ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
नीरज गोस्वामी
नीरज गोस्वामी
अगस्त 1950 को जम्मू में जन्म। अंतरजाल की लगभग सभी प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में ग़ज़लें प्रकाशित। पेशे से इंजीनियर। अनेक विदेश यात्राएं कर चुके हैं। सम्प्रति - भूषण स्टील मुंबई में वाइस प्रेसिडेंट के पद पर कार्यरत।
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तुम साथ हो तो घर की कमी फिर नहीं खलती
01-Mar-2017 12:11 AM 499 तुम साथ हो तो घर की कमी फिर नहीं खलती

कविता एक कोशिश करती है जीवन का चित्र बनाने की। अवनीश कुमार की किताब पत्तों पर पाजेब ऐसी ही एक कोशिश है। आजकल ग़ज़लें थोक के भाव लिखी जा रही हैं और छप भी रही हैं। अमूमन हरेक पत्रिका में एक आध ग़ज़ल का प

मैं उस जगह हूँ जहाँ फासला रहे तुमसे
01-Feb-2017 01:02 AM 646 मैं उस जगह हूँ जहाँ फासला रहे तुमसे

जयपुर के लोकायत प्रकाशन पर जिस किताब पर मेरी नज़र पड़ी, वह थी आवाज़ चली आती है। इस नायाब किताब के शायर हैं मरहूम जनाब शाज़ तमकनत साहब। हिंदी पाठकों के लिए शायद ये नाम अंजाना हो लेकिन दकन में इनका नाम ब

यहाँ पर भीड़ में सब अजनबी हैं
01-Jan-2017 01:52 AM 2506 यहाँ पर भीड़ में सब अजनबी हैं

शायर जनाब अनवारे इस्लाम की बात करती हुई ग़ज़लों की किताब का शीर्षक है- मिजाज़ कैसा है।
उस की आँखों में आ गए आंसू
मैंने पूछा मिजाज़ कैसा है
दूर तक रेत ही चमकती है
कोई पानी नहीं है धो

इस चमन के फूल को पत्थर न होने दीजिये
01-Dec-2016 12:00 AM 1284 इस चमन के फूल को पत्थर न होने दीजिये

ग़ज़ल को नए ढंग से परिभाषित करने वाले शायरों में जनाब प्रेमकिरण
साहब को बिलाशक शामिल किया जा सकता है। यूं नए शायरों को पढ़ना, नए अनुभव और अपरिचित क्षेत्र की यात्रा करने जैसा होता है। जहां पता नह

ग़म तो है हासिले ज़िन्दगी दोस्तो
01-Nov-2016 12:00 AM 2119 ग़म तो है हासिले ज़िन्दगी दोस्तो

उर्दू के मशहूर शायर जनाब नक्श लायलपुरी की किताब "तेरी गली की तरफ" का एक पृष्ठ देवनागरी में और दूसरा उर्दू लिपि में छपा है, जो इसे नायाब बनाता है।

लोग फूलों की तरह आयें
के पत्थर की तरह

थोड़ी-सी मोहब्बत भी ज़रूरी है जिगर में
01-Oct-2016 12:00 AM 2463 थोड़ी-सी मोहब्बत भी ज़रूरी है जिगर में

शायर जनाब दिनेश ठाकुर की किताब परछाइयों के शहर में के बकमाल शेरों पर नज़र डालें :
कभी तुम जड़ पकड़ते हो
कभी शाखों को गिनते हो
हवा से पूछ लो न
ये शजर कितना पुराना है
समय ठहरा

इतना हुए क़रीब कि हम दूर हो गए
01-Sep-2016 12:00 AM 2471 इतना हुए क़रीब कि हम दूर हो गए

बहते हुए अश्कों से ग़म की लज्जत उठाने वाले इस अज़ीम शायर का नाम है गणेश बिहारी "तर्ज़", जिनकी किताब "हिना बन गयी ग़ज़ल" के हिंदी संस्करण का अनावरण हो उससे  पहले ही 17 जुलाई 2009 को वे इस दुनिया-ऐ-फ़

बंद अंधेरों के लिए ताज़ा हवा लिखते हैं हम
01-Aug-2016 12:00 AM 291 बंद अंधेरों के लिए ताज़ा हवा लिखते हैं हम

ये चाँद ख़ुद भी तो सूरज के दम से काइम है
ये ख़ुद के बल पे कभी चांदनी नहीं देते
गज़ब के तेवर लिए छोटी-सी, प्यारी-सी शायरी की किताब "जन गण मन" के लेखक हैं ब्लॉग जगत

ख़ुश्बू की तरह से मैं फिजा में बिखर गया
01-May-2016 12:00 AM 1192 ख़ुश्बू की तरह से मैं फिजा में बिखर गया

रोज़ बढ़ती जा रही इन खाइयों का क्या करें
भीड़ में उगती हुई तन्हाइयों का क्या करें
हुक्मरानी हर तरफ बौनों की, उनका ही हजूम
हम ये अपने कद की इन ऊचाइयों का क्या करें
बौनों के हुजूम मे

अभी तो अपना मुझे घर तलाश करना है
01-Mar-2016 12:00 AM 192 अभी तो अपना मुझे घर तलाश करना है

शायर जनाब कुँवर "कुसुमेश' की लाजवाब ग़ज़लों की किताब "कुछ न हासिल हुआ' पढ़कर ऐसा महसूस होता है, जैसे कुछ नायाब हासिल हुआ है।
जो बड़े प्यार से मिलता है लपककर तुझसे
आदमी दिल का भी अच्छा हो वो ऐ

अच्छे दिनों की आस में दीवारो-दर हैं चुप
01-Feb-2016 12:00 AM 156 अच्छे दिनों की आस में दीवारो-दर हैं चुप

ऐसे अशआर पढ़कर अचानक मुंह से कोई बोल नहीं फूटते। ऐसे कुंदन से अशआर यूँही कागज़ पर नहीं उतरते, इसके लिए शायर को उम्र भर सोने की तरह तपना पड़ता है। इस तपे हुए सोने जैसे शायर का नाम है- निश्तर खानकाही। उ

ख़ुशी गम से अलग रहकर मुकम्मल हो नहीं सकती
01-Jan-2016 12:00 AM 158 ख़ुशी गम से अलग रहकर मुकम्मल हो नहीं सकती

जनाब अकील नोमानी साहब की किताब "रहगुज़र' पढ़कर खुद के उर्दू शायरी के जानकार होने की ग़लतफहमी दूर हो गयी। साठ-सत्तर शायरी की किताबें पढ़ लेने के बाद मुझे लगने लगा था कि मैंने उर्दू-हिंदी के बेहतरीन समका

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