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नया साल मुबारक हो
01-Jan-2016 12:00 AM 1002     

काई पन्द्रह साल पहले की घटना है। महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी वि?ाविद्यालय के दिल्ली केंद्र में एक भद्र महिला आर्इं। बताया गया कि वे अमरीका से आई हैं। बैठते ही उन्होंने शिकायत की कि हालाँकि हम अंतरराष्ट्रीय कहते हैं खुद को लेकिन बाहर बसे भारतीयों के लिए कुछ नहीं करते। वे इससे बहुत चिंतित थीं कि अमरीका जैसी जगह में रहने वाले भारतीयों के बच्चों को भारतीय संस्कृति से जोड़ने के साधन इतने कम हैं! उनका कहना था कि यह हमारा दायित्व है कि हम परदेसी भारतीयों के लिए कुछ करें। उनका ठोस प्रस्ताव था कि त्योहारों से जुड़ी कहानियाँ, गीत आदि की किताबें हम छापें। मैंने कुछ निष्ठुरता से उत्तर दिया था, यह कहते हुए कि यह संस्था भारत के करदाताओं के पैसे से चलती है और जो यहाँ कर न देता हो, उसके लिए अपने संसाधनों का इस्तेमाल करना कुछ तर्कसंगत नहीं लगता। फिर मैंने उनसे कहा कि ऐसा नहीं कि परदेसी भारत में कुछ प्रयासों को पैसे नहीं भेजते। उग्र राष्ट्रवादी संगठनों को खासी मदद उनसे मिलती है। फिर वे वि?ाविद्यालय जैसी संस्था को क्यों न मदद करें जिसके सहारे हम शायद वह भी कर सकें जो वे चाहती हैं! उन्हें मेरी बात बेतुकी लगी और फिर उन्होंने मुझे सुना नहीं। उन भारतीय-अमरीकी महिला की चिंता अपने आप में अतार्किक न थी। आमतौर पर हम कह दिया करते हैं कि अगर आप अपना मुल्क छोड़ किसी दूसरे देश में स्थायी या अस्थायी तौर पर बस गए हैं तो आपकी वफादारी उस मुल्क से होनी चाहिए। खामख्वाह जिस देश को छोड़ने का फैसला कर लिया, उसे लेकर परेशान क्यों हों या उसे परेशान क्यों करें। लेकिन मनुष्य का कहीं बसना इतनी सरल परिघटना नहीं है। लोग कई कारणों से देश छोड़ने का फैसला करते हैं। अक्सर यह किसी-न-किसी प्रकार की साधनहीनता से बाध्य होकर लिया गया निर्णय होता है। संपन्नता के विरुद्ध ईष्र्या को छोड़ दें, तो कह सकते हैं कि समृद्ध घरों के बच्चे-बच्चियां अगर शिक्षा के लिए इंग्लैंड या अमरीका अगर जा रहे हैं तो उनमें से कई वैसे शैक्षणिक अनुभवों के लिए जाते हैं, जो यहाँ उपलब्ध नहीं। जिन्होंने साधन रहने के बावजूद ऐसा न किया या जो एक बार बाहर के बेहतर मौके छोड़ देश लौट आए उन्हें त्यागी ही कहा जाता है। प्रायः देशों का भाग्य ऐसे प्रवासी तय करते हैं। वे लोग जिन्होंने देश छोड़ने का निर्णय किया। भारतीय राष्ट्रवाद की कल्पना दादा भाई नौरोजी, श्यामजीकृष्ण वर्मा, विनायक दामोदर सावरकर,भीकाजी कामा, सरदार सिंह रेवाभाई राणा जैसे नामों के बिना करना असंभव है। मोहनदास करमचंद गांधी के नाम का जिक्र करने की तो ज़रूरत ही नहीं। अपने सक्रिय राजनीतिक या सामजिक जीवन का लगभग एक चौथाई हिस्सा उन्होंने भारत से बाहर गुजारा। इन सबके उलट जवाहरलाल नेहरू को तो आज तक इसके लिये माफ़ नहीं किया गया कि वे शिक्षा के लिए इंग्लैंड क्यों चले गए। अन्य सभी प्रवासी तो भारतीय बने रहे, नेहरू को अब तक एक बड़े शिक्षित समुदाय ने पूरा भारतीय नहीं माना है। लेकिन यह अलग बहस है। यह सब कहने का अर्थ यह है कि प्रवासी हो जाने मात्र से अपने "मूल स्थान' के मसलों पर बोलने या उनमें हस्तक्षेप गैरमुनासिब नहीं हो जाता। प्रवासी समूह अक्सर अपनेे देश को लेकर एक तरह के अपराध बोध से ग्रस्त रहते हैं। मानो, वह ज़मीन छोड़कर उन्होंने उसके साथ गद्दारी की हो। इसकी भरपाई की कोशिश कई तरह से की जाती है। कुछ लोग तो पीढ़ियों बाद अपनी जड़ें तलाशने लौटते हैं और "मातृभूमि' का ऋण अदा करने के लिए काफी कुछ करते हैं। इस मातृभूमि की याद बनाए रखने के लिए काफी जतन किया जाता है। कहानियों, संस्मरणों के माध्यम से उस देश को अपनी अगली पीढ़ी को सुपुर्द किया जाता है। इंग्लैंड में रह रहे बांग्ला देश के प्रवासियों के एक अध्ययन में एक साहब ने बताया कि उनके बच्चे एक निजी स्कूल में जाते हैं जहां उन्हें इतना अधिक गृहकार्य दे दिया जाता है कि उनके पास पिता से बात करने को वक्त नहीं रहता। फिर भी वे हर इक्कीस फरवरी को उन्हें बांग्लादेश की पूरी कहानी बताने का पूरा ख्याल रखते हैं। इससे उनके भीतर एक बांग्लादेशी बनता रहता है जो बाहर से दिखाई नहीं देता। यह उन्हें तब मालूम हुआ जब स्कूल में एक पाकिस्तानी बच्चे ने कहा कि हमने तुम लोगों को आज़ादी दी। इसके जवाब में उन बच्चों ने बताया की दरअसल उसके पाकिस्तान ने किया क्या था। अगर इस बांग्लादेशी चेतना का निर्माण गलत नहीं है तो फिर भारतीय चेतना के निर्माण का प्रयास क्योंकर गलत माना जाए! अगर वे भली महिला त्योहारों और पर्वों की कहानियों के जरिए एक भारत को जीवित करने या रखने की कोशिश कर रही थीं तो इसका तर्क तो था ही। सवाल सिर्फ यह है कि वे पर्व-त्यौहार कौन से हैं। क्या उनमें दीवाली, होली, दुर्गापूजा के साथ ईद, बकरीद, नवरोज़, पोंगल, बिहू शामिल हैं? ऐसा न होने पर कुछ समस्या हो सकती है। इंडियन एक्सप्रेस में एक लेख में इंग्लैंड में रह रहे रमेश वेंकटरमन ने लिखा है कि उनके उत्तर भारतीय मित्र जब दीवाली पर उन्हें नए साल की बधाई देते हैं तो उनकी सांस्कृतिक लापरवाही का पता चलता है क्योंकि तमिल होने के नाते वे तो अप्रैल के महीने में नया साल शुरू करते हैं और उनकी दीवाली भी उत्तर भारत से अलग तारीख पर पड़ती है और उसकी कहानी भी अलग है। रमेश की कहानी सिर्फ यही समझाती है कि भारतीयता को संप्रेषित करना इतना आसान नहीं। वह एक अत्यंत जटिल कल्पना है।

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