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नेक्स्ट टू गॉडलीनेस
01-Mar-2016 12:00 AM 1839     

सफाई के बारे में अंग्रेजी कहावत है- क्लीनली नेस इज नेक्स्ट टू गॉडलीनेस। ई?ार के बाद सफाई ही सबसे महत्त्वपूर्ण है। वैसे तो ई?ार भी सफाई पसंद करता है- मन की सफाई, विचारों की सफाई, कर्मों की सफाई, वाणी की सफाई- एक निश्च्छल मन जो अंततः जीवन को भी सुन्दर, विराट और उदार बनाता है। अन्दर की इस सफाई के साथ जब बाहर की सफाई भी मिल जाती है तो जीवन पूर्ण बनता है। तभी ई?ार की पूजा से पहले तन की, अपने आसपास की सफाई अपेक्षित मानी गई है। इस बाहरी सफाई से आतंरिक सफाई का मार्ग प्रशस्त होता है। दोनों प्रकार की ये सफाइयां निरंतर चलने वाली प्रक्रियाएँ हैं। और इन दोनों ही सफाइयों का जीवन शैली से घनिष्ठ संबंध है।
जब ये सफाइयाँ प्रतीकात्मक या कर्मकांड बन जाती हैं तो फिर वास्तव में काम कम होता है और दिखावा बढ़ जाता है। आजकल लगता है यह दिखावा अपने चरम पर है। जिस तरह से आजकल दुनिया के सभी देशों में देशभक्ति के नाम पर जिस तरह विभेद और घृणा फ़ैल रहे हैं वह चिंताजनक है। लेकिन हम यहाँ बाहरी सफाई या क्लीनलीनेस की बात करना चाहते हैं। यह सफाई पवित्रता से अलग है। पवित्रता एक विचार है और स्वच्छता अर्थात भौतिक सफाई एक स्पष्ट कर्म। इस मामले में हमारे यहाँ सफाई और पवित्रता का घालमेल कर दिया गया है। हम गंगा की सफाई को गंगा की आरती, भजन, आयोजन आदि प्रतीकात्मक बातों के माध्यम से देखने और दिखने लगे हैं। इसलिए आयोजन चालू हैं और गंगा अपनी स्वाभाविक रफ़्तार से मर रही है।
विदेशों विशेषकर अमरीका और योरप घूमने के लिए जाने वाले लोग वहाँ की सफाई के गुण गाते हैं और अपने यहाँ भी वैसा ही कुछ चाहते हैं। इस सन्दर्भ में अमरीका की सफाई व्यवस्था की बात की जाए।
अमरीका में सबसे ज्यादा पैकेजिंग पर जोर दिया गया है। हर चीज बहुत शानदार और आकर्षक पैकिंग में आती है जिसकी ग्राहक से अच्छी कीमत वसूल की जाती है और जो घर लाते ही एक अच्छी मात्रा में कूड़ा बन जाती है। किसी होटल में कुछ भी खाने जाएंगे तो वहाँ थर्मोकोल की प्लेट, गिलास, कटोरी और प्लास्टिक के चम्मच आदि उपलब्ध कराए जाते हैं जो दो-चार मिनट बाद ही उस भोजन से अधिक कूड़ा फैला देते हैं।
यदि व्यापार में प्रतियोगिता होती है तो पिज्जा का साइज बढ़ा दिया जाता है लेकिन कीमत नहीं घटाई जाती अर्थात सस्ते के नाम पर और कूड़ा। हर चीज बड़ी लापरवाही से बड़े-बड़े पोलीथीन के थैलों में डाल दी जाती हैं। हर चीज डिब्बा बंद- भोजन, पानी, ठंडा पेय, फल, सब्ज़ी सब कुछ। खाओ कम और कूड़ा ज्यादा फैलाओ और वह भी दिन में चार-पाँच बार।
घरों से निकलने वाले इस कूड़े की सफाई के लिए उसी इलाके की निजी कम्पनियां काम करती हैं जो सप्ताह में एक बार अर्थात महीने में चार बार घर से कूड़ा ट्रक द्वारा ले जाती हैं। घरों में कोई हजार-पाँच सौ लीटर का एक बड़ा ड्रम होता है जिसमें रोज कूड़ा प्लास्टिक के थैलों में बंद करके डाल दिया जाता है और निश्चित दिन घर के सामने एक निश्चित स्थान पर रख दिया जाता है। कूड़ा उठाने वाला ट्रक आता है, उसका हेल्पर उस बड़े ड्रम को उस ट्रक से निकले एक मशीनी हाथ के सामने कर देता जिसे उठाकर वह मशीनी हाथ ट्रक के पिछले भाग में उलट देता है। थोड़ी-थोड़ी देर में उसे मशीनी दबाव से पिचकाकर छोटा आकर दे दिया जाता है। अंत में उसके बड़े-बड़े ब्लॉक बनाकर तय स्थान पर ज़मीन में दबा दिया जाता है। यदि कोई कूड़ा बड़ी साइज़ का होता है तो उसके लिए कहा जाता है कि आप इसे छोटे टुकड़ों में करके रखें। कुछ ऐसे कूड़े जिन्हें पुनर्चक्रति किया जा सकता है अलग तरह के बैग में डाल देते हैं। अखबार, पुस्तकें आदि आप तय स्थान पर डाल कर आ सकते हैं। भारत की तरह उन्हें रद्दी में खरीदने कोई घर-घर नहीं आता।
जिस दिन कूड़ा उठाने का दिन होता है उसकी पूर्वसंध्या को कुछ कबाड़ी भी आते हैं जो आप द्वारा फेंके गए फर्नीचर, बेड, टूटी साइकिल आदि उठा ले जाते हैं जिन्हें ठीक करके फिर गरीबों को सस्ते में बेच देते हैं लेकिन वैसे कोई कबाड़ी उन्हें नहीं खरीदता। स्थान-स्थान पर पुराने कपड़े-जूते आदि डालने के लिए ड्राप बॉक्स बने हुए हैं जिनमें डाले गए सामान को स्वयंसेवी या चर्च के लोग उठा ले जाते हैं और गरीबों को दान कर देते हैं। जिन्हें कोई लेने वाला नहीं होता वे गरीब देशों को दे दिए जाते हैं। सफाई की सफाई और दान का दान। उसे वहाँ से लाकर उन गरीब देशों के तथाकथित स्वयंसेवी संस्थान रेहड़ी वालों को बेच देते हैं जिन्हें देश की राजधानी तक में देखा जा सकता है।
सर्दी की ऋतु से पहले पेड़ों के झड़े हुए पत्तों के कूड़े को आपको अपने घर के सामने स्वयं इकठ्ठा करके रखना होता है जिसे पाइप से वेकम द्वारा ट्रकों में इकठ्ठा करके खाद बनाने वाले स्थानों तक पहुंचा दिया जाता है। यदि कोई पेड़ गिर जाता है तो स्थानीय प्रशासन की ओर से उसे छोटे-छोटे टुकड़ों में बदलकर मल्च के रूप में बेच दिया जाता है। मल्च लकड़ी के छोटे-छोटे किए गए उन टुकड़ों को कहते हैं जिन्हें बर्फीले इलाकों में पेड़ों की जड़ों को बर्फ से बचाने के लिए तने के साथ चढ़ा दिया जाता है जैसे आलू के पौधे को मिट्टी चढ़ाते हैं।

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