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कारखाने में नहीं बनती भाषा
01-Feb-2019 02:39 PM 1738     

मनुष्य आरंभ से ही अपने वजूद को लेकर सचेत रहा है। उसकी चेतना ज्यों-ज्यों विकसित होती गयी अपने अस्तित्व को लेकर उसका चिंतन भी प्रबल होता गया। शायद "मनुष्य" और "व्यक्ति" शब्द की सार्थकता यानी मनुष्य का होना उसके मनन करने और खुद को अभिव्यक्त करने की क्षमता में ही निहित है। इसी बात को व्यक्त करते हुए प्रसिद्ध दार्शनिक देकार्त ने कहा था कि "मैं सोचता हूं, इसलिए मैं हूं।" सवाल यह उठता है कि हम सोचते कैसे हैं? और किस माध्यम में सोचते हैं? क्या यह कहा जा सकता है कि हम जितना सोच पाते हैं उतना ही होते हैं? और जो नहीं सोच पाते वे नहीं होते या कम होते हैं?
मेरा मानना है कि हम भाषा (और दृश्यों) में सोचते हैं और जिस भाषा में हम सोचते हैं उस भाषा के अनुपात में ही हम होते हैं। इसीलिए अलग-अलग भाषाओं में होना अलग-अलग होना है। अंग्रेजी में होना, हिन्दीं में होना, खड़िया में होना एक ही होना नहीं है। दूसरे शब्दों में कहें तो हम केवल बाह्य दुनिया में नहीं रहते, हमारे भीतर भी एक दुनिया होती है जो स्मृति और संस्कृति के रूप में हमें संचालित कर रही होती है। उदाहरण के रूप में मिथक, परंपरा, लोक विश्वास, पारिवारिक आदत आदि हमारे भीतर निहित होते हैं और ये एक भाषा विशेष से जुड़े होते हैं। तुलसी का पौधा एक ग्रामीण व्यक्ति के लिए, एक शहरी व्यक्ति के लिए और एक विदेशी व्यक्ति के लिए अलग-अलग महत्व रखता है। इस प्रकार भाषाएं हमारे निर्माण में कई तरह की भूमिकाएं निभाती हैं और यह अनेक स्तरों पर कार्य कर रही होती हैं। समझ के माध्यम के रूप में भाषा की अलग भूमिका है, संपर्क एवं संचार के माध्यम के रूप में भाषा की भूमिका अलग है। इसी प्रकार सत्ता और अर्थोपार्जन के माध्यम के रूप में भाषा अलग तरह से कार्य कर रही होती है। समस्या वहां आती है जहां हम इन सारी भूमिकाओं को एक ही नजर से देखने लगते हैं।
इस बात को समझ लेना चाहिए कि भाषा केवल व्यवहार से नहीं बल्कि स्मृति, बोध और चिंतन से भी जुड़ी होती है। किसी भी भाषा का मन:स्थ रूप ज्यादा महत्वपूर्ण होता है। हम कई भाषाओं में काम कर सकते हैं पर सारे रूप मन:स्थ हों, यह जरूरी नहीं। 7-8 भाषाएं जानने के बाद भी सोचने का काम दिमाग एक या दो भाषाओं में ही करता है। हमारा दिमाग शानदार अनुवादक है, वह ऐसी कुशलता से और इतनी तेजी से भिन्न भाषाओं में अनुवाद करता है कि सामनेवाले को कई बार खबर तक नहीं लगती।
भाषा व्यक्तिगत नहीं सामाजिक और सार्वजनिक संरचना है। यह किसी व्यक्ति के बनाए नहीं बनती, वह अधिक से अधिक कुछ शब्दों का निर्माण कर सकता है पर उनमें भी मान्यता केवल उन्हीं शब्दों को मिलेगी जिन्हें सामान्य जन स्वीकार करेगा। किसी कमरे में या कार्यालय में बैठकर बना देने से वह स्वीकृत नहीं होगी। ज्यादा से ज्यादा यही होगा कि कुछ लोग टमाटर को लाइकोपर्सिकन स्कूलेन्टंम (वैज्ञानिक नाम) कहने लगेंगे। पर इसकी उपयोगिता तकनीकी कार्यों तक ही सीमित रहेगी।
किसी भी शब्द को जनता तत्काल स्वीकार नहीं करती। शब्द विशेष जब तक रगड़ नहीं खाएगा या परिस्थितियों से घिसेगा नहीं, तब तक यह जन के कंठहार नहीं बनेगा। हिन्दी भाषा आज भी आमजन से इसलिए दूर है कि ऐतिहासिक और सांस्कृतिक कारणों से काफी हद तक इसके शब्दों की वैसी रगड़ाई और घिसाई नहीं हुई। इस मामले में उपभाषाएं बाजी मार ले जाती हैं। तुलसीदास ने अवधी में गरीबनेवाजु जैसे शब्दों का प्रयोग किया। हिन्दी अनेक उपभाषाओं की मिश्रण है। जो भाषा जितने बड़े क्षेत्र की होगी, उसमें मिश्रण उतना ही ज्यादा होगा। हिन्दी में संस्कृत, उपभाषाएं, अरबी, फारसी, तुर्की आदि अनेक भाषाओं के शब्द आम जन तक पहुंच चुके हैं। खासतौर से आज की तथाकथित उर्दू तो घनिष्ठ रूप से जुड़ी हुई है। अरबी-फारसी के शब्दों की बड़ी संख्या है। फारसी के शब्द ज्यादा करीब लगते हैं। आज भी "खुदा", "अल्लाह" से ज्यादा करीब लगता है क्योंकि शायरी और तमाम दूसरे कारणों से खुदा ज्यादा रगड़ खाया हुआ शब्द है। लोक भाषाओं के शब्द भी ऐतिहासिक रूप से रगड़ खाए हुए शब्द होते हैं। लंबे समय तक प्रयोग से इसके नुकीले छोर घिस जाते हैं, इसकी कठोरता कम हो जाती है और ये चिकने हो जाते हैं, तब लोक इन पर ज्यादा प्यास उड़ेलते हुए इन्हेंे अपना लेता है। जैसे- कृष्ण कम घिसा हुआ शब्द है। जबकि इसी कृष्ण से बने हुए कान्हा, कन्हैया, कान्ह, कन्हाई जैसे शब्दों को लोक ने ज्यासा दुलार दे रखा है।
भाषाएं किसी कारखाने में नहीं बनतीं ये जनता के बीच विकसित होती हैं। भाषा टकसाल से निकले चमकते सिक्के जैसी या कड़कड़ाते नए नवेले नोट जैसी नहीं होती। अगर होगी भी तो ऐसी भाषा खराब मानी जाएगी या ज्यादातर तकनीकी उपयोग तक सीमित रहेगी। अच्छी भाषा तो वह होती है जिसने मौसम और समय की मार सही हो, जो थोड़ा धूप में जली हो, बारिश में भीगी हो, जिसने तेज हवाओं के थपेड़ों को झेला हो। हिंदी के साथ सबसे बड़ी दिक्कत यह रही कि इसे इसकी जड़ों से काट दिया गया। हिन्दी के स्वाभाविक स्रोतों से हिंदी को वंचित कर दिया गया और कोढ़ में खाज यह कि इसके लिए काम कम हुआ और इस पर राजनीतिक रोटी अधिक सेंकी गई। कम से कम दो स्तरों पर हिन्दी के साथ ज्यादती की गई।
सबसे पहले हिंदी को अवधी, ब्रज, भोजपुरी आदि भाषाओं से अलग कर दिया गया। अट्ठारह सौ पचास के पहले इन भाषाओं का साहित्य हिंदी का अपना साहित्य था परंतु 1850 के बाद अचानक ये भाषाएं हिंदी की तथाकथित सौतन बना दी गयीं। हालत यह हो गई कि भारतेंदु हरिश्चंद्र के प्रिय शायरों में से एक तेग अली तेग की केवल 24 ग़ज़लें मिलती हैं क्योंकि वे भोजपुरी में लिखते थे। हिन्दी के किसी इतिहासकार ने कभी इस बात पर विचार नहीं किया कि हिन्दी की पहली दलित कविता माने जाने वाली "अछूत की शिकायत" जिसके रचनाकार हीरा डोम थे, उनकी केवल एक यही कविता क्यों मिलती है? अगर महावीर प्रसाद द्विवेदी ने इसे सरस्वती में प्रकाशित नहीं किया होता तो संभवत इस कविता का भी आज अस्तित्व नहीं होता। तेग अली तेग और हीरा डोम सभी भाषाओं में हुए होंगे। अवधी, बुंदेली, भीली आदि के रचनाकार या तो उपेक्षा की मार से मर खप गए या अपनी रचनात्मकता को ताले में बंद कर किसी और काम में रम गए। हमें इस बात का एहसास ही नहीं होता कि इन उपभाषाओं की अवहेलना कर हम न केवल इन भाषाओं का बल्कि हिंदी का कितना बड़ा अहित कर रहे हैं। धीरे-धीरे अब हालात ऐसे हो गए कि 1850 से पहले का हिंदी साहित्य पढ़ने वाले ही नहीं, पढ़ाने वालों की भी समझ से बाहर होता चला जा रहा है।
हिंदी के साथ दूसरी बड़ी दुर्घटना यह हुई कि इसकी हमसफर हिंदवी को उर्दू नाम देकर इससे अलग कर दिया गया, जिसका कि 1800 से पहले कहीं कोई वजूद ही नहीं था। यहां तक कि मिर्जा गालिब बार-बार रेख्ता का जिक्र करते हैं पर उर्दू का नाम तक नहीं लेते। आज भी फिल्म और मीडिया की भाषा हिंदी नहीं हिंदुस्तानी है। यह वही हिंदी है जिसे गांधी जी ने और प्रेमचंद जी ने भी अपनाया था। जब कभी हमें सहज प्रवाह पूर्ण आमजन से संवाद करने वाली भाषा की जरूरत होती है तो हम या तो हिंदुस्तानी की ओर कदम बढ़ाते हैं या फिर लोक की ओर।
राज (भाषा) वाली हिंदी चंद बाबुओं या मुट्ठी भर साहबों तक या "बाबू-साहब" बनने के इच्छुक विद्यार्थियों तक सीमित होकर रह जाती है। भले ही हर साल करोड़ों रुपए खर्च कर हिंदी के उत्सव से इस पेड़ को हरा भरा बनाने की कोशिश की जाए परंतु जड़ और जन के अभाव में यह भाषा रूखी सूखी ही रह जाती है। भारत में भौगोलिक सांस्कृतिक विविधता के कारण स्थितियां और जटिल हैं। भाषा का मामला कभी भी इतना सपाट नहीं होता। हिंदी के साथ अंग्रेजी की अनिवार्यता अहिंदी भाषी राज्यों के कारण जरूरी है, यह गलत समझ है। मैं एक अहिंदी भाषी राज्य में लंबे समय से रह रहा हूं। यहां के लोग अपनी भाषा के बाद सबसे ज्यादा हिंदी जानते हैं। सुदूर गांव तक में भी मुझे एक भी ऐसा व्यक्ति नहीं मिला जो हिंदी ना समझ पाए दूसरी ओर अंग्रेजी के मामले में यहां की बहुसंख्यक जनता का हाथ कुछ ज्यादा ही तंग है। दक्षिण के कुछ राज्यों को छोड़कर यही स्थिति पंजाब, बंगाल, उड़ीसा, महाराष्ट्र आदि की भी है। अगर अंग्रेजी अहिंदी भाषी राज्यों की मजबूरी है तो फिर हिंदी भाषी राज्यों में अंग्रेजी वर्चस्व की भाषा क्यों बनी हुई है? हिंदी क्षेत्र के कितने विश्वविद्यालयों में हिंदी माध्यम में पढ़ाई होती है? कितने न्यायालयों में हिंदी में बहस होती है? हिंदी क्षेत्र के उत्कृष्ट विद्यालय हिंदी माध्यम में क्यों नहीं पढ़ाते हैं? कोई चाहे तो दून स्कूल से लेकर मसूरी और डलहौजी तक फैले पांच सितारा विद्यालयों का सर्वे करके देख सकता है। हकीकत यह है कि जब दक्षिण भारत में हिंदी फिल्में चल सकती हैं, हिंदी मीडिया चल सकती है तो हिंदी भाषा क्यों नहीं? इसका उत्तर भाषा में नहीं सत्ता में छुपा हुआ है। भाषागत नीतियों में छुपा हुआ है। इसका कारण इच्छाशक्ति का अभाव और अव्यावहारिक हिंदी का थोपा जाना है। आमजन से कटी हुई हिंदी को जबरन प्रयोग की भाषा बनाने के दुराग्रह का होना है। भाषा की और शब्दों की सामाजिक स्वीकृति नहीं होने पर भाषाएं पानी में लकड़ी की तरह अलग से तैरती भले नजर आए पर समाज उसी भाषा का प्रयोग करता है जो पानी में चीनी की तरह खुली हुई घुली हुई हो। कृत्रिम शब्दों की जन स्वीकृति नहीं होती, अंग्रेजी की भी नहीं है। ये दोनों सिर्फ सत्ता के कारण चल रहे हैं।
भाषा को सामान्यजन से काटने का काम साजिश के तहत किया जाता है। सत्ता को बचाए रखने और रहस्यों को बनाए रखने के लिए लोक (के नाम वाला) तंत्र बहुसंख्यक आबादी से भाषा को काटने का कार्य करता है। राजभाषा हिंदी को सामाजिक स्वीकृति नहीं है इसीलिए इसे हिंदी दिवस और सरकारी अनुदान की बाट जोहनी पड़ती है। सत्ता ने सही अर्थों में हिंदी को महत्व नहीं दिया न कभी बड़ा मुद्दा बनाया जिसकी भारी कीमत देश को चुकानी पड़ी। इसीलिए आज 70 वर्षों के बाद भी यह ज्ञान की भाषा नहीं बन पायी है। राज और भाषा दोनों विरोधी पद हैं, जनतंत्र को राजभाषा की नहीं जनभाषा की जरूरत होती है। राजभाषा या तो अंग्रेजी होगी या अंग्रेजीनुमा हिंदी। जो भी होगी जनता से दूर होगी। इसीलिए आम जन की हिन्दी, अंग्रेजी और राज भाषा के बीच कमजोर हालत में है। शुक्र है कि फिल्म और मीडिया ने उसे थाम रखा है अन्यथा अब तक शायद वह मृतप्राय हो गयी होती।
कुछ विद्वान भाषा समस्या का हल अंग्रेजी देवी की मूर्ति पूजा में ढूंढते हैं। जाहिर सी बात है कि वे भाषा का नहीं सत्ता का हल ढूंढ रहे होते हैं जो एक अर्थ में उचित ही कहा जाएगा। वैसे मूर्ति स्थापित कर पूजा करने से कल्याण होने वाला होता तो कब का हो चुका होता। भाषा बदलने से सत्ता का चरित्र नहीं बदल जाता शासकों और शोषकों के नाम भले बदल जाएं। यह कटु सच्चाई है कि प्रजातंत्र में प्रजा नेता चुनने का काम करती है पर सरकार मुट्ठी भर लोग ही चलाते हैं भाषाओं के बारे में उनकी राय ही अंतिम होती है। ये मुट्ठी भर लोग यानी नौकरशाह, न्यायाधीश, शिक्षाविद्, वैज्ञानिक आदि ही देश के नीति निर्माता और भाग्य विधाता होते हैं और ये लोग जिस भाषा में चाहते हैं उसी में राज चलता रहा है। वर्तमान समय में वह भाषा अंग्रेजी है और मजबूरी में तथाकथित राजभाषा हिंदी है। मजबूरी इसलिए कि संविधान के अधिनियम के तहत अंग्रेजी के आदेशों का हिंदी में अनुवाद करना होता है। अनुवाद की भाषा की सबसे बड़ी कमजोरी यह होती है कि वह कामचलाऊ होती है। उसमें न तो जीवन होता है और न ही धड़कन होती है।
70 वर्षों के बाद भी राजभाषा हिंदी की अस्वीकृति का सबसे बड़ा कारण यही है कि घटिया अनुवादों के लिए तो यहां अरबों खर्च होते रहते हैं परंतु रचनात्मक लेखन के लिए गंभीर कोशिश नहीं की जाती। एक उदाहरण पर्याप्त होगा- हर साल देश के हजारों संस्थान एनुअल रिपोर्ट तैयार करते हैं। 90 प्र.श. संस्थान यह रिपोर्ट अंग्रेजी में तैयार करते हैं और बाद में वार्षिक प्रतिवेदन के रूप में इनका अनुवाद कराते हैं। करोड़ो रुपए में तैयार इन हिंदी अनुवादों को शायद ही कोई पढ़ता हो पर संवैधानिक मजबूरी के तहत इन्हें तैयार किया जाता है। अगर ये रिपोर्ट (यानी प्रतिवेदन) हिंदी में तैयार किए जाएं तो इनकी भाषा, इनका स्वरूप और इनका प्रवाह कुछ और ही होगा।
पर ऐसे कामों के लिए इच्छा शक्ति की जरूरत पड़ेगी, जो कि बड़ी मुश्किल से मिलती है।

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