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नीरज गोस्वामी
नीरज गोस्वामी
अगस्त 1950 को जम्मू में जन्म। अंतरजाल की लगभग सभी प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में ग़ज़लें प्रकाशित। पेशे से इंजीनियर। अनेक विदेश यात्राएं कर चुके हैं। सम्प्रति - भूषण स्टील मुंबई में वाइस प्रेसिडेंट के पद पर कार्यरत।

शाम होती है तो घर ज़ाने को जी चाहता है
शायरी की किताबों को खोजते हुए जब    नए मौसम की खुशबू किताब पर     मेरी नज़र पड़ी तो लगा जैसे गढ़ा खज़ाना हाथ लग गया है। इस किताब के शायर हैं जनाब इफ्तिख़ार आरिफ़। किताब के पहले पन्ने पर दर्ज शेर - मेरे खुदा मुझ
तुम साथ हो तो घर की कमी फिर नहीं खलती
कविता एक कोशिश करती है जीवन का चित्र बनाने की। अवनीश कुमार की किताब पत्तों पर पाजेब ऐसी ही एक कोशिश है। आजकल ग़ज़लें थोक के भाव लिखी जा रही हैं और छप भी रही हैं। अमूमन हरेक पत्रिका में एक आध ग़ज़ल का प्रकाशित होना अनिवार्य हो गया है। बहती गंगा में हाथ
मैं उस जगह हूँ जहाँ फासला रहे तुमसे
जयपुर के लोकायत प्रकाशन पर जिस किताब पर मेरी नज़र पड़ी, वह थी आवाज़ चली आती है। इस नायाब किताब के शायर हैं मरहूम जनाब शाज़ तमकनत साहब। हिंदी पाठकों के लिए शायद ये नाम अंजाना हो लेकिन दकन में इनका नाम बहुत इज्ज़त से लिया जाता है। शाज़ साहब उर्दू के उन चन
यहाँ पर भीड़ में सब अजनबी हैं
शायर जनाब अनवारे इस्लाम की बात करती हुई ग़ज़लों की किताब का शीर्षक है- मिजाज़ कैसा है।उस की आँखों में आ गए आंसूमैंने पूछा मिजाज़ कैसा हैदूर तक रेत ही चमकती हैकोई पानी नहीं है धोका हैकिसके काँधे पे रखके सर रोऊँहाल सब

इस चमन के फूल को पत्थर न होने दीजिये
ग़ज़ल को नए ढंग से परिभाषित करने वाले शायरों में जनाब प्रेमकिरण साहब को बिलाशक शामिल किया जा सकता है। यूं नए शायरों को पढ़ना, नए अनुभव और अपरिचित क्षेत्र की यात्रा करने जैसा होता है। जहां पता नहीं होता रास्ते में कैसे मंज़रों से मुलाकात होगी। पू
ग़म तो है हासिले ज़िन्दगी दोस्तो
उर्दू के मशहूर शायर जनाब नक्श लायलपुरी की किताब "तेरी गली की तरफ" का एक पृष्ठ देवनागरी में और दूसरा उर्दू लिपि में छपा है, जो इसे नायाब बनाता है। लोग फूलों की तरह आयें के पत्थर की तरहदर खुला है मेरा आगोशे-पयम्बर की तरह
थोड़ी-सी मोहब्बत भी ज़रूरी है जिगर में
शायर जनाब दिनेश ठाकुर की किताब परछाइयों के शहर में के बकमाल शेरों पर नज़र डालें :कभी तुम जड़ पकड़ते हो कभी शाखों को गिनते होहवा से पूछ लो न ये शजर कितना पुराना हैसमय ठहरा हुआ सा है हमारे गाँव में अब तकवही पाय
इतना हुए क़रीब कि हम दूर हो गए
बहते हुए अश्कों से ग़म की लज्जत उठाने वाले इस अज़ीम शायर का नाम है गणेश बिहारी "तर्ज़", जिनकी किताब "हिना बन गयी ग़ज़ल" के हिंदी संस्करण का अनावरण हो उससे  पहले ही 17 जुलाई 2009 को वे इस दुनिया-ऐ-फ़ानी से कूच कर गए।ज़िन्दगी का ये सफ़र भी यूँ ही

बंद अंधेरों के लिए ताज़ा हवा लिखते हैं हम
ये चाँद ख़ुद भी तो सूरज के दम से काइम हैये ख़ुद के बल पे कभी चांदनी नहीं देतेगज़ब के तेवर लिए छोटी-सी, प्यारी-सी शायरी की किताब "जन गण मन" के लेखक हैं ब्लॉग जगत के शायर जनाब द्विजेन्द्र द्विज। ब्लॉग पर उनकी सक्
ख़ुश्बू की तरह से मैं फिजा में बिखर गया
रोज़ बढ़ती जा रही इन खाइयों का क्या करेंभीड़ में उगती हुई तन्हाइयों का क्या करेंहुक्मरानी हर तरफ बौनों की, उनका ही हजूमहम ये अपने कद की इन ऊचाइयों का क्या करेंबौनों के हुजूम में ऊंचा कद रहने वाले युवा ¶ाायर अखिले¶ा त
अभी तो अपना मुझे घर तलाश करना है
शायर जनाब कुँवर "कुसुमेश' की लाजवाब ग़ज़लों की किताब "कुछ न हासिल हुआ' पढ़कर ऐसा महसूस होता है, जैसे कुछ नायाब हासिल हुआ है।जो बड़े प्यार से मिलता है लपककर तुझसेआदमी दिल का भी अच्छा हो वो ऐसा न समझआज के बच्चों पे है पश्चिमी जादू का अ
अच्छे दिनों की आस में दीवारो-दर हैं चुप
ऐसे अशआर पढ़कर अचानक मुंह से कोई बोल नहीं फूटते। ऐसे कुंदन से अशआर यूँही कागज़ पर नहीं उतरते, इसके लिए शायर को उम्र भर सोने की तरह तपना पड़ता है। इस तपे हुए सोने जैसे शायर का नाम है- निश्तर खानकाही। उनकी किताब "मेरे लहू की आग' से हिंदी के पाठक बहुत अ

ख़ुशी गम से अलग रहकर मुकम्मल हो नहीं सकती
जनाब अकील नोमानी साहब की किताब "रहगुज़र' पढ़कर खुद के उर्दू शायरी के जानकार होने की ग़लतफहमी दूर हो गयी। साठ-सत्तर शायरी की किताबें पढ़ लेने के बाद मुझे लगने लगा था कि मैंने उर्दू-हिंदी के बेहतरीन समकालीन शायरों को पढ़ लिया है और अब अधिक कुछ पढ़ने को बच
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