ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
निवासिनी हिंदी, प्रवासिनी हिंदी
01-Jan-2019 01:15 PM 931     

पिछली एक शताब्दी से हिंदी की व्यथा-कथा कही जाती रही है और आज लगता है कि शायद हम न तो हिंदी की व्यथा जान पाये हैं और न ही पूरी तरह उसकी कथा कह पाये हैं। भारत के स्वतंत्रता संग्राम के दिनों में आखिर महात्मा गांधी से लेकर भारतेंदु हरिश्चंद्र तक ने यही तो चिंता की थी कि हिंदी एक ऐसी भारत निवासिनी बने जो देश के घर-घर में बोली जाये। यह कल्पना इसलिये की गई थी कि हिंदी की लिपि में यह शक्ति है कि उसमें भारत की प्रत्येक बोली और भाषा को अंकित किया जा सकता है। दूसरा एक कारण ये था कि भारत की सांस्कृतिक एकता संस्कृत के वांग्मय के स्वरों में गुंथी हुई थी और आज भी है। शायद हिंदी को देवनागरी इसीलिये कहा गया होगा कि वह देवों की भाषा से नागरी बनी है और देवता चूंकि पूरी पृथ्वी के नागरिक हैं तो यह सहज ही संभव हो सकता है कि उनकी देवनागरी को हर कोई समझ सके। महात्मा गांधी के इसी आत्मविश्वास ने भारत के नीति निर्माताओं और बहुभाषा-भाषी समाज से यह आग्रह किया था कि वे हिंदी को अपने देश की सम्पर्क भाषा बनाये रखें। भाषाएं सब बोली जायें पर सम्पर्क भाषा और लिपि देवनागरी हो। इसे स्वतंत्रता संग्राम के दिनों से ही आजमाया जाने लगा था। दक्षिण भारा़त के भी वे बड़े नेतागण जो भारत के स्वतंत्रता संग्राम में सहभागी थे इस बात पर एकमत हुए कि भारत की मिलनसारिता की जुबान सिवा हिंदी की और क्या हो सकती है। उन नेताओं ने स्वयं हिंदी बोली और समाज को प्रेरित करने के लिये अपने-अपने राज्यों में हिंदी के शिक्षण और उसके प्रति समाज में आत्मीयता बढ़ाने के लिये अनेक हिंदी आंदोलन भी चलाये। उसी का यह परिणाम है कि पूरा देश अभी भी एक सामान्य धरातल पर हिंदी में ही रोता और गाता है।
हम याद करें उन दिनों को जब ईस्ट इंडिया कंपनी के भारत में आगमन के बाद और एक हद तक उसका यहां उपनिवेश बन जाने के बाद फिरंगियों ने भारत के आसपास के द्वीपों पर यहां के हुनरमंद लोगों को अपने पानी के जहाजों में ले जाना शुरू किया, उनसे खेती कराई, रेलवे लाइनें बिछवाईं, शक्कर के कारखाने खोले और उन लोगों को समृद्धि का लालच देकर इन द्वीपों में ले गये, पर वे गरीबी और दमन का शिकार ही बने रहे। पर यहां एक बात ध्यान देने की है कि कोई भी शासक शोषण करते वक्त किसी का श्रम तो छीन सकता है पर उसकी भाषा और उसमें व्यक्त पीड़ा को नहीं छीन सकता। क्योंकि जो लोग उत्तर प्रदेश, बिहार, पंजाब, गुजरात आदि प्रांतों से इन द्वीपों में ले जाये गये थे वे वहां अपनी-अपनी भाषा, अपने जेहन में बसा कर ले गये थे तभी तो हम उनकी पीड़ा की गाथाएं आज भी हिंदी में पढ़ते हैं। भाषा कोरी बोलने बतियाने भर की चीज नहीं है, वह सुख और दुख का निवास स्थान भी है। उसमें व्यथा और आनंद के द्वार खुलते हैं। उन द्वारों से निकलकर वह भाषा एक घर से दूसरे घर जाने की शक्ति प्राप्त करती है और इस तरह वह पृथ्वी की नागरिकता के हृदय में बास करने की शक्ति रखती है। क्या कारण है कि सहज ही दुनिया के 150 से अधिक देशों में हिंदी बोलने वाले तो हैं ही उसे पढ़ने और सीखने वाले भी हैं। वहां के विद्यालयों में हिंदी का एक कोना आज भी सुरक्षित है।
हम अपने राष्ट्र के स्तर पर अगर हिंदी सहित भारतीय भाषाओं के पक्ष में बात कर रहे हैं तो हमें कभी न कभी अपने आपसी सम्पर्क की बुनियादी आवश्यकता के रूप में हिंदी लिपि से ही अपना मन जोड़ते हुए अंग्रेजी की अनिवार्यता से मुक्ति की तलाश करनी होगी। निश्चय ही यह तलाश अभी अधूरी है और हमें यह स्वीकार करने में भी कोई हिचक नहीं कि 21वीं सदी आते-आते संसार का ऐसा बहुत-सा आधुनिक ज्ञान है जो अंग्रेजी के माध्यम से पूरी दुनिया में फैला है और उसकी पदावली को हम अंग्रेजी में ही समझ सकते हैं। तब हमें यह करना होगा कि जैसा हम प्राचीन तात्विक ज्ञान के लिये संस्कृत की शरण में जाते हैं, वैसे उसी आदर से आधुनिक ज्ञान-विज्ञान की समझ के लिये हम अंग्रेजी का भी दामन थामें, पर अंग्रेजियत की जमीन से थोड़ा हटकर ज्ञान के बीज अपनी ही जमीन पर बोने की चेष्टा करें। अंग्रेजी दुनिया में आधुनिक ज्ञान की भाषा आज भी हो सकती है। भारत में भी हो सकती है। पर आपसी संबंध और संपर्क के लिये जो भाषा हमें सहारा देने में सक्षम है वह हिंदी ही है - हिंदी है हम वतन है हिंदोस्ता हमारा।
हमें अपने बारे में सोचते हुए स्वयं से ही अब यह प्रश्न करना चाहिये कि 2050 ईसवी में भारत के बच्चे आपस में किस बोली में सम्वाद करेंगे। हम विचार करें क्या तमिलभाषी उस समय आपस में तमिल का उपयोग कर रहे होंगे। यह संभव है कि वे बोलने के तौर पर तमिल का व्यवहार कर रहे हों पर वह लिखने-पढ़ने की भाषा बनी रहेगी इसके बारे में आज कुछ भी कहना मुश्किल है। यही हालत बांग्ला, असमी, कन्नड़ और खुद हिंदी की भी हो सकती है। उसका साफ कारण जो दिखाई दे रहा है वह यह है कि बाजारवाद ने अंग्रेजी की स्वीकार्यता के तौर पर लिपि के रूप में रोमन लिपि को स्थापित करने की द्रुतगामी गतिविधियाँ प्रारंभ कर दी हैं। भारत के ही नहीं संसार के दूसरे भाषा-भाषी भी अब अपनी भाषा रोमन लिपि में लिख रहे हैं। ऐसा करते हुए एक दिन उन सबका मन रोयेगा जो अपनी भाषा तो किसी तरह बोल रहे होंगे पर उनकी भाषा की लिपि उनकी स्मृति से ओझल हो गई होगी। ऐसा नहीं है कि हिंदी और दूसरी भाषाओं के साफ्टवेयर मौजूद नहीं हैं, पर बाजार जो चला देता है चलता तो वही है। अब शैम्पू के सामने विचारी शिकाकाई बालों का क्या कर सकती है।
आमतौर पर अनुभव में यही आता है कि प्रवास तो व्यक्ति ही करता है और व्यक्ति जहां-जहां भी जाता है उसकी भाषा उसके मन में निवास करते हुए हर जगह चली जाती है। कभी-कभी वह ऐसे मुल्कों में फंस जाता है जहां की भाषा उसे आती ही नहीं और उसकी अपनी भाषा से भी उसका काम नहीं चलता। तब वह देह से इशारे पैदा करके दैहिक भाषा से काम चलाता है, क्योंकि देह हर जगह उपलब्ध है। ऐसे ही जब कई तरह के प्रवासी लोग भारत से बाहर गये तब उनकी भाषा उनके मन में थी, पर वह दूसरे देशों में जाते ही उनके काम नहीं आई। वे वहां जाकर वहां की भाषा सीखते थे, ताकि उनका काम चल सके। अपने दुख को वे मन ही मन अपनी भाषा में रोते थे ताकि अपने कुटुम्ब से और जो देश छोड़कर वे आयें हैं उससे कुछ कह सकें। यह सब सदियों से चल रहा है और अब उसकी हालत यह है कि जो प्रवासी दूसरे देशों में गये वे भाषा उसी देश की बोलते हैं और कभी-कभी अकेले में व्याकुल होकर हिंदी में रोने की चेष्टा करते हैं। लेकिन सदियां बीत जाने के बाद भाषा का संस्कार भी छूट जाता है। हम उसमें भले ही कितना रोयें और गायें वह बहुत प्राणामिक नहीं होता, बस उसमें एक भावनात्मक व्याकुलता भर होती है। फिर हम उस भाषा में कितना ही साहित्य रचें, वह न रचने वाले को और न अपने बिछुड़े देश में पढ़ने वाले को संतुष्ट करता है, बल्कि अक्सर साहित्य की महिमा को घटाता जान पड़ता है।
जब भी भारत के निवासी दूर देश से प्रवासी बनकर भारत लौटते हैं तब भले ही वे यहां हिंदी बोल रहे हों पर समय बीत जाने के कारण वे उस भाषा में सोचने लगते हैं जो उस देश की है जिसमें वे बरसों पहले बसने चले गये थे। खेल उलट जाता है। जब वे गये थे तो वहां की भाषा उन्हें परायी लगती थी, लेकिन अब उन्हें अपने ही देश में अपनी देश की भाषा परायी लगती है। वे उन प्रवासी पक्षियों की तरह लगते हैं जो भले ही कुछ समय के लिये एक विशेष तरह की जलवायु की तरफ आकर्षित होकर बसेरे करने आ गये हों, पर उन्हें जल्दी ही वहां से लौट जाना पड़ता है। पक्षियों में तो कम से कम पृथ्वी की पहचान अधिक होती है वे कभी-कभी अपने प्रवास स्थान में अपने अंडे छोड़ जाते हैं और चले जाते हैं, फिर उनकी संतानें उत्पन्न होकर गगनमंडल में उड़ जाती है। शायद वे बाद में अपने पितृपक्षियों को खोज भी लेती हैं, पर हाय यह प्रवासी जीवन जो भले ही अपने देश में अपने पितरों की याद में उन्हें खोजने यहां आता हो पर वे उसे यहां कहां मिलते हैं। यह जीवन एक भटकता हुआ जीवन है जो अपने आप को उस जगह पर खोजने आता है जिस जगह की अब कोई स्मृति उसके भीतर नहीं बची क्योंकि वह सिर्फ शब्दों के सहारे टिक नहीं सकता। उसको वह स्मृति भी चाहिये जो उन शब्दों में बसी है जिसे वह बोलता है। क्योंकि स्मृतिहीन शब्दों में आप अपने देश से भी आत्मीय नहीं हो सकते। चाहे आप कितनी ही बार उसमें लौट-लौट कर आयें और न ही आप स्मृतिहीन शब्दों में वह साहित्य रच सकते हैं जिसे साहित्य की कसौटी पर कसा जा सके।
जैसा कि हमने शुरू में कहा कि यह व्यथा और कथा अभी भी पूरी तरह प्रकट नहीं हो सकी है। यह कहानी तो चलती रहेगी, पर आज हमें इस बात की चिंता करनी होगी और समाधान की दिशा में कुछ कदम ज़रूर बढ़ाने होंगे। "गर्भनाल न्यास" की ओर से इस दिशा में हम पहल के लिये तत्पर हैं। हमारी कोशिश यह है कि माध्यमिक शाला के बच्चों को कम्प्यूटर पर यूनिकोड देवनागरी में टाइप करने का प्रशिक्षण दिया जाना चाहिये। यह काम सिर्फ भारत में ही नहीं दुनिया के दूसरे देशों में भी संभव है जहां रोमन लिपि की जगह हिंदी यूनिकोड का प्रशिक्षण दिया जा सकता है। इससे यह होगा कि भारत में तो हिंदी लिपि बचेगी ही उसे दुनिया के उन राष्ट्रों में भी बचाया जा सकेगा जहां हिंदी अभी भी रोमन लिपि के साम्राज्य में फंसी हुई है। तो क्यों न हम भारतीय भाषाओं की चिंता करने वाले लोग यूनिकोड के माध्यम से हिंदी और सभी भारतीय भाषाओं की आपसी सहभागिता की दिशा में कुछ कदम बढ़ाने की चेष्टा करें।

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