर्ष की तिथियाँ भी नियत होती हैं, सौर-चान्द्र गति पर आधारित हिन्दू कैलेंडर में और केवल चान्द्र गति पर आधारित इस्लामी कैलेंडर में तिथियाँ और माह नियत नहीं होते हैं। हिन्दू कैलेंडर में इस त्रुटि को अधिकमास (मलमास या पुरुषोत्तम मास) से सममंजित कर लिया जाता है, किन्तु इस्लामी कैलेंडर में यह नहीं हो पाने के कारण उनके पर्व-त्यौहार किसी भी ऋतु में सम्पन्न होते हैं।
संयोग से इस जून में अधिकमास ज्येष्ठ है। भारत के कतिपय हिस्सों में इसे मलमास कहा जाता है, अतएव इस महीने में सभी शुभ कर्म वर्जित होते हैं, जबकि कुछ सम्प्रदायों में इसे पुरुषोत्तम मास या विशुद्ध मास कहा जाता है।
जून के पूर्वाद्र्ध में इस्लामी पाक महीना रमादान या रमज़ान भी रहेगा। रमादान अरबी भाषा के रमीदा शब्द से आया है, जिसका अर्थ है - असह्य गरमी। मूलतः यह इस्लामी नौवाँ महीना गरमी के मौसम में ही पड़ा था। यह क़ुरान शरीफ के प्रकटन का पाक महीना है। संयोग से यह पाक महीना गरमी के दिनों में आया है। सबको शुभकामना!

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