ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
नुक़्ता-ए-नज़र बनाम तर्क-कुतर्क
CATEGORY : रम्य रचना 01-Jul-2018 05:59 AM 423
नुक़्ता-ए-नज़र बनाम तर्क-कुतर्क

ऊँचाई पर खड़े व्यक्ति को नीचे खड़े लोग बहुत छोटे (चींटियों जैसे) नज़र आते हैं। मज़े की बात ये है कि नीचे वालों को भी ऊँची इमारत, पहाड़ आदि यानि बुलंदी पर खड़ा आदमी उतना ही छोटा दिखाई देता है। यह कमाल है दृष्टिकोण का। जनाब! आईना भी कहने को सच बोलता है, लेकिन वह भी बायें को दायाँ और दायें को बायाँ दिखाता है - आपके रू-ब-रू जो होता है। यह तो हुई वस्तुस्थिति की बात। व्यक्ति किस दिशा और किस कोण से किसी वस्तु को देखता है उससे परिप्रेक्ष्य बदल जाता है। यही बात लागू होती है परिस्थिति पर। विभिन्न परिस्थितियों में सच और झूठ के मायने बदल जाते हैं। हम कितना भी वेद-पुराणों की दुहाई देकर अपने भारत को महान सिद्ध करने की कोशिश करें। सच्चाई यही है कि भारत केवल भ्रष्टाचार के मामलों में सबसे महान है।
अरे साहब दूर क्यों जाएँ, चिराग़ तले अँधेरा दिखा देते हैं। हर पुलिस थाने में गाँधी जी की फोटो लगी रहती है। मुस्कुराता, वात्सल्यपूर्ण चेहरा, आशीर्वाद की मुद्रा में उठे हुये वरदहस्त को इंगित करके थानेदार शिकायत लिखने के लिये व्यक्ति से कहता है "देख भाई, पाँच तो गाँधी जी भी कह गये हैं। (यानि पांच रुपये से कम लेने का तो सवाल ही नहीं आखिर बापू ने कहा है।) ये वाक़या उस वक़्त का है जब पांच रुपये में एक सेर (किलो से ज़्यादा) घी आ जाता था। लेकिन क्या फ़र्क़ पड़ता है। नये समय के साथ नया तरीक़ा ईजाद हो जाता है। आज़ादी के बाद से इस बीमारी में बढ़ोतरी ही हुई है। एक वक़्त के बहुत ईमानदार नेता हमारे दोस्त हैं। अब ख़ुद ही कहते हैं कि अगर पैसे न बनायें तो चुनाव कैसे लड़ें? और हाँ यदि चुनाव हार गये तो? उसका भी तो सोचना है। ये उनका और उनके हमपेशा लोगों का नुक़्तए नज़र है, हमारे दृष्टिकोण से ये सरासर भ्रष्टाचार है। लो कर लो बात।
ख़ैर, सोचिये साहब ख़ूब सोचिये मगर हमेशा अपने बारे में ही मत सोचिये - कभी कभी बेचारी जनता के बारे में भी अपने दिल और दिमाग़ से विचार-विमर्श कर लिया कीजिये। आज़ादी की लड़ाई में अनेक भूतपूर्व नेताओं ने बलिदान दिये। लोकमान्य तिलक ने लाठियाँ खायीं, भगतसिंह तो जान से ही गये। ना जाने क्यों और कैसे हमारे बापू गाँधी और चाचा नेहरू जेल तो गये लेकिन बाक़ी लोगों की तरह प्रताड़ित कभी नहीं हुए। शायद बापू की उम्र तथा कृशकाय शरीर और नेहरू की अंग्रेज़ियत का प्रभाव था। पता नहीं भैया हम तो तब बहुत छोटे थे। हाँ यह बात अवश्य है कि गाँधी जी आज़ादी के बाद कांग्रेस को भंग कर देना चाहते थे। लक्ष्य आज़ादी था - वो पूरा हो गया - विघटन के साथ ही सही। कांग्रेस नहीं मानी। अरे पेड़ लगाया था - काफ़ी निराई गुड़ाई करी थी, अब फल खाने का वक़्त आया तो बापू जी कहते हैं कि बग़ीचा छोड़ दो। तौबा तौबा। शायद बापू अपनी बात मनवा भी लेते, लेकिन दुर्भाग्यवश वे मुख़्तसर नज़रिये का शिकार हो गये। फिर क्या था - ना रहनुमा रहा, ना रहबर। कांग्रेस बरिबंड हो गयी। सैयां भये कोतवाल अब डर काहे का। बस सभी लोग फल खाने में जुट गये, पेड़ लगाने बंद कर दिये। सत्तर साल बाद छायादार शजर और सभी प्रकार के फलों से वंचित जनता ने कांग्रेस को ताज से बेदख़ल कर दिया।
ये क्या हुआ, कैसे हुआ, क्यों हुआ, अरे सोचो! पहले भ्रष्टाचार मचा हुआ था, अब हाहाकार मच गया। "हमने आज़ादी दिलवाई", "इनने क्या किया?" अचानक हार से हत्प्रभ और विदीर्ण हृदय लिये पार्टी चिल्लाई, मगर जनता का नज़रिया बदल चुका था। आज़ादी के असली सिपाही जन्नतनशीन हो चुके थे। अब संघी सिपाही थे या नहीं - ये सवाल बेमानी है, क्योंकि कांग्रेस की मौजूदा पीढ़ी का भी उस लड़ाई से कुछ लेना-देना नहीं है। इतने साल भी वे गद्दी पर बैठे रहे क्योंकि जनता गलतफ़हमी में रही, यक़ीन करती रही और सच माने तो सोती रही। और सही मायनों में -
कहाँ चलता है कोई खोटा सिक्का
बुज़ुर्गों की शराफ़त चल रही है
सवाल यह भी है कि गद्दी के वारिस केवल नेहरू/गाँधी परिवार से ही क्यों? बाक़ी के कांग्रेसी भी तो हैं। बापू के वंशज भी तो हैं। और दूसरे शहीद कुनबे के लोग भी हैं। एक कड़वा मज़ाक़ यह भी है कि जनता द्वारा बहिष्कृत व्यक्ति मुख्यमंत्री बन गया। सिर्फ़ किसी खास पार्टी को सत्ता से दूर रखने के लिये एक न्यूनतम वोट वाले नेता को प्रधान पद पेश करना क्या भ्रष्टाचार नहीं है? क्या दुनिया इतनी अच्छी और गरिमामयी हो गयी है कि बिना स्वार्थ के दुश्मनों को गले से लगा लेगी? लेकिन जनाब क़यामत के वक़्त नोहा की बड़ी-सी नाव में हर जाति और प्रजाति के प्राणी चढ़ गये थे। मरता क्या न करता। कुछ वैसी ही संकट की घड़ी देश के सियासती दलों पर बरपा है। इसीलिये तमाम राग-द्वेष, गिले-शिकवे छोड़कर सबने महासंगठन का महाअभियान चलाया है। पता नहीं नौका में सवार प्राणियों का बाद में क्या हुआ मगर महागठबंधन के जहाज़ का क्या हश्र होगा वह हम ज़रूर देखेंगे। फ़िलहाल तमाम चोर, गिरहकट, रहज़न मिल कर नारा लगा रहे हैं "मोदी हटाओ"। ग़ौर फरमाइये भाजपा नहीं मोदी को हटाओ। ज़ाहिर है कि लोग पूछेंगे "क्यों"। अब कुछ तो कारण बताना पड़ेगा; तो बना लिया नारा - "लोकतंत्र है खतरे में।" वाह, कमाल है, लोकतंत्र की धज्जियाँ उड़ने वाली पार्टी उसे बचाने की बात कर रही है। चूँकि अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता अतः आयें, बायें, दायें से गठजोड़ की तलब कर रही है। बकौल श्री विनोद कुमार भावुक के --
सारे मिलकर हाथ मिलाओ लोकतंत्र है खतरे में
मिलकर एक साथ चिल्लाओ लोकतंत्र है ख़तरे में
जनसेवा होती रहती है वक़्त मिला तो कर लेंगे
पहले सबको ये समझाओ लोकतंत्र है ख़तरे में
यानि झूठ को बार-बार दोहराओ तो वह सच लगने लगे और इस अजीमुश्शान झूठ को सच बनाने के लिये -
अगड़े, पिछड़े, दलित, पादरी, पंडित, मुल्ला कोई हो
इन सबको हथियार बनाओ लोकतंत्र है ख़तरे में
इसीलिये मणिशंकर जी पाकिस्तान से मदद मांगते हैं। चर्च को बुलाते हैं देश की नीतियों पर भाषण चीन के लिये। मतलब इंग्लॅण्ड का चर्च हो या पाकिस्तान - कौन हैं ये खामखां। बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना। बहरहाल दृष्टिकोण किसी का भी हो - लक्ष्य एक ही है, सत्ता!
चलिये साहब एक और ज्वलंत मसला है - औरत! तो इस मसले पर अंतहीन तक़रीर की जा सकती है; मगर हम सिर्फ़ नज़रिये की बात करेंगे।
यूँ तो मनुस्मृति में लिखा है- "यत्र नार्यस्तु पूजयन्ते, रमन्ते तत्र देवताः", लेकिन हक़ीक़त में किसी नारी की पूजा नहीं होती, घर में केवल "पति परमेश्वर " की चलती है। जब औरत का मामला सामने आता है तो अलहदा अलहदा नुक़्त-ए-नज़र दरकिनार, अक्सर लोग उसे एक ही नज़र देखते हैं। समाज ने औरत को भले ही माँ, बहन, बीबी, बेटी या बहू के किरदार में तक़सीम कर दिया हो, पुरुष का नज़रिया उसमें सिर्फ़ और सिर्फ़ औरत या हव्वा को देखने का होता है। तभी तो एक जवान माँ सार्वजनिक स्थान पर अपने बच्चे को बिना शर्मिंदा हुए दूध तक नहीं पिला सकती। एक तरफ़ उसे आसपास के लोगों की कामुक निगाहों का सामना करना पड़ता है, दूसरी ओर तथाकथित नैतिकता के ठेकेदारों के कटाक्ष भी सुनने पड़ते हैं कि ये तो बेशर्मी है। सच कहें बेशर्म और कमज़र्फ तो वे लोग हैं जो बच्चे को स्तनपान कराती स्त्री को माँ की नज़र से न देख कर उसके उघड़े बदन को देखते हैं। यहाँ तक कि उस विज्ञापन तक का ज़ोर-शोर से विरोध हुआ जिसमें एक जवान माँ अपने बच्चे को खुलेआम दूध पिला रही है। आफ़रीन हमारी न्यायपालिका को जिसने उन विरोधियों की खाट खड़ी दी यह कह कर कि अच्छाई या बुराई उनकी नज़र में है और वो विज्ञापन वाली तस्वीर एक माँ की है किसी निर्वस्त्र लड़की की नहीं।
अरे साहब अपनी मानसिकता को बदलने और नज़रिये को सही करने की जगह आदमियों ने औरतों को सिर से पांव तक ढँक दिया (आश्चर्य कि बलात्कारों का सिलसिला फिर भी कम नहीं हुआ)। हिन्दू घूंघट करवाते हैं तो मुसलमान बुर्का पहना देते हैं। क्या वाक़ई दुनिया के सारे मर्द बुरी नज़र रखते हैं? तब तो "बुरी नज़र वाले तेरा मुँह काला"। बेचारी औरतें क्यों काले कपड़ों (बुर्क़े) में रहे। खैर साहब, हम कितनी भी बहस कर लें, किसी का नज़रिया या मानसिकता नहीं बदल सकते; जब तक व्यक्ति खुद अपने अंदर झांक कर अपने आपको न बदले। वैसे हर काले बादल में चांदी की चमक होती है। बहत्तर हूरों के लालच में लोग रोज़ा रख लेते हैं। कभी-कभी बिल्ली के भागों भी छींका टूट जाता है, मसलन -
हसीना ने मस्जिद के सामने घर क्या ख़रीदा
पल भर में सारा शहर नमाज़ी हो गया।

QUICKENQUIRY
Related & Similar Links
Copyright © 2016 - All Rights Reserved - Garbhanal - Version 11.00 Yellow Loop SysNano Infotech Structured Data Test ^