ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
समय की शिला पर नए साल! अब के जो आना
01-Feb-2019 03:09 PM 517     

समय की शिला पर

यह समय की शिला है
इससे छेड़छाड़ मत करना
जो कुछ भी फुसफुसाओगे
इस पर खुद जाएगा
दिल में कितना गहरा छिपा हो
जगजाहिर हो जायेगा
देना पड़ेगा हर प्रश्न का उत्तर
हर प्रश्न कचहरी हो जाएगा।

यह समय की शिला है
कोई अहिल्या पाषाणी नहीं
की युगों तक रह कर मौन अवाक्
किसी दिन अचानक
किसी युग पुरुष की चरणधूली पा
पुन: प्राणवंत नतमस्तक हो जायेगी
और जिस लोक से हुई बलात बहिष्कृत
सर झुका पुन: उसी लोक में चली जाएगी।

समय की शिला पर कुछ वश नहीं चलेगा
यह अपने चुनाव स्वयं कर पाती है
अपने-बेगाने, जाने-अनजाने
कोई मापदंड नहीं अपनाती है
नारी नर-नारायण में भी भेद नहीं करती
निरपराध आँखों से टपकी हर कोई बूँद
स्वत: ही इस पर खुदती चली जाती है

यह समय की शिला है
सिंहासन की भी बपौदी नहीं कि
उठा ली जाए यहाँ, पटक दी जाए वहां
बेमोल बिक जाए या ताकत से डर जाए
कुसूर या बेकसूर बस सूली लटक जाए
इस पर कुछ उकेरने का भी प्रयास मत करना
सोचना भी मत, यह सपने तक पहचान जाती है
यह समय की शिला है सब जान जाती है।

 

नए साल! अब के जो आना

नए साल! अब के जो आना
इतिहास के लिए कुछ पन्ने लेते आना
ख़ास मेरे लिए
हालांकि मैंने कोई बड़ा तीर नहीं मारा
मैंने तो किसी चुनाव को ताने तक नहीं मारे
शतरंज थी तो प्यादे जीते या वजीर क्यों हारे
किसी वादे को वफा की याद भी नहीं कराई
जुमलों की तो हरगिज़ बात तक नहीं उठायी
नहीं पूछा कि किसानों के साथ क्या जला
या कि बेरोजगारी का ग्राफ कितना पला
किसने बिछाई चौपर खेला कैसा जुआ
बैसाखी का रुपया क्यों धराशाई हुआ
सचमुच ऐसी बात नहीं उठाई कोई
कि सरहद बार-बार क्यों इतना रोई
फिर लिखना है क्या-क्या लिखाना है
तुमको अगर जरूर ये प्रश्न उठाना है
तो कान में सुनो कि
अंततः मेरे पास एक क्षीण सही पर आवाज़ बाकी है
कि मुझे अभी भी अपनी अस्मिता पर नाज़ बाकी है
बस कहीं यही व्यतीत न हो जाए
तुम्हारे पन्नों में अतीत न हो जाए
बस यही है लिखाना इसलिए कुछ पन्ने ले आना
ख़ास मेरे लिए
हालांकि मैंने कोई बड़ा तीर नहीं मारा।

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