ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
दूर तुझसे नहीं हूँ माँ
01-Jan-2018 02:27 PM 2940     

अमेरिका एक भागती दौड़ती दुनिया, अपने में मस्त, किसी के लिए ना रुकने वाली, नशे में धुत लोग, यहाँ की सड़कों पर अश्लीलता में लिप्त युवा, विशाल गगनचुंबी इमारतें और एक ऐसी जगह जहाँ पहुँचने के बाद आपको कुछ करने की आवश्यकता ही नहीं पड़ती, एक सुनहरा भविष्य आपका इंतज़ार करता है... हमारा सिनेमा भारतीय दर्शकों को अमेरिका का बस यही रूप दिखाता है।
एक ऐसी ही धारणा को लेकर मैं भी अमेरिका आयी। लेकिन यहाँ पहुँचकर सिनेमा से भिन्न एक अलग ही दुनिया देखने को मिली। अमेरिका एक ऐसा देश है जहाँ अनेक देशों के, अनेक धर्मों को मानने वाले अलग-अलग भाषाएँ बोलने वाले और हमारे और आपके जैसी भावना रखने वाले बहुतेरे लोग रहते हैं। यहाँ चर्च भी देखा और मंदिर भी, भगवान भी दिखे और यीशु भी। पर सभी जगह अपने-अपने धर्म और आस्था को मानने का समभाव दिखाई दिया। इस दरम्यान शिकागो में श्रीस्वामी नारायण मंदिर जाना हुआ। मंदिर का परिसर बहुत ही बड़ा और भव्य था। दीवारों पर की गयी कलाकारी देखते ही बनती थी। पूरा मंदिर सफ़ेद मार्बल से बना हुआ है। मंदिर में घूमते हुए ये सोचना मुश्किल था कि यह शिकागो में स्थित है।
अमेरिका में भारतवंशियों की संख्या भी बहुत है। यहाँ ऐसी कोई भी जगह नहीं होगी जहाँ आपको भारतीय ना मिलें। भारत के हर कोने के लोग यहाँ बहुत ही प्यार से रहते हैं। मैं मूलतः उत्तर प्रदेश से हूँ और मेरे घर के पास ही कई परिवार हैं, जिसमें से एक महाराष्ट्र, केरल और एक हैदराबाद से है। इसमें से सभी की मातृभाषा अलग-अलग है, लेकिन आपस में सभी हिंदी में ही बात करते हैं। हिंदी सभी भारतीयों आपस में जोड़ती है।
अमेरिका में भारतीय परिवार सभी त्योहारों को बहुत उल्लास के साथ मनाते हैं, चाहे दीवाली हो, होली हो या दशहरा। अक्सर ही यहाँ दशहरा पर्व पर स्थानीय मंदिरों में रावण दहन और रामलीला का आयोजन किया जाता है, जिसमें सभी भारतवंशी अपने पूरे परिवार के साथ सम्मिलित होते हैं। छोटे-छोटे बच्चों के द्वारा रामलीला का मंचन बहुत मनोहारी होता है। अमेरिका में रहते हुए भारतीय परम्परा और संस्कार को अपने बच्चों में प्रवाहित करने की सबसे बड़ी जिम्मेदारी भारतीय अभिभावको में होती है। यहाँ सालों से रह रहे भारतवंशी चाहते हैं कि अगर उनके बच्चे विज्ञान को जानें तो वहीं दूसरी तरफ राम को भी जानें और रामायण को भी पहचानें। यहाँ रह रहे भारतीय भारत से दूर रहते हुए भी भारत को अपने दिल में बसाये रखते हैं।
यहाँ अभिभावक अपने बच्चों को लेकर बहुत सजग हैं। वे पढ़ाई के साथ ही नृत्य, गायन-वादन जैसी कला को अपने बच्चों में देखना चाहते हैं। मुझे लगता है इसका एक ही कारण है कि वे बच्चों की परवरिश में भी हम भारतीय होने की झलक देखना चाहते हैं। अभिभावकों के मन में एक कशमकश चलती रहती है अपने बच्चों को लेकर कि वो कैसी परवरिश करें। क्योंकि वो अमेरिका में रहना तो चाहते हैं, लेकिन बच्चों को अमेरिकन नहीं बनाना चाहते।
आज भारत में अधिकतर युवा अमेरिका जाने और वहाँ बसने के सपने देखते हैं। हो भी क्यों ना, अमेरिका को अवसरों की भूमि (थ्ठ्ठदड्ड दृढ दृद्रद्रदृद्धद्यद्वदत्द्यन्र्) यूँ ही नहीं कहा जाता। लेकिन अथक प्रयास, कड़ी मेहनत और धैर्य होना यहाँ भी जरुरी है। इन तीनों के अभाव में यहाँ भी सफल होना मुश्किल है। अमेरिका में आपको सभी काम खुद ही करने पड़ते हैं। चाहे वो गाड़ी में पेट्रोल डालना हो या अपने घर के लॉन में घास काटनी हो। यहाँ आप ही अपने घर के बादशाह भी हैं और गुलाम भी हैं।
भारत से ज्यादा काम यहाँ करना पड़ता है, लेकिन डॉलर के मोह से बाहर नहीं निकल पाते हैं। लोग सालों साल घर और बाहर की मजदूरी करते हुए अपने घरवालों से कहते नहीं थकते "मैं बहुत खुश हूँ।" अब घर की रोजी रोटी चलानी है तो देश क्या और विदेश क्या। यहाँ सारी चीज़ें मिल जाती हैं चाहे वो देशी हो या विदेशी। बिजली रहती है 24 घंटे, सड़कें भी साफ-सुथरी, एक बेहतर जीवन जीने के लिए सभी साधन उपलब्ध हैं। फिर भी परदेश में जो सबसे ज्यादा आती है वो है "माँ"। अन्त में बस एक ही पुकार स्मरण आती है- दूर तुझसे होके भी दूर नहीं हूँ तुमसे माँ।

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