ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
नीलाभ अश्क निरंकुश बवाल, जी का जंजाल
01-May-2019 04:48 PM 1210     

नीलाभ के बारे में कुछ लिखना, मधुमक्खियों के छत्ते में हाथ डालने के समान है। आ बैल, मुझे मार। मेरी हिम्मत की भी दाद देनी पड़ेगी।
मैं नीलाभ के बारे में क्या जानती हूँ? मुझे नहीं ध्यान कि मैं नीलाभ से कभी मिली होऊं। वे जब अपने दिल्ली के किस्से बयान करते हैं तो मैं हैरान होती हूँ कि वे दिल्ली में रहते थे। हाँ, हमारी बात फोन पर अवश्य हुई है, वह भी पिछले एक वर्ष के दौरान ही। शायद दो-तीन वर्ष वे मेरे फेसबुक मित्र भी रहे। जो मैं उनके बारे में जानती हूँ, वह सारा जगत जानता है। मैं अकेली इस बात का श्रेय नहीं ले सकती कि मैं उनके बारे में कुछ ख़ास जानती हूँ। उनका हर आम और ख़ास चौराहे पर सजा हुआ है। न न, किसी दूसरे ने यह सत्कार्य करने का दुस्साहस नहीं किया, उन्होंने खुद सजाया है। पर हमें किसी के अन्दरूनी सच का क्या पता? जो नज़र आता है, क्या वही सच होता है? नज़र आती हैं घटनाएँ, पर घटनाएँ तथ्य होती हैं, किसी सत्य की परिचायक नहीं। तथ्य इतिहास में होता है, सत्य दर्शन शास्त्र में।
मैंने इनका नाम सुना उपेंद्रनाथ अश्क के पुत्र के रूप में। उपेंद्रनाथ अश्क जी लेखन के साथ-साथ पुस्तक-प्रकाशन का काम भी करते थे। उनके प्रकाशन व्यवसाय का नाम था, नीलाभ प्रकाशन। नीलाभ उनके पुत्र का नाम है। जैसे आमतौर पर लोग अपने बच्चों के नाम पर अपने व्यवसाय का, घर का नाम रख देते हैं, वैसे ही नीलाभ प्रकाशन नाम रखा गया। यह उन्होंने मुझे इसी रूप में बताया भी था कि उन्होंने अपने बेटे के नाम पर प्रकाशन का नाम रखा है। उन्होंने मेरा एक कहानी संग्रह प्रकाशित किया था, जो उन्होंने मुझसे खुद माँगा था, नई लेखिका होने के नाते। उपेंद्रनाथ अश्क जी ही इस सिलसिले में मुझसे मिले भी थे, किसी काम से दिल्ली आए होंगे, शायद किसी गेस्ट हाउस या होटल में ठहरे थे, वहीं मुझे मिलने के लिए बुलाया था। उन्होंने मुझे रॉयल्टी स्वरूप एक मनीऑर्डर भी भेजा था, जो बहुत ही थोड़ी राशि का था, टोकन अमाउंट की तरह। मैं उसे पाकर बहुत खुश हुई थी, इसलिए भी कि उस समय मेरे दिन बहुत कड़की में गुज़र रहे थे। तब तक मैंने नीलाभ का नाम इतना भर सुना था कि अश्क जी के बेटे का नाम नीलाभ है।
पिता का व्यवसाय, सम्पत्ति पुत्र को विरासत के रूप में मिलती है, लेकिन पिता के निर्णय, चुनाव। उनके अपने जीवन में किए गए कार्य, इन सबको पुत्र अपना नहीं कह सकता। इसलिए नीलाभ यदि यह कहें कि उन्होंने मेरा कहानी संग्रह छापने का गुनाह किया है, तो वे बाइज़्ज़त इस गुनाह से बरी हों। यह यदि गुनाह था तो इस गुनाह के हकदार उनके पिताश्री हैं, वे नहीं।
मैंने भी कुछ वर्ष एक प्रकाशन चलाया था, जिसके अंतर्गत 14 पुस्तकें प्रकाशित की थीं। अब कल को यदि मेरा पुत्र लेखकों को जाकर यह अहसान जताए कि उसने उनकी पुस्तक प्रकाशित की थी तो यह न केवल गलत होगा, अनैतिक भी होगा और इस बात के लिए मैं मरने के बाद भी अपने पुत्र को कभी माफ़ नहीं करूँगी। पर मेरा पुत्र सुसंस्कारित है, उसमें संस्कारों के बीज मैंने बोये हैं, वह कभी ऐसा कर ही नहीं सकता।
नीलाभ ने उस संग्रह की कहानियाँ लगभग एक वर्ष पहले ही पढ़ी थीं और उन पर एक बेहद खूबसूरत टिप्पणी की थी (जो फेसबुक पर छपी थी) कि "मणिका मोहिनी की कहानियाँ समय से आगे की कहानियाँ हैं, इस पुस्तक का दूसरा संस्करण प्रकाशित होना चाहिए।" मेरी कहानियों के प्रति नीलाभ जी की इस राय की मैं हृदय से आभारी हूँ। नीलाभ यदि अपने पिता के व्यवसाय के प्रति संवेदनशील होते और इसे अच्छा काम समझते तो इस रिटायरमेंट की अवस्था में इसे पुनः शुरू कर सकते थे। उनके पास एक युवा बीवी है इस कार्य को आगे बढ़ाने के लिए। फिर मेरे उस संग्रह का दूसरा संस्करण छापने का गुनाह करते। तब खुल कर कन्फेशन करते कि यह गुनाह किया है।
चाहे कोई मुझसे दुश्मनी करे, मैं लम्बे अर्से तक उसके लिए अपने मन में वैमनस्य नहीं रख पाती, नीलाभ के कुछ प्रेम पत्र (क्षमा कीजिए, हम गालियों को प्रेम पत्र कहते हैं) मेरे फोन के मैसेज बॉक्स में सुरक्षित हैं, जिन्हें, संभव होता तो, मैं फ्रेम में जड़वाकर अपने कमरे की दीवार पर टाँग लेती। पहले के ज़माने में कागज़ पर लिख कर पत्र भेजने का यही मज़ा था कि उन्हें फ्रेम में जड़वाया जा सकता था।
मुझसे दुश्मनी इसलिए नहीं होती क्योंकि मैं हर बात के पीछे व्यक्ति का मनोविज्ञान समझने की कोशिश करती हूँ। मैंने नीलाभ का मनोविज्ञान यह समझा है कि वे मन के भीतर बहुत अकेले हैं। उन्हें दूर-दूर तक कोई अपना नज़र नहीं आता। उन्होंने जीवन में बहुत खोया है, पाया कुछ नहीं। जिसे लोग उनके द्वारा "पाना" समझ रहे हैं, वह मृगतृष्णा है। न वे किसी से प्यार करते हैं, न कोई उनसे प्यार करता है। न वे किसी के अपने हैं, न कोई उनका अपना है। शराब पीकर प्यार नहीं किया जाता, सेक्स किया जाता है। हैविंग सेक्स और मेकिंग लव में बहुत बड़ा फर्क होता है। सब वक़्त-कटी का मामला है।
यह दुखद स्थिति है कि इतना अकेलापन झेल कर भी उन्हें जीना नहीं आया। बहुतों को नहीं आता। यह जीवन जीना भी एक कला है जो सबको नहीं आती। उन्होंने यौवन गुज़ारा "ज़िन्दगी के भी मज़े और मौत से गाफिल नहीं" अंदाज़ में। अंत समय के लिए कुछ बचा कर नहीं रखा, "जिसने दिया है तन को, देगा वही कफ़न को" अंदाज़ में। (यहाँ मेरा मतलब पैसे से नहीं है।)
वे बहुत जल्दी उत्तेजित हो जाते हैं और उसे बुद्धि से समझने की कोशिश नहीं करते। उनका क्रोध उनकी बुद्धि से आगे चलता है। उनके जीवन की समस्याओं में उनसे सही सलाह-मश्वरा करने वाला उनका कोई मित्र/मित्राणी नहीं है। सब तमाशबीन हैं।
एक जीवित आदमी, वह भी लेखक, की अपनी ज़िन्दगी की कहानी इतनी मरी हुई होगी, मुझे विश्वास न था। नीलाभ के जीवन की कहानी आकर्षित भी करती है और उदास भी। एक बौद्धिक, प्रतिभाशाली, उम्रदराज़ पुरुष किसी ने भी उसे प्रेम नहीं किया। कई बार वह मुझे "विक्टिम" (सताया हुआ) लगता है, तो कई बार शातिर और कई बार मूर्ख। अनेक बार ख्याल आया है कि क्या प्रतिभाशाली व्यक्ति इतना नादान भी होता है जो अपने से जुड़े स्वार्थी तत्वों को पहचान नहीं पाता? आखिर उसकी कौन सी दुर्बलता उसे "झूठ" से जुड़े रहने के लिए विवश करती है? क्या उसकी आत्मा इतनी भी जागृत नहीं हुई कि उसे वफ़ा और बेवफ़ा की पहचान करना सिखा सके? क्या जीवन के हादसों ने उसे भीतर से इतना खोखला कर दिया है कि उसमें अकेले, बिना सहारे के खड़े होने की ताकत नहीं है? उसे आस्तीन में साँप पालने का इतना शौक क्यों है? ऐसा व्यक्ति मनोवैज्ञानिक अध्ययन के लिए अच्छा ऑब्जेक्ट हो सकता है।
बहुत से लोग अस्पताली तजुर्बों के लिए मृत्यु-उपरान्त अपना शरीर दान करने की वसीयत लिख देते हैं। क्यों नहीं ऐसे विश्रृंखलित दिमाग के लोग जीवित रहते अपना मस्तिष्क मनोवैज्ञानिक अध्ययन के लिए दान कर देते?
सिर्फ एक सन्दर्भ पर टिप्पणी करना चाहूँगी। उन्होंने खुलेआम फेसबुक पर स्वीकारा (जो कि नहीं करना चाहिए था) कि वे एक 30-35 वर्षीय कन्या के साथ हमबिस्तर हुए। फिर बताया कि वह उनके घर से कुछ सामान उठा कर ले गई, जिसकी उन्होंने पुलिस में रिपोर्ट की। प्यारे भाई, आपके किसी मित्र/मित्राणी ने क्या आपसे पूछा कि अपने से आधी उम्र की लड़की के साथ सोओगे तो क्या मुफ्त में सोओगे? इसीलिए कहती हूँ, सब तमाशबीन हैं। तुम्हें खुद उसे कुछ दे-दिला के विदा करना चाहिए था, ताकि शान से कह सकते, "आय हैव पेड फॉर इट।" बातें तो और भी हैं तुम्हें समझाने की, लेकिन प्यारे भाई, पंगा कौन ले? इतना पंगा लेने की ही हिम्मत कर ली, यह क्या कम है?
मेरे कुछ मित्र सच कहते हैं कि मेरे अपने जीवन में तो दुःख रहे नहीं, लेकिन दुखों का रसास्वादन करने की मेरी आदत नहीं गई। मैं दूसरों की मूर्खताओं, गलतियों, तदुत्पन्न दुखों एवं असंगतियों के बारे में व्यर्थ चिंतित रहती हूँ, खासकर उनके बारे में जो परिवार का भ्रम देते हुए दो जानलेवा दुश्मनों की भाँति साथ रहते हैं। न जाने कब, एक-दूसरे की पीठ में छुरा घोंप दें? संभल के भाई, संभल के। मैं चूँकि भगवान को मानती हूँ इसलिए अंत में यही कहूँगी कि भगवान नीलाभ का भला करे।

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