ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
गर्व ही नहीं, चिंतन का क्षण भी
01-Dec-2018 06:37 PM 1471     

भारत के एक दृढ़ निश्चयी नायक, स्वतंत्रता सेनानी, प्रथम उप प्रधानमंत्री और लौह-पुरुष के नाम से विख्यात सरदार पटेल की लगभग तीन हजार करोड़ रुपए की लागत से निर्मित, दुनिया की सबसे ऊँची प्रतिमा का उनके 144वें जन्म दिन 31 अक्तूबर को बड़े तामझाम से लोकार्पण हुआ। पोषण, स्वास्थ्य, शिक्षा, सुरक्षा और जीवन की गुणवत्ता के विभिन्न क्षेत्रों में बहुत नीचे होने की लज्जा के बीच कुछ समय के लिए ही सही, गर्व का एक क्षण तो आया कि हमारे देश में अमरीका की "स्टेच्यू ऑफ़ लिबर्टी" से भी दुगुनी और वर्तमान में दुनिया की सबसे ऊँची प्रतिमा है।
वैसे शिव, विष्णु, ब्रह्मा, गणेश, दुर्गा, सरस्वती, लक्ष्मी आदि के विग्रह (प्रतिमा इसलिए नहीं कि वे किसी वास्तविक व्यक्ति के आकार-प्रकार की प्रतिकृति नहीं है) कोई व्यक्ति नहीं हैं बल्कि मनीषियों द्वारा सुचिन्तित विचारों के कवियों द्वारा सृजित प्रतीक हैं जो अपने अति-प्रयोग के कारण तथा संवाद और विचार-मंथन से होने वाले परिष्कार के अभाव में, व्यक्ति में बदलते-बदलते प्रस्तरवत हो गए हैं। आज वे हमें कोई वैचारिक दिशा नहीं देते बल्कि अन्धविश्वास की सीमा तक कर्मकांड में उलझा देते हैं। आचरण से उनका दूर-दूर का भी कोई संबंध नहीं रह गया है।
भले ही कोई व्यक्ति किसी भाव, विचार और कर्म के प्रति विसर्जन की हद तक समर्पित रहा हो, अपने समय में उस काम के लिए जाना भी जाता रहा हो लेकिन वह अनंत काल तक के लिए उस विचार का अर्थ नहीं दे सकता। संबंधित इतिहास से अपरिचित व्यक्ति के लिए बुद्ध, महावीर, ईसा, गाँधी आदि की मात्र प्रतिमाओं के द्वारा अहिंसा के भाव तक पहुँचना असंभव है।
संयुक्त राष्ट्र संघ ने 15 जून 2007 को महात्मा गाँधी की स्मृति में प्रति वर्ष 2 अक्तूबर को "अंतर्राष्ट्रीय अहिंसा दिवस" मनाने का प्रस्ताव पारित किया। संयुक्त राष्ट्र संघ में भारत के स्थायी प्रतिनिधि के निवेदन पर संयुक्त राज्य अमरीका के राष्ट्रीय डाक प्रशासन विभाग ने इस दिवस की स्मृति में स्वीडन के प्रसिद्ध शिल्पी कार्ल फ्रेडरिक रूटर्सवार्ड के एक शिल्प के आधार पर एक डाक टिकट जारी किया। 2 अक्तूबर को यहाँ से जाने वाली समस्त डाक पर यही टिकट लगाया जाता है। इस शिल्प में एक ऊँचे चबूतरे पर एक बड़ी बंदूक रखी हुई है जिसकी नली को मोड़कर गाँठ लगा दी गई है।
दुनिया के बहुत से देशों ने महात्मा गाँधी के चित्र वाले डाक टिकट जारी किए हैं। फिर अहिंसा दिवस के इस टिकट पर गाँधी जी का कोई चित्र या फोटो क्यों नहीं है? बात यह है कि डाक टिकटों में उस व्यक्ति को सम्मान दिया गया था जब कि "अंतर्राष्ट्रीय अहिंसा दिवस" एक विचार को वैश्विक स्वीकृति प्रदान की गई। जिसके लिए व्यक्ति नहीं बल्कि कोई प्रतीक ही अधिक उपयुक्त हो सकता था। गाँधी के चित्र से कुछ समय के लिए गाँधी जी के इतिहास और कामों को जानने वाला व्यक्ति ही कुछ समझ सकता था लेकिन इस प्रतीक से कोई भी व्यक्ति अनंत काल तक गाँठ लगी हुई नली वाली बंदूक से अहिंसा के विचार तक पहुँच सकता है। इसलिए व्यक्ति से बड़ा विचार होता है। नश्वर व्यक्ति की सीमाओं का अतिक्रमण करते हुए कोई प्रतीक ही हमें विचार तक पहुँचा सकता है। जब विचार के बीच में गुण-दोषों का पुतला मनुष्य आ जाता है तो अनुयायियों में विचलन की संभावना अधिक रहती है।
वैसे तो अंततः समस्त ज्ञान, पूजा स्थल, मूर्तियों, भाषणों का कोई अर्थ नहीं है बल्कि वे व्यर्थ हैं यदि उनका प्रभाव किसी कर्म में फलित नहीं होता।
भावना बिन क्या धरा है व्याकरण में
शब्द का अनुवाद तो हो आचरण में।
इसलिए कहा जा सकता है कि यदि हम किसी व्यक्ति का सम्मान करते हैं तो हमें उसके विचारों के अनुसार आचरण करना चाहिए न कि मूर्तियों में उलझना-उलझाना चाहिए। इसीलिए बहुत ही प्रेक्टिकल रहे हमारे वैदिक मनीषियों ने मूर्तियाँ नहीं बनाईं, प्रतीक भी अत्यंत सरल बनाए बल्कि शब्दों के साथ-साथ उनमें निहित विचारों को मुक्त भाव से अपने आचरण में उतारा भी। दुनिया में ही नहीं बल्कि इस देश में भी अपने-अपने नेताओं और देवताओं की करोड़ों मूर्तियाँ हैं तो कोई बात नहीं। उस प्रतियोगिता में हम भी सही और फिलहाल जब तक कोई इससे ऊँची प्रतिमा नहीं बने, तब तक हमारे नाम गिनीज बुक का यह कीर्तिमान भी सही।
सरदार पटेल के प्रति समस्त राष्ट्र कृतज्ञ है। उनका सम्मान करता है और उनके योगदान को सरकारी तंत्र की बैशाखी के बिना भी जानता है। लेकिन यह भी सच है कि जिस प्रकार आज किसी राजनीतिक एजेंडे के तहत कुछ राष्ट्र-पुरुषों को दरकिनार किया जा रहा है वहीं यह भी सच है कि इसी तरह भूतकाल में गाँधी, नेहरू, इंदिरा को अधिक महत्त्व दिया गया और कई बड़े और महत्त्वपूर्ण नेताओं यथा डॉ. राजेंद्र प्रसाद, मौलाना आज़ाद, भीमराव आम्बेडकर, लोहिया आदि को विस्मृत किया गया। इसीलिए आम्बेडकर, कांसीराम, खुद अपनी और हाथियों की मूर्तियों से उत्तरप्रदेश के कुछ इलाकों को पाट दिए जाने पर विरोधियों को इस कर्मकांड का विरोध करने का मुखर साहस नहीं हुआ, क्योंकि सबकी दाढ़ियों में तिनके थे।
अमरीका में "स्टेच्यू ऑफ़ लिबर्टी" है। हम एक बल्ब के विज्ञापन वाले अभिनेता की तरह सारे घर के एक ही दिन में बदल देना चाहते हैं। परिवर्तन और विकास के जोश में अमरीका से अधिक अनुकरणीय और कौन हो सकता है? तो उसी की तर्ज़ पर हमने भी "स्टेच्यू ऑफ़ यूनिटी" बना ही ली, लेकिन ध्यान रहे अमरीका की "स्टेच्यू ऑफ़ लिबर्टी" किसी वास्तविक महिला की मूर्ति नहीं है बल्कि एक प्रतीक है जिसमें पुस्तक विचार और ज्ञान की प्रतीक है तथा मशाल विचारों के प्रकाश में अपना लक्ष्य चुनने की स्वतंत्रता की। यह बात और है कि एक कलाकार ने किसी डाक टिकट के लिए लिबर्टी की मूर्ति के फोटो में वास्तविक मूर्ति वाली महिला की जगह अपनी सास का फोटो लगा दिया। बाद में उस पर जुर्माना भी हुआ।
इस सन्दर्भ में यदि विश्व की अन्य विशाल प्रतिमाओं के नामकरण पर विचार करें तो भी यही पता चलता है कि चीन में बनी 153 मीटर ऊँची बुद्ध की प्रतिमा का नाम "Ïस्प्रग टेम्पल बुद्धा", जापान की 110 मीटर ऊँची बुद्ध की प्रतिमा का नाम "उशिको दायाबुत्सू", थाईलैंड की 91 मीटर ऊँची बुद्ध-प्रतिमा का नाम "द ग्रेट बुद्धा" है। इसी नियम के अनुसार रूस की मातृभूमि की 87 मीटर ऊँची प्रतिमा "द मदरलैंड काल्स" प्रतीकात्मक होने के कारण उसमें कोई विशेष व्यक्ति नहीं बल्कि राष्ट्र माता के रूप हाथ में तलवार लिए एक महिला है। हालाँकि हनुमान जी भक्ति, समर्पण, बल और शौर्य के देवता हैं लेकिन उनके मंदिर को सब "हनुमान-मंदिर" ही कहते हैं कोई "पराक्रम-धाम" नहीं कहता।
हालाँकि कुछ अति महत्त्वाकांक्षी लोग लगे तो हुए हैं फिर भी इस समय में हमारे सामने जीते-जागते व्यक्ति का प्रतीक बन पाना बहुत कठिन है। वैसे दुनिया और विशेष रूप से इस देश का यह भी इतिहास रहा है कि उसने अच्छे-भले जीवंत प्रतीकों के पीछे छुपे विचारों को अपने स्वारथ के लिए पत्थर और झगड़े की जड़ बना दिया।
अंत में एक बात और - राष्ट्र गौरव, राष्ट्र भाषा और नाम-परिवर्तनी-अस्मिता के तूफ़ान में भी हमें "स्टेच्यू ऑफ़ लिबर्टी" के अंग्रेजी नाम के स्थान पर कोई संस्कृत पर्याय नहीं मिला, आश्चर्य!

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