ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
नये वर्ष की देहरी पर राम की याद
CATEGORY : स्मरण 01-Apr-2017 12:36 AM 256
नये वर्ष की देहरी पर राम की याद

हे राम मेरा यह हृदय ही तुम्हारा घर है और इस पर बड़ी विपत्ति आयी हुई है। इस घर
पर काम-क्रोध-लोभ-अहंकार ने धावा बोल दिया है। ये चारों तस्करों की तरह तुम्हारे
घर को लूट रहे हैं। मुझे चिन्ता हो रही है और मैं तुम्हारे घर को इस तरह लुटते हुए
नहीं देख सकता। तुलसी बाबा की यह आवाज मुझे अक्सर गहरी नींद से जगा देती है
कि उठो, कहीं तुम्हारे दिल में बसा राम का घर तो नहीं गिर रहा।

मेरी यादों में राम पृथ्वी के उस प्रथम नागरिक की तरह बसे हुए हैं जिनका पता पूछकर बाल्मीकि मुनि ने मानव जाति को उनका चरित सुनाया। जो सदाचार से युक्त, सभी प्राणियों के हित साधक, अपने क्रोध को जीतकर परनिन्दा से अछूते हैं। जीतने के लिए राम का कोई शत्रु नहीं, अपने मन को जीत लेने में ही राम की विजय है।
राम कहानी कवि के हृदय में बसी उस करुण घटना से जन्म लेती है जब वे देखते हैं कि किसी बहेलिए ने अपने बाण से एक क्रौंच पक्षी का वध कर दिया है। तब शोक से भर गये आदि कवि के हृदय से मानव जीवन की जो पहली करुण कथा प्रकाशित हुई, वही तो रामायण कहलाती है। आदि कवि से प्रेरणा लेते हुए महाकवि तुलसीदास ने मनुज रूप ईश्वर की कहानी को ही राम कहानी के रूप में रचा है। राम की कहानी मेरे लिए एक सच्चे नागरिक धर्म का प्रस्ताव है।
प्रतिदिन इस राम कहानी को पढ़ता हूँ तो पाता हूँ कि राम का जीवन सबका सम्मान करते हुए और सबका सामना करने में बीता। जहाँ ज्ञान मिला उसे ग्रहण किया और जब आज्ञा मिली तो उसका पालन किया। राम ही निर्भय होकर सबसे कह सके कि अगर मेरा आचरण अनीतिपूर्ण दिखाई पड़े तो मुझे तुरन्त बिना किसी संकोच के टोका जाये। राम ने अपने जीवन में बातचीत बहुत कम की है, वे पूरी राम कहानी में काम करते हुए आदमी की तरह दिखाई पड़ते हैं। वे विश्वमित्र की माँग पर अपने समय की क्रूर शक्तियों का विनाश करने निकल पड़ते हैं। अपने मार्ग में आयी अहल्या धरती को उर्वर बनाकर उसे फलवती होने का सौभाग्य प्रदान करते हैं। तभी तो उन्हें वनवासियों और ग्रामीणों की दुआएँ मिलती चली जाती हैं। राम ने गहन वनों में अपने रास्ते खुद ही खोजे हैं। राम प्रकृति से इतने अभिन्न हैं कि वृक्षों और लताओं से पता पूछकर अन्यायी को खोज निकालते हैं। वानर-भालुओं को अपना दोस्त बना लेते हैं और अपनी खोई हुई प्रिया को फिर अपनी अयोध्या में वापस ले आते हैं। राम का जीवन खुद अपने पाँवों से खींची गयी पगडण्डी की तरह है, उन्हें अपने ही बनाये रास्ते पर चलना पसन्द है ।
राम कहानी का मनन करते हुए अनुभव में आता है कि मेरा शरीर ही अयोध्या है और मेरा हृदय ही राम का घर है। अपने हृदय को जितना गहरा करता जाता हूँ, राम की महिमा की गहराई उतनी ही बढ़ती जाती है। गहराई में अनुकूल और प्रतिकूल का भेद अपने आप मिट जाता है-- लगता है कि सबके साथ मिल-जुलकर तैर रहा हूँ। राम कहानी में गोता लगाते हुए विषमता का भाव खोने लगता है। फिर यह कहना मुश्किल हो जाता है कि कौन अपना और कौन पराया। लगता है कि राम कहानी में डूबा साधकर सबको पाया जा सकता है।
सदियों से अनेक राम कथाएँ कही जाती रही हैं पर लगता है कि सबकी रामधुन एक ही है। जब भी इस रामधुन में डूबता हूँ तो पाता हूँ कि मेरे शरीर में एक गाँव बसा हुआ है जहाँ क्षिति, जल, पावक, गगन, समीर की पंचायत बैठी है और मेरा आत्म भाव ही सरपंच है। पाँच तत्वों से बना यह मेरा शरीर ही राम का घर है। मेरे ही मानस सरोवर में कमल ऐसे खिलते हैं जैसे सबको पास बुलाने वाले मधुर छंद हों। जहाँ मेरे ही भावों का पराग और मकरन्द सब पर झर रहा है। मेरी ही बोली-बानी की सुगन्ध सबके मन को शीतल कर रही है। सबके जीवन के प्रति मेरी श्रृद्धा ही फलवती होकर बसन्त ऋतु की तरह पूरे गाँव पर छा रही है। मेरे मन में एक चौपाई का अर्थ धीरे-धीरे खुल रहा है-- सिया-राम मय सब जग जानी -- और गुण-अवगुण से सने पूरे संसार को प्रणाम करने की इच्छा जाग रही है। सबको अपना कहने का मन हो रहा है। राम कहानी पढ़ते हुए अनुभव में आता है कि मेरा शरीर सचमुच एक खेत जैसा है। इसकी क्यारियाँ मुझे ही बनानी हैं जिनमें बहुरंगे जीवन के फूल खिलते हैं। हम अपने मन के कितने ही बीज उन क्यारियों में बोयें पर न जाने कहाँ-कहाँ से बीज उड़कर उनमें समा जाते हैं, उग आते हैं। शायद इसीलिए अपने जीवन की क्यारियों की निंदाई-गुड़ाई रोज करना पड़ती है, खरपतवार हटाना पड़ती है। अपने इस शरीर रूपी खेत की बड़ी जिम्मेदारी से रखवाली करना पड़ती है कि कहीं कोई अनजानी बयार इसकी फसल को चौपट न कर दे। इस शरीर रूपी नगरिया को कोई लूट न ले।
बहुत करीब से महाकवि तुलसीदास की आवाज अक्सर सुनायी देती है कि हे राम मेरा यह हृदय ही तुम्हारा घर है और इस पर बड़ी विपत्ति आयी हुई है। इस घर पर काम-क्रोध-लोभ-अहंकार ने धावा बोल दिया है। ये चारों तस्करों की तरह तुम्हारे घर को लूट रहे हैं। मुझे चिन्ता हो रही है और मैं तुम्हारे घर को इस तरह लुटते हुए नहीं देख सकता। तुलसी बाबा की यह आवाज मुझे अक्सर गहरी नींद से जगा देती है कि उठो, कहीं तुम्हारे दिल में बसा राम का घर तो नहीं गिर रहा। तुलसी बाबा याद दिलाते हैं कि राम कथा तो हमारे ही हाथों की सुन्दर ताली जैसी है जिसे बजाकर हम अपने शरीर रूपी वृक्ष पर बैठे संशय के पक्षियों को उड़ा सकते हैं। ये पक्षी बार-बार हमारे जीवन में लौटते हैं। राम कहानी का मर्म अपने ही जीवन की ताल में छिपा हुआ है। अपना जीवन जीने के लिए किसी और के हाथ-पाँव काम नहीं आते।
लगता है कि अपनी राम कहानी अपने साथ लेकर चल रहा हूँ। सारी बातचीत अपने आप से है। खुद को खुद से समझना पड़ता है। संसार के सभी प्राणी अपनी संतानों को उनकी प्रकृति के अनुरूप ही पाल-पोस सकते हैं और संसार का सामना करने योग्य बना सकते हैं। जीवन एक रणक्षेत्र है युद्ध का चक्रव्यूह हर पल बदलता रहता है। पता नहीं कब किससे और खुद अपने आप से ही सामना हो जाये। यह रणक्षेत्र मेरे शरीर से बाहर नहीं है। राम-रावण युद्ध मेरे भीतर ही चल रहा है जिसके परिणाम बाहर प्रकट हो रहे हैं। शायद यही एकमात्र बोध है जो अपने आपको देखने में सहायता कर सकता है ।
राम कहानी से गुजरते हुए लगता है कि यह दुनिया एक बहुत बड़ी पार्टनरशिप से चलती आयी है जिसमें पेड़-पौधों, पशु-पक्षियों, नदी-पहाड़ों सहित सभी बहु विश्वासी मनुष्यों की साझेदारी है। यह किसी एक के वश की नहीं कि जो सबको भेड़ों की तरह हाँक ले जाये। खुद एक ईश्वर ने भी सबके दिलों में जगह बनाकर दुनिया के चलते रहने का इंतजाम किया है।    

NEWSFLASH

हिंदी के प्रचार-प्रसार का स्वयंसेवी मिशन। "गर्भनाल" का वितरण निःशुल्क किया जाता है। अनेक मददगारों की तरह आप भी इसे सहयोग करे।

QUICKENQUIRY
Related & Similar Links
Copyright © 2016 - All Rights Reserved - Garbhanal | Yellow Loop | SysNano Infotech | Structured Data Test ^