ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
नए रूप की हिन्दुस्तानी
01-Nov-2017 02:10 PM 1963     

अभी हाल में ही बेंगलुरु मेट्रो के उद्घाटन के मौके पर अप्रत्याशित घटना सुनने को आई। वहां के स्टेशनों पर हिन्दी में लगे साइन बोर्डों का वहां के स्थानीय लोगों ने यह कहकर विरोध शुरू कर दिया कि यह हिन्दी का वर्चस्ववाद है। यहां हिन्दी का क्या काम? जब दिल्ली या उत्तर के अन्य शहरों में कन्नड़ भाषा में कोई साइन बोर्ड की जरूरत नहीं तो यहां भी हिन्दी का बोर्ड नहीं होना चाहिए। मामला यहां तक गंभीर हुआ कि मेट्रो प्राधिकरण को अंतत: हिन्दी बोर्डों को बदलना पड़ गया। मुझे मालूम नहीं कि अंग्रेजी को लेकर कन्नड भद्रजनों का क्या रुख रहा है? लेकिन हिन्दी के बारे में अचानक उभरी इस प्रवृत्ति से करीब आधी शदी पूर्व के द्रविड आंदोलन की याद ताजा हो जाती है, जिसका केंद्रीय तत्व ही हिन्दी, हिन्दू और हिन्दुस्तान का विरोध था। यह आंदोलन कालांतर में कमजोर पड़ता गया और इस तरह की प्रवृत्ति भी माना जाने लगी कि खत्म हो गई है और दक्षिण का संकुचित आंदोलन अपने संकुचन को छोड़कर उदारता की ओर बढ़ चला है।
तब के आंदोलन में उपनिवेशकाल की अंग्रेजी की जगह आजाद भारत की हिन्दी को देश पर लादा गया माना जा रहा था। हिन्दी और उत्तर के वर्चस्व के विरुद्ध द्रविड आंदोलन संविधान सभा के उस प्रस्ताव के विरुद्ध खड़ा था, जिसमें देश की संपर्क भाषा और राष्ट्रभाषा के तौर पर देवनागरी लिपि वाली हिन्दी को स्थापित करने की बात हो रही थी।
हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने का मानस अचानक नहीं पैदा हुआ था। यह राष्ट्रीय संघर्ष के लंबे अंतराल में अनुभवों से पैदा हुई सोच थी, जिसे गैर हिन्दी भाषी नेताओं ने भी अपनाया था। हिन्दी और देवनागरी के लिए आजादी के पूर्व चले आंदोलन का एक अहम लक्ष्य उर्दू का विरोध भी था। इन्हीं पृष्ठभूमि में महात्मा गांधी ने एक कदम आगे बढ़ते हुए उर्दू और हिन्दी के मेलजोल से बनी भाषा को "हिन्दुस्तानी" के रूप में प्रचलित करने पर जोर दिया था।
संविधान सभा में पंडित जवाहरलाल नेहरू अंग्रेजी को संपर्क भाषा बनाए रखने के पक्ष में थे जबकि कांग्रेस के ही अग्रणी पंक्ति के नेताओं, जिनमें गैर हिन्दी अन्य उत्तरी राज्यों और दक्षिणी राज्यों के राष्ट्रीय नेता भी थे, ने हिन्दी को संपर्क भाषा या राष्ट्रभाषा के रूप में रखने की वकालत की थी। इनमें चक्रवर्ती राजगोपालाचारी, सुभाष चन्द्र बोस, सरकार वल्लभ भाई पटेल जैसे चोटी के नेता शामिल थे। इसमें हिन्दी का संख्याबल और इसकी व्यापक पहुंच का भी हाथ था। लेकिन पं. नेहरू के कद के सामने अंग्रेजी को हटा पाना असंभव सा हो गया था। अंतत: राजनीतिक घटनाक्रमों के बीच एक वोट से हिन्दी की जीत हुई। लेकिन नेहरू जी उस पर भी बाड़ लगवाने में कामयाब रहे कि 15 वर्षों तक अंग्रेजी चलती रहेगी। जो बाद में भी चलती ही आ रही है।
द्रविड क्षेत्रों में हिन्दी विरोध को भी कुछ विद्वान इसी घटनाक्रम से जोड़कर उकसाया हुआ आंदोलन मानते हैं, स्वाभाविक नहीं। बाद के दिनों में हम द्रविड आंदोलन के प्रमुख लोगों में शामिल एम. करुणानिधि को भी तमिल के बाद हिन्दी या किसी अन्य भाषा का विरोध नहीं करने का बयान देते सुन चुके हैं। इसके पीछे माना जाता है गैर हिन्दी भाषियों का हिन्दी क्षेत्रों में रोजगार-व्यापार बड़ा कारण है।
खैर, इनको छोड़ वर्तमान पर आते हैं। इसमें हमारे सामने देश का वर्तमान परिदृश्य है, जिसमें टीवी चैनलों पर या अन्य किसी सार्वजनिक अवसरों पर देश के गैर हिन्दी भाषी प्रदेशों के सामान्य जन को भी वैसी हिन्दी में प्रतिक्रिया देते देखते हैं जो उनके मुंह से स्वाभाविक रूप से निकलती रहती है और जिसे भद्र या क्लासिकल हिन्दी दायरे में "टूटी-फूटी" हिन्दी कहा जाता है। ऐसी हिन्दी देश के पूर्वोत्तर राज्यों, केरल, तमिलनाडु, असम, बंगाल के अलावा हाल के रोहिंग्या समस्या के दौरान म्यांमार से आए इन शरणार्थियों में भी देखी-सुनी जा सकती है। रोहिंग्या शरणार्थी शिविरों में बेहद जमीनी स्तर के लोगों को मिली-जुली हिन्दी धड़ल्ले से बोलते सुना जा सकता है। यहां यह कहने में हिचक नहीं है कि क्लासिकल की अवधारणा ही गलत है।
सवाल है कि इस प्रवृत्ति को हम क्या कहेंगे?
वस्तुस्थिति यह है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था और संचार के नित नए विकसित हो अत्याधुनिक माध्यमों के युग में देश तो क्या पूरी दुनिया एक सूत्र में बंधकर सिमटती जा रही है। इसमें कहीं की संस्कृति और भाषा से खुद को अलग कर रखना न तो संभव हो सकता है और न ही यह प्रवृत्ति बुद्धिमानी का बात कही जा सकती है। दुनिया के बाजारवाद की जद में आ जाने और विश्व शक्तियों की घोषित-अघोषित धमकियों के मद्देनजर किसी एक इकाई में बंधे आधुनिक राष्ट्र-राज्यों के लिए नितांत जरूरी हो जाता है कि उसके नागरिकों के बीच निर्बाध और निरंतर संवाद कायम रहे। जाहिर है कि इसका सबसे महत्वपूर्ण अवयव भाषा होगी।
चिरगुलामी के दौर से निकले विशाल और विविधता से परिपूर्ण आबादी और क्षेत्रफल वाले भारत के लिए तो यह और भी जरूरी हो जाता है कि जटिल होती वैश्विक परिस्थिति में उसके नागरिकों के बीच संवाद की निर्बाध निरंतरता कायम रहे। दो दर्जन से अधिक प्रमुख क्षेत्रीय भाषाओं वाले इस देश में लोगों के बीच एक संपर्क भाषा की निहायत ही जरूरत है। इसमें संवाहक कौन-सी भाषा हो सकती है, इस पर विचार महत्वपूर्ण हो जाता है। गुलामी से निकले समाज के लिए क्या अपने महाप्रभुओं की भाषा अंग्रेजी संपर्क के रूप में चुना जाना चाहिए? समाज के ऊपरी और देश की 70 फीसदी संसाधन और सुविधाओं पर अंग्रेजी के बूते काबिज दस प्रतिशत प्रभुत्वशाली वर्ग से इसकी उम्मीद नहीं की जा सकती है। वह इसमें अड़ंगा डालने में भी पीछे नहीं रहेंगे।
लेकिन, देश के हित में यही है कि देसी भाषा में से ही संपर्क भाषा हो। इसके लिए सबसे माकूल हिन्दी ही हो सकती है। इसका स्थान लेनेवाली भाषा देश में दूसरी नहीं हो सकती। इसका कारण कोई शास्त्रीय या उसकी विशिष्टता नहीं है बल्कि वह जनता-जनार्दन है जो आबादी में लगभग देश की जनसंख्या की आधी है और भूभाग दो तिहाई। अगर राष्ट्रभाषा न हो तो (जो मेरे मत में होना भी नहीं चाहिए) संपर्क भाषा के पद पर हिन्दी को बैठाया जा सकता है।
लेकिन क्या यह इतना न्यायोचित और आसान होगा? इस प्रश्न पर कोई भी जिम्मेदार नागरिक हिचक जाएगा। इसके लिए कुछ सावधानियां बरते जाने की जरूरत है तो इसकी संवेदनशीलता पर बहुत ही नरम दिमाग से विचार करने की जरूरत है। अब तक हो चुके मानवीय, भाषाई, सांस्कृतिक विकास को देखते हुए परंपरागत विचार मे कुछ संशोधन करने की जरूरत है।
संस्कृति भाषा में पलती है। सांस्कृतिक विविधता को स्वीकार करने का मतलब है भिन्न-भिन्न भाषाओं और बोलियों के अधिकारों का सम्मान करना। समकालीन भारतीय समाज में इस आदर्श की प्राप्ति के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा है अंग्रेजी का वर्चस्व। जीवन के हर क्षेत्र में अंग्रेजी के बोलबाले से भारतीय भाषाओं की उपेक्षा हुई है। सामाजिक गैरबराबरी मजबूत हुई है और भारतीय सभ्यता की सृजनशीलता का ह्रास हुआ है। इसलिए सार्वजनिक जीवन से अंग्रेजी को हटाना और इसकी जगह भारतीय भाषाओं को प्रतिष्ठित करना भाषाई आंदोलन का एक अनिवार्य अंग होगा। ध्यान रहे कि भारतीय भाषाओं और बोलियों का प्रयोग स्वाभिमान से हो, इन भाषाओं में साहित्य रचना को प्रोत्साहित किया जाए। इनका सहज और स्वस्थ विकास अवरुद्ध न हो और इन सबमें आपसी संवाद और रिश्ता गहरा हो। भारतीय भाषाओं में सबसे बड़ा भाषा समूह होने के नाते हिंदी की यह जिम्मेदारी बनती है कि वह इस काम मे पहल करे और भारतीय भाषाओं में संपर्क सूत्र का काम करे।
1. देश में स्थानीय स्तर पर वहां की भाषाओं को प्रश्रय दिया जाए और उन्हें सशक्त किया जाना चाहिए। यह काम शासन-प्रशासन की भाषा को पूरी तरह अंग्रेजी से मुक्त कर क्षेत्रीय भाषा कर दिया जाए।
2. इसी तरह शिक्षा के क्षेत्र में आमूलचूल परिवर्तन आवश्यक होंगे। जैसे प्राथमिक शिक्षा क्षेत्रीय या मातृभाषा में हो।
3. माध्यमिक स्तर से त्रिभाषा का फार्मूला लागू आवश्यक रूप से किया जाना चाहिए। यह व्यक्ति के भाषाई सांस्कृतिक, मनोवैज्ञानिक विकास के साथ ही राजनीतिक समस्याओं को हल करने में समाधान साबित होगा। होता यह है कि हिन्दी को राष्ट्रभाषा या संपर्क भाषा घोषित करने पर स्वाभाविक तौर पर गैर-हिन्दी भाषी खुद को भाषा के स्तर पर पिछड़ते हुए पाते हैं। साथ ही हिन्दी के वर्चस्व का उनका तार्किक और दमदार आरोप भी मुखर हो जाता है। त्रिभाषा फार्मूले से बच्चों के भाषाई विकास में संतुलन तो होगा ही, उनका दिमागी विकास भी होगा। ऐसा अनेक वैज्ञानिक शोधों में आ चुका है कि दो-तीन भाषा जानने वाले बच्चे एक भाषा पर ही निर्भर रहनेवाले बच्चों के मुकाबले दिमागी तौर पर विकसित होते हैं क्योंकि उनके दिमाग की कसरत भी कई भाषाओं से होती है। जब माध्यमिक स्तर पर त्रिभाषा अपनाना होगा तो जाहिर है गैर हिन्दी भाषी आमतौर पर हिन्दी भी पढ़ेंगे, वहीं हिन्दी भाषी भी भाषाई कूपमंडूकता से निकलकर देश और दुनिया की अन्य भाषाओं से रू-ब-रू होंगे। इसमें राष्ट्रीयता का विस्तार होगा और यह उदार होगी। इस फार्मूले में एक भाषा के रूप में अंग्रेजी आती है तो उससे हमारा विरोध नहीं होना चाहिए।
4. साहित्य निर्माण, राजकाज और मीडिया जैसे अन्य माध्यमों में, जहां माध्यम भाषा हिन्दी है, खुलकर अन्य भाषाओं के शब्दों, उपसर्गो, प्रत्ययों, शब्द और धातु रूपों का प्रयोग हो। इतना ध्यान रहे हि यह बिल्कुल बनावटी न हो बल्कि अन्य भाषाओं में पूरी तरह आत्मसात की जा चुकी हो।
5. गांधी के हिन्दुस्तानी को विस्तार देकर इसे इस तरह की अन्य भाषाओं के शब्दों और रूपों से सुसज्जित किया जाना चाहिए। इसमें उर्दू तो मुख्य रहेगी ही, अंग्रेजी व अन्य देशी-विदेशी भाषाओं के सहज और व्यावहारिक शब्दों का प्रयोग बेहिचक हो।
हिंदी सही अर्थों में राष्ट्रभाषा और संपर्क भाषा तभी बन सकती है जब वह अन्य भारतीय भाषाओं से यह दर्जा पाए। उनसे संवाद करे और खुद उर्दू व अपनी अनेक बोलियों को आत्मसात करें। चूंकि आज के भारत में हो रहे सांस्कृतिक परिवर्तन भी सहज और स्वत:स्फूर्त नहीं हैं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय शक्ति समीकरण और बाजार के नतीजे हैं, इसलिए इसके जहर को काटने के लिए एक संगठित और व्यापक राजनीतिक पहल की जरूरत है।
ऐसे दौर में, जब पूरे देश को एक में जोड़ने की उत्कंठा लोगों में तीव्र होती दिख रही है, इस जुड़ाव का सर्वाधिक महत्वपूर्ण उपकरण भाषा को माना गया है। भाषा हमारे भावों को व्यक्त करती है। इसलिए संस्कृति, सभ्यता से लेकर तमाम भावों की अभिव्यक्ति के लिए भाषा ही वह तत्व है जो इनके उन्नयन में सहायक है तो कभी विचारों और भावों को एकसूत्र में पिरोकर मानव इतिहास को आगे बढ़ाने का संबल बन सकती है।

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